SIR रद्द करें, चुनावी विश्वसनीयता बहाल करें: वोट देने के अधिकार की रक्षा के लिए एक राष्ट्रीय आह्वान

Written by | Published on: October 8, 2026
जन सभा ने SIR को खत्म करने, चुनाव आयोग की जवाबदेही तय करने और वोटर लिस्ट से गलत तरीके से नाम हटाए जाने के खिलाफ तुरंत सुरक्षा उपाय करने की मांग की है।



वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) पर हुई एक बड़ी राष्ट्रीय चर्चा में कई लोग शामिल हुए। इनमें हायर ज्यूडिशियरी के रिटायर्ड सीनियर सदस्य, मुंबई, दिल्ली और चेन्नई के वरिष्ठ वकील, पूर्व वरिष्ठ नौकरशाह, एकेडमिक्स, एक्टिविस्ट, स्वतंत्र पत्रकार और पूरे भारत से सिविल-सोसाइटी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे। 3 अक्टूबर, 2026 को हुई इस चर्चा में लगभग 200 संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले 80 से ज्यादा लोग शामिल हुए, जबकि कई अन्य लोग जो शामिल नहीं हो पाए, उन्होंने पहले ही अपने सुझाव और जानकारी भेज दी थी।

'पीपल्स फर्स्ट', 'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (CJP) और 'वोट फॉर डेमोक्रेसी' (VFD) द्वारा आयोजित इस चर्चा में वोटर लिस्ट के रिविजन से जुड़ी बढ़ती चिंताओं, योग्य वोटरों के नाम लिस्ट से हटने, भारत के चुनाव आयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही, और विवादित या प्रक्रियात्मक रूप से दोषपूर्ण वोटर लिस्ट के आधार पर चुनाव कराने के कानूनी और लोकतांत्रिक नतीजों पर विचार किया गया।

इस चर्चा में शामिल प्रमुख लोगों में शामिल थे: एमजी देवसहायम (सैनिक, अर्थशास्त्री, प्रशासक, लोक सेवक व भारत की चुनावी प्रणाली के विशेषज्ञ); डॉ. प्यारेलाल गर्ग (पूर्व डीन और सर्जरी के प्रोफेसर और VFD के विशेषज्ञ); प्रोफेसर हरीश कार्निक (पूर्व प्रोफेसर IIT कानपुर); वरिष्ठ RTI एक्टिविस्ट वेंकटेश नायक; पूर्व केंद्रीय गृह सचिव गोपाल कृष्ण पिल्लई; पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव ईएएस सरमा; कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप के पूर्व नौकरशाह अमिताभ पांडे; अभिनेता प्रकाश राज; मानवाधिकार एक्टिविस्ट उषा रामनाथन; थॉमस फ्रेंको (ऑल इंडिया बैंक ऑफिसर्स कन्फेडरेशन के पूर्व महासचिव); 'वेक अप कर्नाटक' की तारा राव और नूर श्रीधर; और एकेडमिक अशोक चटर्जी।

इस चर्चा में SIR प्रक्रिया को लेकर व्यापक चिंताएं सामने आईं। इसमें असम, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों के लोग शामिल हुए। DB लाइव के स्वतंत्र पत्रकार प्रशांत टंडन और तमिलनाडु के इंद्र कुमार थेराडी ने भी इसमें हिस्सा लिया।

असम से बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी खास तौर पर अहम थी। ऐसे राज्य में जहां नागरिक दशकों से दस्तावेजी रिकॉर्ड के जरिए अपनी नागरिकता साबित करने के भारी बोझ का सामना कर रहे हैं, वहां सीनियर एकेडमिक डॉ. घनश्याम नाथ... CJP के नंदा घोष; वकील मृण्मय दत्ता, अभिजीत चौधरी, अब्दुर रहीम और जमाल उद्दीन; हरकुमार गोस्वामी; 'फोरम फॉर सोशल हार्मनी' के डॉ. ऋतुराज कलिता; और प्रोफेसर तैजुद्दीन अहमद ने असम की नागरिकता और चुनावी प्रक्रियाओं के अनुभव को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनाया। इस चर्चा का संचालन CJP की सेक्रेटरी तीस्ता सीतलवाड़ ने किया।

इसमें भाग लेने वालों की विविधता ही इस बात का सबूत थी कि SIR के मुद्दे को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है। वोटर लिस्ट में बदलाव (रिविजन) सिर्फ एक प्रशासनिक काम नहीं है। यह तय करता है कि किसे वोटर माना जाएगा और इसलिए कौन लोकतांत्रिक भागीदारी के सबसे बुनियादी अधिकारों में से एक - वोट देने का अधिकार - का इस्तेमाल कर पाएगा।

