चुनाव आयोग के “सब ठीक है” वाले दावे के खिलाफ एक आरोप-पत्र

Written by AMAN KHAN | Published on: September 28, 2026
आयोग के बहुत ज्यादा सेंट्रलाइज़्ड (केंद्रीकृत) कामकाज के तरीके को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की असहमति की खबरों ने इन विवादों को और बढ़ा दिया है। इन विवादों में बड़े पैमाने पर SIR के तहत नाम हटाना, कानूनी तौर पर स्थानीय EROs के पास मौजूद वोटर लिस्ट से जुड़े अधिकारों को अपने हाथ में लेना और SIR प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले सॉफ़्टवेयर की विश्वसनीयता जैसे मुद्दे शामिल हैं।



हाल ही में मीडिया में आई खबरों से चुनाव आयोग (ECI) के अंदर गंभीर मतभेदों पर फिर से ध्यान गया है और इससे आयोग के काम करने के तरीके में पारदर्शिता की कमी और कामकाज न होने जैसे मुद्दों पर भी चर्चा शुरू हुई है। पिछले ढाई साल की इस विस्तृत जांच से पता चलता है कि यह सिलसिला कम से कम 2024 से ही चल रहा है, जब वोटिंग डेटा, CCTV फुटेज और 17C फॉर्म जारी करने से इनकार करना चुनावी प्रक्रिया पर पूरी तरह कब्जा करने की कहानी का बस एक हिस्सा था।

सुधारात्मक संस्थानों को वास्तव में स्वायत्तता दिलाने के लिए, इन सभी मुद्दों पर ठोस और प्रक्रियात्मक, दोनों तरह से ध्यान देने की जरूरत है।


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चुनाव आयोग (ECI) पर, जिसे संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी सौंपी गई है, 2024 से ही चुनाव में पारदर्शिता, वोटर रजिस्ट्रेशन, वोटों की गिनती के डेटा, चुनाव रिकॉर्ड तक पहुंच और वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया को लेकर लगातार आरोप लग रहे हैं। आयोग के बहुत ज्यादा सेंट्रलाइज़्ड (केंद्रीकृत) कामकाज के तरीके को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की असहमति की खबरों ने इन विवादों को और बढ़ा दिया है। इन विवादों में बड़े पैमाने पर SIR के तहत नाम हटाना, कानूनी तौर पर स्थानीय EROs के पास मौजूद वोटर लिस्ट से जुड़े अधिकारों को अपने हाथ में लेना और SIR प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले सॉफ़्टवेयर की विश्वसनीयता जैसे मुद्दे शामिल हैं।

चुनाव आयोग में आ रही गिरावट से जुड़ी दस अहम बातें:

1. ECI के भीतर आंतरिक मतभेद: दो चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज कराई गई 14 आपत्तियां



23 सितंबर, 2026 को 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने रिपोर्ट दी कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के कामकाज से जुड़े फैसलों और आदेशों पर दस महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक रूप से आपत्ति जताई थी। ये आपत्तियां वोटर रजिस्ट्रेशन, नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म 6, डेटाबेस एक्सेस, पश्चिम बंगाल की अपीलों और ECI के नाम पर उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना जारी किए गए कम्युनिकेशन से जुड़ी थीं। बताया गया है कि एक ही दिन में चार आपत्तियां दर्ज की गईं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने IT सिस्टम की निष्पक्षता और निगरानी पर असर डालने वाले बदलावों को लेकर कैबिनेट सेक्रेटरी से संपर्क किया था।



एक मुख्य आपत्ति जुलाई 2026 में फॉर्म 6 में किए गए बदलाव को लेकर थी, जिसका इस्तेमाल नए वोटर करते हैं। बदले हुए फॉर्म में पूछा गया था कि क्या आवेदक, या उनके माता-पिता या दादा-दादी/नाना-नानी का नाम पिछली SIR में था। रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने आपत्ति जताई थी कि संबंधित नियम में संशोधन किए बिना यह बदलाव नहीं किया जा सकता; बाद में संधू ने इसे "अनधिकृत और गैर-कानूनी" बताया और इसे हटाने की मांग की। किसी नियम में संशोधन के लिए संसद (विधायिका) की सामूहिक चर्चा की जरूरत होती है।

आयुक्तों ने वोटर लिस्ट डेटाबेस के सेंट्रलाइज़ेशन (केंद्रीकरण) पर भी चिंता जताई। पिछले कुछ महीनों में वोटर लिस्ट में हेरफेर के आरोपों पर आयोग का लगातार यह बचाव रहा है कि लिस्ट तैयार करने की प्रक्रिया विकेंद्रीकृत (decentralised) है, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल से पता चला कि ERONet और उसके बाद ECINet सॉफ्टवेयर के जरिए ERO (निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी) की लिस्ट तक पहुंच को केंद्रीय रूप से नियंत्रित और सीमित किया जा रहा था और दोनों आयुक्तों ने बार-बार इस केंद्रीकरण पर सवाल उठाए थे। (हर निर्वाचन क्षेत्र की वोटर लिस्ट उसके ERO द्वारा तैयार और नियंत्रित की जाती है, जो जमीनी स्तर पर एक वैधानिक अधिकारी होता है। आमतौर पर, ERO सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट होता है)।


