अजबा खातून की शर्तों के साथ रिहाई से परिवार को राहत, लेकिन कानूनी लड़ाई अभी बाकी; एक अन्य बंदी की रिहाई के लिए भी उठाई आवाज़।

772 दिनों तक हिरासत में रहने के बाद, अजाभा खातून आखिरकार अपने घर लौट आई हैं। असम के बारपेटा जिले के कोएटकुची गांव की रहने वाली अजाभा एक बीमार और हाशिए पर रहने वाली महिला हैं। उन्हें 'विदेशी' घोषित किए जाने के बाद, 2 सितंबर 2024 से गोलपारा के मटिया ट्रांजिट कैंप में रखा गया था। 13 अक्टूबर 2026 को, महीनों की कानूनी कार्यवाही, अधिकारियों के साथ लगातार बातचीत और 'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (CJP) के व्यापक प्रयासों के बाद, उन्हें सशर्त जमानत पर कैंप से रिहा किया गया।
अजाभा और उनके परिवार के लिए, उनकी रिहाई एक बेहद पीड़ादायक इंतजार के खत्म होने जैसा था। CJP की असम टीम के लिए, यह 2026 का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पड़ाव था। लेकिन इस राहत के साथ ही यह दुखद सच्चाई भी सामने आई कि अभी भी कई लोग हिरासत केंद्रों में फंसे हुए हैं- अपने परिवारों से दूर, जिनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा है और जिनका भविष्य अनिश्चित है। उनकी आजादी यह भी याद दिलाती है कि ऐसे व्यक्ति के लिए समय पर मिलने वाली कानूनी मदद कितनी मायने रखती है, जिसके पास अकेले लड़ने के लिए कोई साधन नहीं है।
असम में CJP की समर्पित टीम- जिसमें सामुदायिक स्वयंसेवक, जिला स्वयंसेवक प्रेरक और वकील शामिल हैं- हर हफ्ते असम के 24 से अधिक जिलों में नागरिकता संकट से प्रभावित लोगों को जरूरी कानूनी सहायता, परामर्श और कानूनी मदद मुहैया कराती है। हमारे सक्रिय प्रयासों के जरिए, 12,00,000 लोगों ने NRC के फॉर्म (2017-2019) सफलतापूर्वक जमा किए। हम जिला स्तर पर हर महीने 'फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल' (विदेशी न्यायाधिकरण) के मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ते हैं। इन निरंतर प्रयासों से, हमें हर साल 20 मामलों में बड़ी सफलता मिली है, जहां लोगों को अपनी भारतीय नागरिकता वापस मिल सकी है। जमीनी स्तर का यह डेटा CJP को संवैधानिक अदालतों में प्रभावी ढंग से पक्ष रखने में मदद करता है। आपका समर्थन ही इस महत्वपूर्ण काम को आगे बढ़ाता है। 'सभी के लिए समान अधिकार' की हमारी मुहिम में हमारे साथ खड़े हों
एक भुला दिए गए मामले से लेकर एक लंबी कानूनी लड़ाई तक
2 सितंबर 2024 को, बारपेटा जिले के 28 बंगाली भाषी मुसलमानों को हिरासत में ले लिया गया और उन्हें एक डिटेंशन कैंप (हिरासत केंद्र) में भेज दिया गया। जब CJP की टीम उनके परिवारों से मिली, तो उन्हें पता चला कि अजाभा के परिवार ने उनकी ओर से गुवाहाटी उच्च न्यायालय में कोई अपील नहीं की थी। परिवार बेहद हाशिए पर था और उनके पास कानूनी मदद लेने के लिए जरूरी साधन नहीं थे। परिवार के अनुरोध पर, CJP ने अजाभा का मामला अपने हाथ में लिया, उन्हें कानूनी और पैरा-लीगल सहायता दी, और उनकी दुर्दशा को गुवाहाटी उच्च न्यायालय के सामने रखने में मदद की।
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3 मार्च, 2025 को गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने उनके निर्वासन (deportation) पर रोक लगा दी और उन्हें विदेशी घोषित करने वाले आदेश की समीक्षा के लिए 'फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल' (Foreigners Tribunal) से रिकॉर्ड तलब किया। हालांकि, कानूनी चुनौती लंबित रही और अजाभा को मटिया (Matia) में ही रखा गया।
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उच्च न्यायालय की कार्यवाही महत्वपूर्ण थी, लेकिन जमीनी हकीकत बहुत कठोर थी: एक बीमार महिला अभी भी डिटेंशन कैंप में कैद थी, अपने परिवार से दूर, और यह भी पता नहीं था कि वह कब घर लौट पाएगी। अगर समय रहते कानूनी हस्तक्षेप न होता, तो अजाभा के पास अपनी स्थिति को चुनौती देने का कोई प्रभावी रास्ता नहीं बचता, और उन पर निर्वासन का खतरा भी मंडराता रहता।
CJP का काम सिर्फ उनके मामले को अदालत तक पहुंचाने पर खत्म नहीं हुआ। टीम अजाभा और उनके परिवार के साथ खड़ी रही और उनकी रिहाई के लिए हर संभव कोशिश करती रही, जबकि उनकी मुख्य कानूनी लड़ाई अभी भी चल रही थी।
डिटेंशन में दो साल, उन्हें घर वापस लाने की एक नई कोशिश
