World Tribal Day: आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने के बजाय FRA की धार कुंद करने में जुटी सरकार!

Written by Navnish Kumar | Published on: August 10, 2021
विश्व आदिवासी दिवस की इस साल की थीम मोटे तौर पर यह कहती है कि हमें ध्यान रखना होगा कि कोई पीछे ना छूट जाए। आदिवासी भी मुख्य धारा के अन्य समुदायों के साथ-साथ चलें। समाज भी इसकी जिम्मेवारी लें। आदिवासी दिवस की इस थीम पर देश भर में कार्यक्रम हुए। मांदर, नगाड़ा, गीत व परंपरागत नृत्य के साथ रैलियां निकाली गईं। वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी देश की सबसे पुरानी सभ्यता है। इन्होंने ही पहाड़, जल, जंगल, जमीन, खनिज संपदा को बचा के रखा है। संकल्प दोहराया कि हमारे पूर्वज जो बहुत सारी धरोहर छोड़ कर गए हैं उसको बचाये रखना हम सभी का कर्त्तव्य है। हमें अपने अधिकार और आने वाली पीढ़ी के लिये मिलकर खड़ा होना होगा। लड़ना होगा। आज बहुत सारी जगहों पर आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही है, जो पूरी तरह से गलत है। वनाधिकार कानून के बाद आदिवासियों को ऐतिहासिक अन्नाय से निजात मिलना चाहिए था। लेकिन उसके उलट पिछले कुछ सालों से उत्पीड़न बढा है और आदिवासी समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने की बजाय, कानून के उलट जबरिया बेदखली की घटनाएं ही बढ़ी हैं। यही नहीं, कानूनों और संशोधनों आदि के जरिये भी सरकार वनाधिकार कानून की धार को कुंद करने का ही काम कर रही हैं!



संयुक्त राष्ट्र संघ के भारत के संदर्भ में वर्किंग ग्रुप ऑन ह्यूमन राइट्स द्वारा वर्ष 2012 में जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में आजादी के बाद से लगभग 6.5 करोड़ लोगों का विस्थापन हुआ है जो दुनिया के किसी भी मुल्क में सबसे अधिक है। यह रिपोर्ट कहती है कि कुल विस्थापितों में लगभग 40 फीसदी (2.6 करोड़) आदिवासी समुदाय है। अर्थात आदिवासियों की कुल आबादी का लगभग एक-चौथाई (25 फीसदी) अब तक विस्थापित हो चुका है। वास्तविकता यह भी है कि इनमें से लगभग दो-तिहाई से अधिक लोगों का अब तक पुनर्वास हुआ ही नहीं। दिल्ली के सीमापुरी की एक झुग्गीबस्ती में पहचान-विहीन रहने को मजबूर निर्मल कुजूर अब याद नहीं करना चाहते कि किस तरह कोरबा के कोयला खदानों से उनके बाप-दादा को अवैध नागरिक की तरह बेदखल कर दिया गया। भारत की स्वाधीनता के लगभग 75 बरसों बाद भी देश के प्रथम समाज को उनके जंगल-जमीन का स्वामित्व न दिए जा सकने को, पूरे जनतंत्र की नैतिक-राजनैतिक पराजय माना जाना चाहिये।

अंग्रेजी हुक़ूमत के दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 1865 के पूर्व भारत के प्रथम (आदिवासी) समाज के अधीन देश के लगभग आधे जंगल-जमीन का स्वामित्व था। जो वर्ष 1927 के भारतीय वन अधिनियम के लागू होते-होते केवल 35 फीसदी रह गया। यही नहीं, आजाद भारत में लागू केंद्रीय वन संरक्षण कानून (1980) के आते-आते देश में वन-संसाधनों का क्षेत्र महज 21 फीसदी रह गया था। यदि वन-विभाग की स्थापना तथाकथित रूप से वनों और वन संसाधनों की सुरक्षा के लिए हुई थी तो फिर क्यों नहीं, वनों के संस्थागत विनाश का अभियोग वन विभाग पर चलाया जाना चाहिये? जाहिर है कि ऐतिहासिक अन्याय का प्रथम प्रस्थान बिंदु वन कानून और नीतियां ही हैं, जिसका प्रमाण भारतीय वन अधिनियम है। भारत के लगभग सभी वन कानूनों का बुनियादी चरित्र 'ग्राम सभा और उनके अधिकारों' के खिलाफ ही रहा है। भारतीय वन अधिनियम (1927) और केंद्रीय वन संरक्षण कानून (1980) में 'ग्राम सभा और उसके अधिकार' आज भी स्वीकार्य शब्द नहीं हैं। जंगल व जमीन पर पूरी तरह वन विभाग का कब्जा है। यही नहीं, आदिवासियों की अपनी जन्मभूमि पर खनिज संसाधनों के उत्खनन (और अनियंत्रित दोहन) ने ऐतिहासिक अन्याय की इस बुनियाद को और अधिक गहरा कर दिया है।

