मुख्यमंत्री बदलने से खत्म हो जाएगा उत्तराखंड भाजपा का संकट?

Written by Navnish Kumar | Published on: March 10, 2021
उत्तराखंड में हफ्तों से जारी सियासी उठापटक के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मंगलवार शाम इस्तीफा दे दिया है। इसके बाद यह सियासी ड्रामा बुधवार को खत्म हो गया। पौड़ी लोकसभा सीट से सांसद तीरथ सिंह रावत को राज्य का नया मुख्यमंत्री चुना गया है। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ही तीरथ सिंह रावत का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए सुझाया था। आरएसएस के प्रचारक के तौर पर काम कर चुके तीरथ सिंह रावत आज शाम चार बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।



ऐसे में बड़ा सवाल  है कि 4 साल से उत्तराखंड की सरकार चला रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत को बदलकर नया चेहरा लाने से क्या बीजेपी का संकट खत्म हो जाएगा? क्या नीतियों के स्तर पर भी कोई बदलाव होगा और होगा तो क्या एक साल में धरातल पर उसके परिणाम  दिखने लगेंगे और लोगों को राहत मिलने का काम होगा? दरअसल, असल सवाल आम उत्तराखंडियों की नाराजगी का है?

खैर, पार्टी आलाकमान बहुत अच्छे से समझ गया था कि आने वाले समय में भाजपा को रावत के चेहरे से नुकसान हो सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि लॉकडाउन और कोरोना काल में परेशानियों का सामना करने के बाद से राज्य के लोगों में सीएम के खिलाफ काफी आक्रोश था। यहां के लोगों की नाराजगी का कारण पीएम मोदी या फिर भाजपा नहीं थी बल्कि लोग सीएम के व्यवहार, काम करने के तरीके व एक वर्ग को तरजीह देने से ज्यादा परेशान थे। वहीं, बेलगाम नौकरशाही भी बड़ा कारण बताया जा रहा है। पार्टी विधायकों व मंत्रियों तक का यह बड़ा आरोप था कि मुख्यमंत्री तो उनकी सुनते ही नहीं, अधिकारी भी नहीं सुनते हैं। हाल में गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने के ऐलान के बाद से भी उनके खिलाफ़ माहौल बना। सूत्रों की मानें तो उनके कैबिनेट सहयोगियों को भी ये फैसला बगावत की हद तक नाराज कर गया।

भले उन्हें हटाने के कारणों की बाबत दिल्ली को बताने के पीछे त्रिवेंद्र सिंह रावत का दर्द, बाहर छलक पड़ा हो लेकिन शुरुआती समय में बेहद धीमी गति से चलकर, अपने आपको स्थापित करने में लगे रहे त्रिवेंद्र रावत, चार साल तक आते-आते एक सधे हुए नेता के तौर पर जाने जाने लगे थे। मगर कहीं न कहीं उनका एरोगेंस (अहंकार) अपनी ही पार्टी में उनको अपनों से दूर करता चला गया और शायद यही वजह रही कि उनके अपने ही विधायकों ने दिल्ली में जाकर दस्तक दी और अपनी पीडा शीर्ष नेतृत्व को बयां की।   

अब जब त्रिवेंद्र सिंह रावत 'पूर्व' सीएम हो चुके हैं तो तीरथ सिंह रावत नए मुख्यमंत्री होंगे। हालांकि कई नाम नए मुख्यमंत्री के तौर पर लिए जा रहे थे। इनमें धन सिंह रावत का नाम था तो नैनीताल से सांसद अजय भट्ट जो हरीश रावत को जबरदस्त पटखनी देकर संसद में पहुंचे हैं। वहीं, दूसरी ओर अनिल बलूनी थे जो उत्तराखंड से राज्यसभा सांसद हैं और भाजपा नेतृत्व में अच्छी पकड़ रखते हैं। सतपाल महाराज का नाम भी सीएम की रेस में शामिल है। सतपाल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए हैं। पूर्व में केंद्रीय मंत्री रहे हैं, लेकिन मौजूदा समय में उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। वहीं छोटे कद के बड़े और गंभीर माने जाने वाले खांटी आरएसएस पृष्ठभूमि के नेता धन सिंह रावत का नाम भी सीएम की रेस में था। धन सिंह रावत जो पहली बार ही विधायक चुने गए हैं। दिल्ली और नागपुर दोनों के ही बेहद प्रिय और करीबी माने जाते हैं।