Image: The Print

2. वोटर लिस्ट सॉफ्टवेयर और गोवा का मामला: जब एक अधिकारी का फैसला लागू नहीं किया गया

उसी अखबार, 'इंडियन एक्सप्रेस' की एक फॉलो-अप स्टोरी से पता चला कि संघीय सिद्धांतों को दरकिनार करने और अत्यधिक केंद्रीकरण का मामला गोवा में भी देखा गया था। खबरों के मुताबिक, चुनावी रजिस्ट्रेशन अधिकारियों (EROs) ने दस्तावेजों की जांच के बाद 97 वोटरों को योग्य पाया, लेकिन केंद्रीय ECI के डिजिटल वोटर-लिस्ट सिस्टम में ऐसा कोई तरीका नहीं था जिससे उनके नाम पहले हटाने की कार्रवाई को पलटा जा सके! गोवा के मुख्य चुनाव अधिकारी के दफ्तर ने कथित तौर पर 11 से 17 फरवरी के बीच आठ बार इस कार्रवाई को पलटने की सुविधा की मांग की। यह सुविधा समय पर चालू नहीं की गई और वे 97 वोटर फाइनल वोटर-लिस्ट से बाहर ही रह गए!!

मामला सिर्फ इसमें शामिल वोटरों की संख्या का नहीं है। सवाल यह है कि क्या किसी कानूनी अधिकारी के फैसले को इसलिए बेअसर किया जा सकता है क्योंकि केंद्रीय सॉफ्टवेयर उसे लागू करने की इजाजत नहीं देता? इस संदर्भ में, सेंट्रलाइज्ड डेटाबेस कंट्रोल, एक्सेस क्रेडेंशियल्स और IT डिवीज़न के अधिकार को लेकर कमिश्नर संधू और जोशी की चिंताएं काफी अहम हो जाती हैं।

यह घटना जवाबदेही का सीधा सवाल खड़ा करती है: जब मामला तय करने के लिए अधिकृत अधिकारी किसी वोटर को योग्य पाता है, तो अगर सिस्टम इसके बावजूद उसे वैध वोटर के तौर पर रजिस्टर होने के अधिकार से वंचित कर देता है, तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा?

बैलेट बॉक्स से लेकर चुनावी रिकॉर्ड तक: VFD ने क्या विश्लेषण किया



चुनावों में पारदर्शिता को लेकर नागरिकों की पैनी नजर SIR के साथ शुरू नहीं हुई। 'वोट फॉर डेमोक्रेसी' (VFD) - जो 2023 में बना महाराष्ट्र-स्तर का नागरिकों का एक मंच है - ने चुनावी डेटा, वोटिंग, वोटों की गिनती और वोटर-लिस्ट की प्रक्रियाओं की लगातार जांच शुरू की और 2024 से कई रिपोर्ट और विश्लेषणात्मक दस्तावेज जारी किए।

लोकसभा चुनाव 2024 पर इसकी मुख्य रिपोर्ट, "लोकसभा चुनाव 2024 का संचालन: 'वोट में हेरफेर' और 'वोटिंग व गिनती के दौरान गड़बड़ी' का विश्लेषण", में वोटिंग और गिनती में कथित अनियमितताओं, शुरुआती और अंतिम वोटिंग आंकड़ों में बदलाव, EVM में पड़े वोटों और गिनती के आंकड़ों में अंतर, फॉर्म 17C से जुड़ी पारदर्शिता, रिटर्निंग ऑफिसर के कामकाज और कड़े मुकाबले वाले कुछ निर्वाचन क्षेत्रों की जांच की गई। VFD का तर्क था कि उसकी गणना मुख्य रूप से ECI के आधिकारिक डेटा पर आधारित थी। उसने वोटिंग के दिन के आंकड़ों और बाद में जारी अंतिम आंकड़ों के बीच कुल 4,65,46,885 वोटों की बढ़ोतरी की बात कही और ऐसे 79 संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान की जहां उसकी गणना के अनुसार बढ़ोतरी जीत के अंतर से अधिक थी। साथ ही, उसने 350 से ज्यादा निर्वाचन क्षेत्रों में विसंगतियों की जांच की, जिनमें 50,000 से कम वोटों के अंतर वाली सीटें भी शामिल थीं, और मुंबई उत्तर-पश्चिम व फर्रुखाबाद जैसे मामलों को उजागर किया।