1 सितंबर, 2026 को अजाभा ने मटिया ट्रांजिट कैंप में दो साल पूरे कर लिए। उनकी बीमारी और लंबे समय तक कैद में रहने के कारण, उन्हें जल्द से जल्द रिहा कराना और भी जरूरी हो गया था। हालाँकि उनका मामला अभी भी गुवाहाटी उच्च न्यायालय में लंबित था, लेकिन CJP की असम टीम ने उनकी रिहाई के लिए अन्य रास्ते तलाशने शुरू कर दिए। इसका आधार यह था कि वे दो साल से कैद में थीं और उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा था। इस कोशिश में सुप्रीम कोर्ट और गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा COVID-19 महामारी के दौरान और उसके आसपास डिटेंशन (हिरासत) को लेकर शुरू की गई 'स्वतः संज्ञान' (suo-motu) कार्यवाहियों का भी सहारा लिया गया।
अगस्त के महीने से, टीम ने अपने प्रयासों को और तेज कर दिया। अपने कानूनी काम को जारी रखने के साथ-साथ, उन्होंने परिवार के सदस्यों को सलाह दी, डिटेंशन कैंप का दौरा किया, अजाभा की परिस्थितियों का दस्तावेजीकरण किया और उनकी रिहाई के लिए जरूरी प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू की। CJP के असम राज्य प्रभारी नंदा घोष और कानूनी टीम के सदस्य अभिजीत चौधरी ने संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया और अजाभा के बेटे के जरिए एक आवेदन जमा कराया। इसके बाद का काम काफी मेहनत भरा और अक्सर सरकारी औपचारिकताओं से भरा रहा: इसमें उपयुक्त जमानतदारों की पहचान करना, उनके दस्तावेजों की जांच करना, और जिला बॉर्डर पुलिस कार्यालय में जमा करने के लिए जरूरी आवेदन, हलफनामे और अन्य सहायक दस्तावेज तैयार करना शामिल था।
अक्टूबर तक, अजाभा को हिरासत में रखे हुए दो साल और एक महीने से ज्यादा का समय बीत चुका था। जिला बॉर्डर ब्रांच में दस्तावेज जमा करने के बाद, अधिकारियों ने टीम को बताया कि इन्हें गुवाहाटी भेजा जाएगा और आगे की प्रक्रिया वहां से मिलने वाले सकारात्मक जवाब पर निर्भर करेगी। कुछ दिनों बाद, टीम को सूचना मिली कि गुवाहाटी में प्रक्रिया पूरी हो गई है और अब आगे के कदम उठाए जा सकते हैं।
अगले पूरे हफ्ते टीम अधिकारियों के संपर्क में बनी रही। 11 अक्टूबर को, अजाभा की सशर्त जमानत पर रिहाई की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। 12 अक्टूबर को, बॉर्डर ब्रांच ने अनौपचारिक रूप से संकेत दिया कि परिवहन (आने-जाने के साधन) की दिक्कतों के कारण उनकी रिहाई में देरी हो सकती है, लेकिन अगर कोई वैकल्पिक इंतज़ाम हो जाए, तो अगले दिन उनका बाहर आना मुमकिन हो सकता है। CJP ने तुरंत बॉर्डर पुलिस और अजाभा के परिवार के साथ तालमेल बिठाया ताकि जरूरी इंतजाम किए जा सकें। दो साल से ज्यादा के इंतजार के बाद, 13 अक्टूबर का दिन आखिरकार उन्हें घर वापस ले आया।
13 अक्टूबर: आजादी की ओर वापसी का लंबा सफर

रिहाई के बाद अजबा खातून के साथ CJP की असम टीम
दिन की शुरुआत भोर होने से पहले ही हो गई थी। सुबह 3:40 बजे, CJP की असम टीम की ओर से नंदा घोष और ऑफिस के ड्राइवर आशिकुल हुसैन बारपेटा के लिए निकल पड़े। इस सफर में कई जगह रुकना पड़ा जिसमें बॉर्डर ब्रांच पुलिस क्वार्टर, स्थानीय पुलिस स्टेशन और अजाभा का घर शामिल है। यहां परिवार के सदस्यों को पुलिस के साथ मिलाना था, ताकि वे सब मिलकर गोलपारा के मटिया ट्रांज़िट कैंप जा सकें। वे सुबह लगभग 9:30 बजे मटिया पहुंचे। जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद, टीम अजाभा को कैंप से बाहर लाई और बारपेटा के लिए वापसी का सफर शुरू हुआ।
दोपहर लगभग 1:30 बजे, बिना कुछ खाए कई घंटे सड़क पर बिताने के बाद, अजाभा, CJP की टीम और उनके साथ मौजूद तीन पुलिसकर्मी खाना खाने के लिए रुके। यह एक छोटा और सामान्य सा पल था, लेकिन इसने यह दिखा दिया कि इस दिन को मुमकिन बनाने के लिए कितनी मेहनत और कोशिशें की गई थीं। इसके बाद वे बारपेटा ज़िला बॉर्डर ब्रांच पहुंचे, जो पुलिस अधीक्षक (SP) के कार्यालय में स्थित है। वहां अभिजीत चौधरी ने पहले ही जरूरी काम शुरू कर दिया था। CJP के बारपेटा जिले के DVM, जफर अली और दो जमानतदार भी वहां मौजूद थे।
टीम के पहुंचने के बाद, अजाभा और जमानतदारों से जुड़ी बाकी औपचारिकताएं पूरी की गईं, और बॉर्डर पुलिस ने उसे जमानतदारों को सौंप दिया। एक और आधिकारिक प्रक्रिया बाकी थी। टीम अजाभा, दोनों जमानतदारों और परिवार के एक सदस्य को बारपेटा सदर पुलिस स्टेशन ले गई, जहां उसे अपनी रिहाई की शर्तों के तहत हफ्ते में एक बार हाजिरी देनी होती है। इन सभी औपचारिकताओं के पूरा होने के बाद ही टीम अजाभा को अपने साथ घर ले जा सकी।
"वहां की तकलीफें शब्दों में बयां नहीं की जा सकतीं। जो लोग वहां रहे हैं, सिर्फ वही उस दर्द को समझ सकते हैं।"
जैसे ही अजाभा कार में बैठीं, उनके लंबे संघर्ष का बोझ सामने आने लगा। भावनाओं से भर जाने के कारण, उन्हें CJP टीम के प्रति अपना आभार व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे। उन्होंने कहा, "बाबा, भगवान आप सभी का भला करे!"