माना जा रहा था कि अगले साल प्रदेश में चुनाव होने हैं ऐसे में अगर अजय भट्ट को चेहरा बनाया जाता, तो सूबे का जातीय समीकरण बिगड़ सकता था। राज्य में हमेशा से दो बातों का ख्याल रखा गया है कि कुमाऊं और गढ़वाल में से एक तरफ से पार्टी अध्यक्ष और दूसरे को सत्ता की कमान। इसके अलावा जातीय समीकरण के लिहाज से एक ब्राह्मण और दूसरे ठाकुर समीकरण के जरिए जातीय संतुलन बनाए रखा जाता है। उत्तराखंड में भाजपा अध्यक्ष न केवल कुमाऊं मंडल से हैं बल्कि ब्राह्मण समुदाय से हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री भी उसी क्षेत्र से और ब्राह्मण समुदाय से चुना जाता, तो जातीय और क्षेत्रीय समीकरण पूरी तरह से बिगड़ जाते और गढ़वाल इलाके में खामियाजा उठाना पड़ सकता था।

ऐसा ही समीकरण अनिल बलूनी को लेकर भी था। वो गढ़वाल से आते हैं, लेकिन ब्राह्मण हैं। यहां जातीय समीकरण बिगड़ जाएगा कि बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री दोनों ही एक ही समुदाय से हो जाते। ऐसे में राजपूत वोट छिटकने का खतरा बढ़ सकता था। सतपाल महाराज के साथ कशमकश यह है कि वो ठाकुर हैं और गढ़वाल इलाके से आते हैं, लेकिन कांग्रेस से आए हुए हैं तो खांटी भाजपाई और आरएसएस दोनों ही उनके बारे में फैसला लेने में कई बार सोच सकते हैं। सूत्रों की मानें तो भाजपाई आज भी उन्हें स्वीकार नहीं कर पाए हैं। जिसकी टीस गाहे बगाहे सतपाल महाराज दबी जुबान से कहते रहे हैं।

इसलिए धन सिंह रावत पर दांव खेलने की उम्मीद जताई जा रही थी। वह जातीय और क्षेत्रीय समीकरण दोनों में फिट बैठते हैं। बेहद गंभीर व जमीनी नेता माने जाते हैं। किसी तरह से फैसले लेने में देर नहीं करते और शासन और प्रशासन पर कैसे पकड़ रखी जाए इसे बखूबी समझते हैं। उनकी सियासी राह में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वो पहली बार के विधायक हैं। 

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी मान लिया है कि मौजूदा सरकार कुछ कर नहीं सकी है। ऐसे में अब कोई फर्क नहीं पड़ता कि भाजपा किसे 'मुख्यमंत्री' लाती है, लेकिन 2022 में सत्ता में नहीं लौटेंगे।

खास यह है कि उत्तराखंड में नित्यानंद स्वामी हों या फिर भगत सिंह कोश्यारी, भुवन सिंह खण्डूरी, रमेश पोखरियाल निशंक हों या फिर अब त्रिवेंद्र सिंह रावत, कोई भी सत्ता में 5 साल कार्यकाल पूरा नहीं कर सका है। यही नहीं, पार्टी की सत्ता में वापसी भी नहीं करा पाया है।

उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी के नित्यानंद स्वामी बने थे। लेकिन एक साल भी वो कुर्सी पर नहीं रह सके। नित्यानंद के खिलाफ बीजेपी नेताओं ने मोर्चा खोल दिया था जिसके बाद नित्यानंद को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। नित्यानंद के इस्तीफा देने के बाद बीजेपी ने भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन चार माह बाद ही चुनाव आ गए और सरकार बदल गई। कोश्यारी की अगुवाई में बीजेपी राज्य की सत्ता में वापसी नहीं कर सकी। 2007 में फिर विधानसभा चुनाव हुए जिसमें भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटी। 

2007 से 2012 तक भी भाजपा में तीन मुख्यमंत्री बदले। पहले भुवन चन्द्र खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया गया। खंडूरी मुख्यमंत्री के पद पर लगभग पौने दो साल ही रह सके। इसके बाद भाजपा आलाकमान ने खंडूरी की जगह रमेश पोखरियाल निशंक को सत्ता की कमान सौंप दी। लगभग सवा दो साल बाद ही विरोध के चलते निशंक को भी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। 2011 में एक बार फिर भुवन चन्द्र खंडूरी दोबारा मुख्यमंत्री बने लेकिन 2012 में एक बार फिर राज्य में विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मिली हार के बाद खंडूरी को 13 मार्च 2012 को कुर्सी छोड़नी पड़ गई। 2017 में त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने थे। अब सवाल है कि क्या नए मुख्यमंत्री अगले साल होने वाले चुनाव में पार्टी को सत्ता में वापस ला पाएंगे?

Related:
संसद द्वारा एकमत से पारित वनाधिकार कानून के बाद भी आदिवासियों, वनाश्रितों के साथ अन्याय क्यों?
उत्तराखंड में विकास के नाम पर विनाश करती इन 'परियोजनाओं' को रोको
उत्तराखंड: अरसे बाद वन टांगिया गांवों की सुध लेने पहुंची सरकार
उत्तराखंड: पुलिस की आलोचना करने पर ट्रेड यूनियन के नेता के खिलाफ 'राजद्रोह' का मुकदमा

बाकी ख़बरें