उत्तराखंड में 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार का बचाव करने पर एफआईआर, हाईवे जाम और कानून-व्यवस्था का संकट

Written by sabrang india | Published on: February 4, 2026
कोटद्वार में एक दुकान के नाम को लेकर कथित डराने-धमकाने के खिलाफ स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ हस्तक्षेप जल्द ही दक्षिणपंथी लामबंदी, कई एफआईआर, चयनात्मक पुलिसिंग, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांप्रदायिक सौहार्द पर एक राष्ट्रीय बहस में बदल गया।



उत्तराखंड के कोटद्वार में गणतंत्र दिवस के मौके पर एक स्थानीय जिम मालिक द्वारा किए गए हस्तक्षेप से शुरू हुई घटना अब कानून-व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं के एक जटिल संकट में तब्दील हो गई है। इस घटनाक्रम ने सांप्रदायिक धमकियों के प्रति राज्य की प्रतिक्रिया में मौजूद गंभीर खामियों को उजागर किया है।

26 जनवरी 2026 को दीपक कुमार ने उस समय हस्तक्षेप किया, जब कथित तौर पर बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े कुछ लोगों के एक समूह ने 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद को उनकी दशकों पुरानी दुकान के नाम में “बाबा” शब्द के इस्तेमाल को लेकर धमकाया। कुछ ही दिनों में यह मामला एक सीमित विवाद से आगे बढ़ गया और इसके चलते कई एफआईआर दर्ज हुईं, दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा बड़े पैमाने पर लामबंदी हुई, राष्ट्रीय राजमार्ग जाम किया गया और न केवल कथित धमकाने वालों व प्रदर्शनकारियों के खिलाफ, बल्कि बुजुर्ग दुकानदार के समर्थन में हस्तक्षेप करने वालों के खिलाफ भी आपराधिक मामले दर्ज किए गए।

राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से रिपोर्ट की गई कोटद्वार की यह घटना अब इस बात की कसौटी बन गई है कि राज्य सांप्रदायिक सतर्कता के मामलों में पुलिसिंग कैसे करता है, अभिव्यक्ति और विवेक की स्वतंत्रता की रक्षा कैसे करता है, और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दावों को कानून के समक्ष समानता के संवैधानिक दायित्व के साथ कैसे संतुलित करता है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है और पुलिस की तैनाती बढ़ाई गई है, यह घटना एक परेशान करने वाला सवाल खड़ा करती है—क्या धार्मिक धमकियों का विरोध करने पर आम नागरिकों को संरक्षण मिलता है या अभियोजन का सामना करना पड़ता है?

विवाद की शुरुआत: 26 जनवरी और “बाबा” शब्द

द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, 46 वर्षीय दीपक कुमार कोटद्वार में एक जिम चलाते हैं। 26 जनवरी को वे एक दोस्त की दुकान पर मौजूद थे, जब उन्होंने कुछ लोगों के एक समूह को 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार वकील अहमद (जिन्हें अहमद वकील भी कहा जाता है) से बातचीत करते सुना। अहमद की दुकान—बाबा स्कूल ड्रेस—पिछले लगभग 30 वर्षों से पटेल मार्ग पर स्थित है।

कथित तौर पर खुद को बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद (VHP) का सदस्य बताने वाले इन लोगों ने अहमद की दुकान के नाम में “बाबा” शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई और नाम बदलने की मांग की। उनका दावा था कि यह शब्द केवल हिंदू धार्मिक हस्तियों के लिए प्रयुक्त होना चाहिए।

जब कुमार ने हस्तक्षेप कर यह पूछा कि एक बुजुर्ग व्यक्ति को क्यों धमकाया जा रहा है, तो कथित तौर पर उनसे दखल न देने को कहा गया।

वायरल पल: “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है”

इस टकराव का एक वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। वीडियो में कुमार भीड़ के तर्क पर सवाल उठाते नजर आते हैं। वे पूछते हैं कि अन्य दुकानों को “बाबा” शब्द इस्तेमाल करने की अनुमति क्यों है, लेकिन अहमद की दुकान को नहीं, और क्या तीन दशक पुरानी दुकान को अब अपनी पहचान बदलने के लिए मजबूर किया जा सकता है।

