1857 की क्रांति के नायक, गंगा जमुनी तहजीब के पैरोकार मौलवी अहमदुल्ला शाह

Written by Sabrangindia Staff | Published on: June 11, 2022
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम-1857 में यदि किसी एक व्यक्ति की सबसे उल्लेखनीय भूमिका रही तो वह मौलवी अहमदुल्ला शाह हैं।



डंका शाह / नक्कार शाह / मौलवी अहमदउल्लाह। ये अलग अलग व्यक्ति नहीं बल्कि एक ही थे जो 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के महानायक के तौर पर पहचाने जाते हैं। मिज़ाज से फकीर मौलवी अहमदउल्लाह शाह को अवध के हीरो के तौर पर भी पहचाना जाता है।  

शाह को एक ऐसे रहस्यमयी लीडर के रूप में जाना जाता जिन्हें अंग्रेज पकड़ते मगर वह हर बार रेत की तरह उनकी मुट्ठी से निकल जाते। जब तक एक हुलिया दिमाग में बैठाते, उनका हुलिया बदल जाता। फैज़ाबाद में जब उन्हें आजीवन कारावास देकर कैद किया, तो वह कैद हो गए। 1857 की क्रांति का बिगुल बजा तो वे जेल से बाहर आ गए।

मौलवी अहमदुल्लाह उर्दू, अरबी, फारसी, हिंदी और अंग्रेजी और फ्रेंच समेत कई भाषाओं के जानकार थे। वे अद्भुत संगठनकर्ता थे। 1857 की क्रांति के समय वे घूम-घूमकर राजाओं, नवाबों और क्रांतिकारियों के संगठित कर रहे थे। वे 1857 के भारतीय विद्रोह के प्रमुख व्यक्ति थे इसीलिए शाह को 1857 के विद्रोह का लाइटहाउस कहा जाता है।

अहमदुल्ला शाह की साहस, बहादुरी, व्यक्तिगत और संगठनात्मक क्षमताओं का उल्लेख करते हुए ब्रिटिश अधिकारी थॉमस सीटन ने कहा, "महान क्षमताओं का एक आदमी, निर्विवाद साहस, कठोर दृढ़ संकल्प, और विद्रोहियों के बीच अब तक का सबसे अच्छा सैनिक।"

मौलवी अहमदुल्ला का जन्म 1787 में हुआ था। परिवार मूलत: हरदोई का रहने वाला था लेकिन कालांतर में फैजाबाद में बस गया था। उनके पिता गुलाम हुसैन खान हैदर अली की सेना में एक वरिष्ठ अधिकारी थे। मौलवी एक सुन्नी मुस्लिम थे और समृद्ध परिवार के थे। वह अंग्रेजी अच्छी जानते थे। हिंदू-मुस्लिम एकता के पैरोकार अहमदुल्लाह शाह के नेतृत्व में 1857 के विद्रोह में, नाना साहिब और खान बहादुर खान जैसे रॉयल्टी लड़े।
 
मौलवी का मानना ​​था कि सशस्त्र विद्रोह की सफलता के लिए, लोगों का सहयोग बहुत महत्वपूर्ण था। उन्होंने दिल्ली, मेरठ, पटना, कलकत्ता और कई अन्य स्थानों की यात्रा की और आजादी के बीज बोए। मौलवी और फजल-ए-हक खैराबादी ने भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह घोषित किया। उन्होंने 1857 में विद्रोह के विस्फोट से पहले भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की आवश्यकता के लिए फतेह इस्लाम नामक एक पुस्तिका लिखी थी।

मौलाना खुद अपने लिखे हुए क्रांतिकारी पर्चे को गाँव गाँव जाकर पहुंचाते थे। 1856 में जब वे लखनऊ पहुंचे तो पुलिस ने उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों को रोक दिया। प्रतिबन्ध के बावजूद जब उन्होंने लोगों को आज़ादी की लड़ाई के लिए उकसाना बंद नही किया तो 1857 में उन्हें फ़ैजाबाद में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। 

जेल से छूटने के बाद उन्होंने लखनऊ और शाहजहांपुर में लोगों को फिर से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए जगाना शुरू कर दिया। जंग ए आज़ादी के दौरान मौलाना को विद्रोही स्वतंत्रता सेनानियों की उस 22वीं इन्फेंट्री का प्रमुख बनाया गया जिसने चिनहट की प्रसिद्ध लड़ाई में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना से एक बहुत ही जबरदस्त जंग लड़ी। इस जंग में ब्रिटिश सेना को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। जंग के बाद उन्हें जीते जी ब्रिटिश इंटेलिजेंस और पुलिस नही पकड़ पाई और वो जीते जी अवाम के हर दिल अज़ीज़ बन गए।

जी बी मॉलसन के मुताबिक, "यह संदेह से परे है कि 1857 के विद्रोह की षड्यंत्र के पीछे, मौलवी के मस्तिष्क और प्रयास महत्वपूर्ण थे। अभियान के दौरान रोटी का वितरण, चपाती आंदोलन वास्तव में उनका दिमाग था। इस आंदोलन ने लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

15 मई 1858 को विद्रोहियों और जनरल ब्रिगेडियर जोन्स की रेजिमेंट के बीच भयंकर लड़ाई हुई। दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा लेकिन विद्रोहियों ने अभी भी शाहजहांपुर को नियंत्रित किया था। कॉलिन 20 मई को शाहजहांपुर पहुंचे, और सभी तरफ से शाहजहांपुर पर हमला किया। यह लड़ाई पूरी रात जारी रही। मौलवी और नाना साहिब ने शाहजहांपुर छोड़ दिया। ऐसा कहा जाता है कि कॉलिन ने खुद मौलवी का पीछा किया लेकिन उसे पकड़ नहीं सका।

अंग्रेजों ने पचास हज़ार चांदी के सिक्कों का ईनाम रखा, कहा- जो डंका शाह का सर लाएगा वह यह ईनाम तो पाएगा ही, अंग्रेज़ो का सम्मान भी हासिल करेगा। दोस्त ने ईनाम की लालच में ईमान बेच दिया। महल में घुसते ही चमकते माथे पर चुपके से उसके भाई ने छिपकर गोली चला दी, मौलवी गिर गए। जिसका अंग्रेज कुछ कर न सके, उसकी पीठ पर दोस्त ने खँजर मारा और गर्दन उतार ली।  

15 जून 1858 को क्रांतिकारी मौलवी अहमद उल्ला शाह की पुवायां के पास जब शहादत हुई तो उनका सिर धड़ से अलग कर दिया गया और उसे कोतवाली गेट पर लटका दिया गया। ताकि कोई बगावत की हिम्मत न जुटा सके। लेकिन क्रांति की धारा इतनी तेज थी कि कुछ नौजवान कोतवाली से उनका सिर उठा ले गए, जिससे लोधीपुर में दफ्न कर दिया गया।

यह धरा ऐसे ही लाखों वीरों की गाथाओं से भरी पड़ी है लेकिन अफसोस की बात है कि उन्हें अब बहुत ही कम लोग जानते हैं। भारत को आजाद कराने के लिए लाखों कुर्बानियां हुई हैं। 

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