“महाराष्ट्र में वधवन पोर्ट विकास नहीं, विनाश की परियोजना है”: नेशनल सॉलिडेरिटी टीम

Written by sabrang india | Published on: September 21, 2026
"तटीय इलाकों में जलवायु परिवर्तन का असर गंभीर होता जा रहा है। ऐसे में इतने बड़े पोर्ट प्रोजेक्ट के निर्माण से खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। संगठन ने वधवन पोर्ट प्रोजेक्ट को तत्काल रद्द करने की मांग की है।"



महाराष्ट्र में प्रस्तावित वधवन पोर्ट प्रोजेक्ट को लेकर ‘नेशनल अलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट्स’ (NAPM) ने विरोध जताया है। संगठन का कहना है कि यह परियोजना स्थानीय समुदायों की जरूरतों के अनुरूप नहीं है, बल्कि इससे मछुआरों की आजीविका, आदिवासियों की जमीन, खेती और बागों के साथ-साथ समुद्र और तटीय जैव-विविधता पर खतरा पैदा होगा।

NAPM के मुताबिक, तटीय इलाकों में जलवायु परिवर्तन का असर गंभीर होता जा रहा है। ऐसे में इतने बड़े पोर्ट प्रोजेक्ट के निर्माण से खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। संगठन ने वधवन पोर्ट प्रोजेक्ट को तत्काल रद्द करने की मांग की है।

19 और 20 सितंबर 2026 को महाराष्ट्र और देश के कई अन्य राज्यों से NAPM के प्रतिनिधियों ने वधवन इलाके में मछुआरों, आदिवासियों, किसानों, डाई-मेकर्स, भूमिहीन लोगों, मजदूरों और अन्य प्रभावित समुदायों से मुलाकात की और बातचीत की। NAPM इस संघर्ष का शुरू से ही हिस्सा रहा है, जो कई दशकों से चल रहा है। मेधा पाटकर, स्वर्गीय थॉमस कोचेरी, रामभाऊ पाटिल, एन. डी. कोली और कई अन्य कार्यकर्ता सालों से इस संघर्ष के साथ खड़े रहे हैं।

वधवन पोर्ट प्रोजेक्ट में जमीन बनाने के लिए समुद्र के लगभग 1,448 हेक्टेयर हिस्से को भरने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, सड़कों, रेलवे और अन्य संबंधित बुनियादी ढांचे के लिए बड़ी मात्रा में जमीन की जरूरत होगी। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि वधवन पोर्ट महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था को बदल देगा, पालघर को “चौथा मुंबई” बना देगा और लाखों नौकरियां पैदा करेगा। लेकिन वधवन तट पर विरोध कर रहे मछुआरे, आदिवासी, किसान, डाई-मेकर्स और अन्य स्थानीय समुदाय ऐसा विकास नहीं चाहते जो उनके जीवन और आजीविका को बर्बाद कर दे।



संगठन का कहना है कि वधवन इलाके में पोर्ट के प्रस्ताव पर पहले भी पर्यावरणीय आधार पर सवाल उठाए गए थे। आज, केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न एजेंसियां इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रही हैं। फिर भी, पहले उठाए गए पर्यावरणीय और सामाजिक मुद्दे अनसुलझे हैं, जबकि प्रोजेक्ट का दायरा कई गुना बढ़ गया है। JNPT और दूसरे बंदरगाहों के अनुभव का अध्ययन किया जाना चाहिए — जिसमें ट्रैफिक, शहरीकरण, प्रदूषण, मछली पकड़ने पर असर और तटीय इलाकों में बुनियादी ढांचे का विस्तार शामिल है — और वधवन प्रोजेक्ट के कुल असर का स्वतंत्र मूल्यांकन किया जाना चाहिए। दूसरी जगहों पर जो नुकसान हुआ है, वह एक गंभीर चेतावनी होनी चाहिए।

“हम चौथा मुंबई नहीं चाहते। हमारा समुद्र, हमारे खेत, हमारे जंगल और हमारे गांव जैसे हैं, वैसे ही रहने चाहिए!”

