आर्कोट के प्रिंस नवाब मोहम्मद अब्दुल अली ने इस परंपरा की सराहना करते हुए इसे हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी सम्मान का जीवंत उदाहरण बताया है। दादा रतनचंद के निधन के बाद भी यह परंपरा राम देव जैसे सामुदायिक नेताओं और समर्पित स्वयंसेवकों की टीम की देखरेख में जारी है, जिन्होंने इसके संस्थापक की सेवा-भावना को बनाए रखा है।

देश के विभिन्न हिस्सों में इस्लामोफोबिया और घृणास्पद बयानबाजी की घटनाओं के बीच, चेन्नई की एक शांत लेकिन दृढ़ परंपरा सामाजिक सौहार्द का प्रेरक उदाहरण पेश करती है। यह पहल करुणा, साझी इंसानियत और अंतरधार्मिक एकजुटता की उस भावना को दर्शाती है, जो विभाजनकारी प्रवृत्तियों के विपरीत एक सकारात्मक संदेश देती है।
माध्यमम की रिपोर्ट के अनुसार, मायलापोर स्थित सूफीदार मंदिर में पिछले 40 वर्षों से रमजान के दौरान रोजाना मुसलमानों के लिए इफ्तार की व्यवस्था की जाती रही है। एक व्यक्ति की निजी पहल के रूप में शुरू हुई यह परंपरा समय के साथ सामुदायिक सौहार्द की सशक्त मिसाल बन गई। आज यह केवल भोजन वितरण नहीं, बल्कि विभिन्न आस्थाओं के लोगों के बीच विश्वास, सम्मान और सह-अस्तित्व का प्रतीक है।
यह परंपरा 1980 के दशक की शुरुआत में पूज्य दादा रतनचंद साहिब ने शुरू की थी, जिन्हें दादा रतनचंद या दादाजी के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 4 नवंबर 1926 को हैदराबाद, सिंध (अब पाकिस्तान) में रुक्मिणी देवी और भाई पेसुमल डोडानी के घर हुआ था। 1947 के विभाजन के दौरान वे एक हिंदू शरणार्थी के रूप में चेन्नई आ बसे।
चेन्नई में नई शुरुआत करने के बाद रतनचंद सूफी संत शहंशाह बाबा नेभराज साहिब के शिष्य बने, जिनकी शिक्षाएं धर्म से परे प्रेम, एकता और सेवा पर आधारित थीं। इन्हीं आदर्शों से प्रेरित होकर उन्होंने सूफीदार ट्रस्ट की स्थापना की और वॉल्टैक्स रोड पर 30-40 भक्तों के साथ एक छोटी आध्यात्मिक सभा शुरू की। समय के साथ यह स्थान मायलापोर स्थित डॉ. राधाकृष्णन रोड पर स्थानांतरित हुआ और एक ऐसे आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जो सभी धर्मों के लोगों का स्वागत करता है।
शहर से मिली शरण और अपनापन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए, तथा धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर सेवा करने की भावना से प्रेरित होकर, रतनचंद ने रमजान के दौरान मुसलमानों के लिए शाकाहारी इफ्तार की शुरुआत की। यह पहल जल्द ही वार्षिक परंपरा बन गई और चार दशकों से अधिक समय से निरंतर जारी है।
आज इस अभियान में 100 से अधिक स्वयंसेवक भाग लेते हैं, जिनमें सिंधी समुदाय, हिंदू, मुस्लिम और अन्य समुदायों के लोग शामिल हैं।
हर रमजान में विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोग मिलकर लगभग 1,000 से अधिक रोजेदारों के लिए भोजन तैयार करते हैं। मंदिर के रसोईघर में सुबह 7:30 बजे से तैयारियां शुरू हो जाती हैं। स्वयंसेवक सब्जी बिरयानी, फ्राइड राइस, चना चावल, पुलाव, सब्जी का अचार, मिठाई, खजूर, ताजे फल और केसर दूध जैसे व्यंजन तैयार करते हैं।
शाम लगभग 5:30 बजे भोजन पैक कर ट्रिप्लिकेन स्थित ऐतिहासिक वल्लाजाह बड़ी मस्जिद में पहुंचाया जाता है। यह मस्जिद 18वीं सदी के अंत में आर्कोट के शाही परिवार द्वारा निर्मित की गई थी। स्वयंसेवक मस्जिद में जाकर भोजन परोसते हैं और सम्मान स्वरूप टोपी पहनते हैं, जिससे आपसी विश्वास और सामुदायिक संबंध और मजबूत होते हैं।
इस पहल को स्थानीय मुस्लिम नेतृत्व का भी लंबे समय से समर्थन मिला है। आर्कोट के प्रिंस नवाब मोहम्मद अब्दुल अली ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता और पारस्परिक सम्मान का जीवंत उदाहरण बताया है। दादा रतनचंद के निधन के बाद भी यह परंपरा राम देव जैसे सामुदायिक नेताओं और समर्पित स्वयंसेवकों की टीम के नेतृत्व में जारी है।
हाल के दिनों में इस पहल ने सोशल मीडिया और राष्ट्रीय मीडिया में फिर से ध्यान आकर्षित किया है और इसे बढ़ती विभाजनकारी प्रवृत्तियों के दौर में मेल-जोल की मिसाल के रूप में सराहा जा रहा है। प्रेम, कृतज्ञता और सेवा के सूफी आदर्शों पर आधारित यह परंपरा याद दिलाती है कि छोटे-छोटे सद्भावनापूर्ण कार्य भी धार्मिक मतभेदों को पाट सकते हैं।
