पंजाब में हाल ही में जो "पवित्र धर्मग्रंथों के खिलाफ अपराध रोकने वाला बिल, 2025" (PPOHS एक्ट) समिति को भेजा गया है, उस पर कुछ पूर्व अफसरों के एक समूह ने अपनी राय दी है। उन्होंने विस्तार से समझाते हुए कहा है कि ये कानून अपने आप में संविधान के खिलाफ है और इसकी भाषा इतनी ढीली-ढाली है कि इसका आसानी से गलत इस्तेमाल हो सकता है।

फोटो साभार : स्क्रॉल
पूर्व सिविल सेवकों का एक मंच कंस्टिच्यूशनल कंडक्ट ग्रुप (Constitutional Conduct Group – CCG) ने खुले पत्राचार में कहा है कि पंजाब सरकार द्वारा पेश किया गया "पवित्र ग्रंथों के खिलाफ अपराध रोकने वाला बिल 2025", जिसे अभी जांच के लिए एक कमेटी को भेजा गया है, संविधान के खिलाफ है। करीब अस्सी पूर्व अफसरों द्वारा साइन की गई पंजाब पवित्र ग्रंथों के विरुद्ध अपराध रोकथाम विधेयक, 2025 (PPOHS एक्ट) पर एक लंबी और तर्कपूर्ण विश्लेषण में इस ग्रुप ने बताया है कि यह प्रस्तावित कानून न सिर्फ संविधान के खिलाफ है, बल्कि इसकी ढीली-ढाली परिभाषाओं के कारण इसका गलत इस्तेमाल होने की भी पूरी संभावना है।
यह प्रस्तावित कानून हाल ही में राज्य विधानसभा द्वारा एक कमेटी को भेजा गया है। CCG की इस पत्राचार में कानून से जुड़ी कई अहम बातें उठाई गई हैं। साथ ही इसमें यह भी याद दिलाया गया है कि इससे पहले भी पंजाब सरकार ने 2015 और 2018 में पवित्र ग्रंथों की बेअदबी से जुड़ी धारा 295A (जो अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 में धारा 299 के रूप में शामिल है) में बदलाव की कोशिश की थी। लेकिन दोनों बार ये प्रयास नाकाम रहे क्योंकि प्रस्तावित संशोधन संविधान की कसौटी पर खरे नहीं उतरे।
इस खुले पत्र का पूरा टेक्स्ट यहां पढ़ा जा सकता है:
सेवा में
अध्यक्ष महोदय,
“पंजाब पवित्र धर्मग्रंथों के खिलाफ अपराधों की रोकथाम अधिनियम, 2025” के प्रवर समिति,
पंजाब विधान सभा,
चंडीगढ़-160001
विषय: “पंजाब पवित्र धर्मग्रंथों के खिलाफ अपराधों की रोकथाम अधिनियम, 2025” पर आपत्तियां।
प्रिय अध्यक्ष महोदय,
हम, हस्ताक्षर करने वाले, कंस्टिच्यूशनल कंडक्ट ग्रुप के सदस्य हैं। यह समूह अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्रीय सिविल सेवाओं के पूर्व अधिकारियों का एक साझा मंच है। हमारा यह समूह किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं है और हमारे गणराज्य के मूलभूत सिद्धांतों को बढ़ावा देने तथा संवैधानिक आचरण के मानदंडों का पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। हम संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और उदार मूल्यों के लगातार हो रहे गिरावट से बेहद चिंतित हैं और इसी कारण हम यह पत्र लिख रहे हैं, ताकि पंजाब पवित्र ग्रंथों के विरुद्ध अपराध रोकथाम अधिनियम, 2025 (PPOHS Act) को लेकर अपनी गहरी चिंता सार्वजनिक रूप से दर्ज करा सकें। यह विधेयक फिलहाल समिति को विचार के लिए भेजा गया है।
यहां यह याद रखना उचित होगा कि इससे पहले दो मौकों पर यानी 2015 और 2018 में पंजाब सरकार ने पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता, 1860 (जिसे अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 299 के रूप में पुनः अधिनियमित किया गया है) की धारा 295ए में निहित बेअदबी से संबंधित प्रावधान में संशोधन करने का प्रयास किया था। दोनों ही प्रयास असफल रहे क्योंकि प्रस्तावित संशोधन संवैधानिकता की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए।
3 सितंबर, 2018 को पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री को लिखे एक खुले पत्र में, सीसीजी ने संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रताओं के साथ असंगति के आधार पर 2018 के संशोधन का कड़ा विरोध किया था। पत्र में इसके दुरुपयोग और राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने की संभावना का जिक्र किया गया था। ये आपत्तियां विचाराधीन प्रस्ताव पर भी समान रूप से लागू होती हैं।
हमारा मानना है कि पंजाब सरकार द्वारा बीएनएस की धारा 299 के पूरक के रूप में एक विशेष कानून बनाने का कदम भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक आधार पर हमला है। "पवित्र धर्मग्रंथ" और "अपराधों" की ढीली और व्यापक रूप से गढ़ी गई परिभाषाओं को अपनाकर, यह मसौदा विधेयक आपराधिक न्याय के बुनियादी न्यायिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार कर देता है। एक संवैधानिक लोकतंत्र में, जहां कठोर सजाएं जैसे आजन्म कारावास या भारी जुर्माना निर्धारित की जाती हैं, वहां यह अनिवार्य होता है कि कानून में दोषसिद्ध मानसिक स्थिति (mens rea) यानी अपराध करने की मंशा को स्पष्ट रूप से स्थापित किया जाए। लेकिन यह प्रस्तावित कानून इस जरूरी सिद्धांत को पूरी तरह नजरअंदाज करता है। यह धार्मिक ग्रंथों से जुड़ी अनजाने में या ईमानदारी से की गई कार्रवाइयों को भी अपराध मानते हुए आपराधिक दायित्व तय करता है। इस तरह का कानून आपराधिक मामलों में "सख्त दायित्व" (strict liability) थोप देगा जो कि न्यायिक प्रक्रिया की मूल भावना के खिलाफ है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से भी मेल नहीं खाता।