फिर, हिरासत में बिताए अपने समय के बारे में बात करते हुए, उन्होंने उन तकलीफों का जिक्र किया जिन्हें उन्होंने सहा था। "उस डिटेंशन कैंप की तकलीफों के बारे में मैं क्या कहूं? वह तो नर्क है। वहां की पीड़ा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। जो लोग वहां रहे हैं, सिर्फ वही उस दर्द को समझ सकते हैं!"
लेकिन राहत के इस पल में भी, अजाभा किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोच रही थीं जिसे वह पीछे छोड़ आई थीं। उन्होंने टीम को सेहेरा के बारे में बताया, जो बारपेटा जिले की रहने वाली एक दृष्टिहीन महिला हैं और अभी भी डिटेंशन कैंप में हैं। साथ रहने के दौरान अजाभा ने उनकी बहुत देखभाल की थी-उनके लिए खाना लाती थीं, उनके कपड़े और थाली धोती थीं, और उनका बिस्तर लगाती थीं।
"बाबा, वहां एक नेत्रहीन महिला हैं जो देख नहीं सकतीं। उन्हें बहुत तकलीफ होती है। मैं उनके लिए खाना लाती थी, उनके कपड़े और थाली धोती थी, और उनका बिस्तर लगाती थी। उनका नाम सेहेरा है। वह बारपेटा जिले की ही रहने वाली हैं, लेकिन मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि कहां की हैं। मुझे बस उनका नाम पता है। क्या आप उन्हें भी रिहा करवा सकते हैं, बाबा?"
अजाभा ने बताया कि जब वह वहां से जा रही थी, तो सेहेरा ने उसे गले लगाया और रो पड़ी। उसने अजाभा से कहा कि जिन लोगों ने उसे (अजाभा को) रिहा कराने में मदद की थी, उनसे उसके लिए भी वही गुहार लगाए। जब मैं वहां से जा रही थी, तो उसने मुझे गले लगाया और बहुत रोई। उसने मुझसे कहा कि जिन लोगों ने मुझे रिहा कराया है, उनसे मेरे लिए भी बात करूं। कृपया मुझे भी, मेरी तरह ही उस डिटेंशन कैंप से बाहर निकलवा दें। "अल्लाह आपको जरूर बरकत देगा," अजाभा ने विनती की।
यह गुहार दिल तोड़ने वाली थी। 772 दिनों की कैद, बीमारी, अपनों से बिछड़ने का दर्द और अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता झेलने के बाद भी, अजाभा को सबसे ज्यादा चिंता उस दूसरी महिला की थी जो अभी भी अंदर ही थी। CJP टीम सेहेरा को सिर्फ नाम से जानती थी। उन्होंने अजाभा को भरोसा दिलाया कि वे उसे ढूंढ़ने की पूरी कोशिश करेंगे और उसकी रिहाई के लिए कानूनी रास्ते तलाशेंगे, हालांकि उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि वे किसी नतीजे की गारंटी नहीं दे सकते। अजाभा को आखिरकार आजादी मिल गई थी। लेकिन, आजाद होकर लौटते हुए भी, वह अपने साथ उस इंसान का दर्द लिए हुए थी जिसे आजादी नहीं मिली थी।
एक गांव इंतजार कर रहा है। एक परिवार उसका घर पर स्वागत करता है

सूरज ढलने लगा था, तभी CJP टीम अजाभा के साथ कोएटकुची गांव पहुंची। उसके लौटने की खबर सुनकर लगभग पूरा गांव उसके घर के बाहर इकट्ठा हो गया था। जैसे ही गाड़ी पहुंची, लोग आगे लपके। वहां आंसू, चीखें और जज़्बातों का सैलाब उमड़ पड़ा। इतने लंबे समय तक बिछड़े रहने के बाद, अजाभा को घर लौटते देखना लोगों के लिए बर्दाश्त से बाहर था। इस भारी जज्बाती उथल-पुथल के बीच वह कई बार बेहोश हो गई।
टीम ने आख़िरकार उसे उसके परिवार को सौंप दिया। उन्होंने परिवार से कहा कि इतने लंबे समय तक कैद में रहने और इस सफर के तनाव के बाद, आने वाले दिनों में वे अजाभा की शारीरिक और मानसिक सेहत का खास ख्याल रखें। अजाभा का बेटा, बुद्धू, मेघालय की कोयला खदानों में मजदूरी करता है। रिहाई की पूरी प्रक्रिया के दौरान वह वहां मौजूद नहीं रह सका, इसलिए उसने फोन करके CJP टीम से बात की और अपनी मां को घर वापस लाने में मदद करने के लिए उनका तहे दिल से शुक्रिया अदा किया।
जिस परिवार ने महीनों तक अनिश्चितता और बेबसी का सामना किया था, उसके लिए अजाभा की वापसी एक बहुत बड़ी राहत लेकर आई। लेकिन अजाभा जानती है कि उसकी रिहाई शर्तों के साथ है और गुवाहाटी हाई कोर्ट में उसका मामला अभी भी सुलझा नहीं है। टीम के जाने से पहले, उसने हाथ जोड़कर एक आखिरी गुहार लगाई। "बाबा, मैं दुआ करती हूं कि मेरा मामला जल्द से जल्द हमेशा के लिए खत्म हो जाए, ताकि मुझे फिर कभी उस कैंप में न जाना पड़े!" उसने CJP टीम के लिए भी अल्लाह से दुआ की।