वनाधिकार कानून का आना निश्चित ही ऐतिहासिक न्याय की दिशा में पहला क़दम रहा है। लेकिन भारत सरकार (आदिवासी मामलों का मंत्रालय, 2021) के आंकड़े कहते हैं कि लगभग 15 बरसों के बाद आज तक लगभग 20 फीसदी तथाकथित पात्र लोगों को ही उनके आधे-अधूरे वनाधिकार मिल सके हैं। खास है कि आजादी के 60 साल बाद ही सही, देश की संसद ने आदिवासियों पर सदियों से होते आ रहे ऐतिहासिक अन्याय को महसूस किया था बल्कि उसे दूर करने को सर्वसम्मति से वनाधिकार कानून 2006 भी बनाया था। वनाधिकार कानून का मकसद वन क्षेत्र में आदिवासियों के व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों को मान्यता प्रदान करना है। लेकिन ''हकों'' को मान्यता तो दूर, यदा-कदा अतिक्रमण आदि के नाम पर आदिवासियों को, वन महकमे द्वारा पुलिसिया जोर से जंगल से बेदखल करने की ही खबर देखने सुनने में आती हैं। इस जबरिया बेदखली और विस्थापन के पीछे सरकारों की भी ''मौन'' सहमति साफ है। 

मसलन मध्य प्रदेश में वनाधिकार कानून 2006 लागू है और इस कानून की निगरानी व क्रियान्वयन सुनिश्चित करने वाले वन विभाग की कमान प्रदेश के एक आदिवासी राजनेता के ही हाथों में है। यही नहीं, वनाधिकार अधिनियम की धारा 4 (5) के मुताबिक, वनाधिकार कानून के तहत किए गए मान्यता ''दावों'' के निराकरण तक किसी की भी बेदखली नहीं की जा सकती है। कोर्ट आदेश भी है कि कोरोना काल में किसी भी प्रकार की बेदखली प्रतिबंधित है। यह सभी तथ्य हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि वन मंत्री के गृह जिले खंडवा तक में इन नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और इस काम में प्रशासन कठघरे में है। खंडवा में पिछले दिनों पुलिस व वन महकमे के द्वारा 40 आदिवासी परिवारों के घर बुलडोजर से ढहा दिए गए और संपत्ति की लूट के साथ उन्हें जंगल में उनकी काबिज काश्त की भूमि से उजाड़ने का काम किया गया है। 



मध्यप्रदेश ही नहीं, बिहार हो या जम्मू उड़ीसा हो या उत्तर प्रदेश, पूरे देश में अतिक्रमण के नाम पर अवैध तरीके से आदिवासियों के घरों को तोड़ा जा रहा है। हाल ही में तेलंगाना के खम्मम जिले में 18 महिलाओं सहित 21 आदिवासी किसानों को जेल भेज दिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पुलिस हिरासत में लिए गए लोगों में दुध पीते बच्चों की मां भी शामिल हैं। इन आदिवासी किसानों को पोडु भूमि के मसले पर वन अधिकारियों के साथ गतिरोध के बाद हिरासत में लिया गया। पुलिस ने आदिवासी किसानों के खिलाफ आईपीसी की धारा 307, 353 और 158 आर/डब्ल्यू 149 के तहत मामला दर्ज किया है। यानि इन आदिवासियों पर हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जबकि मध्यप्रदेश की ही तरह यहां आदिवासी किसानों का कहना है कि पहाड़ी ढलानों आदि की जिस भूमि पर वो दशकों से खेती कर रहे हैं उसे वन विभाग ज़बरदस्ती छीन रहा है। खम्मम के येल्लाना नगर गांव के किसानों ने वन विभाग के अधिकारियों को इस कोशिश से रोका था जिसे लेकर कहासुनी हुई। राज्य प्रायोजित इस वृक्षारोपण अभियान की आड़ में वन विभाग द्वारा किसानों की कपास और ज्वार की फसल भी नष्ट कर दी गई। किसान वर्षों से पारंपरिक रूप से इस जमीन पर खेती कर रहे थे।