जब समूह के कुछ सदस्य कुमार से उनका नाम पूछते हैं, तो वे जवाब देते हैं, “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है।”

बाद में द इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कुमार ने स्पष्ट किया कि यह बयान जानबूझकर और प्रतीकात्मक था। उन्होंने कहा, “मेरा मकसद यह बताना था कि मैं एक भारतीय हूं और कानून के सामने सभी बराबर हैं।”

वीडियो वायरल होने के बाद जहां सोशल मीडिया पर इसकी सराहना हुई, वहीं कुमार के अनुसार उन्हें और उनके परिवार को धमकियां भी मिलीं।



दुकानदार की शिकायत और पहली एफआईआर

26 जनवरी की घटना के बाद वकील अहमद ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि बजरंग दल का सदस्य होने का दावा करने वाले तीन-चार लोग उनकी दुकान में घुसे, उन्हें धमकाया और नाम न बदलने पर “गंभीर परिणाम” भुगतने की चेतावनी दी।

इस शिकायत के आधार पर कोटद्वार पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई, जिनमें शामिल हैं—

● धारा 115(2): जानबूझकर चोट पहुंचाना

● धारा 333: चोट पहुंचाने, हमला करने या गलत तरीके से रोकने की तैयारी के बाद घर में घुसना

● धारा 351(2): आपराधिक धमकी

● धारा 352: सार्वजनिक शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना

द हिंदू के अनुसार, एफआईआर में दो नामजद और कुछ अज्ञात आरोपी शामिल हैं।

लामबंदी और विरोध: दीपक कुमार के खिलाफ प्रदर्शन

हालांकि शुरुआती टकराव 26 जनवरी को ही थम गया था, लेकिन कुछ दिनों बाद स्थिति और बिगड़ गई। 31 जनवरी को खुफिया जानकारी मिली कि कुमार के जिम और अहमद की दुकान के पास लोग इकट्ठा हो रहे हैं।

सब-इंस्पेक्टर विनोद कुमार द्वारा बाद में दर्ज शिकायत के अनुसार, लगभग 30–40 लोग 12–15 गाड़ियों में कोटद्वार पहुंचे। हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, इनमें से कई देहरादून और हरिद्वार से आए थे और खुद को बजरंग दल का सदस्य बता रहे थे।

हाईवे जाम, नारेबाजी और पुलिस से टकराव

सब-इंस्पेक्टर की शिकायत पर दर्ज एफआईआर के अनुसार, समूह ने—

● कुमार के जिम के पास नारे लगाए

● बैरियर पर तैनात पुलिसकर्मियों को रोका

● पुलिस बैरिकेड हटाए

● सड़क पर वाहन खड़े कर ट्रैफिक जाम किया

● राष्ट्रीय राजमार्ग को लगभग एक घंटे तक बाधित रखा, जिससे आम जनता और एंबुलेंस सेवाएं प्रभावित हुईं

● कोटद्वार बाजार और बाबा स्कूल ड्रेस की ओर मार्च करते हुए धार्मिक नारे लगाए और गाली-गलौज की



बाद में समूह नगर परिषद कार्यालय के सामने मालवीय उद्यान के पास फिर से एकत्र हुआ और सड़क पर बैठकर दोबारा ट्रैफिक जाम किया। एफआईआर में कहा गया है कि इन कार्रवाइयों से राहगीरों में “डर और दहशत” फैल गई और इसका उद्देश्य सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ना था।

इन घटनाओं के आधार पर पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ गैरकानूनी सभा, सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा, शांति भंग करने और समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ाने की धाराओं में एफआईआर दर्ज की।

एक और एफआईआर: इस बार हस्तक्षेप करने वालों के खिलाफ

काफी आलोचना के बीच, उत्तराखंड पुलिस ने दीपक कुमार और एक अन्य स्थानीय निवासी विजय रावत—जिन्होंने 26 जनवरी को अहमद का समर्थन किया था—के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की।