रात के लगभग 9 बज रहे थे, जब टीम ने अपने घर की ओर वापसी का सफर शुरू किया। दिन लंबा था, शारीरिक रूप से थका देने वाला और भावनात्मक रूप से बहुत भारी। महीनों से, अजाभा के परिवार की परेशानी टीम पर एक बोझ की तरह थी, जो उसे घर वापस लाने का रास्ता खोजने में जुटी थी। उस रात, आखिरकार कुछ राहत मिली।
यह कानूनी लड़ाई का अंत नहीं था। यह वह स्थायी समाधान भी नहीं था जिसकी अजाभा को सख्त जरूरत है। लेकिन यह एक ऐसा पल था जब लगातार कानूनी काम, दस्तावेजों की सावधानीपूर्वक तैयारी, प्रशासनिक स्तर पर लगातार फॉलो-अप और एक हाशिए पर पड़े परिवार के साथ खड़े रहने के दृढ़ संकल्प ने एक ठोस बदलाव लाने में मदद की।
लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है
अजाभा खातून की रिहाई CJP की असम टीम के लिए 2026 में एक अहम पड़ाव है। यह कानूनी मदद के महत्व को दिखाता है- जो सिर्फ याचिका दायर करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उस व्यक्ति को राहत दिलाने के लिए जरूरी व्यावहारिक और अक्सर थका देने वाले काम को भी जारी रखती है, जो शायद अकेले सिस्टम से जूझने में असमर्थ होता।
उनका मामला उन लोगों पर लंबे समय तक हिरासत में रहने के मानवीय असर को भी सामने लाता है जिन्हें 'विदेशी' घोषित कर दिया गया है। खासकर उन लोगों के लिए जो बीमार हैं, आर्थिक रूप से कमजोर हैं और कानूनी कार्यवाही लंबित रहने के दौरान अपने परिवारों से अलग कर दिए गए हैं।
अजाभा के लिए, आजादी का मतलब है अपने गांव वापस लौटना, अपने परिवार को गले लगाना और एक बार फिर खुले आसमान के नीचे सोना। लेकिन उनकी इस राहत पर इस बात का साया है कि सेहेरा और अन्य लोग अभी भी हिरासत में हैं।
CJP की टीम अजाभा की वापसी का जश्न मना रही है, लेकिन साथ ही वह उस जिम्मेदारी को भी आगे बढ़ा रही है जो अजाभा की अपील से उनके सामने आई है: सेहेरा का पता लगाने की कोशिश करना, उपलब्ध कानूनी विकल्पों को खोजना, और उन लोगों को राहत दिलाने के लिए काम जारी रखना जो अभी भी कैद में हैं।
772 दिनों के बाद, अजाभा अपने घर वापस आ गई हैं। उनके कानूनी मामले का अभी भी किसी नतीजे तक पहुंचना बाकी है, और उनकी रिहाई की शर्तों का सम्मान किया जाना चाहिए। फिलहाल, एक परिवार को अपनी मां वापस मिल गई है, एक गांव ने अपनी ही एक सदस्य का स्वागत किया है, और कैद की पीड़ा झेलने वाली एक महिला को अब इतनी हिम्मत मिल गई है कि वह उन लोगों के लिए आवाज उठा सके जो अभी भी अंदर हैं। उनकी आजादी एक अहम पड़ाव है। सेहेरा के लिए उनकी अपील हमें याद दिलाती है कि अभी भी बहुत काम बाकी है।
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772 दिनों तक हिरासत में रहने के बाद, अजाभा खातून आखिरकार अपने घर लौट आई हैं। असम के बारपेटा जिले के कोएटकुची गांव की रहने वाली अजाभा एक बीमार और हाशिए पर रहने वाली महिला हैं। उन्हें 'विदेशी' घोषित किए जाने के बाद, 2 सितंबर 2024 से गोलपारा के मटिया ट्रांजिट कैंप में रखा गया था। 13 अक्टूबर 2026 को, महीनों की कानूनी कार्यवाही, अधिकारियों के साथ लगातार बातचीत और 'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (CJP) के व्यापक प्रयासों के बाद, उन्हें सशर्त जमानत पर कैंप से रिहा किया गया।
अजाभा और उनके परिवार के लिए, उनकी रिहाई एक बेहद पीड़ादायक इंतजार के खत्म होने जैसा था। CJP की असम टीम के लिए, यह 2026 का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पड़ाव था। लेकिन इस राहत के साथ ही यह दुखद सच्चाई भी सामने आई कि अभी भी कई लोग हिरासत केंद्रों में फंसे हुए हैं- अपने परिवारों से दूर, जिनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा है और जिनका भविष्य अनिश्चित है। उनकी आजादी यह भी याद दिलाती है कि ऐसे व्यक्ति के लिए समय पर मिलने वाली कानूनी मदद कितनी मायने रखती है, जिसके पास अकेले लड़ने के लिए कोई साधन नहीं है।