यही नहीं, कश्मीर में भी अतिक्रमण के नाम पर जंगलों में रहने वाले गुर्जरों और बाकरवाल बंजारों के घर तोड़े जा रहे हैं? हाल ही में श्रीनगर से 120 किलोमीटर दक्षिण में पहलगाम के लिदरू जंगलों में वन विभाग ने अवैध बताते हुए बंजारों के पत्थरों, मिट्टी और छप्पर से बने दर्जनों घरों को तोड़ दिया था। बीबीसी की एक खबर के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के जंगलों में सदियों से रहते रहे ये क़बायली लोग भी हैरान हैं कि आख़िर सरकार अब उनके घरों को क्यों तोड़ रही है। एक महिला रुबीना बताती हैं "जब बारिश होती है तो बिस्तर भीग जाते हैं। हम सारी रात जागते रहते हैं, दिन में जब बारिश रुकती है, तब ही सो पाते हैं। अब ऐसा लगता है कि इस ज़िंदग़ी से तो मौत ही बेहतर है। रूबीना के ससुर यूसुफ़ कहते हैं कि पिछले महीने जब वो अपने बेटे के साथ मज़दूरी करने शहर गए थे तब प्रशासन ने उनके मिट्टी के उस घर को तोड़ दिया जो उनके पिता ने 70 साल पहले बनाया था। वो कहते हैं, "ना कोई जानकारी दी और ना ही कुछ बताया, अचानक सब ख़त्म हो गया। हमारे घर में गायों के लिए भी एक बाड़ा था। अब बरसात के मौसम में हम कहां जाएंगे। कल जब बर्फ़ पड़ेगी तब क्या होगा। क्या हम इंसान नहीं हैं?

बीबीसी के अनुसार कुछ साल पहले केंद्र में सत्ताधारी बीजेपी ने कहा था कि अनुच्छेद 370 जम्मू-कश्मीर की क़बायली आबादी के विकास में बड़ी रुकावट है। यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि 2019 से पहले जम्मू-कश्मीर सरकार ने वन अधिकार क़ानून को लागू करने से इनकार कर दिया था। ये क़ानून कई सालों से देश भर में लागू है। इस क़ानून के तहत जंगलों में रह रहे गुज्जर और बकरवाल जनजातियों के लोगों के अधिकार सुरक्षित हैं। ऐसे में जब अनुच्छेद 370 को हटाया गया था तो कहा गया था कि इससे गुज्जर और बकरवाल समुदाय के लोगों को फ़ायदा मिलेगा लेकिन जम्मू में कुछ बीजेपी नेताओं ने जंगलों से मुसलमान जनजातियों को बाहर निकालने के अभियान को 'ज़मीन जिहाद' के ख़िलाफ़ उठाया गया क़दम बताया है।

