SIR में ‘अवैध प्रवासी’ का मिथक टूटा, अब क्या पीड़ितों के साथ हुए अन्याय सुधारे जाएंगे?

Written by Teesta Setalvad | Published on: November 3, 2026
कर्नाटक में मुश्किल से 771 “विदेशी नागरिक” और छह अन्य भारतीय राज्यों में केवल 1,600 विदेशी नागरिक ही पहचाने गए हैं; फिर भी, “घुसपैठियों” (अवैध प्रवासियों) के बेबुनियाद और डरावने हौवे का इस्तेमाल करके 13 करोड़ से ज्यादा भारतीयों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है?


Image: outlookindia.com

असम की विवादित ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स’ (NRC) प्रक्रिया की तरह ही—जिसने न केवल 19 लाख लोगों को नागरिकता से ‘संभावित रूप से बाहर’ कर दिया, बल्कि सात साल (31 अगस्त, 2019 तक) बीत जाने के बाद भी उनकी शिकायतों के समाधान को अधर में लटकाए रखा—ठीक उसी तरह पूरी तरह से अविश्वसनीय ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को भी शुरू किया गया। इन दोनों ही प्रक्रियाओं की शुरुआत ‘अवैध प्रवासियों’ के राजनीतिक हौवे (डर) के नाम पर की गई थी!

बारह साल पहले, प्रधानमंत्री पद के दावेदार ने आगामी आम चुनावों (2014) के दौरान इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। अब, पिछले लगभग दो वर्षों में, वही व्यक्ति और उनके करीबी सहयोगी—देश के गृह मंत्री—फिर से इसी मुद्दे को चेतावनी के लहजे में उठा रहे हैं। उनके शासनकाल में भारतीय चुनाव आयोग (जो अब तक एक स्वतंत्र और संवैधानिक संस्था रही है) को मजबूर किया गया कि वह भारत की मतदाता सूचियों का एक जल्दबाजी में तैयार किया गया, और यहां तक कि गैर-कानूनी तथा असंवैधानिक ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) करे। जून 2025 में बिहार से शुरू होकर यह प्रक्रिया अब 20 राज्यों में पूरी हो चुकी है, जबकि 16 अन्य राज्य अभी भी इससे जूझ रहे हैं। इस कवायद ने देश को भारी नुकसान पहुंचाया है। न केवल यह अस्पष्ट है कि इस प्रक्रिया को चलाने का लोकतांत्रिक आधार क्या था (ट्रांस्पेरेंसी एक्टिविस्ट ने बताया है कि फैसले लेने में किसी उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया), बल्कि इसमें भारतीय करदाताओं के लगभग 1500 से 3000 करोड़ रुपये खर्च हो गए हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि स्कूलों का कामकाज, कक्षाओं में पढ़ाई और यहां तक कि परीक्षाएं भी बाधित हुई हैं, क्योंकि शिक्षकों को ऐसे काम में लगा दिया गया है, जिसके लिए उन्हें कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं दिया गया था।

और तो और, स्थिति इससे भी बदतर है। ताजा ख़बरों से पता चलता है—जिसके लिए हमें कर्नाटक के स्थानीय समाचार पत्रों (जैसे ‘प्रजावाणी’) और ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ का धन्यवाद करना चाहिए—कि जिन दो सबसे शक्तिशाली भारतीयों ने इस कवायद को सही ठहराने के लिए ‘अवैध प्रवासियों’ के इस हौवे का इस्तेमाल किया था, वह पूरी तरह से झूठा साबित हो गया है।

‘सबरंग इंडिया’ ने 28 अक्टूबर को अपनी रिपोर्ट में बताया कि कैसे कर्नाटक और अन्य जगहों पर SIR के बाद यह बेबुनियाद प्रचार पूरी तरह से झूठ साबित हुआ है। कर्नाटक में बीजेपी और संघ परिवार के नेताओं ने दावा किया था कि राज्य में, खासकर बेंगलुरु में, 10 से 25 लाख बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं और उनकी पहचान करने के लिए SIR जरूरी है। 27 अक्टूबर को, जिस दिन SIR की अंतिम सूची जारी की गई, कर्नाटक के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) अंबु कुमार ने एक सवाल के जवाब में साफ तौर पर कहा कि पकड़े गए विदेशी नागरिकों की संख्या एक हजार से भी कम है। ‘प्रजावाणी’ अखबार की पहले पन्ने की रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक में कुल 771 विदेशी नागरिकों की पहचान हुई, जिनमें से 685 नेपाली थे! अकेले बेंगलुरु उत्तर जिले में 580 विदेशी नागरिकों की पहचान हुई, जिनमें से 542 नेपाली थे। नेपालियों के अलावा जो अन्य विदेशी नागरिक मिले, वे मुख्य रूप से अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अन्य पश्चिमी देशों के नागरिक थे। इससे यह साबित हो गया कि डर और नफरत फैलाने के लिए दिया गया तर्क पूरी तरह से झूठा था।