असम में CJP की समर्पित टीम- जिसमें सामुदायिक स्वयंसेवक, जिला स्वयंसेवक प्रेरक और वकील शामिल हैं- हर हफ्ते असम के 24 से अधिक जिलों में नागरिकता संकट से प्रभावित लोगों को जरूरी कानूनी सहायता, परामर्श और कानूनी मदद मुहैया कराती है। हमारे सक्रिय प्रयासों के जरिए, 12,00,000 लोगों ने NRC के फॉर्म (2017-2019) सफलतापूर्वक जमा किए। हम जिला स्तर पर हर महीने 'फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल' (विदेशी न्यायाधिकरण) के मामलों में कानूनी लड़ाई लड़ते हैं। इन निरंतर प्रयासों से, हमें हर साल 20 मामलों में बड़ी सफलता मिली है, जहां लोगों को अपनी भारतीय नागरिकता वापस मिल सकी है। जमीनी स्तर का यह डेटा CJP को संवैधानिक अदालतों में प्रभावी ढंग से पक्ष रखने में मदद करता है। आपका समर्थन ही इस महत्वपूर्ण काम को आगे बढ़ाता है। 'सभी के लिए समान अधिकार' की हमारी मुहिम में हमारे साथ खड़े हों
एक भुला दिए गए मामले से लेकर एक लंबी कानूनी लड़ाई तक
2 सितंबर 2024 को, बारपेटा जिले के 28 बंगाली भाषी मुसलमानों को हिरासत में ले लिया गया और उन्हें एक डिटेंशन कैंप (हिरासत केंद्र) में भेज दिया गया। जब CJP की टीम उनके परिवारों से मिली, तो उन्हें पता चला कि अजाभा के परिवार ने उनकी ओर से गुवाहाटी उच्च न्यायालय में कोई अपील नहीं की थी। परिवार बेहद हाशिए पर था और उनके पास कानूनी मदद लेने के लिए जरूरी साधन नहीं थे। परिवार के अनुरोध पर, CJP ने अजाभा का मामला अपने हाथ में लिया, उन्हें कानूनी और पैरा-लीगल सहायता दी, और उनकी दुर्दशा को गुवाहाटी उच्च न्यायालय के सामने रखने में मदद की।
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3 मार्च, 2025 को गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने उनके निर्वासन (deportation) पर रोक लगा दी और उन्हें विदेशी घोषित करने वाले आदेश की समीक्षा के लिए 'फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल' (Foreigners Tribunal) से रिकॉर्ड तलब किया। हालांकि, कानूनी चुनौती लंबित रही और अजाभा को मटिया (Matia) में ही रखा गया।
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उच्च न्यायालय की कार्यवाही महत्वपूर्ण थी, लेकिन जमीनी हकीकत बहुत कठोर थी: एक बीमार महिला अभी भी डिटेंशन कैंप में कैद थी, अपने परिवार से दूर, और यह भी पता नहीं था कि वह कब घर लौट पाएगी। अगर समय रहते कानूनी हस्तक्षेप न होता, तो अजाभा के पास अपनी स्थिति को चुनौती देने का कोई प्रभावी रास्ता नहीं बचता, और उन पर निर्वासन का खतरा भी मंडराता रहता।
CJP का काम सिर्फ उनके मामले को अदालत तक पहुंचाने पर खत्म नहीं हुआ। टीम अजाभा और उनके परिवार के साथ खड़ी रही और उनकी रिहाई के लिए हर संभव कोशिश करती रही, जबकि उनकी मुख्य कानूनी लड़ाई अभी भी चल रही थी।
डिटेंशन में दो साल, उन्हें घर वापस लाने की एक नई कोशिश
1 सितंबर, 2026 को अजाभा ने मटिया ट्रांजिट कैंप में दो साल पूरे कर लिए। उनकी बीमारी और लंबे समय तक कैद में रहने के कारण, उन्हें जल्द से जल्द रिहा कराना और भी जरूरी हो गया था। हालाँकि उनका मामला अभी भी गुवाहाटी उच्च न्यायालय में लंबित था, लेकिन CJP की असम टीम ने उनकी रिहाई के लिए अन्य रास्ते तलाशने शुरू कर दिए। इसका आधार यह था कि वे दो साल से कैद में थीं और उनका स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा था। इस कोशिश में सुप्रीम कोर्ट और गुवाहाटी उच्च न्यायालय द्वारा COVID-19 महामारी के दौरान और उसके आसपास डिटेंशन (हिरासत) को लेकर शुरू की गई 'स्वतः संज्ञान' (suo-motu) कार्यवाहियों का भी सहारा लिया गया।
