भारत में प्रजनन दर गिरी, शिक्षा के साथ सामाजिक आर्थिक कारण है अहम, धर्म नहीं

Written by Navnish Kumar | Published on: May 14, 2022
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रजनन दर गिरकर 2 पर आ गई है। प्रजनन दर यानी एक महिला के पूरे जीवन में होने वाले बच्चों की औसत संख्या। पिछले सर्वे यानी एनएफएचएस 4 में यह आंकड़ा 2.2 था। यही नहीं, एनएफएचएस के ताजा आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में सभी समुदायों में प्रजनन दर गिर गई है। ...विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय में सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई है।



विगत हफ्ते केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS) की रिपोर्ट जारी की। इससे पता चला है कि भारत में तेजी से बढ़ती जनसंख्या की गति कम हुई है। सर्वे के आंकड़ों को देखें तो 2015-2016 में हुए NFHS-4 में जहां फर्टिलिटी रेट 2.2 थी, वहीं NFHS-5 में ये घटकर 2.0 पहुंच गई है। रिप्लेसमेंट स्तर से भी नीचे। 1992-93 में जब एनएफएचएस की शुरुआत हुई थी, तब राष्ट्रीय प्रजनन दर 3.4 थी। सर्वेक्षण के ताजा दौर तक इसमें 40 प्रतिशत गिरावट आई है। अब यह प्रतिस्थापन स्तर से भी नीचे आ गई है। प्रतिस्थापन स्तर यानी वो स्तर जहां बस उतने ही बच्चे पैदा होते हैं जिनसे आबादी स्थिर रह सके।

अगर धर्म के आधार पर प्रजनन दर देखें तो अंग्रेज़ी दैनिक टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक मुसलमानों को छोड़कर सभी समुदायों का कुल प्रजनन दर, अब देश के मौजूदा प्रजनन दर औसतन 2 से कम है। इसमें केवल मुस्लिम वर्ग का कुल प्रजनन दर 2.36 है। हिंदू वर्ग का प्रजनन दर 1.94 है।

हिंदू धर्म में प्रजनन दर देखें तो सर्वे-1 यानी 1992-93 में 3.3, सर्वे-2 में 1998-99 में 2.78, सर्वे-3 में 2005-06 में 2.59, सर्वे-4 में 2.13 और साल 2019-21 में हुए पांचवें सर्वे में घटकर 1.94 हो गया।

जनसंख्या वृद्धि की दर को लेकर एक सवाल आम है कि मुस्लिमों की प्रजनन दर अधिक होती है। लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के सर्वे से पता चलता है कि मुस्लिम वर्ग के प्रजनन दर में सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई है। सर्वे के मुताबिक मुस्लिम वर्ग में प्रजनन दर जहां 1992-93 में 4.4 थी तो वहीं 2015-16 में यह 2.6 रह गई। इसके अलावा ताजा 2019-21 सर्वे में यह दर 2.3 दर्ज की गई है।

दूसरे समुदायों में प्रजनन दर और नीचे है। हिन्दुओं में यह 1.94 है, ईसाइयों में 1.88, सिखों में 1.61, जैनों में 1.6 और बौद्धों और नव बौद्धों में 1.39 है।

मुस्लिम वर्ग में प्रजनन दर का सबसे बड़ा कारण के पीछे भले धर्म को आधार कहा जाता रहा हो लेकिन ताजा सर्वे से पता चला है कि अधिक बच्चे पैदा के पीछे धर्म से अधिक उनकी शिक्षा और आर्थिक कारण अधिक प्रभावी हैं। सर्वे में पाया गया है कि महिलाओं के अधिक शिक्षित होने पर वे कम बच्चे पैदा कर रही हैं। आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। देखें तो प्रजनन दर में गिरावट सभी समुदायों में आई है, लेकिन मुस्लिम समुदाय में यह सबसे तेजी से गिरी है। एनएफएचएस के पिछले दौर से इस दौर के बीच मुसलमानों में प्रजनन दर 9.9 प्रतिशत गिरी है। 1992-93 में मुसलमानों में प्रजनन दर 4.4 थी जो अब गिर कर 2.3 पर आ गई है।

ज्यादा प्रजनन दर के पीछे शिक्षा की बड़ी भूमिका रही है। एनएफएचएस के मुताबिक महिलाओं की शिक्षा का प्रजनन दर से सीधा रिश्ता है। प्रति महिला बच्चों की संख्या महिलाओं के स्कूल जाने के स्तर के हिसाब से गिरी है। जो महिलाएं कभी स्कूल नहीं गईं उनके औसतन 2.8 बच्चे हैं और जो 12 या उससे ज्यादा सालों तक स्कूल गई हैं उनके 1.8 बच्चे हैं। जनसत्ता की एक खबर के भी अनुसार, शिक्षा के आधार पर आंकड़ों पर गौर करें तो 4 में से एक मुस्लिम महिला ऐसी हैं जो कभी स्कूल नहीं गई हैं। वहीं 5 में से 1 ऐसी हैं जो 12 तक स्कूल गई हैं। आंकड़ों के मुताबिक स्कूल ना जाने वाली महिलाओं में औसतन प्रजनन दर 3.57 है तो वहीं 12 तक स्कूल जाने वाली महिलाओं की औसत दर 1.97 है। ऐसे में साफ है कि प्रजनन दर के कम-ज्यादा होने में शिक्षा का अहम रोल है। शिक्षा के मामले में इस तरह का पिछड़ापन भारत में किसी और धर्म के लोगों के बीच नहीं है।

जो महिलाएं कभी स्कूल नहीं गईं    2.82
5वीं से कम                                     2.3
5वीं से 7वीं                                      2.21
8वीं से 9वीं                                      2.12
10वीं से 11वीं                                  1.88
12वीं से अधिक                               1.78

इसके अलावा कई अन्य आर्थिक सामाजिक कारण भी हैं। सामाजिक वातावरण के आधार पर देखें तो सर्वे से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में हिंदू महिलाओं का जन्म दर 2.29 है लेकिन तमिलनाडु में रहने वाली मुस्लिम महिलाओं का जन्म दर 1.93 है। इस आधार पर समझा जा सकता है कि जन्म दर के मामले में सामाजिक वातावरण का भी असर होता है। आर्थिक स्तर पर देखें तो सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक तरक्की से भी प्रजनन दर में सुधार आता है। आर्थिक दृष्टि से सबसे निचले पायदान पर खड़ीं औरतें सबसे ऊंचे पायदान वाली औरतों के मुकाबले औसतन 1.0 ज्यादा बच्चे पैदा करती हैं।

वर्गवार         प्रजनन दर

          NFHS-1          NFHS-2           NFHS-3                NFHS-4       NFHS-5
हिंदू            3.3                 2.78                 2.59                2.13              1.94
मुस्लिम     4.41               3.59                  3.4                  2.62              2.36
ईसाई         2.87               2.44                  2.34                1.99              1.88
सिख          2.43              2.66                   1.95                1.58              1.61
बौद्ध           NA                2.13                 2.25                 1.74               1.39
जैन           NA                1.9                   1.54                  1.2                 1.56

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