आपराधिक कानून में सख्त दायित्व (strict liability) की अवधारणा को शामिल करना उस बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है जिसके तहत दंडात्मक कार्रवाई केवल जानबूझकर किए गए कृत्यों के लिए ही होनी चाहिए। ऐसा करने से यह प्रस्तावित कानून उन अभिव्यक्तियों को भी आपराधिक बना सकता है जो संविधान द्वारा संरक्षित हैं, जिससे लोगों की वैध गतिविधियों पर डर और रोक पैदा होगी। इसका नतीजा यह होगा कि कानून का राज कमजोर होकर दमन का उपकरण बन जाएगा।
मूल रूप से, हमारे प्रस्तावित कानून के विरोध के आधार निम्नलिखित हैं:
● धार्मिक बेअदबी और अपशब्दों के खिलाफ कठोर कानून हमारे जैसे धर्मनिरपेक्ष शासन की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत हैं। यह कानून धर्म की भूमिका को राज्य के मामलों में सीमित करने के बजाय इसे और बढ़ावा देगा। साथ ही, यह धार्मिक संप्रदायवाद को बढ़ावा देने और विभिन्न प्रकार के धार्मिक उग्रवादियों को सशक्त करने का काम करेगा।
● ईशनिंदा कानून संविधान में निहित अभिव्यक्ति और विचार की स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार को खतरे में डालते हैं। फ्री स्पीच पर रोक लगाने के अलावा, ये कानून किसी भी व्यक्ति को, जो यह दावा करता है कि उसकी भावनाएं आहत हुई हैं, निराधार और दुर्भावनापूर्ण मुकदमे दर्ज कराने का अवसर प्रदान करते हैं। ये कानून धार्मिक ग्रंथों पर गंभीर शोध और उनके नए सिरे से विश्लेषण को हतोत्साहित करते हैं, जिससे धार्मिक कट्टरता की पकड़ और मजबूत होती है। इसके अलावा, ऐसे कानून जो अभिव्यक्ति और विश्वास की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास करते हैं, वे और ज्यादा कठोर कानूनों की मांग को जन्म देते हैं। यह देखा गया है कि जहां कहीं भी अपवित्रता को एक बड़ा अपराध बना दिया गया है, वहां पर “असहिष्णुता और दंड से मुक्ति का वातावरण पनपा है, और इससे मानवाधिकारों का बड़ा उल्लंघन हुआ है।” (फ़्रीडम हाउस, 2010)
● सीमापार और अन्य धर्मशासित देशों में ईशनिंदा कानूनों के कार्यान्वयन का अनुभव यह दर्शाता है कि इनका इस्तेमाल अक्सर धार्मिक और अन्य अल्पसंख्यकों तथा कमजोर वर्गों के खिलाफ उन्हें भयभीत करने, दबाने और व्यक्तिगत अथवा राजनीतिक दुश्मनी निकालने के उद्देश्य से किया जाता है। ऐसे कानूनों के कारण सांप्रदायिक तनाव बढ़ने का खतरा स्पष्ट रूप से उन राज्यों में ज्यादा होता है, जैसे पंजाब, जहां स्थापित धार्मिक रूढ़िवाद द्वारा विधर्मी माने जाने वाले पंथों का अनुसरण दलित समुदायों में व्यापक रूप से किया जाता है।
● बीएनएस (पूर्व में आईपीसी) में मौजूद प्रावधान धर्म और धार्मिक ग्रंथों के अपमान से निपटने के लिए पूरी तरह पर्याप्त हैं। ऐसे कृत्यों की घटनाओं को केवल दंड की कठोरता बढ़ाकर नहीं रोका जा सकता। इन पर प्रभावी रोक तभी संभव है जब मुकदमे और सजा की प्रक्रिया सुनिश्चित, त्वरित और निर्णायक हो और यह एक सक्षम आपराधिक न्याय प्रणाली तथा राजनीतिक व प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।
● प्रस्तावित विधेयक कानूनी दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है। यह खराब तरीके से मसौदा तैयार किया गया है: ‘अपवित्रता’ (sacrilege) शब्द की कोई परिभाषा नहीं दी गई है, और ‘पवित्र ग्रंथों’ की परिभाषा भी अस्पष्ट है, जिसमें केवल इतना कहा गया है कि ये वे ग्रंथ हैं जिन्हें संबंधित धार्मिक समुदायों द्वारा पवित्र माना जाता है। केवल चार प्रमुख धर्मों के धार्मिक ग्रंथों को सूचीबद्ध करने का औचित्य स्पष्ट नहीं है और समझ से परे है। विशेष रूप से हिंदू धर्म के संदर्भ में, केवल एक ग्रंथ का उल्लेख किया गया है, जबकि हिंदुओं द्वारा वेदों से लेकर कई अन्य ग्रंथों को पवित्र माना जाता है।
● यह प्रस्तावित संशोधन उम्र भर जेल का प्रावधान करके धार्मिक अपमान (sacrilege) को एक गंभीर अपराध बना देता है। यह अत्यधिक और असंगत है, खासकर सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय के संदर्भ में जो धारा 295-ए भारतीय दंड संहिता (IPC) पर दिया गया था (रामजीलाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, AIR 1957 SC 620)। इस निर्णय में कहा गया था कि अधिकतम 4 वर्ष की सजा देने वाली यह धारा केवल धर्म के प्रति गंभीर और बेहद अपमान की स्थिति में ही लागू हो सकती है।
● यह स्पष्ट है कि ऐसा कानून, जिसके परिणामों पर ठीक से विचार नहीं किया गया हो, जिसमें यह स्पष्ट रूप से परिभाषित न किया गया हो कि अपराध क्या है, और जिसकी व्याख्या कई तरीकों से की जा सकती हो- निश्चित रूप से उसे स्वार्थी तत्व अपने राजनीतिक या संकीर्ण हितों के लिए इस्तेमाल करेंगे और इससे पुलिस दमन का खतरा और बढ़ जाएगा।
● अल्पकालिक राजनीतिक स्वार्थों के लिए विभिन्न धर्मों की अतिवादी भावनाओं को भड़काने के हमारे पिछले पापों की भारी कीमत देश पहले ही चुका चुका है। इससे आज ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जहां समावेशी, बहुलवादी और उदार भारत और भारतीयता का विचार ही खतरे में पड़ गया है। सांप्रदायिक और अनुदार विचारों और विचारधाराओं के सशक्तीकरण के परिणामस्वरूप अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है और सामाजिक दुश्मनी में भारी वृद्धि हुई है। समय की मांग है कि सभी जिम्मेदार हितधारक सभी प्रकार के धार्मिक कट्टरपंथियों को मुहैया कराई जा रही जगह को कम करने के लिए काम करें, न कि उनके लिए और जगह खोलें।
