नागरिक मंच ने चुनाव आयोग में पारदर्शिता, स्वतंत्रता और जवाबदेही की मांग की है।

'फोरम फॉर सोशल हार्मनी – नागरिक उद्योग' ने मांग की है कि वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) को रद्द किया जाए, इस प्रक्रिया में हटाए गए असली वोटरों के नाम वापस जोड़े जाएं, और योग्य नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित होने से बचाने के लिए सुरक्षा उपाय किए जाएं।
ये मांगें 25 सितंबर को गुवाहाटी प्रेस क्लब में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाई गईं। इससे पहले 20 सितंबर को गुवाहाटी के लक्ष्मीराम बरुआ सदन में 'नागरिक अधिवेशन' (Citizens’ Convention) आयोजित किया गया था। प्रेस कॉन्फ्रेंस में अधिवेशन के आयोजकों की ओर से हरकुमार गोस्वामी, डॉ. घनश्याम नाथ, प्रो. तैज़ुद्दीन अहमद और मनोरम गोगोई ने बात रखी।
20 सितंबर के अधिवेशन में, फोरम ने असम में SIR लागू करने का विरोध किया था और रुके हुए 'नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स' (NRC) की प्रक्रिया पूरी करने की मांग की थी। अधिवेशन में यह राय रखी गई थी कि NRC को पूरा करने के लिए 2014 की वोटर लिस्ट को आधार या "फ्रीज" माना जाना चाहिए।
अधिवेशन में उठाई गई चिंताओं का महत्व तब और बढ़ गया जब 23 सितंबर को 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक पड़ताल की रिपोर्ट छपी। इस रिपोर्ट में बताया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों के दौरान चुनाव आयोग के नाम पर जारी फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्तियां दर्ज कराई थीं। ये आपत्तियां वोटर रजिस्ट्रेशन और नाम हटाने, फॉर्म 6 में बदलाव, और वोटर डेटाबेस के मैनेजमेंट और सेंट्रलाइज़ेशन जैसे मामलों से जुड़ी थीं। जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने कुछ बदलावों को "अनधिकृत" (बिना अधिकार के किए गए) और "गैर-कानूनी" बताया था।
हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR और अन्य मामलों से जुड़े फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे और बताई गई असहमति को संस्थागत विचार-विमर्श की प्रक्रिया का हिस्सा बताया।
इस पृष्ठभूमि में, फोरम ने कहा है कि दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज आपत्तियों की जानकारी, उन पर की गई कार्रवाई और मुद्दों को सुलझाने के तरीके को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। फोरम ने कहा, "यह किसी व्यक्ति या किसी राजनीतिक पार्टी का सवाल नहीं है। यह हर नागरिक के वोट देने के अधिकार और भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता का सवाल है।" संगठन ने अधिकारियों के सामने चार मांगें रखीं:
● SIR प्रक्रिया को खत्म करें और असली वोटरों के नाम वापस जोड़ें: पूरी SIR प्रक्रिया को खत्म किया जाना चाहिए और जिन असली वोटरों के नाम इस प्रक्रिया के कारण हटा दिए गए हैं, उन्हें वोटर लिस्ट में वापस जोड़ा जाना चाहिए।
● वोटिंग का अधिकार छीनने की प्रक्रिया रोकें और अपील का असरदार अधिकार सुनिश्चित करें: किसी भी वोटर का नाम वोटर लिस्ट से तब तक नहीं हटाया जाना चाहिए जब तक कि नाम हटाने के प्रस्ताव को चुनौती देने का पारदर्शी, निष्पक्ष और असरदार मौका न दिया जाए। फोरम ने मांग की है कि ऐसी किसी प्रक्रिया के आधार पर चुनाव न कराए जाएं, जिससे उनकी नजर में योग्य वोटरों के वोटर लिस्ट से बाहर होने का खतरा हो।
● चुनाव आयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करें: फोरम ने चुनाव आयोग की अंदरूनी फैसला लेने की प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता की मांग की है। इसने मांग की है कि जहां भी बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम हटाए जाएं, वहां स्वतंत्र ऑडिट और जांच हो, और जहां असली वोटरों के अधिकारों का उल्लंघन हो, वहां व्यक्तिगत और संस्थागत जवाबदेही तय की जाए।