इसके अलावा, विश्वसनीय सूत्रों से मिले दस्तावेजों के अनुसार, केवल एक बांग्लादेशी और एक पाकिस्तानी नागरिक की पहचान हुई, और वे दोनों उत्तर कन्नड़ जिले में मिले। इससे दो बातें बिल्कुल साफ हो जाती हैं। पहली, संघ परिवार का दुर्भावनापूर्ण प्रचार झूठा था। दूसरी, SIR के पीछे का मकसद “राष्ट्रीय सुरक्षा” या “अवैध प्रवासियों” की पहचान करना नहीं, बल्कि लाखों भारतीयों को उनके अधिकारों से वंचित करना था!

गौरतलब है कि इस नतीजे पर पहुंचने के दो और अहम कारण हैं। 27 मई को SIR पर दिए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने उन राज्यों को, जहां SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, निर्देश दिया था कि वे इस प्रक्रिया के दौरान पहचाने गए संदिग्ध विदेशी नागरिकों की सूची चार सप्ताह के भीतर गृह मंत्रालय के तहत आने वाले “सक्षम प्राधिकारी” (Competent Authority) को सौंप दें। उस फैसले को आए अब चार सप्ताह नहीं, बल्कि पांच महीने बीत चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले ही 13 राज्यों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इन्हीं ट्रांसपेरेंसी एक्टिविस्ट (वेंकटेश नायक और अंजलि भारद्वाज) ने अगस्त 2026 में सूचना का अधिकार (RTI) कानून का इस्तेमाल करते हुए गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग से यह जानने की कोशिश की कि ऐसे कितने विदेशी नागरिकों की पहचान की गई है। गौरतलब है कि अक्टूबर में गृह मंत्रालय (MHA) ने अपने जवाब में कहा कि उसके पास न तो “सक्षम प्राधिकारी” के बारे में कोई जानकारी है और न ही संदिग्ध विदेशी नागरिकों की कोई सूची है। वहीं, चुनाव आयोग ने जवाब दिया कि उसके पास ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं है जिससे पता चले कि विभिन्न राज्यों में SIR के जरिए कितने संदिग्ध विदेशी नागरिकों की पहचान की गई है।
और अब बात करते हैं आज की, यानी 29 अक्टूबर 2026 की, जो इस पूरे मामले में ‘सोने पे सुहागा’ जैसा है।

‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, छह राज्यों की मतदाता सूची में 1,600 विदेशी नागरिकों की पहचान की गई है—जो कि कुल मतदाताओं की संख्या के मुकाबले न के बराबर है। लाखों या करोड़ों नहीं, सिर्फ 1,600! अखबार की हिमांशी दहिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इन छह राज्यों में कुल मतदाताओं की संख्या 9.86 करोड़ है। यह अनुपात दिखाता है कि कुल मतदाताओं की तुलना में यह संख्या कितनी मामूली है। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEOs) से बात की, जहां SIR का काम पूरा हो चुका था या मतदाता सूची का ड्राफ्ट जारी किया गया था। इनमें से 11 राज्यों के अधिकारियों ने जवाब दिया। छह राज्यों ने संदिग्ध विदेशी नागरिकों की संख्या बताई, जबकि चार राज्यों ने कहा कि वे ऐसा कोई डेटा नहीं रखते। ओडिशा ने बताया कि उन्हें ऐसे मामले मिले हैं, लेकिन उन्होंने कोई सटीक आंकड़ा दर्ज नहीं किया। कर्नाटक में बड़ी संख्या में नेपाली नागरिक मतदाता सूची में पाए गए, जबकि झारखंड की सूची में अफगानिस्तान के तीन लोग शामिल थे। मेघालय में नेपाल मूल के दो व्यक्तियों की पहचान हुई, और दिलचस्प बात यह है कि दोनों ने भारतीय महिलाओं से शादी की है! गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी संजय गोयल ने बताया कि वहां 419 ऐसे लोग मिले हैं जिनके पास विदेशी पासपोर्ट होने का संदेह है। वहीं, पंजाब, दिल्ली, उत्तराखंड और तेलंगाना ने इस तरह का कोई डेटा दर्ज नहीं किया।

