जंतर-मंतर पर मार्च से लेकर CEC के घर के बाहर प्रदर्शन तक, यूथ कांग्रेस ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपना अभियान सड़कों पर ले जा रही है, जबकि विपक्षी पार्टियां, छात्र, ट्रेड यूनियन और सिविल सोसाइटी ग्रुप नए सिरे से विरोध-प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं।

इंडियन यूथ कांग्रेस, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने अभियान को राजनीतिक बयानों और प्रेस कॉन्फ्रेंस से आगे ले जा रही है। वह वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) से जुड़े विवाद को सड़क पर लोगों को एकजुट करने के एक लगातार चलने वाले कार्यक्रम में बदल रही है।
शनिवार, 26 सितंबर की रात, IYC अध्यक्ष उदय भानु चिब ने प्रदर्शनकारियों के साथ नई दिल्ली में कुमार के सरकारी आवास तक मार्च किया। उन्होंने वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर कुमार के इस्तीफे और जवाबदेही की मांग की। यह प्रदर्शन यूथ कांग्रेस के जंतर-मंतर की ओर मार्च करने और कई राज्यों में चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों की खबरों के कुछ दिनों बाद हुआ।


यह तेजी 'द इंडियन एक्सप्रेस' की 23 सितंबर की उस जांच रिपोर्ट के बाद आई है जिसमें बताया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार वोटर लिस्ट में सुधार और डेटाबेस एक्सेस से जुड़े फैसलों पर आपत्ति जताई थी। इन आपत्तियों में वोटरों के नाम जोड़ने और हटाने, नाम बहाल करने, फॉर्म 6 में बदलाव और वोटर लिस्ट सिस्टम के सेंट्रलाइज़ेशन (केंद्रीकरण) जैसे मुद्दे शामिल थे।
इन खुलासों ने SIR प्रक्रिया और वोटर लिस्ट की प्रमाणिकता (integrity) बनाए रखने की चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी पर पहले से चल रहे विवाद को और तेज कर दिया है। यूथ कांग्रेस के लिए, यह मुद्दा अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं रह गया है। उसने इस विवाद को नागरिकों के चुनाव में भाग लेने के अधिकार और चुनाव कराने की जिम्मेदारी वाली संवैधानिक संस्था की जवाबदेही के सवाल के तौर पर पेश किया है।



यूथ कांग्रेस ने CEC को अपने अभियान के केंद्र में रखा
यूथ कांग्रेस ने कुमार को व्यक्तिगत रूप से अपने लामबंदी अभियान के केंद्र में रखा है। PTI की रिपोर्ट के अनुसार, 26 सितंबर को उनके आवास के बाहर हुए प्रदर्शन में चिब ने कहा कि यूथ कांग्रेस के सदस्य CEC के आवास के बाहर "निगरानी" रखेंगे और दावा किया कि सदस्य हवाई अड्डों पर भी मौजूद रहेंगे। प्रदर्शनकारियों ने कुमार के इस्तीफे की मांग की और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर नारे लगाए।
यूथ कांग्रेस के कुछ नेताओं की भाषा जानबूझकर टकराव वाली रही है। इससे पहले एक विरोध प्रदर्शन में, चिब ने कुमार पर देश के साथ धोखा करने का आरोप लगाया था और दावा किया था कि उन्हें आखिरकार जेल जाना पड़ेगा। लेकिन इन बातों के पीछे एक ज्यादा बुनियादी मांग है: चुनाव आयोग SIR के दौरान लिए गए फैसलों और आयोग के ही दो सदस्यों द्वारा उठाए गए कथित मुद्दों के बारे में सार्वजनिक रूप से जानकारी दे।
यूथ कांग्रेस इस अभियान को दिल्ली से आगे ले जा चुकी है। बिहार, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, असम, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर समेत कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं या उनकी घोषणा की गई है।
दिल्ली में IYC के प्रदर्शनों में कुमार के चेहरे वाले मास्क और ज़ंजीरों में बंधे हाथों का प्रदर्शन शामिल रहा है। इसका मकसद साफ है: संगठन एक ऐसे मामले को, जो महज़ एक संस्थागत विवाद बनकर रह सकता था, सार्वजनिक जवाबदेही के अभियान में बदलना चाहता है।
यह रणनीति युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं के राजनीतिक महत्व को भी दिखाती है। छात्र समूहों ने अलग-अलग तौर पर 'फॉर्म 6' (वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाला आवेदन) में किए गए बदलावों पर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि प्रक्रिया में बदलाव से युवा नागरिकों के लिए रजिस्ट्रेशन मुश्किल हो सकता है।
#QuitGyaneshKumar विरोध प्रदर्शनों पर विस्तृत रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है।
भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के कामकाज में पारदर्शिता की कमी को उजागर करने वाले लेख यहां, यहां और यहां पढ़े जा सकते हैं।
विरोध प्रदर्शनों के पीछे SIR विवाद
मौजूदा लामबंदी की तत्काल वजह SIR से जुड़ा विवाद और चुनाव आयोग के भीतर जताई गई कथित आपत्तियां हैं। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, संधू और जोशी ने कई मौकों पर वोटर लिस्ट से नाम हटाने, जोड़ने और बहाल करने, 'फॉर्म 6' में बदलाव और वोटर डेटाबेस तक पहुंच से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाए। अखबार ने रिपोर्ट दी कि कुछ आपत्तियां इस बात को लेकर थीं कि क्या आयोग के भीतर पर्याप्त बातचीत के बिना बदलाव किए जा रहे थे।
चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों की राजनीतिक व्याख्या को गलत बताया है। उसका कहना है कि कामकाज से जुड़े सवाल, आंतरिक टिप्पणियां और प्रशासनिक सुझाव कई सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था के कामकाज का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग ने जोर देकर कहा है कि SIR पर उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। हालांकि, इस जवाब से विवाद खत्म नहीं हुआ है। इसके बजाय, इस बात की मांग और तेज हो गई है कि आयोग अपने फैसलों तक कैसे पहुंचा, आंतरिक रूप से क्या आपत्तियां दर्ज की गईं और उन आपत्तियों का समाधान कैसे किया गया, इस बारे में ज्यादा पारदर्शिता बरती जाए।
यह सवाल इसलिए भी बहुत अहम है क्योंकि वोटर लिस्ट सिर्फ एडमिनिस्ट्रेटिव डेटाबेस नहीं होती। इससे तय होता है कि कौन वोट दे सकता है। इसलिए, अगर गलती से किसी का नाम हटा दिया जाए, तो इसके नतीजे कागज़ी कार्रवाई से कहीं ज्यादा गंभीर हो सकते हैं। जिन नागरिकों के नाम वोटर लिस्ट से हट जाते हैं, उनके लिए अपनी योग्यता साबित करना और नाम वापस जुड़वाने की प्रक्रिया से गुज़रना, वोट देने के अधिकार का इस्तेमाल करने में एक व्यावहारिक रुकावट बन सकता है। यही वजह है कि प्रदर्शनकारी इस विवाद को सिर्फ चुनावी प्रशासन से जुड़ा मामला न मानकर, वोटिंग का अधिकार छिनने (disenfranchisement) के मुद्दे के तौर पर देख रहे हैं।
वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर सवाल
विपक्षी पार्टियों और सिविल सोसाइटी संगठनों ने SIR (वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया) के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने पर चिंता जताई है। 'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, CPI(ML)-लिबरेशन ने बिहार के कुछ चुने हुए चुनाव क्षेत्रों में सर्वे किया ताकि उन वोटरों की स्थिति का पता लगाया जा सके जिनके नाम हटा दिए गए थे। पार्टी ने बताया कि ऐगांव में, जिन 204 हटाए गए वोटरों का सर्वे किया गया, उनमें से 46 अभी भी अपने गांव में ही रह रहे थे। जिरादेई में, SIR के दौरान हटाए गए 665 वोटरों में से 122 वोटर गांव में ही रहते पाए गए।
ये आंकड़े पार्टी द्वारा चुने हुए बूथों पर किए गए सर्वे पर आधारित हैं और अकेले इनके आधार पर पूरे बिहार या देश में गलत तरीके से नाम हटाए जाने के पैमाने का पता नहीं लगाया जा सकता। फिर भी, वामपंथी दलों ने इनका इस्तेमाल इस बात के सबूत के तौर पर किया है कि हटाए गए नामों की व्यवस्थित जांच क्यों जरूरी है।
यह चिंता उन समुदायों के लिए ज्यादा गंभीर है जिनके लिए दस्तावेजों की जरूरत, पलायन, विस्थापन या अस्थिर निवास के कारण सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंचना पहले से ही मुश्किल हो सकता है। ट्रेड यूनियन भी इस बहस में शामिल हो गए हैं। सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस का तर्क है कि अगर सुधार प्रक्रिया के दौरान गरीब और प्रवासी मजदूरों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए जाते हैं, तो उन्हें अपने नाम वापस जुड़वाने में बहुत ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए, वोटर लिस्ट की बहस ने एक व्यापक सामाजिक पहलू ले लिया है: जब वोटर लिस्ट से किसी का नाम हट जाता है तो उसका बोझ कौन उठाता है, वह व्यक्ति नाम हटाए जाने को कितनी आसानी से चुनौती दे सकता है, और गलत तरीके से नाम हटाए जाने के खिलाफ क्या सुरक्षा उपाय मौजूद हैं?