फोरम ने यह भी मांग की है कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त अपनी मर्जी से इस्तीफा नहीं देते हैं, तो उन्हें उचित प्रक्रिया के जरिए हटाया जाए। उन्होंने SIR प्रक्रिया और वोटरों के नाम हटाने के आरोपों के कारण आयोग की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवालों का हवाला दिया है।
● चुनाव आयोग की आज़ादी और पारदर्शिता को मजबूत करने के लिए उसका पुनर्गठन करें: फोरम ने चुनाव आयोग को ज्यादा स्वतंत्र, पारदर्शी और लोकतांत्रिक संस्था बनाने के लिए उसके पुनर्गठन की मांग की है। इसने मांग की है कि चुनाव आयुक्तों को चुनने वाली समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाए, क्योंकि उनका तर्क है कि चयन प्रक्रिया सिर्फ़ प्रधानमंत्री जैसे राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों के हाथ में नहीं होनी चाहिए।
फोरम ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि चयन समिति द्वारा विश्वसनीय उम्मीदवारों की पहचान करने के बाद, चुनाव आयुक्तों को अंततः आम जनता द्वारा चुना जाना चाहिए ताकि उनकी लोकतांत्रिक वैधता और जनता का भरोसा मजबूत हो सके।
फोरम ने कहा कि वोट देने के अधिकार को सिर्फ वोटर लिस्ट में नागरिक का नाम होने तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने वोटिंग को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी का एक अहम जरिया बताया और कहा कि यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि योग्य नागरिक वोटर लिस्ट में बदलाव के नाम पर इस अधिकार से वंचित न रहें।
‘20 सितंबर को हमने जो कहा था, वह 23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस ने साबित कर दिया’
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए हरकुमार गोस्वामी ने SIR (नागरिकों के रजिस्टर का सत्यापन) को लेकर फोरम की चिंताओं को 20 सितंबर को हुए 'नागरिक अभिबर्तन' में चर्चा किए गए मुद्दों से जोड़ा। गोस्वामी ने कहा, "20 सितंबर को 'नागरिक अभिबर्तन' में हमने जो कहा था, वह 23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस ने साबित कर दिया!"
उन्होंने बताया कि असम के 150 प्रतिष्ठित नागरिकों के आह्वान पर और 'फोरम फॉर सोशल हार्मनी' के सहयोग से गुवाहाटी में राज्य-स्तरीय नागरिक सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें जमीन, बेदखली, प्रकृति के विनाश, मजदूरों के अधिकारों, आर्थिक असमानता और नागरिकता जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
गोस्वामी ने कहा कि सम्मेलन में दो अहम प्रस्ताव पारित किए गए: पहला, असम में अधूरे NRC को 2014 की वोटर लिस्ट को आधार या "फ़्रीज़" मानकर पूरा किया जाए; और दूसरा, पूरे देश में चलाई जा रही SIR प्रक्रिया का पुरज़ोर विरोध किया जाए। उन्होंने कहा, "23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस की फ़्रंट-पेज की ख़बर ने पूरे देश के सामने हमारी 20 सितंबर की आशंकाओं और विरोध को उजागर कर दिया। आज पूरा भारत समझ गया है कि SIR कितना खतरनाक है।"
प्रोफैसर तैज़ुद्दीन अहमद ने कहा कि असम में नागरिकता सत्यापन से जुड़ी चिंताओं को पूरे देश में प्रस्तावित वोटर लिस्ट में बदलाव से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा, "असम में कई सालों से नागरिकता के नाम पर ज्यादतियां हो रही हैं। हम यह अच्छी तरह जानते हैं क्योंकि हम असम से हैं। अब, SIR के ज़रिए पूरे भारत में भी वही सब करने की साजिश रची जा रही है। इसलिए, अब समय आ गया है कि देश भर के लोकतांत्रिक लोग लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीक़े से इसका विरोध करें।" डॉ. घनश्याम नाथ ने कहा कि फोरम अपनी चार मांगों के लिए दबाव बनाना जारी रखेगा। उन्होंने कहा, "हमारी चार सूत्रीय मांग पूरी होनी चाहिए; वरना, हम आगे की कार्रवाई पर विचार करेंगे।"