मौजूदा समय में, जब हमारे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बनाए रखने की आवश्यकता पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है, हम ईमानदारी से उम्मीद करते हैं कि विधानमंडल उन मूल्यों के साथ खड़ा रहेगा और माननीय समिति से विधेयक को पूरी तरह से वापस लेने की सिफारिश करने का आग्रह करेगा।
सत्यमेव जयते
कंस्टिच्यूशनल कंडक्ट ग्रुप (79 हस्ताक्षरकर्ता, नीचे दिए गए हैं)
1. तलमीज़ अहमद -आईएफएस (सेवानिवृत्त) - सऊदी अरब, ओमान और यूएई में पूर्व राजदूत
2. आनंद अर्नी - आरएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व विशेष सचिव, कैबिनेट सचिवालय, भारत सरकार
3. अरुणा बागची - आईएएस (सेवानिवृत्त)- पूर्व संयुक्त सचिव, खान मंत्रालय, भारत सरकार
4. जे.एल. बजाज - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अध्यक्ष, प्रशासनिक सुधार और विकेंद्रीकरण आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार
5. जी. बालचंद्रन -आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, पश्चिम बंगाल सरकार
6. संदीप बागची - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रधान सचिव, महाराष्ट्र सरकार
7. वप्पला बालचंद्रन -आईपीएस (सेवानिवृत्त) -पूर्व विशेष सचिव, कैबिनेट सचिवालय, भारत सरकार
8. सुशांत बलिगा - इंजीनियरिंग सर्विसेज (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक, केंद्रीय पीडब्ल्यूडी, भारत सरकार
9. चंद्रशेखर बालकृष्णन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, कोयला, भारत सरकार
10. राणा बनर्जी -आरएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व विशेष सचिव, कैबिनेट सचिवालय, भारत सरकार
11. शरद बेहर - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व मुख्य सचिव, मध्य प्रदेश सरकार
12. मधु भादुड़ी - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - पुर्तगाल में पूर्व राजदूत
13. प्रदीप भट्टाचार्य - आईएएस (सेवानिवृत्त) -पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, विकास एवं योजना और प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान, पश्चिम बंगाल सरकार
14. नूतन गुहा बिस्वास - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सदस्य, पुलिस शिकायत प्राधिकरण, दिल्ली सरकार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र
15. मीरान सी बोरवणकर - आईपीएस (सेवानिवृत्त) -पूर्व डीजीपी, पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो, भारत सरकार
16. रवि बुद्धिराजा - आईएएस (सेवानिवृत्त) -पूर्व अध्यक्ष, जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट, भारत सरकार
17. आर. चंद्रमोहन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रमुख सचिव, परिवहन एवं शहरी विकास, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार
18. कल्याणी चौधरी - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, पश्चिम बंगाल सरकार
19. गुरजीत सिंह चीमा - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व वित्त आयुक्त (राजस्व), पंजाब सरकार
20. एफ.टी.आर. कोलासो - आईपीएस (सेवानिवृत्त)- पूर्व पुलिस महानिदेशक, कर्नाटक सरकार और पूर्व पुलिस महानिदेशक, जम्मू-कश्मीर सरकार
21. विभा पुरी दास- आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार
22. पी.आर. दासगुप्ता - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अध्यक्ष, भारतीय खाद्य निगम, भारत सरकार
23. प्रदीप के. देब - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, खेल विभाग, भारत सरकार
24. नितिन देसाई -पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार
25. एम.जी. देवसहायम - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, हरियाणा सरकार
26. किरण ढींगरा - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, कपड़ा मंत्रालय, भारत सरकार
27. ए.एस. दुलत - आईपीएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व ओएसडी, कश्मीर, प्रधानमंत्री कार्यालय, भारत सरकार
28. के.पी. फैबियन - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - इटली में पूर्व राजदूत
29. सुरेश के. गोयल - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व महानिदेशक, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, भारत सरकार
30. एच.एस. गुजराल - आईएफओएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक, सरकार पंजाब
31. मीना गुप्ता - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार
32. रवि वीरा गुप्ता - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व डिप्टी गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक
33. रशीदा हुसैन - आईआरएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व महानिदेशक, राष्ट्रीय सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क एवं नारकोटिक्स अकादमी
34. सिराज हुसैन - आईएएस (सेवानिवृत्त)- पूर्व सचिव, कृषि विभाग, भारत सरकार
35. कमल जसवाल - आईएएस (सेवानिवृत्त)- पूर्व सचिव, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार
36. नैनी जयसीलन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, अंतर-राज्यीय परिषद, भारत सरकार