वोटर लिस्ट से लेकर संस्थागत जवाबदेही तक
इस विवाद ने चुनाव आयोग के कामकाज के आंतरिक तौर-तरीकों पर भी सवाल खड़े किए हैं। संधू और जोशी की आपत्तियां इसलिए भी अहम हैं क्योंकि वे खुद उस संवैधानिक संस्था के भीतर से आई हैं। मुद्दा यह नहीं है कि कई सदस्यों वाली संस्था के सदस्य कभी असहमत नहीं हो सकते। संस्थागत असहमति न तो गैर-कानूनी है और न ही असामान्य। सवाल यह है कि उन असहमतियों का क्या होता है।
एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज को मिले RTI जवाब ने इस बहस में एक नया पहलू जोड़ दिया है। 'द न्यूज मिनट' के अनुसार, चुनाव आयोग ने देश भर में SIR शुरू करने के फैसले से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि उसने 2025 में देश भर में SIR शुरू करने का कोई फैसला नहीं लिया है। RTI एप्लीकेशन में, अन्य चीजों के अलावा, इस प्रक्रिया से जुड़ी फाइलें और फैसले लेने से जुड़े रिकॉर्ड मांगे गए थे। इसके बाद भारद्वाज ने सवाल उठाया कि अगर फैसले लेने से जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं थे, तो इसे पूरे देश में लागू करने का फैसला कैसे लिया गया। RTI का जवाब एक जायज पारदर्शिता का सवाल खड़ा करता है- खासकर उस प्रक्रिया के दस्तावेजी रिकॉर्ड को लेकर जो बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट को प्रभावित करती है।
पुलिस की कार्रवाई ने एक और पहलू जोड़ा
विरोध प्रदर्शनों ने असहमति को दबाने के लिए पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनों को कवर करने वाले पत्रकारों के साथ किए गए व्यवहार को लेकर भी चिंताएं पैदा की हैं। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) ने 'फ्रंटलाइन' के पत्रकार वेदांत लखेरा और 'द वायर' के पत्रकार मोहम्मद इरफान को हिरासत में लिए जाने की निंदा की; ये दोनों 25 सितंबर को जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शन को कवर कर रहे थे। PCI के अनुसार, दोनों पत्रकारों के पास प्रेस का पहचान पत्र था। PCI ने बताया कि लखेरा को पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन ले जाया गया और उनसे एक फोटो डिलीट करने को कहा गया, जबकि इरफान को कई घंटों तक हिरासत में रखा गया। PCI ने इस घटना को प्रेस की आजादी के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी चुनावी संस्था की जांच-पड़ताल न केवल जवाबदेही के औपचारिक तरीकों पर निर्भर करती है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि पत्रकार और नागरिक सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों को रिकॉर्ड कर सकें और अधिकारियों के कामकाज पर रिपोर्ट कर सकें।
साथ ही, दिल्ली पुलिस ने कहा है कि प्रदर्शनकारियों को इसलिए हिरासत में लिया गया क्योंकि कुछ जगहों पर प्रदर्शन के लिए इजाजत नहीं ली गई थी। दूसरे राज्यों से भी ऐसी खबरें आई हैं कि प्रदर्शनों के दौरान वॉटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। इसलिए, जो तस्वीर उभर रही है, वह सिर्फ चुनाव आयोग के साथ राजनीतिक टकराव की नहीं है। यह एक जबरदस्त चुनावी विवाद के दौरान जनता के विरोध और स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए उपलब्ध जगह पर बहस का मुद्दा भी बनता जा रहा है।
विपक्षी पार्टियां अगले चरण की तैयारी कर रही हैं
यूथ कांग्रेस का लामबंदी अभियान अब विपक्ष के व्यापक अभियान के साथ जुड़ रहा है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक 29 सितंबर को होनी है, जिसमें चुनाव आयोग और SIR पर अपनी रणनीति पर चर्चा की जाएगी। विपक्षी INDIA गठबंधन की पार्टियों की बैठक 30 सितंबर को नई दिल्ली में होने की उम्मीद है, जिसमें मिलकर जवाब देने पर चर्चा होगी। यह प्रस्तावित बैठक उन पार्टियों के बीच संपर्क के बाद हो रही है जो अपने-अपने राज्यों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रही हैं।