फोरम ने असम और पूरे देश के लोकतांत्रिक नागरिकों, सामाजिक संगठनों और संबंधित समूहों से अपील की है कि वे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक नागरिक आंदोलन के ज़रिए वोटिंग के अधिकार और चुनावी लोकतंत्र की सुरक्षा की मांग को मजबूत करें।
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ये मांगें 25 सितंबर को गुवाहाटी प्रेस क्लब में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाई गईं। इससे पहले 20 सितंबर को गुवाहाटी के लक्ष्मीराम बरुआ सदन में 'नागरिक अधिवेशन' (Citizens’ Convention) आयोजित किया गया था। प्रेस कॉन्फ्रेंस में अधिवेशन के आयोजकों की ओर से हरकुमार गोस्वामी, डॉ. घनश्याम नाथ, प्रो. तैज़ुद्दीन अहमद और मनोरम गोगोई ने बात रखी।
20 सितंबर के अधिवेशन में, फोरम ने असम में SIR लागू करने का विरोध किया था और रुके हुए 'नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स' (NRC) की प्रक्रिया पूरी करने की मांग की थी। अधिवेशन में यह राय रखी गई थी कि NRC को पूरा करने के लिए 2014 की वोटर लिस्ट को आधार या "फ्रीज" माना जाना चाहिए।
अधिवेशन में उठाई गई चिंताओं का महत्व तब और बढ़ गया जब 23 सितंबर को 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक पड़ताल की रिपोर्ट छपी। इस रिपोर्ट में बताया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीनों के दौरान चुनाव आयोग के नाम पर जारी फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्तियां दर्ज कराई थीं। ये आपत्तियां वोटर रजिस्ट्रेशन और नाम हटाने, फॉर्म 6 में बदलाव, और वोटर डेटाबेस के मैनेजमेंट और सेंट्रलाइज़ेशन जैसे मामलों से जुड़ी थीं। जांच रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने कुछ बदलावों को "अनधिकृत" (बिना अधिकार के किए गए) और "गैर-कानूनी" बताया था।
हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR और अन्य मामलों से जुड़े फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे और बताई गई असहमति को संस्थागत विचार-विमर्श की प्रक्रिया का हिस्सा बताया।
इस पृष्ठभूमि में, फोरम ने कहा है कि दोनों चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज आपत्तियों की जानकारी, उन पर की गई कार्रवाई और मुद्दों को सुलझाने के तरीके को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। फोरम ने कहा, "यह किसी व्यक्ति या किसी राजनीतिक पार्टी का सवाल नहीं है। यह हर नागरिक के वोट देने के अधिकार और भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता का सवाल है।" संगठन ने अधिकारियों के सामने चार मांगें रखीं:
● SIR प्रक्रिया को खत्म करें और असली वोटरों के नाम वापस जोड़ें: पूरी SIR प्रक्रिया को खत्म किया जाना चाहिए और जिन असली वोटरों के नाम इस प्रक्रिया के कारण हटा दिए गए हैं, उन्हें वोटर लिस्ट में वापस जोड़ा जाना चाहिए।
● वोटिंग का अधिकार छीनने की प्रक्रिया रोकें और अपील का असरदार अधिकार सुनिश्चित करें: किसी भी वोटर का नाम वोटर लिस्ट से तब तक नहीं हटाया जाना चाहिए जब तक कि नाम हटाने के प्रस्ताव को चुनौती देने का पारदर्शी, निष्पक्ष और असरदार मौका न दिया जाए। फोरम ने मांग की है कि ऐसी किसी प्रक्रिया के आधार पर चुनाव न कराए जाएं, जिससे उनकी नजर में योग्य वोटरों के वोटर लिस्ट से बाहर होने का खतरा हो।
● चुनाव आयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करें: फोरम ने चुनाव आयोग की अंदरूनी फैसला लेने की प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता की मांग की है। इसने मांग की है कि जहां भी बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम हटाए जाएं, वहां स्वतंत्र ऑडिट और जांच हो, और जहां असली वोटरों के अधिकारों का उल्लंघन हो, वहां व्यक्तिगत और संस्थागत जवाबदेही तय की जाए।
फोरम ने यह भी मांग की है कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त अपनी मर्जी से इस्तीफा नहीं देते हैं, तो उन्हें उचित प्रक्रिया के जरिए हटाया जाए। उन्होंने SIR प्रक्रिया और वोटरों के नाम हटाने के आरोपों के कारण आयोग की विश्वसनीयता पर उठ रहे सवालों का हवाला दिया है।
