Bombay HC: महाराष्ट्र सरकार और पुलिस को UK के डॉक्टर पाटिल की याचिका पर नोटिस, LOC और FIR रद्द करने की मांग

Written by sabrang india | Published on: January 23, 2026
बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को राज्य सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर यूके के डॉक्टर और यूट्यूबर संग्राम पाटिल की याचिका पर जवाब मांगा है। जाने-माने डॉक्टर और महाराष्ट्र के रहने वाले पाटिल को 10 जनवरी को मुंबई एयरपोर्ट पर पहुंचने पर हिरासत में लिया गया था और बाद में 19 जनवरी को उन्हें यूके जाने से रोक दिया गया था।



बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार, 22 जनवरी को राज्य सरकार और महाराष्ट्र पुलिस को नोटिस जारी कर यूके के डॉक्टर और यूट्यूबर संग्राम पाटिल की याचिका पर जवाब मांगा है। पाटिल ने बीजेपी नेताओं के खिलाफ कथित आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर अपने खिलाफ जारी LOC और FIR—दोनों—को रद्द करने की मांग की है। एरंडोल के रहने वाले और भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक पाटिल ने आरोप लगाया है कि मुंबई पुलिस द्वारा उनके खिलाफ जारी लुक-आउट सर्कुलर (LOC) अवैध था।

जस्टिस अश्विन डी. भोबे की सिंगल-जज बेंच ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई 4 फरवरी को तय की। सीनियर एडवोकेट सुदीप पासबोला ने डॉ. पाटिल का प्रतिनिधित्व किया और कहा कि इस मामले में तात्कालिक सुनवाई की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि उनके मुवक्किल स्वयं यूके से भारत आए थे और उन्हें अपने खिलाफ दर्ज FIR की जानकारी नहीं थी।

राज्य सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे ने कहा कि पाटिल “अन्य (सोशल मीडिया) पोस्ट से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं और एजेंसी के साथ सहयोग नहीं कर रहे हैं।” साठे ने कहा कि याचिका का जवाब, यदि कोई हो, तो एक सप्ताह के भीतर दाखिल किया जाएगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 10 जनवरी को मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचने पर पाटिल को हिरासत में लिया था। 15 घंटे की पूछताछ के बाद, 10 दिन बाद 19 जनवरी को उन्हें यूके जाने से रोक दिया गया। 21 जनवरी को उन्होंने पुलिस के समक्ष अपना दूसरा बयान दर्ज कराया।

पाटिल पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 353(2) के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से समुदायों के बीच दुश्मनी और नफरत की भावना पैदा करने वाले बयान, झूठी जानकारी या अफवाहें प्रकाशित/प्रसारित करने पर अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान है। जिस सोशल मीडिया पोस्ट पर अधिकारियों ने इतनी कड़ी प्रतिक्रिया दी है, वह कथित तौर पर बीजेपी के वरिष्ठ पदाधिकारियों से संबंधित था।

मुंबई के एन.एम. जोशी मार्ग पुलिस स्टेशन ने बीजेपी मीडिया सेल के पदाधिकारी निखिल भामरे की शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की। शिकायत में दावा किया गया कि 14 दिसंबर को ‘शहर विकास अघाड़ी’ नाम के एक फेसबुक पेज पर बीजेपी और उसके नेताओं के बारे में गलत जानकारी वाली आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट की गई थी। डॉ. पाटिल का कहना है कि उन्होंने केवल सुब्रमण्यम स्वामी सहित अन्य नेताओं की एक पोस्ट को फॉरवर्ड किया था, जिसमें मात्र यह सवाल किया गया था कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

याचिका

भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के तहत यह रिट याचिका दायर की गई है। इसमें मुंबई के एन.एम. जोशी मार्ग पुलिस स्टेशन में धारा 353(2) BNS के अंतर्गत दर्ज FIR संख्या 0672/2025 (दिनांक 18/12/2025) को रद्द करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि विवादित FIR फेसबुक पर कथित पोस्ट पर आधारित है, जो तथ्यों के बयान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती है। FIR में किसी संज्ञेय अपराध के आवश्यक तत्व नहीं बताए गए हैं; आपराधिक मंशा का अभाव है; किसी हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था का आरोप नहीं है; और यह स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण है, जिसे असहमति को दबाने के लिए एक राजनीतिक पदाधिकारी द्वारा दायर किया गया है। आगे कहा गया है कि जांच जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और यह State of Haryana v. Bhajan Lal में निर्धारित मानदंडों के अंतर्गत आता है।