37. नजीब जंग - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व उपराज्यपाल, दिल्ली
38. विनोद सी. खन्ना - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त सचिव, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार
39. गीता कृपलानी - आईआरएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सदस्य, निपटान आयोग, भारत सरकार
40. बृजेश कुमार - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार
41. सुधीर कुमार - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सदस्य, केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण
42. सुबोध लाल - आईपीओएस (इस्तीफा) - पूर्व उप महानिदेशक, संचार मंत्रालय, भारत सरकार
43. हर्ष मंदर - आईएएस (सेवानिवृत्त) - मध्य प्रदेश सरकार
44. अमिताभ माथुर - आईपीएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व विशेष सचिव, कैबिनेट सचिवालय, भारत सरकार
45. अदिति मेहता - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, राजस्थान सरकार
46. शिवशंकर मेनन - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व विदेश सचिव और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार
47. अविनाश मोहनाने - आईपीएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व पुलिस महानिदेशक, सिक्किम सरकार
48. सुधांशु मोहंती - आईडीएएस (सेवानिवृत्त)- पूर्व वित्तीय सलाहकार (रक्षा सेवाएँ), रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार
49. अनूप मुखर्जी - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व मुख्य सचिव, बिहार सरकार
50. देब मुखर्जी - आईएफएस (सेवानिवृत्त)- बांग्लादेश में पूर्व उच्चायुक्त और नेपाल में पूर्व राजदूत
51. रुचिरा मुखर्जी - आईपी एंड टीएएफएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सलाहकार (वित्त), दूरसंचार आयोग, भारत सरकार
52. शिव शंकर मुखर्जी - आईएफएस (सेवानिवृत्त) -यूनाइटेड किंगडम में पूर्व उच्चायुक्त
53. गौतम मुखोपाध्याय - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - म्यांमार में पूर्व राजदूत
54. नागलसामी - आईए एंड एएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रधान महालेखाकार, तमिलनाडु और केरल
55. शोभा नंबिसन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रधान सचिव (योजना), कर्नाटक सरकार
56. अमिताभ पांडे - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, अंतर-राज्यीय परिषद, भारत सरकार
57. टी.आर. रघुनंदन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व संयुक्त सचिव, पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार
58. एन.के. रघुपति - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अध्यक्ष, कर्मचारी चयन आयोग, भारत सरकार
59. वी. रमानी - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व महानिदेशक, यशदा, महाराष्ट्र सरकार
60. पी.वी. रमेश - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री
61. एम.वाई. राव - आईएएस (सेवानिवृत्त)
62. सतवंत रेड्डी - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, रसायन और पेट्रोकेमिकल्स, भारत सरकार
63. जूलियो रिबेरो - आईपीएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व पुलिस महानिदेशक, पंजाब सरकार
64. अरुणा रॉय - आईएएस (रिजाइन्ड)
65. स्मिता पुरुषोत्तम - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - स्विट्जरलैंड में पूर्व राजदूत
66. ए.के. सामंत - आईपीएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व पुलिस महानिदेशक (खुफिया), पश्चिम बंगाल सरकार
67. दीपक सानन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - मुख्यमंत्री के पूर्व प्रधान सलाहकार (एआर), हिमाचल प्रदेश सरकार
68. तिलक राज सारंगल - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रमुख सचिव (चुनाव) और वित्त आयुक्त, राजस्व (अपील)
69. एन.सी. सक्सेना - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, योजना आयोग, भारत सरकार
70. ए. सेल्वराज- आईआरएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व मुख्य आयुक्त, आयकर, चेन्नई, भारत सरकार
71. आफताब सेठ - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - जापान में पूर्व राजदूत
72. अशोक कुमार शर्मा - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - फिनलैंड और एस्टोनिया में पूर्व राजदूत
73. नवरेखा शर्मा - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - इंडोनेशिया में पूर्व राजदूत
74. अवय शुक्ला - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन और तकनीकी शिक्षा), हिमाचल प्रदेश सरकार
75. मुक्तेश्वर सिंह - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सदस्य, मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग
76. प्रकृति श्रीवास्तव - आईएफओएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं विशेष अधिकारी, पुनर्निर्माण केरल विकास कार्यक्रम, केरल सरकार
77. अनूप ठाकुर- आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सदस्य, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग
78. पी.एस.एस. थॉमस - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व महासचिव, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
79. गीता थुपल - आईआरएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व महाप्रबंधक, मेट्रो रेलवे, कोलकाता
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पूर्व सिविल सेवकों का एक मंच कंस्टिच्यूशनल कंडक्ट ग्रुप (Constitutional Conduct Group – CCG) ने खुले पत्राचार में कहा है कि पंजाब सरकार द्वारा पेश किया गया "पवित्र ग्रंथों के खिलाफ अपराध रोकने वाला बिल 2025", जिसे अभी जांच के लिए एक कमेटी को भेजा गया है, संविधान के खिलाफ है। करीब अस्सी पूर्व अफसरों द्वारा साइन की गई पंजाब पवित्र ग्रंथों के विरुद्ध अपराध रोकथाम विधेयक, 2025 (PPOHS एक्ट) पर एक लंबी और तर्कपूर्ण विश्लेषण में इस ग्रुप ने बताया है कि यह प्रस्तावित कानून न सिर्फ संविधान के खिलाफ है, बल्कि इसकी ढीली-ढाली परिभाषाओं के कारण इसका गलत इस्तेमाल होने की भी पूरी संभावना है।
यह प्रस्तावित कानून हाल ही में राज्य विधानसभा द्वारा एक कमेटी को भेजा गया है। CCG की इस पत्राचार में कानून से जुड़ी कई अहम बातें उठाई गई हैं। साथ ही इसमें यह भी याद दिलाया गया है कि इससे पहले भी पंजाब सरकार ने 2015 और 2018 में पवित्र ग्रंथों की बेअदबी से जुड़ी धारा 295A (जो अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 में धारा 299 के रूप में शामिल है) में बदलाव की कोशिश की थी। लेकिन दोनों बार ये प्रयास नाकाम रहे क्योंकि प्रस्तावित संशोधन संविधान की कसौटी पर खरे नहीं उतरे।
इस खुले पत्र का पूरा टेक्स्ट यहां पढ़ा जा सकता है:
सेवा में
अध्यक्ष महोदय,
“पंजाब पवित्र धर्मग्रंथों के खिलाफ अपराधों की रोकथाम अधिनियम, 2025” के प्रवर समिति,
पंजाब विधान सभा,
चंडीगढ़-160001
विषय: “पंजाब पवित्र धर्मग्रंथों के खिलाफ अपराधों की रोकथाम अधिनियम, 2025” पर आपत्तियां।
प्रिय अध्यक्ष महोदय,
हम, हस्ताक्षर करने वाले, कंस्टिच्यूशनल कंडक्ट ग्रुप के सदस्य हैं। यह समूह अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्रीय सिविल सेवाओं के पूर्व अधिकारियों का एक साझा मंच है। हमारा यह समूह किसी भी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं है और हमारे गणराज्य के मूलभूत सिद्धांतों को बढ़ावा देने तथा संवैधानिक आचरण के मानदंडों का पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। हम संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और उदार मूल्यों के लगातार हो रहे गिरावट से बेहद चिंतित हैं और इसी कारण हम यह पत्र लिख रहे हैं, ताकि पंजाब पवित्र ग्रंथों के विरुद्ध अपराध रोकथाम अधिनियम, 2025 (PPOHS Act) को लेकर अपनी गहरी चिंता सार्वजनिक रूप से दर्ज करा सकें। यह विधेयक फिलहाल समिति को विचार के लिए भेजा गया है।
यहां यह याद रखना उचित होगा कि इससे पहले दो मौकों पर यानी 2015 और 2018 में पंजाब सरकार ने पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता, 1860 (जिसे अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 299 के रूप में पुनः अधिनियमित किया गया है) की धारा 295ए में निहित बेअदबी से संबंधित प्रावधान में संशोधन करने का प्रयास किया था। दोनों ही प्रयास असफल रहे क्योंकि प्रस्तावित संशोधन संवैधानिकता की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए।
3 सितंबर, 2018 को पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री को लिखे एक खुले पत्र में, सीसीजी ने संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रताओं के साथ असंगति के आधार पर 2018 के संशोधन का कड़ा विरोध किया था। पत्र में इसके दुरुपयोग और राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने की संभावना का जिक्र किया गया था। ये आपत्तियां विचाराधीन प्रस्ताव पर भी समान रूप से लागू होती हैं।
हमारा मानना है कि पंजाब सरकार द्वारा बीएनएस की धारा 299 के पूरक के रूप में एक विशेष कानून बनाने का कदम भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक आधार पर हमला है। "पवित्र धर्मग्रंथ" और "अपराधों" की ढीली और व्यापक रूप से गढ़ी गई परिभाषाओं को अपनाकर, यह मसौदा विधेयक आपराधिक न्याय के बुनियादी न्यायिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार कर देता है। एक संवैधानिक लोकतंत्र में, जहां कठोर सजाएं जैसे आजन्म कारावास या भारी जुर्माना निर्धारित की जाती हैं, वहां यह अनिवार्य होता है कि कानून में दोषसिद्ध मानसिक स्थिति (mens rea) यानी अपराध करने की मंशा को स्पष्ट रूप से स्थापित किया जाए। लेकिन यह प्रस्तावित कानून इस जरूरी सिद्धांत को पूरी तरह नजरअंदाज करता है। यह धार्मिक ग्रंथों से जुड़ी अनजाने में या ईमानदारी से की गई कार्रवाइयों को भी अपराध मानते हुए आपराधिक दायित्व तय करता है। इस तरह का कानून आपराधिक मामलों में "सख्त दायित्व" (strict liability) थोप देगा जो कि न्यायिक प्रक्रिया की मूल भावना के खिलाफ है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से भी मेल नहीं खाता।
