ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजराइल हमले और भारत की संप्रभुता पर खतरे की चिंता को लेकर साझा संस्कृति मंच ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा

Written by sabrang india | Published on: March 9, 2026
वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में अमेरिका तथा इज़राइल द्वारा पश्चिम एशिया में की जा रही सैन्य कार्रवाइयां, विशेषकर ईरान के संदर्भ में, अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा हैं।



ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल के हमले के विरोध में साझा संस्कृति मंच के आह्वान पर वाराणसी के अंबेडकर पार्क में मौन उपवास और धरना आयोजित किया गया तथा राष्ट्रपति को संबोधित एक ज्ञापन सौंपा गया। इस आयोजन में शहर के सांस्कृतिक और सामाजिक संगठनों तथा नागरिकों ने हिस्सा लिया। इस दौरान लोग अपने हाथों में तख्तियां लिए हुए थे, जिन पर लिखा था— “नेतन्याहु, बच्चों की हत्या बंद करो” और “युद्ध नहीं, शांति चाहिए”।

इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में अमेरिका तथा इज़राइल द्वारा पश्चिम एशिया में की जा रही सैन्य कार्रवाइयां, विशेषकर ईरान के संदर्भ में, अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा हैं। इसी प्रकार वेनेज़ुएला पर एकतरफा सैन्य हस्तक्षेप तथा राजनीतिक दबाव संप्रभु समानता और संयुक्त राष्ट्र चार्टर की मूल भावना के खिलाफ है। साथ ही ग्रीनलैंड पर कब्जा या खरीद, पनामा नहर पर पूर्ण नियंत्रण, कनाडा को “51वां राज्य” बनाने तथा गाजा को “अमेरिकी रिविएरा” बनाने जैसी खुली धमकियां भी अमेरिकी साम्राज्यवाद का स्पष्ट हिस्सा हैं।



एक वक्ता ने कहा कि भारत पर हालिया दबाव—जैसे ट्रंप द्वारा रूसी तेल आयात रोकने की मांग, व्यापार समझौते के लिए टैरिफ की धमकी और बार-बार यह दावा करना कि उन्होंने 200% टैरिफ की धमकी देकर भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रोका—कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इसी साम्राज्यवादी श्रृंखला का हिस्सा हैं। इस दबाव के सामने भारत सरकार का कमजोर रुख और समझौते हमारी स्वतंत्र विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक संप्रभुता तथा राष्ट्रीय गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।



उन्होंने कहा कि भारत का राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम साम्राज्यवाद के खिलाफ अटूट संघर्ष और गहन चिंतन का अमर प्रतीक रहा है। इस चिंतन और संघर्ष ने न केवल भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त किया, बल्कि अफ्रीका, एशिया और विश्व के 50 से अधिक देशों को स्वतंत्रता की प्रेरणा भी दी। आजादी के बाद भारत का संविधान भी, विशेष रूप से अनुच्छेद 51, राज्य को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने, राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानजनक संबंध बनाए रखने तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति आदर विकसित करने का स्पष्ट निर्देश देता है। भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से अहस्तक्षेप, संप्रभुता के सम्मान और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धांतों पर अडिग रही है।



वक्ताओं ने कहा कि ऐसी स्थिति में यह अपेक्षित है कि भारत स्पष्ट शब्दों में किसी भी सैन्य आक्रामकता और वैश्विक साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ अपनी स्थिति व्यक्त करे। नागरिक समाज के लोगों ने इस दौरान राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए निवेदन किया कि आप अपने संवैधानिक दायित्वों के तहत भारत सरकार को प्रेरित करें कि भारत—

अमेरिका-इज़राइल की सैन्य कार्रवाइयों तथा ट्रंप की साम्राज्यवादी नीतियों पर स्पष्ट और सिद्धांतनिष्ठ प्रतिक्रिया दे;

संसद में विशेष सत्र बुलाकर इन वैश्विक खतरों पर राष्ट्रीय सहमति बनाए।



उन्होंने कहा कि भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा उसकी स्वतंत्र, संतुलित और नैतिक विदेश नीति में निहित है। वर्तमान वैश्विक संकट में एक स्पष्ट, साहसी और सिद्धांतनिष्ठ रुख अपनाना न केवल अंतरराष्ट्रीय शांति और न्याय के हित में होगा, बल्कि हमारे संवैधानिक आदर्शों के अनुरूप भी होगा और देश के नागरिकों में राष्ट्रीय संप्रभुता को लेकर बढ़ती चिंता को भी कम करेगा।

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