रिमोट कंट्रोल – देश की समस्या से दूर, न्यूज़ चैनलों पर नुसरत जहां का सिंदूर

Written by Sakshi Mishra | Published on: July 4, 2019

यह हमारी श्रृंखला “रिमोट कंट्रोल” का चौथा लेख है। हमारा प्रयास है कि टीवी और फिल्म द्वारा समाज में फैलाए जा रहे गलत धारणाओं और अफ़वाहों को उजागर कर सकें। जिससे एक द्वेषहीन व विकारमुक्त समाज की स्थापना की जा सके।



Nusrat Jahan

देश के मीडिया चैनलों पर इन दिनों जल, शिक्षा और रोज़गार से जुड़े मुद्दों के स्थान पर नुसरत जहां के सिंदूर और मंगलसूत्र पर चर्चा की जा रही है। न्यूज़ चैनलों पर हो रहे डिबेट शो को देखकर लगता है, मानो आम आदमी की सभी समस्याओं का समाधान हो चुका है, अब बस मसला सिर्फ नुसरत जहां की साज सज्जा का है। संसद में शपथ ग्रहण समारोह के दौरान TMC नेता नुसरत जहां के पहनावे को किसी ने सराहा तो किसी ने उनके खिलाफ ‘फ़तवा’ ज़ारी कर दिया। इस खबर को लेकर मीडिया ने भी एक चित्रकार की भूमिका निभाते हुए, मामले को अपने हिसाब से एक अलग ही मोड़ देने की पर्याप्त कोशिश की है। हमारा आज का विश्लेषण, हाल ही में ‘आज तक’ न्यूज़ चैनल पर प्रकाशित शो ‘हल्ला बोल’ पर आधारित है।                 


संसद में TMC नेता नुसरत जहां ‘जैन’ धर्म के व्यवसायी निखिल जैन से शादी के बाद साड़ी पहनकर,  सिंदूर व मंगलसूत्र के साथ शपथ ग्रहण करने पहुंची थी। जिस पर एक ओर कुछ लोग, उन्हें ‘गंगा-जमुना’ तहज़ीब का सर्वोत्तम उदाहरण बताने लगे। वहीं दूसरी ओर देवबंद के मौलानाओं ने उनके  खिलाफ कथित रूप से फ़तवा ज़ारी कर दिया। देवबंद के एक मौलाना असद वासमी ने कहा था कि “नुसरत जहां फिल्मों से जुड़ी एक अभिनेत्री हैं और ये लोग धर्म की परवाह नहीं करते, उन्हें जो ठीक लगता है, वे वही करते हैं। हमने संसद में देखा कि उन्होंने क्या किया। वे मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र पहनकर संसद पहुंची थीं। जांच के बाद हमने पाया कि उन्होंने जैन धर्म को मानने वाले शख्स के साथ शादी की है। जबकि इस्लाम के मुताबिक मुस्लिम लड़की सिर्फ मुस्लिम शख्स से ही निकाह कर सकती है।“
इस ख़बर को न्यूज़ चैनलों ने भी काफी तोड़-मरोड़कर दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया। न्यूज़ डिबेट में इस विषय को न सिर्फ व्यक्ति के मौलिक अधिकारों व नारीवादी सोच से जोड़ कर दिखाया जा रहा है, बल्कि इस बात पर भी ज़ोर डाला जा रहा है कि किस तरह से मुस्लिम धर्म के मौलानाओं द्वारा लोगों के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है।
 
फ़तवा क्या है?
न्यूज़ चैनलों में बात बात पर फ़तवा का जिक्र होते हुए देख कर यह जानना ज़रूरी हो गया है कि आखिर फ़तवा है क्या? आसान शब्दों में कहा जाए तो इस्लाम से जुड़े किसी मसले पर क़ुरान और हदीस की रोशनी में जो हुक़्म जारी किया जाए वो फ़तवा है। पैगंबर मोहम्मद ने इस्लाम के हिसाब से जिस तरह से अपना जीवन व्यतीत किया उसकी जो प्रामाणिक मिसालें हैं उन्हें हदीस कहते हैं। यहां ये बात भी साफ़ कर देनी ज़रूरी है कि फ़तवा हर मौलाना या इमाम जारी नहीं कर सकता है। फ़तवा कोई मुफ़्ती ही जारी कर सकता है। मुफ़्ती बनने के लिए शरिया क़ानून, कुरान और हदीस का गहन अध्ययन ज़रूरी होता है। यानी दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम बुख़ारी के भी पास फ़तवा जारी करने का अधिकार नहीं है। शरिया क़ानून से चलने वाले देशों में ही फ़तवे का लोगों की ज़िंदगी पर कोई असर हो सकता है क्योंकि वहाँ इसे क़ानूनन लागू कराया जा सकता है। लेकिन भारत में इस्लामी क़ानून के स्थान संविधान द्वारा स्थापित नियमों का पालन होता है इसलिए यहाँ फ़तवे का कानूनी तौर पर कोई महत्व नहीं है।