आपराधिक कानून में सख्त दायित्व (strict liability) की अवधारणा को शामिल करना उस बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है जिसके तहत दंडात्मक कार्रवाई केवल जानबूझकर किए गए कृत्यों के लिए ही होनी चाहिए। ऐसा करने से यह प्रस्तावित कानून उन अभिव्यक्तियों को भी आपराधिक बना सकता है जो संविधान द्वारा संरक्षित हैं, जिससे लोगों की वैध गतिविधियों पर डर और रोक पैदा होगी। इसका नतीजा यह होगा कि कानून का राज कमजोर होकर दमन का उपकरण बन जाएगा।
मूल रूप से, हमारे प्रस्तावित कानून के विरोध के आधार निम्नलिखित हैं:
● धार्मिक बेअदबी और अपशब्दों के खिलाफ कठोर कानून हमारे जैसे धर्मनिरपेक्ष शासन की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत हैं। यह कानून धर्म की भूमिका को राज्य के मामलों में सीमित करने के बजाय इसे और बढ़ावा देगा। साथ ही, यह धार्मिक संप्रदायवाद को बढ़ावा देने और विभिन्न प्रकार के धार्मिक उग्रवादियों को सशक्त करने का काम करेगा।
● ईशनिंदा कानून संविधान में निहित अभिव्यक्ति और विचार की स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार को खतरे में डालते हैं। फ्री स्पीच पर रोक लगाने के अलावा, ये कानून किसी भी व्यक्ति को, जो यह दावा करता है कि उसकी भावनाएं आहत हुई हैं, निराधार और दुर्भावनापूर्ण मुकदमे दर्ज कराने का अवसर प्रदान करते हैं। ये कानून धार्मिक ग्रंथों पर गंभीर शोध और उनके नए सिरे से विश्लेषण को हतोत्साहित करते हैं, जिससे धार्मिक कट्टरता की पकड़ और मजबूत होती है। इसके अलावा, ऐसे कानून जो अभिव्यक्ति और विश्वास की स्वतंत्रता को सीमित करने का प्रयास करते हैं, वे और ज्यादा कठोर कानूनों की मांग को जन्म देते हैं। यह देखा गया है कि जहां कहीं भी अपवित्रता को एक बड़ा अपराध बना दिया गया है, वहां पर “असहिष्णुता और दंड से मुक्ति का वातावरण पनपा है, और इससे मानवाधिकारों का बड़ा उल्लंघन हुआ है।” (फ़्रीडम हाउस, 2010)
● सीमापार और अन्य धर्मशासित देशों में ईशनिंदा कानूनों के कार्यान्वयन का अनुभव यह दर्शाता है कि इनका इस्तेमाल अक्सर धार्मिक और अन्य अल्पसंख्यकों तथा कमजोर वर्गों के खिलाफ उन्हें भयभीत करने, दबाने और व्यक्तिगत अथवा राजनीतिक दुश्मनी निकालने के उद्देश्य से किया जाता है। ऐसे कानूनों के कारण सांप्रदायिक तनाव बढ़ने का खतरा स्पष्ट रूप से उन राज्यों में ज्यादा होता है, जैसे पंजाब, जहां स्थापित धार्मिक रूढ़िवाद द्वारा विधर्मी माने जाने वाले पंथों का अनुसरण दलित समुदायों में व्यापक रूप से किया जाता है।
● बीएनएस (पूर्व में आईपीसी) में मौजूद प्रावधान धर्म और धार्मिक ग्रंथों के अपमान से निपटने के लिए पूरी तरह पर्याप्त हैं। ऐसे कृत्यों की घटनाओं को केवल दंड की कठोरता बढ़ाकर नहीं रोका जा सकता। इन पर प्रभावी रोक तभी संभव है जब मुकदमे और सजा की प्रक्रिया सुनिश्चित, त्वरित और निर्णायक हो और यह एक सक्षम आपराधिक न्याय प्रणाली तथा राजनीतिक व प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।
● प्रस्तावित विधेयक कानूनी दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है। यह खराब तरीके से मसौदा तैयार किया गया है: ‘अपवित्रता’ (sacrilege) शब्द की कोई परिभाषा नहीं दी गई है, और ‘पवित्र ग्रंथों’ की परिभाषा भी अस्पष्ट है, जिसमें केवल इतना कहा गया है कि ये वे ग्रंथ हैं जिन्हें संबंधित धार्मिक समुदायों द्वारा पवित्र माना जाता है। केवल चार प्रमुख धर्मों के धार्मिक ग्रंथों को सूचीबद्ध करने का औचित्य स्पष्ट नहीं है और समझ से परे है। विशेष रूप से हिंदू धर्म के संदर्भ में, केवल एक ग्रंथ का उल्लेख किया गया है, जबकि हिंदुओं द्वारा वेदों से लेकर कई अन्य ग्रंथों को पवित्र माना जाता है।
● यह प्रस्तावित संशोधन उम्र भर जेल का प्रावधान करके धार्मिक अपमान (sacrilege) को एक गंभीर अपराध बना देता है। यह अत्यधिक और असंगत है, खासकर सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय के संदर्भ में जो धारा 295-ए भारतीय दंड संहिता (IPC) पर दिया गया था (रामजीलाल मोदी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, AIR 1957 SC 620)। इस निर्णय में कहा गया था कि अधिकतम 4 वर्ष की सजा देने वाली यह धारा केवल धर्म के प्रति गंभीर और बेहद अपमान की स्थिति में ही लागू हो सकती है।
● यह स्पष्ट है कि ऐसा कानून, जिसके परिणामों पर ठीक से विचार नहीं किया गया हो, जिसमें यह स्पष्ट रूप से परिभाषित न किया गया हो कि अपराध क्या है, और जिसकी व्याख्या कई तरीकों से की जा सकती हो- निश्चित रूप से उसे स्वार्थी तत्व अपने राजनीतिक या संकीर्ण हितों के लिए इस्तेमाल करेंगे और इससे पुलिस दमन का खतरा और बढ़ जाएगा।
● अल्पकालिक राजनीतिक स्वार्थों के लिए विभिन्न धर्मों की अतिवादी भावनाओं को भड़काने के हमारे पिछले पापों की भारी कीमत देश पहले ही चुका चुका है। इससे आज ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जहां समावेशी, बहुलवादी और उदार भारत और भारतीयता का विचार ही खतरे में पड़ गया है। सांप्रदायिक और अनुदार विचारों और विचारधाराओं के सशक्तीकरण के परिणामस्वरूप अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है और सामाजिक दुश्मनी में भारी वृद्धि हुई है। समय की मांग है कि सभी जिम्मेदार हितधारक सभी प्रकार के धार्मिक कट्टरपंथियों को मुहैया कराई जा रही जगह को कम करने के लिए काम करें, न कि उनके लिए और जगह खोलें।