अगस्त के महीने से, टीम ने अपने प्रयासों को और तेज कर दिया। अपने कानूनी काम को जारी रखने के साथ-साथ, उन्होंने परिवार के सदस्यों को सलाह दी, डिटेंशन कैंप का दौरा किया, अजाभा की परिस्थितियों का दस्तावेजीकरण किया और उनकी रिहाई के लिए जरूरी प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू की। CJP के असम राज्य प्रभारी नंदा घोष और कानूनी टीम के सदस्य अभिजीत चौधरी ने संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया और अजाभा के बेटे के जरिए एक आवेदन जमा कराया। इसके बाद का काम काफी मेहनत भरा और अक्सर सरकारी औपचारिकताओं से भरा रहा: इसमें उपयुक्त जमानतदारों की पहचान करना, उनके दस्तावेजों की जांच करना, और जिला बॉर्डर पुलिस कार्यालय में जमा करने के लिए जरूरी आवेदन, हलफनामे और अन्य सहायक दस्तावेज तैयार करना शामिल था।
अक्टूबर तक, अजाभा को हिरासत में रखे हुए दो साल और एक महीने से ज्यादा का समय बीत चुका था। जिला बॉर्डर ब्रांच में दस्तावेज जमा करने के बाद, अधिकारियों ने टीम को बताया कि इन्हें गुवाहाटी भेजा जाएगा और आगे की प्रक्रिया वहां से मिलने वाले सकारात्मक जवाब पर निर्भर करेगी। कुछ दिनों बाद, टीम को सूचना मिली कि गुवाहाटी में प्रक्रिया पूरी हो गई है और अब आगे के कदम उठाए जा सकते हैं।
अगले पूरे हफ्ते टीम अधिकारियों के संपर्क में बनी रही। 11 अक्टूबर को, अजाभा की सशर्त जमानत पर रिहाई की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। 12 अक्टूबर को, बॉर्डर ब्रांच ने अनौपचारिक रूप से संकेत दिया कि परिवहन (आने-जाने के साधन) की दिक्कतों के कारण उनकी रिहाई में देरी हो सकती है, लेकिन अगर कोई वैकल्पिक इंतज़ाम हो जाए, तो अगले दिन उनका बाहर आना मुमकिन हो सकता है। CJP ने तुरंत बॉर्डर पुलिस और अजाभा के परिवार के साथ तालमेल बिठाया ताकि जरूरी इंतजाम किए जा सकें। दो साल से ज्यादा के इंतजार के बाद, 13 अक्टूबर का दिन आखिरकार उन्हें घर वापस ले आया।
13 अक्टूबर: आजादी की ओर वापसी का लंबा सफर

रिहाई के बाद अजबा खातून के साथ CJP की असम टीम
दिन की शुरुआत भोर होने से पहले ही हो गई थी। सुबह 3:40 बजे, CJP की असम टीम की ओर से नंदा घोष और ऑफिस के ड्राइवर आशिकुल हुसैन बारपेटा के लिए निकल पड़े। इस सफर में कई जगह रुकना पड़ा जिसमें बॉर्डर ब्रांच पुलिस क्वार्टर, स्थानीय पुलिस स्टेशन और अजाभा का घर शामिल है। यहां परिवार के सदस्यों को पुलिस के साथ मिलाना था, ताकि वे सब मिलकर गोलपारा के मटिया ट्रांज़िट कैंप जा सकें। वे सुबह लगभग 9:30 बजे मटिया पहुंचे। जरूरी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद, टीम अजाभा को कैंप से बाहर लाई और बारपेटा के लिए वापसी का सफर शुरू हुआ।
दोपहर लगभग 1:30 बजे, बिना कुछ खाए कई घंटे सड़क पर बिताने के बाद, अजाभा, CJP की टीम और उनके साथ मौजूद तीन पुलिसकर्मी खाना खाने के लिए रुके। यह एक छोटा और सामान्य सा पल था, लेकिन इसने यह दिखा दिया कि इस दिन को मुमकिन बनाने के लिए कितनी मेहनत और कोशिशें की गई थीं। इसके बाद वे बारपेटा ज़िला बॉर्डर ब्रांच पहुंचे, जो पुलिस अधीक्षक (SP) के कार्यालय में स्थित है। वहां अभिजीत चौधरी ने पहले ही जरूरी काम शुरू कर दिया था। CJP के बारपेटा जिले के DVM, जफर अली और दो जमानतदार भी वहां मौजूद थे।
टीम के पहुंचने के बाद, अजाभा और जमानतदारों से जुड़ी बाकी औपचारिकताएं पूरी की गईं, और बॉर्डर पुलिस ने उसे जमानतदारों को सौंप दिया। एक और आधिकारिक प्रक्रिया बाकी थी। टीम अजाभा, दोनों जमानतदारों और परिवार के एक सदस्य को बारपेटा सदर पुलिस स्टेशन ले गई, जहां उसे अपनी रिहाई की शर्तों के तहत हफ्ते में एक बार हाजिरी देनी होती है। इन सभी औपचारिकताओं के पूरा होने के बाद ही टीम अजाभा को अपने साथ घर ले जा सकी।
"वहां की तकलीफें शब्दों में बयां नहीं की जा सकतीं। जो लोग वहां रहे हैं, सिर्फ वही उस दर्द को समझ सकते हैं।"
जैसे ही अजाभा कार में बैठीं, उनके लंबे संघर्ष का बोझ सामने आने लगा। भावनाओं से भर जाने के कारण, उन्हें CJP टीम के प्रति अपना आभार व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे। उन्होंने कहा, "बाबा, भगवान आप सभी का भला करे!"
