बदलती व्यवस्था और आदिवासी अस्तित्व की चुनौतियाँ

Written by Amrita pathak | Published on: August 9, 2020
आदिवासी समाज सदियों से तत्कालीन स्थापित व्यवस्था में राष्ट्र के लिए एक आकर्षक एजेंडे में से एक है. आदिवासी या अनुसूचित जनजाति एक प्रशासनिक शब्द है जिसका उपयोग ऐतिहासिक रूप से वंचित और पिछड़े ’माने जाने वाले विशिष्ट वर्गों के लिए किया जाता है जिसे  कुछ विशिष्ट संवैधानिक विशेषाधिकार, संरक्षण और लाभ की बात की गयी है। आदिवासी समाज लगातार अपने अस्तित्व व् अस्मिता के लिए संघर्षरत रहा है. तथाकथिक सभ्यता और संस्कृति ने उनके सामने दो ही रास्ते छोड़े हैं या तो वे अपनी अस्मिता, अपना इतिहास व् परंपरा को मिटा कर मुख्य धारा की वर्चस्ववादी संस्कृति को स्वीकार कर ले या अपना अस्तित्व मिट जाने के लिए अभिशप्त हो जाएँ. पेरू के माची ग्वेंकाओ, झारखण्ड के बिरहोर, शबर, असुर, राजस्थान के सहरिया आदिवासी की संख्यां में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. विकास और बाजार के समन्वय का आलम आज यह है कि अंडमान निकोबार द्वीप समूह के जारवा और आंजे समुदाय को चिड़ियाँघर में बंद वन्य जंतुओं की तरह पर्यटन और विस्मय की वस्तु बना कर नुमाइश तक की जा रही है. दुनिया भर में आदिवासी के अधिकारों को बढ़ावा देने व् उनकी रक्षा करने के लिए प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को आदिवासी दिवस मनाया जाता है.



अपने गठन के 50 साल बाद संयुक्त राष्ट्र संघ ने यह महसूस किया कि 21वीं सदी में भी विश्व के विभिन्न देशों में निवासरत जनजातीय आदिवासी समाज अपनी उपेक्षा, गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा का अभाव, बेरोजगारी एवम बंधुआ मजदुर जैसी समस्याओं से ग्रसित है.  जनजातीय समाज की इन समस्याओं के निराकरण हेतु विश्व ध्यानकर्षण के लिए 1994 में  संयुक्त राष्ट्र संघ के महासभा द्वारा प्रतिवर्ष 9 अगस्त को आदिवासी दिवस मनाने का फैसला लिया गया. १३ दिसम्बर  2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मूलनिवासी लोगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा को अपनाया जो कि मूलनिवासी लोगों और सदस्य राज्यों के बीच सहयोग और एकता के संबंध में एक प्रमुख मील का पत्थर है हालाँकि भारत में कागज़ों पर आदिवासी समाज राष्ट्र की जनता के तौर पर देखा जाता रहा है जबकि उनकी स्थिति आज भी सीढी के निचले पायदान पर पड़ी देखि जा सकती है.
भारत का संविधान, जो 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया, धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव को रोकता है (अनुच्छेद 15) और यह धर्म की स्वतंत्रता के लिए समानता (अनुच्छेद 14) का अधिकार प्रदान करता है। भारत में 5653 अलग-अलग समुदायों में से, 635 को 'जनजाति' या 'आदिवासी' माना जाता है। दुनिया के सबसे बड़े "आधुनिक लोकतंत्र" में आज भी आदिवासी समाज की स्थिति दयनीय बनी हुई है. 

यह समाज सदियों से जल जंगल जमीन से जुड़ा हुआ है जो इनके अस्तित्व का सार है. विश्व के सभी आदिवासी समुदाय एक जैसे नहीं हैं। वे विभिन्न ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों के उत्पाद हैं। वे अलग-अलग भाषा परिवारों के हैं, और इनके कई अलग-अलग नस्लीय और धार्मिक साँचे हैं। उन्होंने हज़ारों सालों से खुद को सामंती राज्यों और जातिवादी, ब्राह्मणवादी पदानुक्रमों से अलग रखा है।