19 जुलाई 2024 को, VFD और उससे जुड़े संगठनों ने ECI को एक नोटिस भेजा, जिसमें वोटिंग डेटा, फॉर्म 17C, कथित तौर पर वोट डालने (injection of votes), गिनती की प्रक्रियाओं, रिटर्निंग ऑफिसर्स और अन्य कथित अनियमितताओं के बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया।

यह जांच VFD की 19 नवंबर 2024 की हरियाणा और जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों पर ड्राफ्ट रिपोर्ट के साथ जारी रही। इस रिपोर्ट में गिनती से पहले कुल वोटिंग के आंकड़े जारी करने से ECI के इनकार, वोटिंग प्रतिशत में बदलाव, हरियाणा में अनुमानित वोट, जिलेवार वोटिंग में बदलाव, EVM में पड़े वोटों और गिनती के आंकड़ों में कथित अंतर, गिनती के बाद के बदलाव, वोटिंग बंद होने के बाद भी कतार में खड़े मतदाता, और EVM की बैटरी व वोट-गिनती से जुड़े मुद्दों का विश्लेषण किया गया। 2025 में, VFD ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव 2024 पर अपनी रिपोर्ट के जरिए अपनी जांच का दायरा बढ़ाया। इसमें 95 विधानसभा क्षेत्रों का विश्लेषण किया गया, जिसमें EVM में डाले गए और बरामद वोटों के बीच अंतर, शाम 5 बजे के बाद वोटिंग प्रतिशत में बताई गई 7.83% की ऐसी बढ़ोतरी जिसका कोई स्पष्ट कारण नहीं था, 26,500 से कम अंतर वाले निर्वाचन क्षेत्र, जिला-स्तर के डेटा में अंतर, 3,000/5,000/10,000 वोटों से कम अंतर वाली सीटें, 2019 और 2024 के बीच मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी, ECI और CEO महाराष्ट्र के मतदाता डेटा में अंतर, और 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच नागपुर दक्षिण-पश्चिम में 29,219 मतदाताओं के जुड़ने जैसे मामलों को देखा गया।

इसके बाद आई विस्तृत रिपोर्ट और 12 अगस्त, 2025 के बिहार SIR विश्लेषण में लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाने, हटाने के डेटा के वर्गीकरण और उसके विवरण के स्तर में बदलाव, "पता न चलने वाले" और मृत मतदाताओं की श्रेणियों, जिला-स्तर पर इनकी संख्या, ECI द्वारा जारी SIR डेटा के क्रम और 243 विधानसभा क्षेत्रों पर इसके संभावित असर की जांच की गई।

इस तरह, VFD की रिपोर्टें एक लगातार चलने वाली विश्लेषणात्मक कड़ी पेश करती हैं: वोट के आंकड़ों के सफर, मतदाता सूची की पूर्णता और उन रिकॉर्डों की स्वतंत्र रूप से कौन पुष्टि कर सकता है जिनसे ECI के अंतिम आंकड़े तैयार होते हैं?

ये VFD की गणनाएं, व्याख्याएं और आरोप हैं, न कि न्यायिक निष्कर्ष कि चुनावों में हेरफेर किया गया था। हालांकि, इस रिकॉर्ड का महत्व इस बात में है कि आंकड़ों में अंतर का मतलब अपने आप में गड़बड़ी नहीं होता; यह एक ऐसा सवाल खड़ा करता है जिसका समाधान तभी हो सकता है जब स्वतंत्र मिलान के लिए जरूरी कानूनी और चुनावी रिकॉर्ड पर्याप्त रूप से उपलब्ध हों। इसलिए, 2024-25 की VFD रिपोर्टों ने बहस को वोटिंग मशीनों या वोटिंग प्रतिशत जैसे अलग-थलग सवालों से हटाकर चुनावी ट्रेसिबिलिटी (ट्रैक करने की क्षमता) के व्यापक सवाल की ओर मोड़ दिया कि क्या सार्वजनिक रिकॉर्ड वोट, मतदाता और अंतिम परिणाम को स्वतंत्र रूप से ट्रैक और सत्यापित करने की अनुमति देते हैं? इन रिपोर्टों या 19 जुलाई, 2024 को ECI को भेजे गए नोटिस में उठाए गए किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया गया।

3. डाले गए वोट बनाम गिने गए वोट: ECI के चुनावी डेटा में अनसुलझे सवाल

'वोट फॉर डेमोक्रेसी' (VFD) की 2024 लोकसभा चुनाव रिपोर्ट में EVM में डाले गए वोटों और गिने गए वोटों के बीच अंतर को लेकर चिंता जताई गई। इसके अलावा, 'एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स' (ADR) ने 29 जुलाई, 2024 की अपनी रिपोर्ट में ECI के जारी डेटा के आधार पर 538 निर्वाचन क्षेत्रों में 5,89,691 वोटों का अंतर पाया। ECI का कहना है कि EVM में दर्ज वोटों का मिलान 'फॉर्म 17C' से किया जाता है और जांच के बाद रिटर्निंग ऑफिसर अंतिम मतदान का मिलान करते हैं। हालांकि, इन स्पष्टीकरणों के बावजूद, जनता का ध्यान निर्वाचन क्षेत्र-वार मिलान, समय पर जानकारी देने और पाई गई गड़बड़ियों पर पारदर्शी स्पष्टीकरण की ओर बना हुआ है।



4. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव: VFD के डेटा में गड़बड़ी के और आरोप

2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों पर VFD की 2025 की रिपोर्ट में 95 निर्वाचन क्षेत्रों की जांच की गई। इसमें EVM में डाले गए और बरामद वोटों के बीच कथित अंतर, शाम 5 बजे के बाद मतदान में 7.83% की बढ़ोतरी, जिला-स्तर के डेटा में अंतर और कम अंतर से जीत वाले निर्वाचन क्षेत्रों की जांच शामिल थी। इसमें 2019 और 2024 के बीच मतदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी, ECI और मुख्य निर्वाचन अधिकारी के डेटा में अंतर, और 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच नागपुर दक्षिण-पश्चिम में 29,219 मतदाताओं के जुड़ने की भी जांच की गई।

VFD की अगस्त 2025 की बड़ी रिपोर्ट, "भारत का 'काम न करने वाला' चुनाव आयोग और भारत की चुनाव प्रणाली का हथियार के तौर पर इस्तेमाल", में 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों, महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों और बिहार SIR के विश्लेषण को एक साथ लाया गया। इसमें EVM/VVPAT/SLU आर्किटेक्चर, फॉर्म 17A और 17C, चुनाव-डेटा के प्रकाशन, वीडियोग्राफी, CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने और नियम 93 में संशोधन से जुड़े सवाल भी उठाए गए। इन आरोपों ने चुनावी डेटा की पुष्टि के लिए जरूरी रिकॉर्ड की उपलब्धता और उनमें एकरूपता को लेकर ECI की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए। रिपोर्ट के निष्कर्ष VFD के हैं; केवल आंकड़ों में अंतर होने से, बिना मूल रिकॉर्ड की जांच किए, जानबूझकर की गई गड़बड़ी साबित नहीं होती।

5. नियम 93 में संशोधन: चुनाव से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तक जनता की पहुंच कम हुई

2024 के लोकसभा चुनावों के ठीक बाद, जिसमें सत्ताधारी पार्टी की सीटें काफी कम हो गई थीं, नागरिक समूहों ने ECI के कामकाज, ख़ासकर फॉर्म 17C का डेटा जारी न करने पर सवाल उठाना शुरू कर दिया था। कुल मिलाकर, ECI की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे थे और विपक्ष के वे उम्मीदवार, जो जानबूझकर की गई चूक का शिकार हुए थे, EVM सत्यापन और CCTV फुटेज की मांग कर रहे थे। 21 दिसंबर 2024 को, ECI की सिफारिश पर केंद्र सरकार ने एकतरफा और चुपके से 'चुनाव संचालन नियम, 1961' के नियम 93 (2) (a) में संशोधन किया। इस संशोधन ने चुनाव से जुड़े कागजात की सार्वजनिक जांच के तरीके को बदल दिया और CCTV, वेबकास्टिंग और वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे कुछ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड तक पहुंच को प्रभावित किया। इसके पीछे बताई गई वजहों में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के गलत इस्तेमाल को रोकना और निजता की सुरक्षा करना शामिल था। लेकिन असल में, इस संशोधन ने बिना किसी सार्वजनिक बहस या विपक्ष की राय लिए, जांच-पड़ताल और पारदर्शिता की गुंजाइश को खत्म कर दिया।

दी गई जानकारी में यह चिंता जताई गई है कि जांच पर लगी पाबंदियों से उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों, शोधकर्ताओं और नागरिकों की चुनाव संचालन की स्वतंत्र रूप से जांच करने की क्षमता कमजोर हो सकती है। संशोधन ने उन चुनावी रिकॉर्ड की श्रेणी को सीमित कर दिया जिनकी आम जनता जांच कर सकती है। CCTV फुटेज, वेबकास्टिंग और इसी तरह के इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सिर्फ इसलिए सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध नहीं होते कि वे चुनाव से जुड़े हैं। उम्मीदवारों की इन तक पहुंच बनी रहती है, और अदालतें उचित मामलों में इन्हें सार्वजनिक करने का आदेश दे सकती हैं। इसलिए, चिंता यह है कि नागरिकों, शोधकर्ताओं और अन्य संबंधित पक्षों के लिए स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना मुश्किल हो सकता है, खासकर तब जब चुनाव के संचालन या सटीकता से जुड़े आरोपों की जांच के लिए इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हों।