मौजूदा समय में, जब हमारे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बनाए रखने की आवश्यकता पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है, हम ईमानदारी से उम्मीद करते हैं कि विधानमंडल उन मूल्यों के साथ खड़ा रहेगा और माननीय समिति से विधेयक को पूरी तरह से वापस लेने की सिफारिश करने का आग्रह करेगा।
सत्यमेव जयते
कंस्टिच्यूशनल कंडक्ट ग्रुप (79 हस्ताक्षरकर्ता, नीचे दिए गए हैं)
1. तलमीज़ अहमद -आईएफएस (सेवानिवृत्त) - सऊदी अरब, ओमान और यूएई में पूर्व राजदूत
2. आनंद अर्नी - आरएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व विशेष सचिव, कैबिनेट सचिवालय, भारत सरकार
3. अरुणा बागची - आईएएस (सेवानिवृत्त)- पूर्व संयुक्त सचिव, खान मंत्रालय, भारत सरकार
4. जे.एल. बजाज - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अध्यक्ष, प्रशासनिक सुधार और विकेंद्रीकरण आयोग, उत्तर प्रदेश सरकार
5. जी. बालचंद्रन -आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, पश्चिम बंगाल सरकार
6. संदीप बागची - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रधान सचिव, महाराष्ट्र सरकार
7. वप्पला बालचंद्रन -आईपीएस (सेवानिवृत्त) -पूर्व विशेष सचिव, कैबिनेट सचिवालय, भारत सरकार
8. सुशांत बलिगा - इंजीनियरिंग सर्विसेज (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक, केंद्रीय पीडब्ल्यूडी, भारत सरकार
9. चंद्रशेखर बालकृष्णन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, कोयला, भारत सरकार
10. राणा बनर्जी -आरएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व विशेष सचिव, कैबिनेट सचिवालय, भारत सरकार
11. शरद बेहर - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व मुख्य सचिव, मध्य प्रदेश सरकार
12. मधु भादुड़ी - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - पुर्तगाल में पूर्व राजदूत
13. प्रदीप भट्टाचार्य - आईएएस (सेवानिवृत्त) -पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, विकास एवं योजना और प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान, पश्चिम बंगाल सरकार
14. नूतन गुहा बिस्वास - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सदस्य, पुलिस शिकायत प्राधिकरण, दिल्ली सरकार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र
15. मीरान सी बोरवणकर - आईपीएस (सेवानिवृत्त) -पूर्व डीजीपी, पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो, भारत सरकार
16. रवि बुद्धिराजा - आईएएस (सेवानिवृत्त) -पूर्व अध्यक्ष, जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट, भारत सरकार
17. आर. चंद्रमोहन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रमुख सचिव, परिवहन एवं शहरी विकास, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार
18. कल्याणी चौधरी - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, पश्चिम बंगाल सरकार
19. गुरजीत सिंह चीमा - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व वित्त आयुक्त (राजस्व), पंजाब सरकार
20. एफ.टी.आर. कोलासो - आईपीएस (सेवानिवृत्त)- पूर्व पुलिस महानिदेशक, कर्नाटक सरकार और पूर्व पुलिस महानिदेशक, जम्मू-कश्मीर सरकार
21. विभा पुरी दास- आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, जनजातीय कार्य मंत्रालय, भारत सरकार
22. पी.आर. दासगुप्ता - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अध्यक्ष, भारतीय खाद्य निगम, भारत सरकार
23. प्रदीप के. देब - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, खेल विभाग, भारत सरकार
24. नितिन देसाई -पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार
25. एम.जी. देवसहायम - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, हरियाणा सरकार
26. किरण ढींगरा - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, कपड़ा मंत्रालय, भारत सरकार
27. ए.एस. दुलत - आईपीएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व ओएसडी, कश्मीर, प्रधानमंत्री कार्यालय, भारत सरकार
28. के.पी. फैबियन - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - इटली में पूर्व राजदूत
29. सुरेश के. गोयल - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व महानिदेशक, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, भारत सरकार
30. एच.एस. गुजराल - आईएफओएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक, सरकार पंजाब
31. मीना गुप्ता - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार
32. रवि वीरा गुप्ता - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व डिप्टी गवर्नर, भारतीय रिज़र्व बैंक
33. रशीदा हुसैन - आईआरएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व महानिदेशक, राष्ट्रीय सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क एवं नारकोटिक्स अकादमी
34. सिराज हुसैन - आईएएस (सेवानिवृत्त)- पूर्व सचिव, कृषि विभाग, भारत सरकार
35. कमल जसवाल - आईएएस (सेवानिवृत्त)- पूर्व सचिव, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार
36. नैनी जयसीलन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, अंतर-राज्यीय परिषद, भारत सरकार
37. नजीब जंग - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व उपराज्यपाल, दिल्ली