इसी मांग के साथ, इस इलाके के समुदाय वधवन बंदरगाह विरोधी संघर्ष समिति के नेतृत्व में बंदरगाह का विरोध करने के लिए एकजुट हुए हैं।



बंदरगाह के अलावा, इस प्रोजेक्ट में लगभग 1,448 हेक्टेयर समुद्री जमीन को भरने (reclamation), 10 किलोमीटर से ज्यादा लंबा ब्रेकवाटर बनाने, बड़े पैमाने पर ड्रेजिंग, सड़क और रेल कनेक्टिविटी, स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक व व्यावसायिक विकास शामिल है। दूसरे शब्दों में, यह एक ऐसा प्रोजेक्ट है जो पूरे समुद्र तट को बदल देगा। NAPM की नजर में, यह विकास की नहीं, बल्कि विनाश की कड़ी है। सरकार 76,220 करोड़ रुपये के निवेश और लाखों नौकरियां पैदा करने की बात करती है। लेकिन सरकारी एजेंसियों के साथ-साथ, बड़े अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह, टर्मिनल, लॉजिस्टिक्स और ड्रेजिंग ऑपरेटर भी इस प्रोजेक्ट में शामिल हैं। तो फिर, स्थानीय मछुआरों, आदिवासियों, किसानों और छोटे उत्पादकों की पीढ़ियों पुरानी आजीविका को होने वाले नुकसान का हिसाब कौन रखेगा?

सरकारी अध्ययनों के अनुसार, प्रोजेक्ट वाले इलाके में मछली पकड़ने वाले 16 गांवों में 5,333 परिवारों के 20,809 मछुआरे रहते हैं। मछली पकड़ना इन समुदायों की मुख्य आजीविका है। स्किल ट्रेनिंग या कुछ लाख रुपये का मुआवजा एक मछुआरे के लिए समुद्र की जगह नहीं ले सकता। पारंपरिक मछली पकड़ने के तरीके, स्थानीय मछली संसाधन — जिसमें लॉबस्टर भी शामिल है — और उन पर आधारित पूरी अर्थव्यवस्था की रक्षा की जानी चाहिए। वधवन पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील दहानू इलाके में आता है। बड़े पैमाने पर समुद्री जमीन भरने, ड्रेजिंग और ब्रेकवाटर का समुद्री धाराओं, तलछट की आवाजाही, मछली पकड़ने के इलाकों और ज्वारीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले कुल असर की गंभीरता से जांच की जानी चाहिए।

नेशनल अलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट्स के राष्ट्रीय संयोजक (महाराष्ट्र से) संजय मंगला गोपाल और सुनीति एस. आर. ने कहा कि एक बुनियादी सवाल यह है कि क्या इन स्टडीज़ में स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, समुद्र के बारे में उनके अनुभव और स्थानीय जैव-विविधता के डेटा को ठीक से शामिल किया गया है?


अगर मैंग्रोव वाले इलाके प्रभावित होते हैं, तो समुद्री इकोसिस्टम बर्बाद हो सकते हैं। ऐसे इकोसिस्टम को कहीं और दोबारा बनाना लगभग नामुमकिन है, इसलिए इनकी सुरक्षा और संरक्षण बहुत जरूरी है। वधवन में जमीन तैयार करने (reclamation) और उससे जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सामान जुटाने के असर — जैसे पहाड़ी इलाकों में पत्थर निकालना, आदिवासी इलाकों पर असर और जंगल काटना — पर भी ध्यान देना होगा। एक जगह जंगल काटकर दूसरे जिले में पेड़ लगाने से उस इकोसिस्टम के नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।

सरकारी जानकारी के मुताबिक, पोर्ट को जोड़ने वाली सड़कों और रेलवे के लिए प्राइवेट जमीन, आदिवासी जमीन, वन भूमि और सरकारी जमीन की जरूरत होगी। इसलिए, इस प्रोजेक्ट का असर सिर्फ पोर्ट इलाके तक ही सीमित नहीं रहेगा। आदिवासी समुदायों के लिए, पीढ़ियों से खेती की जा रही जमीन ही उनके जिंदा रहने का आधार है। हम विकास के नाम पर ये जमीनें छीने जाने को मंजूर नहीं कर सकते — जैसे पहाड़ उड़ाना, जंगल काटना और जमीन भरने का सामान डालना, और इसे “विकास” कहना।

वधवन को सिर्फ एक “कंटेनर पोर्ट” के तौर पर पेश करना गुमराह करने वाला है। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, यह एक गहरे ड्राफ्ट वाला बड़ा पोर्ट है, जिसमें कंटेनर के अलावा भारी मात्रा में केमिकल और कच्चे माल (crude cargo) को मैनेज करने की क्षमता है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के वर्गीकरण के तहत, पोर्ट, हार्बर, जेटी और ड्रेजिंग ऑपरेशन ‘रेड कैटेगरी’ में आते हैं, जबकि सिर्फ कंटेनर संभालने वाले पोर्ट ‘ऑरेंज कैटेगरी’ में आते हैं।