आलोचना पारदर्शिता के ढांचे और इसके व्यावहारिक नतीजों पर केंद्रित है, न कि यह साबित करने पर कि संशोधन से ही हेरफेर साबित होता है।

6. बिहार SIR: एक गहन संशोधन जिसने मौजूदा मतदाताओं पर दस्तावेजों का नया बोझ डाला



24 जून 2025 को, ECI ने बिहार में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरिक्षण' का आदेश दिया, जहां मतदाताओं की संख्या लगभग 7.89 करोड़ थी। आयोग ने अनुच्छेद 324 और 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' की धारा 21(3) का सहारा लिया और संशोधन के कारणों के तौर पर जनसांख्यिकीय बदलाव, पलायन, बिना रिपोर्ट की गई मौतें और डुप्लिकेट एंट्री का हवाला दिया। सामान्य अपडेटिंग के विपरीत, इस प्रक्रिया में मौजूदा मतदाताओं को गिनती (एन्यूमरेशन) में शामिल होने और अपनी परिस्थितियों व पुराने रिकॉर्ड के आधार पर पात्रता से संबंधित दस्तावेज पेश करने की जरूरत थी। बिहार में SIR (विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण) के दौरान, ECI ने शुरू में पात्रता से जुड़ी जानकारी के लिए 11 दस्तावेजों में से किसी एक को जरूरी बताया था, लेकिन इस सूची में आधार को शामिल नहीं किया था। 8 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को निर्देश दिया कि वह बिहार की संशोधित मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने पर विचार करने के लिए आधार को बारहवें पहचान दस्तावेज के तौर पर स्वीकार करे। साथ ही, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आधार नागरिकता का सबूत नहीं है और इसकी प्रमाणिकता की जांच की जा सकती है।

दी गई जानकारी में यह सवाल उठाया गया है कि क्या इससे पहले से रजिस्टर्ड वोटरों पर बहुत ज्यादा बोझ पड़ा, खासकर उन लोगों पर जिनके दस्तावेज अधूरे थे, जिनके परिवार दूसरी जगह चले गए थे, जिनके नाम अलग-अलग रिकॉर्ड में अलग-अलग थे या जिन्हें गिनती के दौरान ढूंढा नहीं जा सका। इसमें यह भी आरोप लगाया गया है कि "पता न चलने वाले", "दूसरी जगह चले गए" और "पते पर न मिलने वाले" जैसे कैटेगरी का असर मुसलमानों, दलितों, प्रवासी मजदूरों और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों पर ज्यादा पड़ा, क्योंकि उनकी हालात की वजह से दस्तावेज जुटाना और गिनती में शामिल होना मुश्किल हो सकता है। ये भेदभावपूर्ण असर के गंभीर आरोप हैं; इनकी सच्चाई जानने के लिए कैटेगरी के हिसाब से सबूत और हर मामले की अलग-अलग जांच की जरूरत है।

जानकारी में यह भी आरोप लगाया गया है कि जो वोटर ECI के 24 जून, 2025 के आदेश के पैरा 5(b) के तहत दस्तावेजों की जरूरतें पूरी नहीं कर पाए, उनके नाम हटाने के साथ-साथ उन्हें बिना किसी कानूनी फैसले के संदिग्ध विदेशी मानकर "सक्षम अधिकारी" के पास भेज दिया गया। आलोचना यह है कि प्रशासनिक जांच में दस्तावेजों की कमी के कारण वोटर लिस्ट से नाम कटने का खतरा था, जिसका सीधा असर वोटिंग के अधिकारों पर पड़ा। मुख्य मुद्दा यह है कि क्या संबंधित चुनाव से पहले पर्याप्त सूचना, सुनवाई, वैकल्पिक दस्तावेजों के विकल्प और समय पर नाम वापस जोड़ने की सुविधा उपलब्ध थी।

बिहार 2025 SIR और उसके बाद पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में हुए SIR की सबसे बड़ी संरचनात्मक समस्या यह थी कि वे होने वाले चुनावों के लिए बिना पर्याप्त प्रक्रियात्मक समय के, मानो बंदूक की नोक पर कराए गए थे। नतीजा यह हुआ कि मनमाने ढंग से हटाए गए वोटरों को उनके सार्वभौमिक मताधिकार के संवैधानिक अधिकार से तुरंत वंचित कर दिया गया।