CPI(M), CPI और CPI(ML)-लिबरेशन ने कुमार को हटाने और SIR को रोकने की मांग की है। तृणमूल कांग्रेस ने भी विपक्ष की संयुक्त कार्रवाई की मांग की है, जबकि CPI(M) के महासचिव एम.ए. बेबी ने व्यापक लामबंदी के लिए विपक्षी नेताओं से संपर्क किया है।
खबरों के मुताबिक, विपक्षी पार्टियां कुमार को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में एक और संसदीय नोटिस लाने की तैयारी कर रही हैं। यह CEC को हटाने से जुड़ी संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने की एक और कोशिश होगी।

मुंबई में विरोध प्रदर्शन का एक और दौर शुरू होने वाला है
अगला बड़ा विरोध केंद्र मुंबई हो सकता है। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) ने SIR और चुनाव आयोग के कामकाज के खिलाफ 4 अक्टूबर को एक संयुक्त रैली की घोषणा की है।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, राज ठाकरे ने इस लामबंदी को जन-विरोध के तौर पर देखने और राजनीतिक पार्टियों से इसमें शामिल होने की अपील की है। आदित्य ठाकरे ने भी 2 अक्टूबर से व्यापक लामबंदी का समर्थन किया है, अगर कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी ने अलग से 2 अक्टूबर को मुंबई से शुरू होने वाले देशव्यापी विरोध अभियान की घोषणा की है, और बाद में इस लामबंदी को दूसरे शहरों तक ले जाने की योजना है। मुंबई पुलिस से इजाज़त न मिलने के बावजूद, विरोध-प्रदर्शन का आह्वान जारी है।





प्रदर्शनकारियों की रणनीति साफ है: विवाद को चर्चा में बनाए रखना, इसे युवा वोटरों तक ले जाना और दिल्ली से आगे बढ़कर इसे एक राष्ट्रीय अभियान का रूप देना। संगठन का विरोध-प्रदर्शन अब मार्च से आगे बढ़कर CEC के घर के बाहर प्रदर्शन तक पहुंच गया है। इसके नेताओं ने लोगों को एकजुट करने का काम जारी रखने की घोषणा की है, जबकि कांग्रेस कार्यकर्ता इस मुद्दे को राज्यों की राजधानियों और जिला-स्तरीय केंद्रों तक ले गए हैं। फिलहाल मुख्य मांग कुमार का इस्तीफा है।
लेकिन जनता के सामने जो बड़ा मुद्दा रखा जा रहा है, वह यह है कि क्या लाखों नागरिकों को प्रभावित करने वाली वोटर लिस्ट में बदलाव की प्रक्रिया को काफी पारदर्शिता, प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों और जवाबदेही के साथ पूरा किया जा सकता है। प्रदर्शनकारी उसी संस्थागत जवाबदेही का सबूत मांग रहे हैं।
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इंडियन यूथ कांग्रेस, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अपने अभियान को राजनीतिक बयानों और प्रेस कॉन्फ्रेंस से आगे ले जा रही है। वह वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) से जुड़े विवाद को सड़क पर लोगों को एकजुट करने के एक लगातार चलने वाले कार्यक्रम में बदल रही है।
शनिवार, 26 सितंबर की रात, IYC अध्यक्ष उदय भानु चिब ने प्रदर्शनकारियों के साथ नई दिल्ली में कुमार के सरकारी आवास तक मार्च किया। उन्होंने वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर कुमार के इस्तीफे और जवाबदेही की मांग की। यह प्रदर्शन यूथ कांग्रेस के जंतर-मंतर की ओर मार्च करने और कई राज्यों में चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों की खबरों के कुछ दिनों बाद हुआ।