फिर, हिरासत में बिताए अपने समय के बारे में बात करते हुए, उन्होंने उन तकलीफों का जिक्र किया जिन्हें उन्होंने सहा था। "उस डिटेंशन कैंप की तकलीफों के बारे में मैं क्या कहूं? वह तो नर्क है। वहां की पीड़ा शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। जो लोग वहां रहे हैं, सिर्फ वही उस दर्द को समझ सकते हैं!"
लेकिन राहत के इस पल में भी, अजाभा किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोच रही थीं जिसे वह पीछे छोड़ आई थीं। उन्होंने टीम को सेहेरा के बारे में बताया, जो बारपेटा जिले की रहने वाली एक दृष्टिहीन महिला हैं और अभी भी डिटेंशन कैंप में हैं। साथ रहने के दौरान अजाभा ने उनकी बहुत देखभाल की थी-उनके लिए खाना लाती थीं, उनके कपड़े और थाली धोती थीं, और उनका बिस्तर लगाती थीं।
"बाबा, वहां एक नेत्रहीन महिला हैं जो देख नहीं सकतीं। उन्हें बहुत तकलीफ होती है। मैं उनके लिए खाना लाती थी, उनके कपड़े और थाली धोती थी, और उनका बिस्तर लगाती थी। उनका नाम सेहेरा है। वह बारपेटा जिले की ही रहने वाली हैं, लेकिन मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि कहां की हैं। मुझे बस उनका नाम पता है। क्या आप उन्हें भी रिहा करवा सकते हैं, बाबा?"
अजाभा ने बताया कि जब वह वहां से जा रही थी, तो सेहेरा ने उसे गले लगाया और रो पड़ी। उसने अजाभा से कहा कि जिन लोगों ने उसे (अजाभा को) रिहा कराने में मदद की थी, उनसे उसके लिए भी वही गुहार लगाए। जब मैं वहां से जा रही थी, तो उसने मुझे गले लगाया और बहुत रोई। उसने मुझसे कहा कि जिन लोगों ने मुझे रिहा कराया है, उनसे मेरे लिए भी बात करूं। कृपया मुझे भी, मेरी तरह ही उस डिटेंशन कैंप से बाहर निकलवा दें। "अल्लाह आपको जरूर बरकत देगा," अजाभा ने विनती की।
यह गुहार दिल तोड़ने वाली थी। 772 दिनों की कैद, बीमारी, अपनों से बिछड़ने का दर्द और अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता झेलने के बाद भी, अजाभा को सबसे ज्यादा चिंता उस दूसरी महिला की थी जो अभी भी अंदर ही थी। CJP टीम सेहेरा को सिर्फ नाम से जानती थी। उन्होंने अजाभा को भरोसा दिलाया कि वे उसे ढूंढ़ने की पूरी कोशिश करेंगे और उसकी रिहाई के लिए कानूनी रास्ते तलाशेंगे, हालांकि उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि वे किसी नतीजे की गारंटी नहीं दे सकते। अजाभा को आखिरकार आजादी मिल गई थी। लेकिन, आजाद होकर लौटते हुए भी, वह अपने साथ उस इंसान का दर्द लिए हुए थी जिसे आजादी नहीं मिली थी।
एक गांव इंतजार कर रहा है। एक परिवार उसका घर पर स्वागत करता है

सूरज ढलने लगा था, तभी CJP टीम अजाभा के साथ कोएटकुची गांव पहुंची। उसके लौटने की खबर सुनकर लगभग पूरा गांव उसके घर के बाहर इकट्ठा हो गया था। जैसे ही गाड़ी पहुंची, लोग आगे लपके। वहां आंसू, चीखें और जज़्बातों का सैलाब उमड़ पड़ा। इतने लंबे समय तक बिछड़े रहने के बाद, अजाभा को घर लौटते देखना लोगों के लिए बर्दाश्त से बाहर था। इस भारी जज्बाती उथल-पुथल के बीच वह कई बार बेहोश हो गई।
टीम ने आख़िरकार उसे उसके परिवार को सौंप दिया। उन्होंने परिवार से कहा कि इतने लंबे समय तक कैद में रहने और इस सफर के तनाव के बाद, आने वाले दिनों में वे अजाभा की शारीरिक और मानसिक सेहत का खास ख्याल रखें। अजाभा का बेटा, बुद्धू, मेघालय की कोयला खदानों में मजदूरी करता है। रिहाई की पूरी प्रक्रिया के दौरान वह वहां मौजूद नहीं रह सका, इसलिए उसने फोन करके CJP टीम से बात की और अपनी मां को घर वापस लाने में मदद करने के लिए उनका तहे दिल से शुक्रिया अदा किया।