नतीजतन, इस चर्चा में एक मुख्य मांग के इर्द-गिर्द जन-आंदोलन, व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, सोशल ऑडिट, कानूनी दखल और संस्थागत जवाबदेही को एक साथ लाने का फैसला किया गया: SIR को खत्म किया जाए और हर योग्य नागरिक के चुनावी अधिकारों को बहाल और सुरक्षित किया जाए।

जन-अभियानों/विरोध-प्रदर्शनों के लिए मांगें

1. CEC ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना होगा: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का इस्तीफा या हटाया जाना (अगर इस्तीफा नहीं होता है, तो इस प्रक्रिया के लिए महाभियोग का कानूनी प्रावधान है)।

2. SIR को रद्द किया जाना चाहिए: SIR को पूरी तरह से रद्द किया जाए। भविष्य के सभी चुनाव 2024 की वोटर लिस्ट व पिछले 2 वर्षों में नाम जोड़ने या हटाने के लिए कानून और पुरानी परंपरा के अनुसार किए गए किसी भी बदलाव पर आधारित होने चाहिए।

3. भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को भंग किया जाना चाहिए।

4. 2023 का वह कानून रद्द किया जाए जो ECI आदि को कानूनी कार्रवाई से छूट देता है और आयुक्तों की नियुक्ति को अपारदर्शी बनाता है: आयुक्तों को उनके फैसलों के लिए छूट देने वाले 2023 के कानून को रद्द किया जाए। 5. सभी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नया कानून बनाना: इस नए कानून में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नियुक्ति करने वाली कमिटी और प्रक्रिया व्यापक और विविध हो, और इसमें कुछ जवाबदेही भी हो। नियुक्ति 8-10 लोगों की एक व्यापक कमिटी द्वारा या उसके माध्यम से की जानी चाहिए, जिसमें सरकार के दो नॉमिनी, विपक्ष के दो नॉमिनी, दो पूर्व चुनाव आयुक्त (जो सरकार द्वारा दिया गया कोई पद न संभाल रहे हों) और उच्च न्यायपालिका के दो प्रतिनिधि (हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जो कोई पद न संभाल रहे हों) शामिल हों। अंतिम चयन दो-तिहाई बहुमत से होना चाहिए।

6. SIR 2025 प्रक्रिया के बाद हुए चुनावों को रद्द करना और दोबारा कराना: चुनाव, 2025 और 2026 (जैसा भी मामला हो) के वार्षिक 'समरी रिविजन' (summary revision) के बाद वेरिफ़ाई और पारदर्शी वोटर लिस्ट (electoral rolls) के आधार पर कराए जाने चाहिए।

7. ECI के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही: चुनाव के दौरान और सामान्य समय में, EC के पास उपलब्ध सभी डेटा मशीन-रीडेबल फॉर्मेट में पूरी तरह पारदर्शी और जनता की पहुंच में होना चाहिए। खास तौर पर सभी वोटर लिस्ट, चुनाव के दौरान पीठासीन अधिकारियों (presiding officers) द्वारा भरे गए सभी फॉर्म और वोटों की गिनती से जुड़ा डेटा।

8. सोर्स कोड को सार्वजनिक करना: EVM सॉफ्टवेयर, ECInet/EROnet सॉफ्टवेयर और वोटर लिस्ट की जांच-पड़ताल (जैसे तार्किक गड़बड़ी का पता लगाने) के लिए इस्तेमाल होने वाले किसी भी अन्य सॉफ्टवेयर का सोर्स कोड सार्वजनिक डोमेन में होना चाहिए।

चुनावी पारदर्शिता एक संवैधानिक जरूरत है

सभा ने ECI के कामकाज में पूरी पारदर्शिता की मांग की है, जिसमें मशीन-रीडेबल फॉर्मेट में चुनावी डेटा, वोटर लिस्ट, चुनाव अधिकारियों द्वारा भरे गए जरूरी फॉर्म और वोटों की गिनती से जुड़ी जानकारी तक जनता की पहुंच शामिल है। इसने EVM सॉफ्टवेयर, ECINet, ERONet और वोटर लिस्ट के वेरिफिकेशन और गड़बड़ी का पता लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाले अन्य सॉफ्टवेयर के सोर्स कोड को भी सार्वजनिक डोमेन में रखने की मांग की है। ये मांगें एक बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांत से जुड़ी हैं। नागरिक किसी चुनावी फैसले को असरदार ढंग से चुनौती नहीं दे सकते अगर उस फैसले तक पहुंचाने वाली प्रक्रियाएं आम लोगों की पहुंच से बाहर हों या उनकी स्वतंत्र रूप से जांच करना नामुमकिन हो। डिजिटलाइजेशन जवाबदेही का विकल्प नहीं बन सकता।

