नागरिकता पर वर्षों की जद्दोजहद का अंत, सुकुमार बैश्य को मिला न्याय

Written by | Published on: August 30, 2025
न्यायाधिकरण ने पिता के 1956 के पंजीकरण और 1971 से पहले के दस्तावेज़ी सबूतों को स्वीकार किया। CJP की कानूनी टीम ने वर्षों की अनिश्चितता के बाद न्याय दिलाने में मदद की।



एक बड़ी कानूनी जीत

पाटकाटा नंबर 1, बोंगाईगांव के रहने वाले 64 वर्षीय बंगाली भाषी सुकुमार बैश्य को बोंगाईगांव के विदेशी न्यायाधिकरण (एफटी) नंबर 1 ने भारतीय नागरिक घोषित कर दिया है। यह फैसला 7 फरवरी 2025 को आया और उनके लिए यह एक लंबी और तकलीफ़भरी लड़ाई का अंत था। इस जीत में सिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) की अहम भूमिका रही, जिन्होंने लगातार उन्हें कानूनी और ज़मीनी स्तर पर सहायता प्रदान की।

बेघर होने और अत्याचार से भरा सफर

1963 में पाटकाटा नंबर 1 में जन्मे सुकुमार बैश्य, स्व. सहदेव बैश्य के बेटे हैं। उनके पिता ने 1952–53 में धार्मिक उत्पीड़न के कारण पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के बिन्नाटी गांव से असम में शरण ली थी। बाद में, 24 दिसंबर 1956 को उन्हें भारतीय नागरिकता का पंजीकरण प्रमाणपत्र मिला।

सुकुमार की ज़िंदगी असम के उथल-पुथल भरे राजनीतिक इतिहास से गहराई से जुड़ी रही है। 1983 के असम आंदोलन के दौरान उनका घर जला दिया गया और सारी संपत्ति नष्ट हो गई। भारत में उनके लंबे समय से मौजूद दस्तावेज़ों और संबंधों के बावजूद उन पर यह आरोप लगाया गया कि वे एक विदेशी हैं, जो 25 मार्च 1971 के बाद असम में दाखिल हुए।

मामला और राज्य के आरोप

यह मामला विदेशी न्यायाधिकरण आदेश, 1964 के नियम 2(1) के तहत एक संदर्भ से शुरू हुआ। आरोप था कि वे “विशिष्ट क्षेत्र से आए विदेशी” हैं, जो 1971 के बाद असम में आए।

सुकुमार ने इन आरोपों का पुरजोर विरोध किया और स्पष्ट रूप से कहा:

● वह जन्म से भारतीय हैं और उनके पिता 1956 से पंजीकृत भारतीय नागरिक थे।

● जांच अधिकारी (IO) कभी उनके घर नहीं आए, न ही उन्होंने सुकुमार या उनके गवाहों से पूछताछ की और एक झूठी व बिना जांच की गई रिपोर्ट दाखिल कर दी।

● मामला 2004 में दर्ज हुआ था, लेकिन नोटिस फरवरी 2021 में दिया गया—यानी 17 साल की देरी से। सुकुमार ने दलील दी कि इतनी देर बाद नोटिस मिलने के कारण यह मामला समय-सीमा (limitation) से बाहर है।

दस्तावेज़ी सबूत

CJP की कानूनी मदद से, सुकुमार ने अपनी भारतीय नागरिकता और अपने पिता से संबंध साबित करने वाले दस प्रमुख दस्तावेज़ पेश किए, जिनमें शामिल थे:

1. 1956 का नागरिकता पंजीकरण प्रमाणपत्र।

2. 1966 की मतदाता सूची (पिता का नाम दर्ज)।

3. 1971 की मतदाता सूची (कट-ऑफ से पहले दर्ज)।

4. पिता के नाम की 1956 की सेल डीड।

5. 1988 का जमाबंदी रिकॉर्ड (पिता की मृत्यु के बाद ज़मीन उत्तराधिकार में मिली)।

6. 1997 की मतदाता सूची (सुकुमार और उनकी पत्नी का नाम दर्ज)।

7. 2005 की मतदाता सूची (पत्नी रेणु बाला और अंजलि बाला दोनों दर्ज)।

8. राशन कार्ड (पिता और सुकुमार का नाम)।

9. पंचायत अध्यक्ष का लिंक प्रमाणपत्र।

10. 1950 के दशक से भूमि संबंधी अतिरिक्त रिकॉर्ड।

न्यायाधिकरण का तर्क और निष्कर्ष

न्यायाधिकरण ने दो मुख्य मुद्दे तय किए:

1. क्या सहदेव बैश्य भारत के नागरिक थे।

2. क्या सुकुमार बैश्य उनके बेटे थे।

पितृत्व पर:

जमाबंदी रिकॉर्ड, 1997 की मतदाता सूची और छोटे भाई मनिंद्र बैश्य की गवाही से साबित हो गया कि सुकुमार वास्तव में सहदेव बैश्य के बेटे हैं।

पिता की नागरिकता पर:

1956 का पंजीकरण प्रमाणपत्र और 1971 से पहले की मतदाता सूचियां इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि सहदेव 1956 से ही भारत के पंजीकृत नागरिक थे। सेल डीड और भूमि अभिलेखों ने लंबे समय से निवास और स्वामित्व का भी प्रमाण दिया।

अंतिम निर्णय:

न्यायाधिकरण ने माना कि सुकुमार ने विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के तहत कानूनी ज़िम्मेदारी पूरी कर दी है और साबित कर दिया कि वह विदेशी नहीं, बल्कि जन्म से भारतीय नागरिक हैं। इसलिए उन पर लगाए गए सभी आरोप ख़ारिज कर दिए गए।

मानवीय असर और प्रतिक्रिया

जब CJP की टीम—देवान अब्दुर रहीम, नंदा घोष, सुद्रासन दास, तपश चक्रवर्ती और असीकुल हुसैन—फैसले की कॉपी लेकर उनके घर पहुँची, तो सुकुमार भावुक हो उठे और CJP को धन्यवाद दिया।

उनके पड़ोसी दुलाल बैश्य (80 वर्ष) ने कहा, “मैंने असम आंदोलन और उसके भयावह दृश्य देखे हैं। दशकों से यहां सांप्रदायिक झगड़े होते आए हैं। हाल ही में मेरा एक रिश्तेदार नॉर्थ बंगाल चला गया, लेकिन सरकार की नागरिकता, बेदखली और ज़मीन संबंधी नीतियों को देखकर मुझे अपने भविष्य को लेकर डर लगता है। एक आम आदमी के तौर पर, मुझे चिंता है कि इस राज्य में कैसे जियूँगा।”

व्यापक अन्याय का पैटर्न

सुकुमार का मामला अकेला नहीं है। आज़ादी के 78 साल बाद भी असम में बंगाली भाषी हिंदू और मुस्लिम—खासकर गरीब और वंचित वर्ग—दशकों से यहां रहने के बावजूद बार-बार अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं।

यह मामला स्पष्ट रूप से बताता है कि:

● नागरिकता तय करने की प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए।

● मनमानी जांच और झूठी रिपोर्टों से लोगों को बचाया जाना चाहिए।

● प्रशासनिक प्रक्रियाएं कभी भी कमजोर समुदायों को बाहर करने का साधन नहीं बननी चाहिए।

पूरा आदेश आप यहां पढ़ा जा सकता है।



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