नुसरत पर फ़तवे का सच?
अब अगर नुसरत जहां के खिलाफ देवबंद के मौलानाओं के फ़तवे पर चर्चा की जाए, तो यह साफ़ है कि देश में शरिया कानून चलता ही नहीं, इसलिए उनके पास फ़तवा ज़ारी करने का अधिकार ही नहीं है। सिर्फ टीवी पर आने की चाहत में उन्होंने यह गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया। जिसे TRP की भूखी मीडिया ने इतना बढ़-चढ़ कर दिखाया कि यह एक नेशनल मुद्दा बन चुका है। पक्ष और विपक्ष के नेता नुसरत जहां के समर्थन में खड़े हो गए, तो खुद नुसरत जहां मौलाना के फ़तवे को आधारहीन बताने लगी। परंतु, मीडिया द्वारा फैलाई गई इस अपवाह का पूरा सच किसी ने जानने की शायद ही कोशिश की होगी।

FAME और TRP की भूख  
इस मुद्दे पर “आज तक” सहित देश के कई बड़े चैनलों पर चर्चा हुई थी। “आज तक” के शो ‘हल्ला बोल’ में मौलाना शर्फुद्दीन ने नुसरत जहां के खिलाफ कथित रूप से ज़ारी फ़तवे का समर्थन किया। उन्होंने शो के दौरान अन्य अतिथियों की बात बीच में ही रोक-रोक कर एक के बाद एक विवादस्पद बयान दिया। कभी उन्होंने मुस्लिम पोशाक के स्थान पर पहने जाने वाले अन्य सभी परिधानों को बलात्कार का मुख्य कारण बताया। तो कभी उन्होंने भारत के संविधान से ऊपर शरिया कानून को बता दिया। इस पर एंकर ने पूरे शो में उन्हें कम से कम आठ से दस बार उनका माइक बंद करने की धमकी दी, लेकिन TRP की भूख ने उन्हें ऐसा करने से कई बार रोक दिया।            

इस मुद्दे पर हमारी राय
आजकल न्यूज़ चैनलों पर TRP के लोभ में किसी भी राह चलते दाढ़ी टोपी वाले को टीवी पर बैठा कर डिबेट शो कराया जाता है, और उसे मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधि दर्शा कर मुस्लिमों की विचारधारा को “कट्टरपंथी” सिद्ध कर दिया जाता है। मीडिया की नीयत पर सवाल इसलिए खड़ा किया जा रहा है क्योंकि मौलाना शर्फुद्दीन के स्थान पर किसी पढ़े लिखे मुस्लिम आलिम को बुला सकते थे। तब शायद उन्हें ब्रेकिंग न्यूज़ बनाने के लिए मौलाना शर्फुद्दीन के जैसा भड़काऊ बयान न मिल पाता।

हम पत्रकारिता की स्वतंत्रता का सम्मान करने के साथ उसके “दायित्वों” के प्रति भी बेहद सचेत हैं। जिसके अनुसार, न तो किसी धर्म विशेष का बखान किया जाना चाहिए और न ही जानबूझ कर किसी धर्म विशेष को नीचा दिखाने का प्रयास करना चाहिए। नुसरत जहां के मौलिक अधिकार, उन्हें अपनी इच्छा अनुसार कपड़े पहनने, विवाह करने और रीति रिवाज़ का अनुसरण करने की आज़ादी देते हैं। परंतु, इस विषय को लेकर आलोचना न्यूज़ चैनलों की होनी चाहिए। लगभग सभी चैनल पर इस मुद्दे पर बहस की गई, वो भी बिना किसी सम्मानीय व जानकार मुफ़्ती को शामिल किए। क्या कोई आम मौलाना या पंडित धर्म की गहराई को बारीकी से समझे बिना, धर्म का प्रतिनिधित्व करने के योग्य हो सकता है? हमारे हिसाब से इस दायित्व को सिर्फ वह ही पूरा कर सकता है, जिसने धर्म के आध्यात्मिक महत्वों को समझते हुए लोक कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया हो। बजाय उन मौलवियों के जो टीवी पर कुछ दिनों की शोहरत पाने के लिए, निराधार और विवादपस्त बयान देते रहते हैं।                                      
इस प्रकार से, इन मौलानाओं की राय को ‘फ़तवा’ कह कर, अफ़वाह फैलाना इस्लाम धर्म की गरिमा को ठेंस पहुंचाना है। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ मौलानाओं ने इसका ग़लत इस्तेमाल किया है। परंतु, समाज में किसी विशेष धर्म को नीचा दिखा कर सांप्रदायिकता का रूप देना,कहीं से भी देश के हित में नहीं है। भारतीय संविधान का चौथा मुख्य स्तंभ मीडिया को माना जाता है, ऐसे में मीडिया द्वारा इन निराधार मसलों पर यूं बहस करने से लगता है कि अब न्यूज़ चैनलों का रिमोट कंट्रोल उन शक्तियों के हाथों में है जिन्हें समाज के ध्रुवीकरण से लाभ होता है।