अगर किसी वोटर का नाम हटाया जाता है, तो नागरिक को यह पता होना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ। अगर नाम हटाने के लिए कोई आवेदन दिया गया है, तो उस आवेदन का आधार और स्रोत जांच के दायरे में होना चाहिए। अगर नाम शामिल करने का दावा खारिज कर दिया जाता है, तो वोटर को इसके कारणों का पता होना चाहिए। अगर कोई अपील लंबित है, तो उसकी स्थिति का पता लगाया जा सकना चाहिए। अगर कोई सॉफ्टवेयर किसी गड़बड़ी या नाम हटाने की प्रक्रिया में भूमिका निभाता है, तो इस बात का ऑडिट-योग्य रिकॉर्ड होना चाहिए कि वह फैसला कैसे लिया गया और उसकी समीक्षा कैसे की गई। संवैधानिक चुनाव प्रक्रिया को 'ब्लैक बॉक्स' की तरह काम करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। कानूनी दखल सीमित, सख्त और सबूतों पर आधारित होना चाहिए।

इस सभा ने SIR और विवादित या प्रक्रिया में खामियों वाली वोटर लिस्ट के आधार पर हुई चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े सही कानूनी उपायों का पता लगाने में मदद करने का फैसला किया है। कानूनी रणनीति की शुरुआत सबूतों से होनी चाहिए। इसमें लोगों के नाम हटाने के पैटर्न, एक साथ कई नाम हटाने के आवेदन, फॉर्म 6 और 7, सॉफ्टवेयर की वजह से नाम हटना, बिना सुलझी अपील, नाम वापस न जुड़ पाना और ऐसे मामले जहां नागरिकों को वेरिफिकेशन या सुनवाई का सही मौका नहीं मिला, इन सबको दर्ज करना होगा।

बिहार से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के मई 2026 के फैसले के बाद यह तरीका और भी जरूरी हो गया है। अब सही संवैधानिक सवाल यह नहीं है कि क्या ECI के पास बड़े पैमाने पर बदलाव करने की शक्ति है, बल्कि यह है कि क्या उस शक्ति का इस्तेमाल कानूनी ढांचे और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के मुताबिक किया गया है।

जिन जगहों पर ऐसी वोटर लिस्ट के आधार पर चुनाव हो चुके हैं जिनमें गंभीर गड़बड़ियां पाई गई हैं, वहां चुनाव से जुड़ी चुनौतियों को संभालने वाले कानूनी ढांचे और हर चुनाव क्षेत्र के खास सबूतों के आधार पर समाधान तलाशे जाने चाहिए। इस सभा ने खास तौर पर पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में लंबित अपील और वोटरों के नाम वापस जुड़ने की कम संख्या को ऐसे मामलों के तौर पर पहचाना है, जिनकी बारीकी से जांच जरूरी है, ताकि बदली हुई वोटर लिस्ट के आधार पर हुए चुनावों की वैधता के बारे में कोई नतीजा निकाला जा सके।

नाम से हटाए गए हर वोटर को पहचान दें

इसलिए इस सभा ने SIR से प्रभावित राज्यों में वोटर लिस्ट का देशव्यापी पब्लिक सोशल ऑडिट करने की मांग की है। सिविल सोसाइटी संगठनों, कम्युनिटी ग्रुप्स, युवा संगठनों और नागरिकों को बूथ, वार्ड और ग्राम सभा स्तर पर मिलकर वेरिफिकेशन करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसमें जहां भी संभव हो, संबंधित बूथ लेवल ऑफिसर और इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर भी शामिल हों।

दिल्ली के कुछ हिस्सों और कर्नाटक में लगभग 100 बूथों पर ऐसी कवायद पहले ही की जा चुकी है। सभा इन कोशिशों को एक व्यवस्थित राष्ट्रीय अभियान का रूप देना चाहती है, जिसमें नाम हटाने, लंबित दावों और आपत्तियों, फॉर्म 6 और 7, नाम हटाने के नोटिस, एक साथ कई आवेदन और प्रक्रिया से जुड़ी गड़बड़ियों को दर्ज किया जाएगा।