द हिंदू के अनुसार, यह एफआईआर कथित तौर पर वीएचपी सदस्य गौरव कश्यप और बजरंग दल सदस्य बताए जा रहे कमल पाल की शिकायतों पर दर्ज की गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि कुमार और रावत ने हमला किया, पैसे और मोबाइल फोन छीने, जातिसूचक गालियां दीं और एक हिंसक भीड़ का हिस्सा बने।

पुलिस ने दोनों के खिलाफ आपराधिक धमकी, जानबूझकर चोट पहुंचाने, दंगा और शांति भंग करने सहित कई धाराओं में मामला दर्ज किया है।

दीपक कुमार का सवाल

कुमार ने सभी आरोपों से इनकार किया है और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि उनकी और उनके परिवार की सुरक्षा खतरे में है और पूछा कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों की गई, जबकि बुजुर्ग दुकानदार को धमकाने वाले कथित आरोपी खुले घूम रहे हैं।

एक इंस्टाग्राम वीडियो में उन्होंने कहा, “मैं न हिंदू हूं, न मुसलमान, न सिख, न ईसाई। सबसे पहले मैं एक इंसान हूं। किसी को भी उसके धर्म के कारण निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए।”



पुलिस का रुख

पुलिस अधीक्षक सर्वेश पंवार ने कहा कि सभी एफआईआर कानून-व्यवस्था बनाए रखने और स्थिति को बिगड़ने से रोकने के लिए दर्ज की गई हैं। पुलिस के अनुसार, वीडियो फुटेज की जांच की जा रही है, सभी पक्षों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं और अतिरिक्त बल तैनात किया गया है।

पुलिस ने कहा:

● शामिल लोगों की पहचान करने के लिए वीडियो फुटेज की जांच की जा रही है
● इसमें शामिल सभी पक्षों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं
● संभावित भीड़ के बारे में खुफिया जानकारी मिलने के बाद कोटद्वार में अतिरिक्त बल तैनात किए गए हैं

द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जांच सख्ती से कानूनी आधार पर आगे बढ़ेगी और "दोषी पाए जाने वाले किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा।"

राजनीतिक और नागरिक समाज की प्रतिक्रिया

कुमार और रावत के खिलाफ FIR से नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं, वकीलों और सोशल मीडिया यूजर्स ने कड़ी आलोचना की, जिनमें से कई ने तर्क दिया कि राज्य उन लोगों को दंडित कर रहा है जिन्होंने धमकी देने वालों के खिलाफ हस्तक्षेप किया, न कि उन लोगों को जिन्होंने इसे शुरू किया।

कांग्रेस नेता और विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से कुमार का समर्थन किया, उन्हें "नफरत के बाजार में प्यार का जीता-जागता प्रतीक" कहा। सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में, गांधी ने संघ परिवार पर जानबूझकर फूट डालने का आरोप लगाया और कहा कि उत्तराखंड सरकार "असामाजिक ताकतों" का साथ दे रही है।

गांधी ने लिखा, "हमें और ज्यादा दीपक जैसे लोगों की जरूरत है, जो झुकते नहीं, डरते नहीं, और संविधान के साथ मजबूती से खड़े रहते हैं।"

कांग्रेस के सीनियर नेता सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि कोटद्वार की घटना, साथ ही उत्तराखंड में हाल ही में हुए दूसरे सांप्रदायिक और टारगेटेड हमलों ने राज्य के सामाजिक ताने-बाने को काफी नुकसान पहुंचाया है।



एक अनसुलझा सवाल

फिलहाल तीन अलग-अलग एफआईआर की जांच जारी है—दुकानदार की शिकायत, हाईवे जाम करने वालों के खिलाफ पुलिस मामला और दीपक कुमार व विजय रावत के खिलाफ एफआईआर। कोटद्वार में पुलिस तैनाती बढ़ा दी गई है।

एक दुकान के नाम से शुरू हुआ यह विवाद अब इस बात की कसौटी बन गया है कि जब आम नागरिक सांप्रदायिक धमकियों के खिलाफ खड़े होते हैं, तो राज्य उनकी रक्षा करता है या उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

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