लिदरू के ही रहने वाले एक नौजवान चौधरी मंज़ूर पोसवाल का जन्म मिट्टी के एक ऐसे ही घर में ही हुआ था। पोसवाल पहलगाम और आसपास के जंगलों में सदियों से रह रहे क़बायली परिवारों के अधिकारों के लिए काम करते हैं। वो कहते हैं, "हमें बताया गया था कि अनुच्छेद 370 हटाने से हमारा जीवन बदल जाएगा। इससे हमें अधिक अधिकार मिलेंगे। लेकिन हुआ ये है कि हमारे घरों को मलबा बना दिया गया है। क्या यही वो बदलाव है जिसका वादा किया गया था। जम्मू-कश्मीर में वन अधिकार क़ानून लागू हो चुका है। क़ानून में प्रावधान है कि यदि ये साबित भी हो जाता है कि किसी ने जंगल में अतिक्रमण कर अवैध घर बनाया है तब भी उसे वैकल्पिक आवास दिए बिना उसके घर को नहीं तोड़ा जा सकता है जिसमें लोग रह रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर प्रांत में जंगलों में रहने वाली क़बायली लोगों की तादाद क़रीब 18 लाख है, जिनमें से अधिकतर जंगल के बीचोबीच झोपड़ियां बना कर रहते हैं। मिट्टी के घरों को तोड़ने का काम महीनों से चल रहा है लेकिन इस साल सरकार ने जनजातीय आबादी के पास अखरोट के पेड़ों की भी गणना की है और स्थानीय आबादी को इनका इस्तेमाल करने से रोक दिया है। दो कमरों के मिट्टी के घर में अपने परिवार के दस सदस्यों के साथ रहने वाले मोहम्मद यूसुफ़ चौहान कहते हैं, एक ही झुग्गी में चार-पाँच परिवारों को रहना पड़ रहा है। जंगली जानवर और ख़राब मौसम का ख़तरा है। हमलोग कहां जाएंगे? ये लोग कहते हैं कि ये पेड़ भी हमारे नहीं हैं। हम बीते अस्सी सालों से इनकी फ़सल से थोड़ा बहुत कमा लेते थे लेकिन अब हमारा इन पर कोई अधिकार नहीं है। अभी भी कुछ मिट्टी के घर ऐसे हैं जो तोड़े नहीं गए हैं. लेकिन इनमें रह रहे लोगों के सिर पर भी डर की तलवार लटकी है।

इतने सब के बावजूद हैरत की बात यह है कि सरकार के पास पिछले 3 साल में विस्थापित हुए आदिवासियों की संख्या की जानकारी नहीं है।गुजरात से सांसद राजेश नारणभाई चुड़ासमा ने लोक सभा में जनजातीय मंत्रालय से यह सवाल किया था। चार बातें पूछी थी। पहली यह कि पिछले 3 सालों में विस्थापित हुए आदिवासियों या आदिवासी परिवारों की संख्या क्या है। दूसरी, राज्यवार कितने आदिवासी परिवार विस्थापित हुए हैं। तीसरा, 3 साल में जो आदिवासी विस्थापित हुए हैं उसका कारण क्या था। चौथी बात यह कि विस्थापित आदिवासियों की सहायता के लिए सरकारी उपबंध क्या है। 

जनजातीय कार्य राज्य मंत्री की तरफ़ से इस सवाल का काफ़ी विस्तार से जवाब दिया गया। लेकिन बात बस इतनी सी है कि उन्होंने इस सवाल के जवाब में जो काम की बात बताई वो इतनी सी है कि सरकार के पास पिछले 3 साल में विस्थापित हुए आदिवासियों की संख्या की जानकारी नहीं है। अब यह अपने आप में कमाल की बात है कि जब सरकार को यह पता ही नहीं है कि पिछले 3 साल में कितने आदिवासी और किस किस राज्य में विस्थापित हुए हैं, तो फिर जवाब के विस्तार में मंत्री जी ने बताया क्या है। आप सोचेंगे कि शायद मंत्री जी ने इस सवाल में पूछी गई बाक़ी बातों का जवाब दिया होगा। मसलन आदिवासी विस्थापन के कारण या फिर विस्थापित आदिवासियों को सरकारी मदद का ब्यौरा उन्होंने दिया होगा। जी नहीं आपका यह अंदाज़ा भी ग़लत है। 