इस सार्वजनिक प्रक्रिया में SIR के जरिए हटाए गए और जोड़े गए नामों की तुलना पुराने चुनावी रिकॉर्ड (जैसे 2002-03 की वोटर लिस्ट, जहां जरूरी हो) और 2025-26 की SIR वोटर लिस्ट से करना शामिल होगा। इसका मकसद यह पता लगाना है कि अलग-अलग वोटरों के साथ क्या हुआ, ताकि उनके नाम हटने की बात प्रशासनिक आंकड़ों में कहीं खो न जाए।

इस कैंपेन का मकसद उन 13.60 करोड़ भारतीयों को पहचान और नाम देना है जिन्हें बेहद दुखद और शर्मनाक तरीके से बाहर कर दिया गया था। और यह सब भारत के चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था ने किया। 2025-2026 के SIR को रद्द करने की मांग को बढ़ाने और बनाए रखने के लिए पब्लिक सोशल ऑडिट का यह कैंपेन बहुत जरूरी है।

नाम हटाने या जोड़ने के हर प्रस्ताव को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, और वोटर को नाम हटाने का विरोध करने और गलत तरीके से हटाए गए नाम को वापस जुड़वाने का सही मौका मिलना चाहिए। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता होनी चाहिए कि किसने नाम हटाने की मांग की, किस आधार पर, किसका नाम हटाने का प्रस्ताव है और क्या जांच की गई। बिना सार्वजनिक सूचना, जांच और आपत्ति जताने के असरदार मौके के वोटर लिस्ट में कोई बदलाव नहीं किया जाना चाहिए।

स्वतंत्र जांच से जनता के प्रति जवाबदेही मजबूत होनी चाहिए

इस सभा ने SIR की संवैधानिक और कानूनी वैधता, तरीके और असर की जांच के लिए 'लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन' (LAFC) द्वारा बनाए गए पूर्व सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट जजों के स्वतंत्र आयोग का स्वागत किया है। पांच सदस्यों वाले इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी. लोकुर कर रहे हैं और इसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस ए.के. पटनायक और जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और पटना हाई कोर्ट के पूर्व जज शामिल हैं। यह आयोग जन-सुनवाई करने, प्रभावित नागरिकों से बयान लेने और वोटर लिस्ट के डेटा का विश्लेषण करने का प्रस्ताव रखता है, और दिसंबर 2026 तक रिपोर्ट आने की उम्मीद है।

इस सभा ने इस प्रक्रिया में आयोग के सामने सार्वजनिक अभियान, स्वतंत्र जांच और सोशल ऑडिट से मिले जरूरी डेटा, दस्तावेज और सबूत पेश करके मदद करेगी। ऐसी जांच को न्यायिक और कानूनी उपायों की जगह नहीं लेनी चाहिए, बल्कि उनका पूरक होना चाहिए। इसकी अहमियत उन सबूतों को एक साथ लाने में है जो अलग-अलग वोटरों, चुनाव अधिकारियों, सिविल-सोसाइटी समूहों और स्वतंत्र जांच के बीच बिखरे हुए हैं।

बिना जवाबदेही के लोगों को बाहर रखने वाली चुनावी लोकतंत्र व्यवस्था टिक नहीं सकती

SIR से जुड़े विवाद ने ऐसे कई सवालों को एक साथ खड़ा कर दिया है जिन्हें अलग-अलग नहीं देखा जा सकता: वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता, वोट देने का अधिकार, संस्थागत आजादी और पारदर्शिता, सामूहिक फैसला लेना और न्यायिक जवाबदेही। चुनाव की विश्वसनीयता वोटिंग के दिन से बहुत पहले ही शुरू हो जाती है। यह वोटर लिस्ट से शुरू होती है। अगर किसी योग्य नागरिक का नाम बिना सही नोटिस, वेरिफिकेशन या असरदार उपाय के हटा दिया जाता है, तो उस नागरिक के पोलिंग स्टेशन पहुंचने से पहले ही लोकतांत्रिक नुकसान हो जाता है। इसलिए, 3 अक्टूबर की सभा ने एक मुख्य मांग के इर्द-गिर्द जन-लामबंदी, सोशल ऑडिट, सबूत जुटाने, कानूनी दखल और संस्थागत जवाबदेही को एक साथ लाने का फैसला किया है।

हर योग्य नागरिक को वोटर लिस्ट में बने रहने, नाम हटाने के प्रस्ताव का कारण जानने, उसे असरदार ढंग से चुनौती देने और गलत तरीके से नाम हटाए जाने पर उसे ठीक करवाने का अधिकार होना चाहिए।