याचिका में डॉ. पाटिल ने 18 दिसंबर, 2025 को एन.एम. जोशी मार्ग पुलिस स्टेशन में उनके खिलाफ जारी LOC और FIR संख्या 0672/2025—दोनों—को रद्द करने की मांग की है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि FIR में हिंसा भड़काने, सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा या सार्वजनिक शांति भंग करने का कोई आरोप नहीं है। शिकायत या FIR में यह उल्लेख नहीं है कि किस धार्मिक, नस्लीय, भाषाई या क्षेत्रीय समूह/जाति/समुदाय के विरुद्ध कथित पोस्ट से नफरत या दुर्भावना को बढ़ावा दिया गया। FIR यह भी स्पष्ट नहीं करती कि किस प्रकार ‘अनुयायियों की चुप्पी’ जैसी टिप्पणी झूठी जानकारी/अफवाह या चिंताजनक खबर है, अथवा उससे दुश्मनी, नफरत या दुर्भावना कैसे उत्पन्न हुई या हो सकती है। साथ ही, विवादित FIR में कथित पोस्ट का हूबहू विवरण, सटीक शब्द, संदर्भ या सामग्री भी नहीं दी गई है, जिससे धारा 353(2) BNS के अपराध का गठन होता हो। आरोप पूर्णतः व्यक्तिपरक हैं और राजनीतिक असहमति से उपजे हैं।

याचिका में यह भी कहा गया है कि FIR का सबसे व्यक्तिपरक पहलू यह है कि कथित पोस्ट से किस नेता को बदनाम किया गया, इसका उल्लेख ही नहीं है। शिकायतकर्ता द्वारा पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बारे में केवल एक अस्पष्ट आशंका व्यक्त की गई है। इसके बाद याचिका में लागू धारा 353(2) BNS का हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि—

“(2) जो कोई भी, धर्म, नस्ल, जन्म स्थान, निवास, भाषा, जाति या समुदाय या किसी भी अन्य आधार पर, अलग-अलग धार्मिक, नस्लीय, भाषाई या क्षेत्रीय समूहों या जातियों या समुदायों के बीच दुश्मनी, नफरत या दुर्भावना पैदा करने या बढ़ावा देने के इरादे से, या जिससे ऐसी भावनाएं पैदा होने या बढ़ावा मिलने की संभावना हो, झूठी जानकारी, अफवाह या सनसनीखेज खबरों वाला कोई बयान या रिपोर्ट बनाता है, प्रकाशित करता है या प्रसारित करता है—जिसमें इलेक्ट्रॉनिक माध्यम भी शामिल हैं—उसे तीन साल तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों से दंडित किया जाएगा।”

याचिका में कहा गया है कि विवादित धारा के तहत तीन आवश्यक तत्व होते हैं:
(i) बयान झूठा/अफवाह/सनसनीखेज होना चाहिए;
(ii) उससे दुश्मनी, नफरत या दुर्भावना उत्पन्न होनी चाहिए; और
(iii) वह किसी विशिष्ट धार्मिक/नस्लीय/भाषाई/क्षेत्रीय समूह, जाति या समुदाय से संबंधित होना चाहिए। कथित पोस्ट में इनमें से कोई भी तत्व पूरा नहीं होता।

इसके अतिरिक्त, याचिका में कहा गया है कि FIR कथित पोस्ट की तारीख के कई दिनों बाद बिना किसी उचित कारण के दर्ज की गई, जबकि सामग्री सार्वजनिक रूप से उपलब्ध थी। प्रतिवादी संख्या 5 एक राजनीतिक पार्टी का सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर है और शिकायत राजनीतिक भय से प्रेरित है—“लोगों की आवाज़ को डराने, परेशान करने और चुप कराने के एकमात्र उद्देश्य से।” याचिकाकर्ता को किसी अपराध के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए उदाहरण बनाने और भय का संदेश देने के लिए परेशान किया जा रहा है।

आगे कहा गया है कि “एन.एम. जोशी मार्ग पुलिस स्टेशन के पुलिस निरीक्षक, श्री विलास राणे (प्रतिवादी संख्या 1) ने बिना किसी प्रारंभिक पूछताछ या जांच के, जल्दबाजी में FIR दर्ज की, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने दुर्भावनापूर्ण मंशा से और पुलिस शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए, प्रतिवादी संख्या 5 के कहने पर कार्रवाई की।”

दर्ज FIR के बाद जारी दोनों LOC को रद्द करने की मांग करते हुए डॉ. पाटिल ने कहा है कि “LOC के अवैध और अनावश्यक जारी होने” के कारण उन्हें असुविधा, मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और मानहानि का सामना करना पड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि फ्लाइट छूटने और अपने कार्यस्थल पर समय पर न पहुंच पाने के कारण उन्हें वित्तीय नुकसान हुआ। LOC का जारी रहना प्रक्रिया को सजा के रूप में इस्तेमाल करते हुए उत्पीड़न को जारी रखना है। किसी भी स्थिति में, याचिका के अनुसार, यह FIR “राजनीतिक प्रतिशोध और भिन्न राजनीतिक विचारों/राय को दबाने के लिए आपराधिक कानून के दुरुपयोग का उदाहरण” है।

राज्य सरकार से एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल किए जाने की उम्मीद है और अगली सुनवाई मंगलवार, 4 फरवरी को निर्धारित है।

Related

जुलूस के दौरान दरगाह की ओर तीर का इशारा करने पर हिंदुत्ववादी नेता हर्षिता सहित अन्य के खिलाफ मामला दर्ज

ओडिशा में पादरी पर अमानवीय हमला: सार्वजनिक प्रताड़ना और जबरन गोबर खिलाने के बावजूद कोई गिरफ्तारी नहीं

बाकी ख़बरें