यह तेजी 'द इंडियन एक्सप्रेस' की 23 सितंबर की उस जांच रिपोर्ट के बाद आई है जिसमें बताया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार वोटर लिस्ट में सुधार और डेटाबेस एक्सेस से जुड़े फैसलों पर आपत्ति जताई थी। इन आपत्तियों में वोटरों के नाम जोड़ने और हटाने, नाम बहाल करने, फॉर्म 6 में बदलाव और वोटर लिस्ट सिस्टम के सेंट्रलाइज़ेशन (केंद्रीकरण) जैसे मुद्दे शामिल थे।
इन खुलासों ने SIR प्रक्रिया और वोटर लिस्ट की प्रमाणिकता (integrity) बनाए रखने की चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी पर पहले से चल रहे विवाद को और तेज कर दिया है। यूथ कांग्रेस के लिए, यह मुद्दा अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं रह गया है। उसने इस विवाद को नागरिकों के चुनाव में भाग लेने के अधिकार और चुनाव कराने की जिम्मेदारी वाली संवैधानिक संस्था की जवाबदेही के सवाल के तौर पर पेश किया है।



यूथ कांग्रेस ने CEC को अपने अभियान के केंद्र में रखा
यूथ कांग्रेस ने कुमार को व्यक्तिगत रूप से अपने लामबंदी अभियान के केंद्र में रखा है। PTI की रिपोर्ट के अनुसार, 26 सितंबर को उनके आवास के बाहर हुए प्रदर्शन में चिब ने कहा कि यूथ कांग्रेस के सदस्य CEC के आवास के बाहर "निगरानी" रखेंगे और दावा किया कि सदस्य हवाई अड्डों पर भी मौजूद रहेंगे। प्रदर्शनकारियों ने कुमार के इस्तीफे की मांग की और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर नारे लगाए।
यूथ कांग्रेस के कुछ नेताओं की भाषा जानबूझकर टकराव वाली रही है। इससे पहले एक विरोध प्रदर्शन में, चिब ने कुमार पर देश के साथ धोखा करने का आरोप लगाया था और दावा किया था कि उन्हें आखिरकार जेल जाना पड़ेगा। लेकिन इन बातों के पीछे एक ज्यादा बुनियादी मांग है: चुनाव आयोग SIR के दौरान लिए गए फैसलों और आयोग के ही दो सदस्यों द्वारा उठाए गए कथित मुद्दों के बारे में सार्वजनिक रूप से जानकारी दे।
यूथ कांग्रेस इस अभियान को दिल्ली से आगे ले जा चुकी है। बिहार, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, असम, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और मणिपुर समेत कई राज्यों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं या उनकी घोषणा की गई है।
दिल्ली में IYC के प्रदर्शनों में कुमार के चेहरे वाले मास्क और ज़ंजीरों में बंधे हाथों का प्रदर्शन शामिल रहा है। इसका मकसद साफ है: संगठन एक ऐसे मामले को, जो महज़ एक संस्थागत विवाद बनकर रह सकता था, सार्वजनिक जवाबदेही के अभियान में बदलना चाहता है।
यह रणनीति युवा और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं के राजनीतिक महत्व को भी दिखाती है। छात्र समूहों ने अलग-अलग तौर पर 'फॉर्म 6' (वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाला आवेदन) में किए गए बदलावों पर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि प्रक्रिया में बदलाव से युवा नागरिकों के लिए रजिस्ट्रेशन मुश्किल हो सकता है।
#QuitGyaneshKumar विरोध प्रदर्शनों पर विस्तृत रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है।
भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के कामकाज में पारदर्शिता की कमी को उजागर करने वाले लेख यहां, यहां और यहां पढ़े जा सकते हैं।
विरोध प्रदर्शनों के पीछे SIR विवाद
मौजूदा लामबंदी की तत्काल वजह SIR से जुड़ा विवाद और चुनाव आयोग के भीतर जताई गई कथित आपत्तियां हैं। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, संधू और जोशी ने कई मौकों पर वोटर लिस्ट से नाम हटाने, जोड़ने और बहाल करने, 'फॉर्म 6' में बदलाव और वोटर डेटाबेस तक पहुंच से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाए। अखबार ने रिपोर्ट दी कि कुछ आपत्तियां इस बात को लेकर थीं कि क्या आयोग के भीतर पर्याप्त बातचीत के बिना बदलाव किए जा रहे थे।
चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों की राजनीतिक व्याख्या को गलत बताया है। उसका कहना है कि कामकाज से जुड़े सवाल, आंतरिक टिप्पणियां और प्रशासनिक सुझाव कई सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था के कामकाज का सामान्य हिस्सा हैं। आयोग ने जोर देकर कहा है कि SIR पर उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। हालांकि, इस जवाब से विवाद खत्म नहीं हुआ है। इसके बजाय, इस बात की मांग और तेज हो गई है कि आयोग अपने फैसलों तक कैसे पहुंचा, आंतरिक रूप से क्या आपत्तियां दर्ज की गईं और उन आपत्तियों का समाधान कैसे किया गया, इस बारे में ज्यादा पारदर्शिता बरती जाए।
यह सवाल इसलिए भी बहुत अहम है क्योंकि वोटर लिस्ट सिर्फ एडमिनिस्ट्रेटिव डेटाबेस नहीं होती। इससे तय होता है कि कौन वोट दे सकता है। इसलिए, अगर गलती से किसी का नाम हटा दिया जाए, तो इसके नतीजे कागज़ी कार्रवाई से कहीं ज्यादा गंभीर हो सकते हैं। जिन नागरिकों के नाम वोटर लिस्ट से हट जाते हैं, उनके लिए अपनी योग्यता साबित करना और नाम वापस जुड़वाने की प्रक्रिया से गुज़रना, वोट देने के अधिकार का इस्तेमाल करने में एक व्यावहारिक रुकावट बन सकता है। यही वजह है कि प्रदर्शनकारी इस विवाद को सिर्फ चुनावी प्रशासन से जुड़ा मामला न मानकर, वोटिंग का अधिकार छिनने (disenfranchisement) के मुद्दे के तौर पर देख रहे हैं।
वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर सवाल
विपक्षी पार्टियों और सिविल सोसाइटी संगठनों ने SIR (वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया) के दौरान बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने पर चिंता जताई है। 'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, CPI(ML)-लिबरेशन ने बिहार के कुछ चुने हुए चुनाव क्षेत्रों में सर्वे किया ताकि उन वोटरों की स्थिति का पता लगाया जा सके जिनके नाम हटा दिए गए थे। पार्टी ने बताया कि ऐगांव में, जिन 204 हटाए गए वोटरों का सर्वे किया गया, उनमें से 46 अभी भी अपने गांव में ही रह रहे थे। जिरादेई में, SIR के दौरान हटाए गए 665 वोटरों में से 122 वोटर गांव में ही रहते पाए गए।
ये आंकड़े पार्टी द्वारा चुने हुए बूथों पर किए गए सर्वे पर आधारित हैं और अकेले इनके आधार पर पूरे बिहार या देश में गलत तरीके से नाम हटाए जाने के पैमाने का पता नहीं लगाया जा सकता। फिर भी, वामपंथी दलों ने इनका इस्तेमाल इस बात के सबूत के तौर पर किया है कि हटाए गए नामों की व्यवस्थित जांच क्यों जरूरी है।
यह चिंता उन समुदायों के लिए ज्यादा गंभीर है जिनके लिए दस्तावेजों की जरूरत, पलायन, विस्थापन या अस्थिर निवास के कारण सरकारी रिकॉर्ड तक पहुंचना पहले से ही मुश्किल हो सकता है। ट्रेड यूनियन भी इस बहस में शामिल हो गए हैं। सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस का तर्क है कि अगर सुधार प्रक्रिया के दौरान गरीब और प्रवासी मजदूरों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए जाते हैं, तो उन्हें अपने नाम वापस जुड़वाने में बहुत ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए, वोटर लिस्ट की बहस ने एक व्यापक सामाजिक पहलू ले लिया है: जब वोटर लिस्ट से किसी का नाम हट जाता है तो उसका बोझ कौन उठाता है, वह व्यक्ति नाम हटाए जाने को कितनी आसानी से चुनौती दे सकता है, और गलत तरीके से नाम हटाए जाने के खिलाफ क्या सुरक्षा उपाय मौजूद हैं?