SIR को रद्ध करें और वोटर लिस्ट लागू करें

इस सभा ने मांग की है कि SIR प्रक्रिया को पूरी तरह से उलट दिया जाए और भविष्य के चुनाव 2024 की वोटर लिस्ट के आधार पर कराए जाएं, जिसमें सामान्य कानूनी प्रक्रियाओं और स्थापित सुरक्षा उपायों के तहत नाम जोड़ने या हटाने की गुंजाइश हो। यह मांग सुप्रीम कोर्ट के मई 2026 के उस फैसले के बाद उठी है जिसमें बिहार SIR की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा गया था। हालांकि, उस फैसले का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि SIR से जुड़े बाद के हर फैसले या उसके लागू होने की प्रक्रिया को न्यायिक जांच से बाहर रखा जाए। मौजूदा विवाद सिर्फ वोटर लिस्ट में बदलाव करने की शक्ति के होने का नहीं है, बल्कि उस शक्ति का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है, उसके साथ कौन-कौन से सुरक्षा उपाय हैं और इस प्रक्रिया के दौरान लिए गए खास फैसलों की कानूनी वैधता क्या है, इस बारे में है।

यह फर्क बहुत जरूरी है। संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल संविधान, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Acts), मतदाता पंजीकरण नियम (Registration of Electors Rules), लागू निर्देशों और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुसार ही किया जाना चाहिए। इसलिए, ये सभा SIR के बारे में सामान्य दावों पर निर्भर रहने के बजाय, खास उल्लंघनों, दर्ज किए गए नामों को हटाने, दोषपूर्ण प्रक्रियाओं और कानूनी सुरक्षा उपायों के उल्लंघन पर केंद्रित सबूत-आधारित कानूनी रणनीति का प्रस्ताव करती है।

जवाबदेही के बिना चुनाव आयोग काम नहीं कर सकता

इस सभा ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है और चुनाव आयोग को चलाने वाले संस्थागत ढांचे में बुनियादी बदलाव की भी मांग की है। सुप्रीम कोर्ट की 5 अक्टूबर की कार्यवाही के बाद इन मांगों का महत्व और बढ़ गया है। इस कार्यवाही में उन आरोपों पर चर्चा हुई कि SIR से जुड़े अहम फैसले CEC ने बाकी दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद एकतरफा तरीके से लिए थे।

'द इंडियन एक्सप्रेस' की जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों में कम से कम 14 बार SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर आपत्तियां दर्ज कराईं। कुछ आपत्तियों में आरोप लगाया गया कि फैसले उनकी जानकारी के बिना या उनकी सिफारिशों के खिलाफ लिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने अब संबंधित अधिकारियों से जवाब और रिकॉर्ड मांगे हैं। कोर्ट ने इस चरण में CEC को निलंबित करने से इनकार कर दिया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि कथित एकतरफा फैसलों की वैधता की जांच की जा सकती है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि आयोग के फैसलों को सामूहिक निर्णय लेने की कानूनी रूप से निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।

फॉर्म 6 को लेकर विवाद इस मुद्दे को और भी गंभीर बनाता है। 5 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 में किए गए कथित बदलावों को मंजूरी नहीं दी थी और संकेत दिया कि कोर्ट यह जांच करेगा कि उन बदलावों को किसने अधिकृत किया था।

फॉर्म 6 खास तौर पर और प्रक्रियात्मक रूप से पहली बार नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए बनाया गया है। ECI, सीमित और विशिष्ट उद्देश्य के लिए बनी इस प्रक्रिया का इस्तेमाल गलत तरीके से हटाए गए पुराने मतदाताओं के फिर से पंजीकरण के लिए करके खुद एक गलत और गैर-कानूनी काम कर रहा है और नागरिकों से भी ऐसा ही करने को कह रहा है। स्थिति को और खराब करते हुए, संशोधित फॉर्म 6 में एक पुराने मतदाता द्वारा शपथ पर एक घोषणा शामिल है कि 'उसने पहले वोट नहीं दिया है'। इसलिए, देश के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कोई खास प्रशासनिक फैसला सही था या नहीं। बल्कि सवाल यह है कि क्या लोकतांत्रिक मतदान प्रक्रिया पर बहुत ज़्यादा अधिकार रखने वाली एक संवैधानिक संस्था सामूहिक रूप से, पारदर्शी तरीके से और कानून की सीमाओं के दायरे में काम कर रही है।

पूरा प्रस्ताव नीचे पढ़ा जा सकता है:



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