● चुनाव आयोग की आज़ादी और पारदर्शिता को मजबूत करने के लिए उसका पुनर्गठन करें: फोरम ने चुनाव आयोग को ज्यादा स्वतंत्र, पारदर्शी और लोकतांत्रिक संस्था बनाने के लिए उसके पुनर्गठन की मांग की है। इसने मांग की है कि चुनाव आयुक्तों को चुनने वाली समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाए, क्योंकि उनका तर्क है कि चयन प्रक्रिया सिर्फ़ प्रधानमंत्री जैसे राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों के हाथ में नहीं होनी चाहिए।
फोरम ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि चयन समिति द्वारा विश्वसनीय उम्मीदवारों की पहचान करने के बाद, चुनाव आयुक्तों को अंततः आम जनता द्वारा चुना जाना चाहिए ताकि उनकी लोकतांत्रिक वैधता और जनता का भरोसा मजबूत हो सके।
फोरम ने कहा कि वोट देने के अधिकार को सिर्फ वोटर लिस्ट में नागरिक का नाम होने तक सीमित नहीं किया जा सकता। उन्होंने वोटिंग को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी का एक अहम जरिया बताया और कहा कि यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि योग्य नागरिक वोटर लिस्ट में बदलाव के नाम पर इस अधिकार से वंचित न रहें।
‘20 सितंबर को हमने जो कहा था, वह 23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस ने साबित कर दिया’
प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए हरकुमार गोस्वामी ने SIR (नागरिकों के रजिस्टर का सत्यापन) को लेकर फोरम की चिंताओं को 20 सितंबर को हुए 'नागरिक अभिबर्तन' में चर्चा किए गए मुद्दों से जोड़ा। गोस्वामी ने कहा, "20 सितंबर को 'नागरिक अभिबर्तन' में हमने जो कहा था, वह 23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस ने साबित कर दिया!"
उन्होंने बताया कि असम के 150 प्रतिष्ठित नागरिकों के आह्वान पर और 'फोरम फॉर सोशल हार्मनी' के सहयोग से गुवाहाटी में राज्य-स्तरीय नागरिक सम्मेलन आयोजित किया गया था, जिसमें जमीन, बेदखली, प्रकृति के विनाश, मजदूरों के अधिकारों, आर्थिक असमानता और नागरिकता जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
गोस्वामी ने कहा कि सम्मेलन में दो अहम प्रस्ताव पारित किए गए: पहला, असम में अधूरे NRC को 2014 की वोटर लिस्ट को आधार या "फ़्रीज़" मानकर पूरा किया जाए; और दूसरा, पूरे देश में चलाई जा रही SIR प्रक्रिया का पुरज़ोर विरोध किया जाए। उन्होंने कहा, "23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस की फ़्रंट-पेज की ख़बर ने पूरे देश के सामने हमारी 20 सितंबर की आशंकाओं और विरोध को उजागर कर दिया। आज पूरा भारत समझ गया है कि SIR कितना खतरनाक है।"
प्रोफैसर तैज़ुद्दीन अहमद ने कहा कि असम में नागरिकता सत्यापन से जुड़ी चिंताओं को पूरे देश में प्रस्तावित वोटर लिस्ट में बदलाव से अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा, "असम में कई सालों से नागरिकता के नाम पर ज्यादतियां हो रही हैं। हम यह अच्छी तरह जानते हैं क्योंकि हम असम से हैं। अब, SIR के ज़रिए पूरे भारत में भी वही सब करने की साजिश रची जा रही है। इसलिए, अब समय आ गया है कि देश भर के लोकतांत्रिक लोग लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीक़े से इसका विरोध करें।" डॉ. घनश्याम नाथ ने कहा कि फोरम अपनी चार मांगों के लिए दबाव बनाना जारी रखेगा। उन्होंने कहा, "हमारी चार सूत्रीय मांग पूरी होनी चाहिए; वरना, हम आगे की कार्रवाई पर विचार करेंगे।"
फोरम ने असम और पूरे देश के लोकतांत्रिक नागरिकों, सामाजिक संगठनों और संबंधित समूहों से अपील की है कि वे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक नागरिक आंदोलन के ज़रिए वोटिंग के अधिकार और चुनावी लोकतंत्र की सुरक्षा की मांग को मजबूत करें।
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