वोटर लिस्ट से लेकर संस्थागत जवाबदेही तक
इस विवाद ने चुनाव आयोग के कामकाज के आंतरिक तौर-तरीकों पर भी सवाल खड़े किए हैं। संधू और जोशी की आपत्तियां इसलिए भी अहम हैं क्योंकि वे खुद उस संवैधानिक संस्था के भीतर से आई हैं। मुद्दा यह नहीं है कि कई सदस्यों वाली संस्था के सदस्य कभी असहमत नहीं हो सकते। संस्थागत असहमति न तो गैर-कानूनी है और न ही असामान्य। सवाल यह है कि उन असहमतियों का क्या होता है।
एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज को मिले RTI जवाब ने इस बहस में एक नया पहलू जोड़ दिया है। 'द न्यूज मिनट' के अनुसार, चुनाव आयोग ने देश भर में SIR शुरू करने के फैसले से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि उसने 2025 में देश भर में SIR शुरू करने का कोई फैसला नहीं लिया है। RTI एप्लीकेशन में, अन्य चीजों के अलावा, इस प्रक्रिया से जुड़ी फाइलें और फैसले लेने से जुड़े रिकॉर्ड मांगे गए थे। इसके बाद भारद्वाज ने सवाल उठाया कि अगर फैसले लेने से जुड़े रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं थे, तो इसे पूरे देश में लागू करने का फैसला कैसे लिया गया। RTI का जवाब एक जायज पारदर्शिता का सवाल खड़ा करता है- खासकर उस प्रक्रिया के दस्तावेजी रिकॉर्ड को लेकर जो बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट को प्रभावित करती है।
पुलिस की कार्रवाई ने एक और पहलू जोड़ा
विरोध प्रदर्शनों ने असहमति को दबाने के लिए पुलिस की कार्रवाई और प्रदर्शनों को कवर करने वाले पत्रकारों के साथ किए गए व्यवहार को लेकर भी चिंताएं पैदा की हैं। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) ने 'फ्रंटलाइन' के पत्रकार वेदांत लखेरा और 'द वायर' के पत्रकार मोहम्मद इरफान को हिरासत में लिए जाने की निंदा की; ये दोनों 25 सितंबर को जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शन को कवर कर रहे थे। PCI के अनुसार, दोनों पत्रकारों के पास प्रेस का पहचान पत्र था। PCI ने बताया कि लखेरा को पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन ले जाया गया और उनसे एक फोटो डिलीट करने को कहा गया, जबकि इरफान को कई घंटों तक हिरासत में रखा गया। PCI ने इस घटना को प्रेस की आजादी के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी चुनावी संस्था की जांच-पड़ताल न केवल जवाबदेही के औपचारिक तरीकों पर निर्भर करती है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि पत्रकार और नागरिक सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों को रिकॉर्ड कर सकें और अधिकारियों के कामकाज पर रिपोर्ट कर सकें।
साथ ही, दिल्ली पुलिस ने कहा है कि प्रदर्शनकारियों को इसलिए हिरासत में लिया गया क्योंकि कुछ जगहों पर प्रदर्शन के लिए इजाजत नहीं ली गई थी। दूसरे राज्यों से भी ऐसी खबरें आई हैं कि प्रदर्शनों के दौरान वॉटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। इसलिए, जो तस्वीर उभर रही है, वह सिर्फ चुनाव आयोग के साथ राजनीतिक टकराव की नहीं है। यह एक जबरदस्त चुनावी विवाद के दौरान जनता के विरोध और स्वतंत्र रिपोर्टिंग के लिए उपलब्ध जगह पर बहस का मुद्दा भी बनता जा रहा है।