ऐसे समय में जब सांप्रदायिक तनाव अक्सर सुर्खियां बनते हैं, चेन्नई का यह मंदिर चुपचाप एक अलग कहानी लिख रहा है—जहां आस्था दीवार नहीं, बल्कि पुल बनती है; और एकता नारों से नहीं, बल्कि साथ बैठकर भोजन साझा करने और इंसानियत निभाने से मजबूत होती है।
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माध्यमम की रिपोर्ट के अनुसार, मायलापोर स्थित सूफीदार मंदिर में पिछले 40 वर्षों से रमजान के दौरान रोजाना मुसलमानों के लिए इफ्तार की व्यवस्था की जाती रही है। एक व्यक्ति की निजी पहल के रूप में शुरू हुई यह परंपरा समय के साथ सामुदायिक सौहार्द की सशक्त मिसाल बन गई। आज यह केवल भोजन वितरण नहीं, बल्कि विभिन्न आस्थाओं के लोगों के बीच विश्वास, सम्मान और सह-अस्तित्व का प्रतीक है।
यह परंपरा 1980 के दशक की शुरुआत में पूज्य दादा रतनचंद साहिब ने शुरू की थी, जिन्हें दादा रतनचंद या दादाजी के नाम से जाना जाता है। उनका जन्म 4 नवंबर 1926 को हैदराबाद, सिंध (अब पाकिस्तान) में रुक्मिणी देवी और भाई पेसुमल डोडानी के घर हुआ था। 1947 के विभाजन के दौरान वे एक हिंदू शरणार्थी के रूप में चेन्नई आ बसे।
चेन्नई में नई शुरुआत करने के बाद रतनचंद सूफी संत शहंशाह बाबा नेभराज साहिब के शिष्य बने, जिनकी शिक्षाएं धर्म से परे प्रेम, एकता और सेवा पर आधारित थीं। इन्हीं आदर्शों से प्रेरित होकर उन्होंने सूफीदार ट्रस्ट की स्थापना की और वॉल्टैक्स रोड पर 30-40 भक्तों के साथ एक छोटी आध्यात्मिक सभा शुरू की। समय के साथ यह स्थान मायलापोर स्थित डॉ. राधाकृष्णन रोड पर स्थानांतरित हुआ और एक ऐसे आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जो सभी धर्मों के लोगों का स्वागत करता है।
शहर से मिली शरण और अपनापन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए, तथा धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर सेवा करने की भावना से प्रेरित होकर, रतनचंद ने रमजान के दौरान मुसलमानों के लिए शाकाहारी इफ्तार की शुरुआत की। यह पहल जल्द ही वार्षिक परंपरा बन गई और चार दशकों से अधिक समय से निरंतर जारी है।
आज इस अभियान में 100 से अधिक स्वयंसेवक भाग लेते हैं, जिनमें सिंधी समुदाय, हिंदू, मुस्लिम और अन्य समुदायों के लोग शामिल हैं।
हर रमजान में विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोग मिलकर लगभग 1,000 से अधिक रोजेदारों के लिए भोजन तैयार करते हैं। मंदिर के रसोईघर में सुबह 7:30 बजे से तैयारियां शुरू हो जाती हैं। स्वयंसेवक सब्जी बिरयानी, फ्राइड राइस, चना चावल, पुलाव, सब्जी का अचार, मिठाई, खजूर, ताजे फल और केसर दूध जैसे व्यंजन तैयार करते हैं।
शाम लगभग 5:30 बजे भोजन पैक कर ट्रिप्लिकेन स्थित ऐतिहासिक वल्लाजाह बड़ी मस्जिद में पहुंचाया जाता है। यह मस्जिद 18वीं सदी के अंत में आर्कोट के शाही परिवार द्वारा निर्मित की गई थी। स्वयंसेवक मस्जिद में जाकर भोजन परोसते हैं और सम्मान स्वरूप टोपी पहनते हैं, जिससे आपसी विश्वास और सामुदायिक संबंध और मजबूत होते हैं।
इस पहल को स्थानीय मुस्लिम नेतृत्व का भी लंबे समय से समर्थन मिला है। आर्कोट के प्रिंस नवाब मोहम्मद अब्दुल अली ने इसे हिंदू-मुस्लिम एकता और पारस्परिक सम्मान का जीवंत उदाहरण बताया है। दादा रतनचंद के निधन के बाद भी यह परंपरा राम देव जैसे सामुदायिक नेताओं और समर्पित स्वयंसेवकों की टीम के नेतृत्व में जारी है।
हाल के दिनों में इस पहल ने सोशल मीडिया और राष्ट्रीय मीडिया में फिर से ध्यान आकर्षित किया है और इसे बढ़ती विभाजनकारी प्रवृत्तियों के दौर में मेल-जोल की मिसाल के रूप में सराहा जा रहा है। प्रेम, कृतज्ञता और सेवा के सूफी आदर्शों पर आधारित यह परंपरा याद दिलाती है कि छोटे-छोटे सद्भावनापूर्ण कार्य भी धार्मिक मतभेदों को पाट सकते हैं।
ऐसे समय में जब सांप्रदायिक तनाव अक्सर सुर्खियां बनते हैं, चेन्नई का यह मंदिर चुपचाप एक अलग कहानी लिख रहा है—जहां आस्था दीवार नहीं, बल्कि पुल बनती है; और एकता नारों से नहीं, बल्कि साथ बैठकर भोजन साझा करने और इंसानियत निभाने से मजबूत होती है।
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