7. SIR के आंकड़े: बड़े पैमाने पर नाम हटाना और कैटेगरी के हिसाब से मिलान में विफलता

बिहार SIR की शुरुआत लगभग 7.89 करोड़ वोटरों के साथ हुई थी। ECI के आंकड़ों के अनुसार, ड्राफ्ट स्टेज पर लगभग 65 लाख नाम हटाए गए, फॉर्म 6 के जरिए 21.53 लाख नाम जोड़े गए, और दावे व आपत्तियों के बाद 3.66 लाख और नाम हटाए गए। 30 सितंबर, 2025 को जारी अंतिम वोटर लिस्ट में लगभग 7.42 करोड़ वोटर थे- जो SIR से पहले की वोटर संख्या से लगभग 47 लाख कम थी। दिए गए विश्लेषण में यह तर्क दिया गया है कि बताए गए नए नाम जुड़ने और बाद में हटाए गए नामों से, मूल मतदाता से अंतिम संख्या तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया समझ नहीं आती।

जून 2026 में सबरंगइंडिया की "एक्सक्लूसिव इन्वेस्टिगेशन SIR: ECI ने असल में कितने वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित किया? अंतिम आंकड़ों में बिना वजह 'नए नाम जुड़ने' की बात क्यों दिख रही है?" नाम के विश्लेषण में 14 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सरकारी डेटा की VFD द्वारा की गई जांच के आधार पर SIR से पहले वोटरों की संख्या 61.38 करोड़, हटाए गए नाम 5.29 करोड़ और जोड़े गए नाम 1.87 करोड़ बताए गए। इस हिसाब से, उम्मीद के मुताबिक फाइनल वोटर संख्या लगभग 57.96 करोड़ होनी चाहिए थी, जबकि पब्लिश किया गया कुल आंकड़ा 55.17 करोड़ था-यानी लगभग 2.79 करोड़ का अंतर। विश्लेषण में आरोप लगाया गया है कि ECI ने इस अंतर को स्पष्ट करने के लिए कैटेगरी के हिसाब से पर्याप्त डेटा पब्लिश नहीं किया, जैसे कि कितने वोटर की मौत हो गई, कितने स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए, कितने डुप्लीकेट थे, कितनों का नाम बहाल किया गया या कितनों का नया रजिस्ट्रेशन हुआ। यह सरकारी आंकड़ों की बाहरी विश्लेषण है, न कि कोई न्यायिक निष्कर्ष कि 2.79 करोड़ लोगों को गैर-कानूनी तरीके से वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया। इसका मुख्य आरोप यह है कि पब्लिक डेटा का मिलान इस तरह से नहीं किया गया है कि स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि की जा सके।

दी गई जानकारी में राज्य-स्तर पर भी गड़बड़ियों की पहचान की गई है, जिसमें बिहार और पश्चिम बंगाल शामिल हैं, और उत्तर प्रदेश में ड्राफ्ट और फाइनल रोल के बीच बिना वजह नए नाम जुड़ने पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप यह नहीं है कि हर नाम हटाना या जोड़ना गलत है, बल्कि यह है कि ECI के पब्लिश किए गए आंकड़े वोटर लिस्ट में बदलाव की प्रक्रिया के दौरान वोटरों की संख्या में हुए बदलाव का पर्याप्त रूप से पारदर्शी और दोबारा जांचने लायक ब्योरा नहीं देते। करोड़ों नामों वाली इस प्रक्रिया में, कैटेगरी के हिसाब से पूरा मिलान न होना जवाबदेही का एक बड़ा मुद्दा है।

8. पश्चिम बंगाल SIR: बड़े पैमाने पर नाम हटाना, अपीलों का भारी बैकलॉग और ऑथराइजेशन पर सवाल


Image: Dibyangshu SARKAR / AFP.

पश्चिम बंगाल में, लगभग 60 लाख वोटरों की पहचान "तार्किक विसंगतियों" के आधार पर की गई और न्यायिक निगरानी वाली प्रक्रिया के जरिए उनकी जाxच की गई। इसके बाद लगभग 27 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए। ECI ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 38.31 लाख अपीलें दायर की गई थीं: 22.21 लाख अपीलें हटाए गए वोटरों के नाम वापस जोड़ने के लिए थीं और 16.10 लाख अपीलें उन वोटरों के नाम हटाने के लिए थीं जिन्हें शामिल किया गया था। इन अपीलों की बड़ी संख्या ने उन लोगों के लिए समाधान की पहुंच और समय पर समाधान मिलने को लेकर चिंताएं पैदा कीं जिनके नाम हटा दिए गए थे।

इस मामले में यह सवाल भी उठा कि न्यायिक प्रक्रिया के जरिए शामिल किए गए वोटरों के नाम हटाने के लिए अपील करने की मंजूरी किसने दी थी। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, संधू ने मंजूरी पर सवाल उठाए और कहा कि न तो उन्हें, न ही जोशी को और न ही उस समय के पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी को उस आधार या प्रक्रिया के बारे में बताया गया था जिसके तहत वे अपीलें शुरू की गई थीं। बाद की रिपोर्टों से पता चला कि अपीलों का केवल एक छोटा हिस्सा ही निपटाया गया था, जिससे बड़ी संख्या में अपीलें लंबित रह गईं।