38. विनोद सी. खन्ना - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त सचिव, विदेश मंत्रालय, भारत सरकार
39. गीता कृपलानी - आईआरएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सदस्य, निपटान आयोग, भारत सरकार
40. बृजेश कुमार - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार
41. सुधीर कुमार - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सदस्य, केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण
42. सुबोध लाल - आईपीओएस (इस्तीफा) - पूर्व उप महानिदेशक, संचार मंत्रालय, भारत सरकार
43. हर्ष मंदर - आईएएस (सेवानिवृत्त) - मध्य प्रदेश सरकार
44. अमिताभ माथुर - आईपीएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व विशेष सचिव, कैबिनेट सचिवालय, भारत सरकार
45. अदिति मेहता - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, राजस्थान सरकार
46. शिवशंकर मेनन - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व विदेश सचिव और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार
47. अविनाश मोहनाने - आईपीएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व पुलिस महानिदेशक, सिक्किम सरकार
48. सुधांशु मोहंती - आईडीएएस (सेवानिवृत्त)- पूर्व वित्तीय सलाहकार (रक्षा सेवाएँ), रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार
49. अनूप मुखर्जी - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व मुख्य सचिव, बिहार सरकार
50. देब मुखर्जी - आईएफएस (सेवानिवृत्त)- बांग्लादेश में पूर्व उच्चायुक्त और नेपाल में पूर्व राजदूत
51. रुचिरा मुखर्जी - आईपी एंड टीएएफएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सलाहकार (वित्त), दूरसंचार आयोग, भारत सरकार
52. शिव शंकर मुखर्जी - आईएफएस (सेवानिवृत्त) -यूनाइटेड किंगडम में पूर्व उच्चायुक्त
53. गौतम मुखोपाध्याय - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - म्यांमार में पूर्व राजदूत
54. नागलसामी - आईए एंड एएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रधान महालेखाकार, तमिलनाडु और केरल
55. शोभा नंबिसन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रधान सचिव (योजना), कर्नाटक सरकार
56. अमिताभ पांडे - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, अंतर-राज्यीय परिषद, भारत सरकार
57. टी.आर. रघुनंदन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व संयुक्त सचिव, पंचायती राज मंत्रालय, भारत सरकार
58. एन.के. रघुपति - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अध्यक्ष, कर्मचारी चयन आयोग, भारत सरकार
59. वी. रमानी - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व महानिदेशक, यशदा, महाराष्ट्र सरकार
60. पी.वी. रमेश - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री
61. एम.वाई. राव - आईएएस (सेवानिवृत्त)
62. सतवंत रेड्डी - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, रसायन और पेट्रोकेमिकल्स, भारत सरकार
63. जूलियो रिबेरो - आईपीएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व पुलिस महानिदेशक, पंजाब सरकार
64. अरुणा रॉय - आईएएस (रिजाइन्ड)
65. स्मिता पुरुषोत्तम - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - स्विट्जरलैंड में पूर्व राजदूत
66. ए.के. सामंत - आईपीएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व पुलिस महानिदेशक (खुफिया), पश्चिम बंगाल सरकार
67. दीपक सानन - आईएएस (सेवानिवृत्त) - मुख्यमंत्री के पूर्व प्रधान सलाहकार (एआर), हिमाचल प्रदेश सरकार
68. तिलक राज सारंगल - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रमुख सचिव (चुनाव) और वित्त आयुक्त, राजस्व (अपील)
69. एन.सी. सक्सेना - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सचिव, योजना आयोग, भारत सरकार
70. ए. सेल्वराज- आईआरएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व मुख्य आयुक्त, आयकर, चेन्नई, भारत सरकार
71. आफताब सेठ - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - जापान में पूर्व राजदूत
72. अशोक कुमार शर्मा - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - फिनलैंड और एस्टोनिया में पूर्व राजदूत
73. नवरेखा शर्मा - आईएफएस (सेवानिवृत्त) - इंडोनेशिया में पूर्व राजदूत
74. अवय शुक्ला - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन और तकनीकी शिक्षा), हिमाचल प्रदेश सरकार
75. मुक्तेश्वर सिंह - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सदस्य, मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग
76. प्रकृति श्रीवास्तव - आईएफओएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं विशेष अधिकारी, पुनर्निर्माण केरल विकास कार्यक्रम, केरल सरकार
77. अनूप ठाकुर- आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व सदस्य, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग
78. पी.एस.एस. थॉमस - आईएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व महासचिव, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग
79. गीता थुपल - आईआरएएस (सेवानिवृत्त) - पूर्व महाप्रबंधक, मेट्रो रेलवे, कोलकाता
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