जिस परिवार ने महीनों तक अनिश्चितता और बेबसी का सामना किया था, उसके लिए अजाभा की वापसी एक बहुत बड़ी राहत लेकर आई। लेकिन अजाभा जानती है कि उसकी रिहाई शर्तों के साथ है और गुवाहाटी हाई कोर्ट में उसका मामला अभी भी सुलझा नहीं है। टीम के जाने से पहले, उसने हाथ जोड़कर एक आखिरी गुहार लगाई। "बाबा, मैं दुआ करती हूं कि मेरा मामला जल्द से जल्द हमेशा के लिए खत्म हो जाए, ताकि मुझे फिर कभी उस कैंप में न जाना पड़े!" उसने CJP टीम के लिए भी अल्लाह से दुआ की।
रात के लगभग 9 बज रहे थे, जब टीम ने अपने घर की ओर वापसी का सफर शुरू किया। दिन लंबा था, शारीरिक रूप से थका देने वाला और भावनात्मक रूप से बहुत भारी। महीनों से, अजाभा के परिवार की परेशानी टीम पर एक बोझ की तरह थी, जो उसे घर वापस लाने का रास्ता खोजने में जुटी थी। उस रात, आखिरकार कुछ राहत मिली।
यह कानूनी लड़ाई का अंत नहीं था। यह वह स्थायी समाधान भी नहीं था जिसकी अजाभा को सख्त जरूरत है। लेकिन यह एक ऐसा पल था जब लगातार कानूनी काम, दस्तावेजों की सावधानीपूर्वक तैयारी, प्रशासनिक स्तर पर लगातार फॉलो-अप और एक हाशिए पर पड़े परिवार के साथ खड़े रहने के दृढ़ संकल्प ने एक ठोस बदलाव लाने में मदद की।
लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है
अजाभा खातून की रिहाई CJP की असम टीम के लिए 2026 में एक अहम पड़ाव है। यह कानूनी मदद के महत्व को दिखाता है- जो सिर्फ याचिका दायर करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उस व्यक्ति को राहत दिलाने के लिए जरूरी व्यावहारिक और अक्सर थका देने वाले काम को भी जारी रखती है, जो शायद अकेले सिस्टम से जूझने में असमर्थ होता।
उनका मामला उन लोगों पर लंबे समय तक हिरासत में रहने के मानवीय असर को भी सामने लाता है जिन्हें 'विदेशी' घोषित कर दिया गया है। खासकर उन लोगों के लिए जो बीमार हैं, आर्थिक रूप से कमजोर हैं और कानूनी कार्यवाही लंबित रहने के दौरान अपने परिवारों से अलग कर दिए गए हैं।
अजाभा के लिए, आजादी का मतलब है अपने गांव वापस लौटना, अपने परिवार को गले लगाना और एक बार फिर खुले आसमान के नीचे सोना। लेकिन उनकी इस राहत पर इस बात का साया है कि सेहेरा और अन्य लोग अभी भी हिरासत में हैं।
CJP की टीम अजाभा की वापसी का जश्न मना रही है, लेकिन साथ ही वह उस जिम्मेदारी को भी आगे बढ़ा रही है जो अजाभा की अपील से उनके सामने आई है: सेहेरा का पता लगाने की कोशिश करना, उपलब्ध कानूनी विकल्पों को खोजना, और उन लोगों को राहत दिलाने के लिए काम जारी रखना जो अभी भी कैद में हैं।
772 दिनों के बाद, अजाभा अपने घर वापस आ गई हैं। उनके कानूनी मामले का अभी भी किसी नतीजे तक पहुंचना बाकी है, और उनकी रिहाई की शर्तों का सम्मान किया जाना चाहिए। फिलहाल, एक परिवार को अपनी मां वापस मिल गई है, एक गांव ने अपनी ही एक सदस्य का स्वागत किया है, और कैद की पीड़ा झेलने वाली एक महिला को अब इतनी हिम्मत मिल गई है कि वह उन लोगों के लिए आवाज उठा सके जो अभी भी अंदर हैं। उनकी आजादी एक अहम पड़ाव है। सेहेरा के लिए उनकी अपील हमें याद दिलाती है कि अभी भी बहुत काम बाकी है।
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