आंध्र प्रदेश: मानवाधिकार संगठनों ने दलित महिला की कथित कस्टोडियल मौत की स्वतंत्र जांच की मांग की

Written by sabrang india | Published on: June 29, 2026
HRF और IFTU की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की है। संगठनों का आरोप है कि पुलिस ने माला गंगम्मा को उनके बेटे के लापता होने के मामले में कथित भूमिका कबूल कराने के लिए हिरासत में प्रताड़ित किया।



मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स फोरम (HRF) और इंडियन फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस (IFTU) ने आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में 40 वर्षीय दलित महिला माला गंगम्मा की कथित कस्टोडियल मौत की स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की है। संगठनों का आरोप है कि गंगम्मा की मौत स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) द्वारा हिरासत में दी गई कथित यातना के कारण हुई। यह SIT उनके बेटे वीरेंद्र के लापता होने के मामले की जांच कर रही थी। HRF और IFTU का कहना है कि गंगम्मा को कथित तौर पर इस उद्देश्य से प्रताड़ित किया गया कि वे अपने बेटे के रहस्यमय ढंग से लापता होने में अपनी कथित भूमिका स्वीकार कर लें।

HRF और IFTU ने संयुक्त बयान में कहा कि तीन सदस्यीय फैक्ट-फाइंडिंग टीम—जिसमें HRF के राज्य उपाध्यक्ष यू.जी. श्रीनिवासुलु, HRF के कुरनूल जिला अध्यक्ष के. उरुकुंडप्पा और IFTU के जिला प्रतिनिधि नरसन्ना शामिल थे—ने बदिनेहाल गांव का दौरा किया। टीम ने गंगम्मा के परिजनों और स्थानीय लोगों से मुलाकात की तथा अपनी रिपोर्ट तैयार करने से पहले कौथालम पुलिस से भी बातचीत की।

वीरेंद्र नवंबर 2024 में लापता हो गया था। बाद में गंगम्मा ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का रुख किया, जिसके बाद अदालत ने तत्कालीन गुंटूर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) के. सुप्रजा की अध्यक्षता में एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) गठित करने का निर्देश दिया।

संगठनों के अनुसार, SIT ने निष्कर्ष निकाला कि गंगम्मा ने अपने साथी मल्ला दुर्गाय्या के साथ मिलकर वीरेंद्र की हत्या की साजिश रची थी, क्योंकि वीरेंद्र कथित तौर पर दोनों के संबंध का विरोध करता था।

HRF और IFTU का आरोप है कि SIT ने गंगम्मा और दुर्गाय्या को हिरासत में अमानवीय यातनाएं दीं, ताकि वे उस स्थान का खुलासा करें जहां कथित रूप से वीरेंद्र का शव दफनाया गया था। 31 मई को गंगम्मा की मौत हो गई। संगठनों का दावा है कि उनकी मौत हिरासत में दी गई यातना के कारण हुई, जबकि दुर्गाय्या का इलाज अभी भी कुरनूल सरकारी अस्पताल में चल रहा है।

संगठनों ने जांच के तौर-तरीकों पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि SIT ने जबरन कबूलनामा कराने के लिए अवैध तरीकों का इस्तेमाल किया। उन्होंने गंगम्मा को कुरनूल के KIMS अस्पताल ले जाने, पोस्टमार्टम की प्रक्रिया तथा उनके शरीर पर मौजूद सभी चोटों को ठीक से दर्ज किए जाने जैसे मुद्दों पर भी चिंता जताई।

HRF और IFTU ने गंगम्मा का अंतिम संस्कार जल्दबाजी में किए जाने पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, 1 जून को 20 से 30 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में उनके शव को पैतृक गांव बदिनेहाल में दफना दिया गया।

संगठनों ने पुलिस के उस दावे पर भी सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि दुर्गाय्या को चोटें मोटरसाइकिल दुर्घटना में लगी थीं। उनका आरोप है कि अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान दुर्गाय्या के परिजनों को उनसे मिलने तक की अनुमति नहीं दी गई।

HRF और IFTU ने कहा कि यदि वीरेंद्र की हत्या के लिए कोई व्यक्ति जिम्मेदार है, तो उसके खिलाफ कानून के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए। लेकिन हिरासत में यातना देना और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन किसी भी स्थिति में न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता।

संगठनों ने घटना की स्वतंत्र न्यायिक अथवा निष्पक्ष जांच, गंगम्मा के शव का दोबारा पोस्टमार्टम कराने तथा जिम्मेदार पाए जाने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आपराधिक मामले दर्ज करने की मांग की है।

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