विपक्षी पार्टियां अगले चरण की तैयारी कर रही हैं
यूथ कांग्रेस का लामबंदी अभियान अब विपक्ष के व्यापक अभियान के साथ जुड़ रहा है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक 29 सितंबर को होनी है, जिसमें चुनाव आयोग और SIR पर अपनी रणनीति पर चर्चा की जाएगी। विपक्षी INDIA गठबंधन की पार्टियों की बैठक 30 सितंबर को नई दिल्ली में होने की उम्मीद है, जिसमें मिलकर जवाब देने पर चर्चा होगी। यह प्रस्तावित बैठक उन पार्टियों के बीच संपर्क के बाद हो रही है जो अपने-अपने राज्यों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रही हैं।
CPI(M), CPI और CPI(ML)-लिबरेशन ने कुमार को हटाने और SIR को रोकने की मांग की है। तृणमूल कांग्रेस ने भी विपक्ष की संयुक्त कार्रवाई की मांग की है, जबकि CPI(M) के महासचिव एम.ए. बेबी ने व्यापक लामबंदी के लिए विपक्षी नेताओं से संपर्क किया है।
खबरों के मुताबिक, विपक्षी पार्टियां कुमार को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में एक और संसदीय नोटिस लाने की तैयारी कर रही हैं। यह CEC को हटाने से जुड़ी संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने की एक और कोशिश होगी।

मुंबई में विरोध प्रदर्शन का एक और दौर शुरू होने वाला है
अगला बड़ा विरोध केंद्र मुंबई हो सकता है। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) ने SIR और चुनाव आयोग के कामकाज के खिलाफ 4 अक्टूबर को एक संयुक्त रैली की घोषणा की है।

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, राज ठाकरे ने इस लामबंदी को जन-विरोध के तौर पर देखने और राजनीतिक पार्टियों से इसमें शामिल होने की अपील की है। आदित्य ठाकरे ने भी 2 अक्टूबर से व्यापक लामबंदी का समर्थन किया है, अगर कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी ने अलग से 2 अक्टूबर को मुंबई से शुरू होने वाले देशव्यापी विरोध अभियान की घोषणा की है, और बाद में इस लामबंदी को दूसरे शहरों तक ले जाने की योजना है। मुंबई पुलिस से इजाज़त न मिलने के बावजूद, विरोध-प्रदर्शन का आह्वान जारी है।





प्रदर्शनकारियों की रणनीति साफ है: विवाद को चर्चा में बनाए रखना, इसे युवा वोटरों तक ले जाना और दिल्ली से आगे बढ़कर इसे एक राष्ट्रीय अभियान का रूप देना। संगठन का विरोध-प्रदर्शन अब मार्च से आगे बढ़कर CEC के घर के बाहर प्रदर्शन तक पहुंच गया है। इसके नेताओं ने लोगों को एकजुट करने का काम जारी रखने की घोषणा की है, जबकि कांग्रेस कार्यकर्ता इस मुद्दे को राज्यों की राजधानियों और जिला-स्तरीय केंद्रों तक ले गए हैं। फिलहाल मुख्य मांग कुमार का इस्तीफा है।
लेकिन जनता के सामने जो बड़ा मुद्दा रखा जा रहा है, वह यह है कि क्या लाखों नागरिकों को प्रभावित करने वाली वोटर लिस्ट में बदलाव की प्रक्रिया को काफी पारदर्शिता, प्रक्रियागत सुरक्षा उपायों और जवाबदेही के साथ पूरा किया जा सकता है। प्रदर्शनकारी उसी संस्थागत जवाबदेही का सबूत मांग रहे हैं।
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