इसलिए, ECI पर लगे आरोप शुरुआती तौर पर नाम हटाने की प्रक्रिया और समाधान की प्रभावशीलता, दोनों से जुड़े हैं। जब किसी वोटर को अपना नाम वापस जुड़वाने के लिए अपील करनी पड़ती है, तो अपील का समाधान न होने का मतलब यह हो सकता है कि असल में उसका नाम सूची से बाहर ही रहे। सवाल यह है कि क्या नाम हटाने का हर मामला उचित कारणों पर आधारित था, क्या अपीलों को सही ढंग से मंजूरी दी गई थी और क्या चुनाव से पहले नाम वापस जुड़वाना संभव था।

9. वोटर सूची से नाम हटाना और उसके परिणाम: कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ी चिंताएं और सुप्रीम कोर्ट द्वारा SIR को सीमित मंजूरी

दी गई जानकारी में इस बात पर चिंता जताई गई है कि वोटर सूची से नाम हटाने को कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित होने से जोड़ा जा रहा था। पश्चिम बंगाल में, खबरों के अनुसार सरकारी बयानों में वोटर सूची से नाम हटाने को कुछ योजनाओं के लिए पात्रता से जोड़ा गया, जबकि रिपोर्टों में प्रभावित लाभार्थियों पर राशन कार्ड और नकद हस्तांतरण (कैश-ट्रांसफर) के असर का जिक्र किया गया। बिहार में, खबरों के अनुसार उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि सूची से हटाए गए लोग राशन और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए अयोग्य होंगे और बैंक पासबुक रद्द करने की संभावना भी जताई। ऐसे उपाय एक खास चिंता पैदा करते हैं: वोटर सूची से नाम हटाने को अपने-आप नागरिकता या उससे जुड़ी अन्य योजनाओं के लाभ पाने के अधिकार के बारे में अंतिम फैसला नहीं माना जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के 27 मई, 2026 के फैसले ने संवैधानिक और कानूनी ढांचे के तहत बिहार में SIR (विशेष मतदाता पुनरीक्षण) आयोजित करने के ECI के अधिकार को बरकरार रखा। हालांकि, कोर्ट ने ECI की चुनावी पात्रता की सीमित जांच और नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत नागरिकता तय करने की औपचारिक प्रक्रिया के बीच अंतर बताया। कोर्ट ने खास मामलों में सक्षम अधिकारी को मामला भेजने और नोटिस व सुनवाई का मौका देने का भी निर्देश दिया। इसलिए, कोर्ट के फैसले ने वोटर लिस्ट में बदलाव करने के कमीशन के अधिकार को सही ठहराया; इसने हर व्यक्ति का नाम हटाने को कानूनी रूप से प्रमाणित नहीं किया और न ही यह तय किया कि लिस्ट से बाहर किया गया हर वोटर अयोग्य था।

दी गई जानकारी में इस फैसले की आलोचना की गई है क्योंकि इसमें नागरिकता पर अंतिम फैसला होने से पहले लिस्ट से बाहर किए जाने के व्यावहारिक नतीजों का ठीक से समाधान नहीं किया गया है। साथ ही, प्रक्रियात्मक निष्पक्षता और मौजूदा वोटर रजिस्ट्रेशन को सही मानने की धारणा के समर्थन में 'लाल बाबू हुसैन बनाम इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (1995)' का हवाला दिया गया है। ये आलोचनाएं फैसले और SIR ढांचे के बारे में हैं, न कि कोर्ट के अपने निष्कर्षों के बारे में। चिंता यह बनी हुई है कि जब तक अलग से कोई फैसला या अपील लंबित है, तब तक वोटर वोट देने का मौका खो सकता है।

10. SIR का विस्तार और जवाबदेही की अनसुलझी परीक्षा

ECI की SIR प्रक्रिया बिहार से आगे बढ़कर बहुत बड़े वोटर बेस तक फैल गई है। दी गई जानकारी के अनुसार, तीसरे चरण में 16 राज्य और तीन केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, जिनमें लगभग 36.73 करोड़ वोटर हैं। इसमें तर्क दिया गया है कि यह विस्तार ऐसे समय में हो रहा है जब पिछले चरणों के सवाल- जैसे डेटा में बिना वजह बदलाव, नाम हटाने की श्रेणियां, नाम बहाल करने की प्रक्रिया और वोटरों पर व्यावहारिक बोझ- अभी भी अनसुलझे हैं।