ऐतिहासिक रूप से आदिवासियों का स्वशासित राष्ट्र रहा है पूर्व औपनिवेशिक काल तक वे सम्बंधित राज्यों के अज्ञात सीमान्त का हिस्सा थे जो किसी भी शाशक के पहुच से बाहर था. अंग्रेजों के स्थायी बंदोबस्त और "ज़मींदारी" प्रणाली की स्थापना के साथ राजस्व संग्रह के उद्देश्य से निर्दिष्ट सामंती शासकों  ने आदिवासी क्षेत्रों सहित विशाल क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित किया. हिन्दू समाज और धर्मग्रंथों में भी इस समाज को सामाजिक पदानुक्रम में सबसे निचले पायदान पर रखा है. आजादी के बाद आदिवासी समाज को कुछ विशेषाधिकार राज्य द्वारा प्रदत जरुर किए गए लेकिन जमीनी हकीकत इससे इतर रही है. आदिवासी क्षेत्रों पर आक्रमण, जो औपनिवेशिक काल के दौरान शुरू हुए वो उपनिवेशवाद के बाद के काल में और तेज हुआ। राज्य द्वारा अधिकांश आदिवासी क्षेत्रों पर दावा किया गया। 10 मिलियन से अधिक आदिवासियों को विकास परियोजनाओं जैसे बाँध, खनन, उद्योग, सड़क, संरक्षित क्षेत्र आदि के लिए रास्ता बनाने व् देश की तरक्की करने के नाम पर विस्थापित किया गया है।


आदिवासियों के विस्थापन का सिलसिला वर्तमान में पूजीवादी उदारवादी नीतियों के कारण बदस्तूर जारी है. उदारीकरण की नीतियों ने बाजारवाद के लिए रास्ते खोल दिए. बाजार जो की मुनाफे पर टिकी होती है उन्होंने आदिवासियों को जल जंगल जमीन व् संसाधनों से तेजी से बेदखल करना शुरू कर दिया. 

विकास के नाम पर अपने पैतृक क्षेत्रों से ये लोग बेदखल किए गए.  यह दुखद है कि जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 1993 को ‘देशज लोगों का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष’के रूप में मनाने का फैसला किया तो भारत सरकार की प्रतिक्रिया थी- ‘संयुक्त राष्ट्र द्वारा परिभाषित इंडिजिनस लोग भारतीय आदिवासी या अनुसूचित जनजातियां नहीं हैं, बल्कि भारत के सभी लोग देशज लोग हैं और न यहां के आदिवासी या अनुसूचित जनजाति किसी प्रकार के सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक पक्षपात के शिकार हो रहे हैं।’
दरअसल पूरा मसला आदिवासियों को आत्मनिर्भरता का अधिकार नहीं देने का था. कभी मुंबई में बुलेट ट्रेन चलाने को लेकर, पोस्को में स्टील प्लान बनाने को लेकर, कभी बाँध निर्माण व् अन्य राज्यों में छदम विकास के नाम पर देश के संसाधनों को पूंजीपतियों के हाथों में बेचने की सरकारी साजिस के ख़िलाफ़ लगातार आदिवासी समाज संघर्षरत है. 

वर्तमान में संघ समर्थित बीजेपी की सरकार ने भी विकास के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों, जो की संसाधनों से परिपूर्ण है वहां कॉर्पोरेट लुट को जारी रखा है या यूँ कहें कि यह लुट दुगुनी गति से बढ़ गयी है. पूंजीपतियों की गोद में बैठ कर सत्ता में आई सरकार ने जब देश के सार्वजानिक सम्पति को कॉर्पोरेट के हाथ में बेचने से गुरेज नहीं किया है तो इनसे देश के संसाधनों के रक्षा की उम्मीद करना भी बेईमानी है. देश की बदलती राजनितिक व्यवस्था ने इस समाज की चुनौतियों को बढ़ा दिया है. पहले आदिवासी समाज जल जंगल जमीन की लड़ाई लड़ रहे थे अब संघ समर्थित सरकार के हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना के तले इनका अस्तित्व भी खतरे में है जो खुद को हमेशा से हिन्दू धर्म से अलग मानते आए हैं. 

आदिवासियों पर लगातार हो रहे दमन के विरोध में सदियों तक विद्रोह होता रहा है लेकिन वह मौखिक ही अधिक रही है वह लिखित इतिहास व् साहित्य का रूप नहीं ले सका, संचार माध्यमों के आभाव में वह राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय रूप धारण नहीं कर सका हालाँकि बदलते वक्त के साथ और सुचना क्रांति के इस दौर में आदिवासी साहित्य और संघर्ष देश और दुनिया के सामने आ रही है. सदियों से देश के लिए समर्पित और संघर्षरत इस समाज के समृद्ध पारंपरिक संस्कृति के बारे में जानना देश के लोगों के लिए गौरव की बात है.

बाकी ख़बरें