तो इसका क्या मतलब है? आज कम से कम 13.60 करोड़ भारतीय नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हैं। ‘वोट फॉर डेमोक्रेसी’ (Vote for Democracy) के स्वतंत्र आकलन के अनुसार, यह संख्या 16 करोड़ से भी अधिक हो सकती है! दिसंबर 2025 में भारत के गृह मंत्री ने SIR का बचाव करते हुए कहा था कि इसका मकसद कथित ‘घुसपैठियों’ की पहचान करना, उन्हें सूची से हटाना और देश से बाहर निकालना है—हालांकि यह दावा पूरी तरह से बेबुनियाद है।
इस मनमानी और बिना किसी ठोस आधार वाली प्रक्रिया (SIR) के कारण बिहार और पश्चिम बंगाल के बड़ी संख्या में असली भारतीय मतदाता अपने मताधिकार से वंचित हो गए हैं। अभी भी कानूनी प्रक्रिया चल रही है, लेकिन इसके बावजूद हजारों लोग नागरिकता से जुड़े अन्य लाभ से भी महरूम हो गए हैं। इनमें सरकारी योजनाओं का लाभ, पासपोर्ट और हर जगह ज़रूरी माने जाने वाले आधार कार्ड जैसी सुविधाएं शामिल हैं। हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि SIR नागरिकता तय करने की कोई प्रक्रिया नहीं हो सकती, लेकिन मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के कारण लोगों को इन बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित होना पड़ रहा है। इससे भी ज्यादा डरावनी बात पश्चिम बंगाल और असम राज्यों में शुरू किया गया वह अभियान है—जहां दोनों जगह भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार है—जिसके तहत लोगों को जबरदस्ती देश से बाहर निकालने (deportation) की कार्रवाई की जा रही है (असम में मई 2025 से और पश्चिम बंगाल में मई 2026 के बाद से)। ‘रिपोर्टर्स कलेक्टिव’, ‘द वायर’, ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ और ‘सिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ की रिपोर्टों के अनुसार, इसके चलते बंगाली मूल के मुसलमानों को जबरदस्ती उनके घरों से निकाला गया है। केंद्र सरकार की अपनी ‘निर्वासन नीति’ (deportation policy) का पालन किए बिना, उन्हें सीमा पार ‘नो मैन्स लैंड’ (no man’s land) और यहां तक कि बांग्लादेश में धकेल दिया गया है! SIR प्रक्रिया पूरी होने के बाद, पश्चिम बंगाल में BJP सरकार ने “पहचानो, हटाओ, निकालो” (detect, delete, deport) नीति के तहत मई 2026 में डिटेंशन कैंप (हिरासत केंद्र) बनाए और मनमाने ढंग से लोगों को हिरासत में लेना जारी रखा।

ये सभी कदम बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया, सबूत या जवाबदेही के उठाए गए हैं। यह सब एक ऐसी सरकार द्वारा किया जा रहा है जो लगातार और ज्यादा अलोकतांत्रिक तरीके से काम कर रही है; जो अपने समर्थकों को हकीकत या तथ्यों के बजाय उन्माद (hysteria) और प्रोपेगैंडा परोस रही है। हालांकि पिछले कुछ महीनों में राजनीतिक विपक्ष ने इस गलत तरीके से सोची गई SIR प्रक्रिया का कड़ा विरोध किया है, लेकिन इससे उन नागरिकों के जीवन पर पड़ने वाले विनाशकारी प्रभाव अभी भी लोगों की नजरों से ओझल हैं।

ये 16 करोड़ (160 मिलियन) बदकिस्मत भारतीय कौन हैं, जो आज ‘नागरिकता विहीन’ (stateless) होने के गंभीर खतरे के साये में जी रहे हैं? इसका जवाब हम सभी को—चाहे वह कोई संस्था हो, व्यक्ति हो या पूरा समाज—झकझोर कर रख देने वाला होना चाहिए। और जब तक इस गंभीर अन्याय को सुधारा नहीं जाता—एक-एक व्यक्ति, एक-एक मतदाता के स्तर पर—तब तक भारत का लोकतंत्र बँटा हुआ और कमजोर बना रहेगा।


[1] https://www.youtube.com/watch?v=zQnSBVGZy-k;

[2]https://ceo.karnataka.gov.in/uploads/PDF%20FINAL%20AC%20WISE%2027_179309...

[3] https://thewire.in/rights/rti-reveals-in-sir-purging-of-ineligibles-from...

[4] https://www.youtube.com/watch?v=HowI1PVIwyE

[5] https://indianexpress.com/article/cities/patna/bihar-ration-card-list-tr...

[6] https://indianexpress.com/article/india/election-commission-sir-draft-ro...

[7] https://theprint.in/india/bengals-bjp-govt-tells-districts-to-set-up-det...

बाकी ख़बरें