सरकारी दस्तावेजों में समुद्र की गहराई 20 मीटर बताई गई है। हालांकि, स्थानीय संघर्ष समिति का कहना है कि कम ज्वार (low tide) के समय की गई नाप-जोख में गहराई कम पाई गई। एक्टिविस्ट का कहना है कि पब्लिक हियरिंग के दौरान यह मुद्दा उठाया गया था, लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया।



मुख्य मांगें:
  • वधवन पोर्ट प्रोजेक्ट को तुरंत रद्द किया जाए।
  • पेड़ काटने और उससे जुड़े सभी इंफ्रास्ट्रक्चर के कामों को तुरंत रोका जाए।
  • स्थानीय मछुआरों, आदिवासियों, किसानों और महिलाओं की भागीदारी के साथ एक स्वतंत्र और पारदर्शी ‘क्युमुलेटिव इम्पैक्ट असेसमेंट’ (कुल असर का आकलन) किया जाए।
  • समुद्र की गहराई को स्वतंत्र रूप से फिर से मापा जाए, जिसमें 20 मीटर गहराई के दावे की पुष्टि भी शामिल हो। यह प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए और स्थानीय समुदायों की मौजूदगी में की जानी चाहिए।
  • मछुआरों की पीढ़ियों पुरानी आजीविका की रक्षा की जाए। मुआवजे या वैकल्पिक रोजगार के नाम पर पारंपरिक मछली पकड़ने के काम को खत्म नहीं किया जाना चाहिए।
  • आदिवासियों की जमीन और जंगलों की रक्षा करें, और PESA के तहत मिलने वाले अधिकारों सहित उनके सभी कानूनी अधिकारों को सुरक्षित रखें।
  • स्थानीय जंगलों के विनाश के मुआवजे के तौर पर दूर के जिलों में पेड़ लगाने के बजाय, स्थानीय इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) की रक्षा करें।
  • “चौथी मुंबई” के नाम पर अनियंत्रित शहरीकरण थोपने के बजाय, स्थानीय लोगों की जरूरतों के आधार पर स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार के अवसर बनाए जाएं।
वधवन में चल रहा जन-आंदोलन सिर्फ एक बंदरगाह के खिलाफ संघर्ष नहीं है। यह समुद्र तट, मछुआरों और आदिवासी समुदायों, खेती, जंगलों और जैव-विविधता की रक्षा के लिए एक संघर्ष है।

वधवन के लोग विकास चाहते हैं। वे स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और डॉक्टर चाहते हैं। वे अपनी खेती और बागवानी के लिए बाजार चाहते हैं। मछुआरों को सुविधाओं और सही कीमतों की जरूरत है, और युवाओं को अपने ही इलाके में सम्मानजनक रोजगार चाहिए।

NAPM, ‘वधवन बंदर विरोधी संघर्ष समिति’ और इस प्रोजेक्ट के खिलाफ लड़ रहे मछुआरों, आदिवासियों और स्थानीय समुदायों के साथ मजबूती से खड़ा है। हम समुद्र, जंगलों, जमीन और आजीविका को नष्ट करके बनाए गए विकास के मॉडल को अस्वीकार करते हैं।

NAPM देश भर के जन-आंदोलनों से अपील करता है कि वे उस धरने के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करें जो अब पिछले 48 दिनों से चल रहा है।

नेशनल अलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट्स के राष्ट्रीय संयोजक (महाराष्ट्र से) संजय मंगला गोपाल, सुनीति एस. आर. और महाराष्ट्र राज्य संयोजक सुजय मोरे, सीरत सतपुते तथा समर्थन टीम के सदस्य प्रसाद चाको (अहमदाबाद), प्रांजलि त्रिपाठी (जयपुर), एडवोकेट मिनी मैथ्यू (बांद्रा), सिद्धार्थ चक्रवर्ती (बेंगलुरु), साक्षी सामंत (ठाणे), नंदकुमार पवार (मुंबई), रमेश कोली (उरण), मंगेश कोली (उरण), मयूर कोली (उरण), धनंजय शिंदे और राजश्री शिंदे (मुंबई) शामिल थे।

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