कुल मिलाकर, 2024 के बाद से उठे विवाद किसी एक चुनाव या लिस्ट में बदलाव की प्रक्रिया से कहीं अधिक गंभीर हैं। VFD की रिपोर्टों ने वोटिंग और गिनती के डेटा का पता लगाने की क्षमता पर सवाल उठाए। नियम 93 में संशोधन ने इलेक्ट्रॉनिक चुनावी रिकॉर्ड की सार्वजनिक जांच के दायरे को सीमित कर दिया। SIR के तहत दस्तावेजों की जांच, नाम हटाने, अपील और वोटर लिस्ट के आंकड़ों के मिलान की प्रक्रिया शुरू हुई। गोवा की घटना और दो चुनाव आयुक्तों द्वारा जताई गई आपत्तियों ने इस बारे में और सवाल खड़े कर दिए कि सॉफ्टवेयर को कौन नियंत्रित करता है और क्या कानूनी अधिकारियों द्वारा लिए गए फैसलों को वास्तव में लागू किया जा सकता है।

इन सभी घटनाओं में मुख्य आरोप यह है कि ECI ने चुनावी फैसलों के लिए लगातार ऐसा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया है जो पारदर्शी, सत्यापित करने योग्य और जवाबदेह हो।

सभी आरोपों का सबूत के तौर पर एक जैसा महत्व नहीं है, और हर गड़बड़ी का मतलब हेर-फेर या गैर-कानूनी काम नहीं होता। लेकिन पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी, या नागरिकों या विपक्ष से कोई बातचीत न होने की वजह से, कमीशन का कामकाज शक के घेरे में है। कमीशन की संवैधानिक जिम्मेदारी के लिए सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि प्रक्रियाओं का पालन किया गया था। इसके लिए ऐसे रिकॉर्ड की जरूरत है जो किसी फैसले के लिए जिम्मेदार अथॉरिटी की पहचान करें, फैसले का आधार बताएं, प्रभावित वोटर को उसे चुनौती देने का मौका दें, और गलती साबित होने पर सुधार की गुंजाइश रखें।

हाल ही में सामने आई अंदरूनी आपत्तियों ने इस मांग को और भी जरूरी बना दिया है। जब तीन में से दो चुनाव आयुक्त वोटर रजिस्ट्रेशन, नाम हटाने, डेटाबेस एक्सेस और संस्थागत मंजूरी से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाते हैं, तो यह मामला सिर्फ राजनीतिक पार्टियों या सिविल-सोसाइटी संगठनों की आलोचना तक सीमित नहीं रह जाता।

यह मामला खुद संवैधानिक संस्था के कामकाज से जुड़ा है। असली कसौटी यह है कि क्या ECI वोटर लिस्ट में हुए हर अहम बदलाव और चुनावी प्रक्रिया के हर चरण का हिसाब ऐसे रिकॉर्ड के जरिए दे सकता है जो पूरे हों, आसानी से उपलब्ध हों और जिनकी स्वतंत्र रूप से जांच की जा सके।

ECI का सर्वसम्मति पर बचाव: एक प्रेस नोट जो भरोसा तो दिलाना चाहता है, लेकिन अहम सवाल अधूरे छोड़ देता है

'द इंडियन एक्सप्रेस' की जांच के जवाब में - जिसमें बताया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं - निर्वाचन आयोग (ECI) ने 23.09.2026 के अपने प्रेस नोट (नंबर EC/PN/119/2026) में कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 324, कानूनी नियमों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के तहत एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था के तौर पर काम करता है।



कमीशन ने कहा कि लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और अंदरूनी जांच-पड़ताल और संतुलन (checks and balances) आम प्रक्रियाएं हैं जिनका मकसद पारदर्शिता, कानूनी नियमों का पालन और कामकाज में सख्ती सुनिश्चित करना है; कि सभी आधिकारिक आदेश, फैसले और प्रशासनिक निर्देश कानूनी मान्यता रखते हैं और 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' के तहत कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हैं; और यह कि ड्राफ्ट के चरणों के दौरान उठाए गए सवाल या सुझाव आम प्रक्रियाएं हैं जिनका मकसद वोटरों के अधिकारों की रक्षा करना और चुनावी प्रक्रियाओं को बेहतर बनाना है। इसमें यह भी कहा गया कि अलग-अलग राय होना विचार-विमर्श का एक सामान्य हिस्सा है, आयोग का हर अधिकारी सुझाव देने के लिए अधिकृत है, और 10 महीनों के दौरान चुने हुए इंटरनल नोट्स को उजागर करना "तस्वीर का सिर्फ एक पहलू" दिखाता है।

ECI ने जोर देकर कहा कि उसने कई फैसले लिए, लगभग 40 पहल शुरू कीं, चुनावी सुधार किए-जिनमें SIR भी शामिल है- और बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में चुनाव से जुड़ी बड़ी गतिविधियां आयोजित कीं। साथ ही, यह भी कहा कि पिछले साल लिए गए सभी फैसले पूरे आयोग की आम सहमति से लिए गए थे। इसने ECINet और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी बचाव किया और कहा कि वे कड़े डेटा-सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं, और यह भी स्पष्ट किया कि इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर और जिला चुनाव अधिकारी कानून के तहत अपनी वैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं।

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