जनजातीय कार्य राज्यमंत्री विश्वेश्वर टुडू ने अपने उत्तर के विस्तार में संसद को बताया कि ग्रामीण विकास मंत्रालय का भूमि संसाधन विभाग भूमि अधिग्रहण से निपटने वाला नोडल मंत्रालय है। आगे मंत्री जी बताते हैं ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जानकारी दी है कि केन्द्र या राज्य सरकारें 2013 के क़ानून के तहत भूमि अधिग्रहण करते हैं। इसके बाद मंत्री जी बताते हैं कि अनुसूचित जनजाति और परंपरागत रूप से जंगल में रहने वाले समुदायों को तब तक उनकी भूमि से नहीं हटाया जा सकता है जब तक कि मान्यता और सत्यापन का कार्य पूरा नहीं हो जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि आदिवासी इलाक़ों में ग्राम सभा के परामर्श के बिना लोगों को विस्थापित नहीं किया जा सकता है। उन्होंने फ़ॉरेस्ट राइट्स एक्ट 2006 का भी ज़िक्र अपने जवाब में किया है। बस जिस बात का ज़िक्र उनके जवाब में नहीं था, वो वही बात थी जो सांसद चूडासमा ने मंत्री से पूछी थी।

लेकिन अब तो बाड़ के ही खेत खाने वाली स्थिति है। मसलन वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की नोडल एजेंसी आदिम जाति कल्याण मंत्रालय ने ही आदिवासियों को वन विभाग के रहमो-करम पर छोड़ दिया है! यह भी तब जब, वनाधिकार कानून-2006 में आदिवासियों के साथ जारी ऐतिहासिक अन्याय के लिए वन विभाग को जिम्मेदार ठहराया गया है। इसके चलते ही (वनाधिकार) कानून में आदिवासी मंत्रालय को नोडल जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन अब वन अधिनियम-1927 में संशोधन के जरिये सरकार, आदिवासी मंत्रालय की जगह वन विभाग को नोडल एजेंसी बनाने का मसौदा लेकर आई है। पिछले दिनों दोनों मंत्रालयों के साझा संबोधन में मसौदे की मंशा जाहिर की गईं। यह मसौदा सामुदायिक वन प्रबंधन व गैर-इमारती वनोत्पादों के उपयोग में आदिवासी समुदायों की भागीदारी को सीमित करता है तथा नीति निर्धारण के क्षेत्र में वन मंत्रालय को महत्वपूर्ण स्थान देता है जो पूरी तरह से वनाधिकार कानून की भावना के ही खिलाफ है। 

पिछले माह 22 जून, 2021 को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने कंसल्टेंसी संगठनों को कठोर और औपनिवेशिक भारतीय वन अधिनियम-1927 में व्यापक संशोधन का मसौदा तैयार करने के लिए आमंत्रित किया है। इसी भारतीय वन अधिनियम 1927 (IFA) के माध्यम से औपनिवेशिक शासन यानी अंग्रेज सरकार ने वन संसाधनों पर अधिक से अधिक शक्ति हासिल करने की कोशिश की थी। अब इस नये मसौदे के माध्यम से मोदी सरकार उससे भी कहीं आगे जाकर अपने अधिकारों को मजबूत करना चाहती है। यह विधेयक भारतीय वन अधिनियम 1927 की जगह लेगा जो संयुक्त वन प्रबंधन समिति (JFMC) के माध्यम से 'वनों का प्रबंधन' फॉरेस्ट ब्यूरोक्रेसी को देता है। और ऐसे वनों को आरक्षित वन घोषित करने के लिए मुआवजे का भुगतान करके आदिवासियों के व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को खत्म करने की शक्ति भी देता है। मार्च 2019 में भी मोदी सरकार ने इस बाबत एक असफल प्रयास किया था।

2019 में भी वन मंत्रालय ने भारतीय वन अधिनियम-1927 में संशोधन का मसौदा प्रस्तुत किया था जिसका व्यापक विरोध और तीखी आलोचना हुई थी। इंडियन फॉरेस्ट (अमेंडमेंट) बिल 2019 में प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य वनाधिकार अधिनियम-2006 (FRA) के तहत वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों और वनवासियों को दिए गए अधिकारों पर फिर से राज्य सत्ता (वन विभाग) को स्थापित करना था! जो कि वनाधिकार कानून-2006 के उस प्रावधान का भी उल्लंघन है जो वन भूमि और वन संसाधनों पर ग्राम सभा के माध्यम से वनों के संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार वनवासी समुदायों को देता हैं। यही नहीं, वनाधिकार कानून में वन विभाग को मुंसिफ़ (सर्वोच्चता देने) बनाने वाला यह संशोधन वनवासियों के हकों को और कमजोर ही करेगा।

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