द केरला स्टोरी: नफ़रत फैलाने के लिए कला का इस्तेमाल

Written by Ram Puniyani | Published on: May 4, 2023
'द केरल स्टोरी' 5 मई को प्रीमियर के लिए तैयार है और पहले से ही यह फ़िल्म की 'कश्मीर फ़ाइल्स' के साथ की जा रही है।



जब कोई केरल के बारे में सुनता है, तो जो बातें दिमाग में आती हैं, वह यह कि यह एक ऐसा राज्य है, जिसके वाशिंदे अमन और सद्भाव में रहते हैं, जिसने निरक्षरता को खत्म कर दिया है, स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण से संबंधित सामाजिक सूचकांकों पर सबसे ऊपर है, और सर्वोत्तम संभव तरीके से कोविड-19 महामारी का मुकाबला करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह वह जगह भी है जहां 52एडी में सेंट सेबेस्टियन के आगमन के साथ ईसाई धर्म आया था, और इस्लाम पहली बार सातवीं शताब्दी में अरब व्यापारियों के साथ आया था। इन सबके विपरीत, 'द केरला स्टोरी' का टीज़र और प्रोमो, केरल को एक ऐसे राज्य के रूप में पेश करता है जो इस्लाम में धर्मांतरण से ग्रस्त है और जहाँ बड़ी संख्या में हिंदू महिलाओं को आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट में घसीटा जा रहा है।

यह फिल्म ‘द कश्मीर’ फाइल्स की तर्ज पर बनाई गई है, जहां, कलह और नफ़रत को बढ़ावा देने के लिए, आधे सच और एकमुश्त कल्पनाजनक तथ्यों का सहारा लिया गया है, और हक़ीक़त को छिपाया गया है। यही वह वजह थी कि गोवा में आयोजित 53वें अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के जूरी/निर्णायक मंडल के प्रमुख ने इस फिल्म को "प्रोपगेंडा/प्रचार" वाली फिल्म करार दिया था। नादव लापिड ने भी इसे अभद्र फिल्म कहा था, हालांकि उनके मूल्यांकन से भारत और इज़राइल के कुछ वर्गों में नाराजगी पैदा ही लेकिन इसके बावजूद वे अपने प्रारंभिक आंकलन पर कायम रहे।

द केरला स्टोरी 5 मई को रिलीज़ होनी है। टीज़र 2 नवंबर, 2022 को रिलीज़ किया गया था और ट्रेलर 27 अप्रैल को रिलीज़ किया गया था। इस रिलीज़ से स्पष्ट संकेत मिले हैं कि संबंधित नागरिकों को आधा-अधूरा सच दिखाया जा रहा है जो धर्मांतरण और आतंकवादी संगठन, इस्लामिक स्टेट में भर्ती के पैमाने और उसकी वास्तविक स्थिति पर शोध की कमी को दर्शाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के इराक पर आक्रमण करने और पश्चिम एशिया के "तेल क्षेत्र" में रूसी प्रभाव का मुकाबला करने के लिए, अमरीका ने कट्टरपंथी इस्लामी समूहों को बढ़ावा दिया जिसके बाद इस संगठन ने अपना सर उठाया था। 

आने वाली फिल्म में यह हास्यास्पद दावा किया गया है कि 32,000 हिंदू लड़कियों का धर्मांतरण किया गया है और वे इस्लामिक स्टेट का हिस्सा हैं। इस संख्या का स्रोत अत्यधिक संदिग्ध है—जिसमें इस दी गई जानकारी का कोई स्रोत नहीं है। मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस (आईडीएसए) में प्रकाशित आदिल रशीद का एक पेपर 'क्यों कम भारतीय आईएसआईएस में शामिल हुए हैं' का कहना है कि दुनिया भर में इस्लामिक स्टेट [पहले आईएसआईएस के रूप में जाना जाता था] में लगभग 40,000 रंगरूट हैं। 100 से भी कम भारतीयों ने कभी सीरिया और अफगानिस्तान में इस्लामिक स्टेट के इलाकों में जाने के लिए प्रस्थान किया था, और लगभग 155 को इसके साथ संबंध रखने के लिए हिरासत में लिया गया था। दुनिया भर में कट्टरपंथी संगठन में हुई भर्तियों की विश्व जनसंख्या समीक्षा के आंकड़ों से पता चलता है कि इराक, अफगानिस्तान, रूस, ट्यूनीशिया, जॉर्डन, सऊदी अरब, तुर्की, फ्रांस और अन्य देशों से बड़े पैमाने पर भर्ती की गई है। मध्य पूर्व इसकी सदस्यता का बड़ा स्रोत था, जिसके बाद यूरोपीय संघ आता है। 

फिर भी, फिल्म निर्माताओं की केरल के बारे में कल्पना, स्पष्ट रूप से प्रोपेगेंडा/प्रचार उद्देश्यों के लिए थी, जो उस दावे के उलट है कि फिल्म एक सच्ची कहानी पर आधारित है। फिल्म  एक लड़की को संदर्भित करती है जिसे पता चलता है कि वह फंस गई है और वर्तमान में एक अफगान जेल में क़ैद है। वह दावा करती हैं कि उसके जैसे और भी हैं- फिल्म निर्माता के अनुसार, यह "कई" महिलाओं और लड़कियों की गवाही के बराबर है और हवा में तथा बिना किसी आधार के 32,000 आंकड़ा होने का दावा करता है।

केरल में धर्मांतरण की स्थिति फिल्म का अगला अंक है। केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने 2006 से 2012 के बीच के संबंधित आंकड़े पेश किए हैं: उनके मुताबिक "2006-2012 के दौरान कुल 7,713 लोगों को इस्लाम में परिवर्तित किया गया, जबकि 2,803 लोगों को हिंदू धर्म में परिवर्तित किया गया था।" उन्होंने कहा कि इस अवधि के दौरान ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वालों की संख्या अनुपलब्ध थी। 2009-12 के दौरान इस्लाम कबूल करने वालों में 2,667 युवतियां थीं, जिनमें से 2,195 हिंदू और 492 ईसाई थे। उन्होंने यह भी कहा कि कोई जबरन धर्मांतरण नहीं हुआ है।

याद करें कि लव जिहाद (हिंदू लड़कियों को शादी के झांसे में लाकर इस्लाम में धर्मांतरण करना) के आसपास के अभियान की शुरुआत केरल के रूढ़िवादी तत्वों से हुई थी। साम्प्रदायिक राजनीति को हमेशा विभाजनकारी, भावनात्मक मुद्दों की जरूरत होती है ताकि वे समाज में जड़ें जमा सकें। चांडी ने कहा, 'हम जबरन धर्म परिवर्तन नहीं होने देंगे। न ही हम लव जिहाद के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले अभियानों को फैलने देंगे। पुलिस आयुक्तों की जांच में हिंदू या ईसाई महिलाओं या लड़कियों को लुभाने और इस्लाम में परिवर्तित करने के किसी अभियान का कोई सूत्र नहीं मिला। 

लेकिन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस मुद्दे को पकड़ लिया और 11 राज्यों में अब "लव जिहाद" के खिलाफ कानून बना लिए हैं। महाराष्ट्र में हाल ही में समग्र हिंदू समाज के नाम पर बड़े पैमाने पर लामबंदी देखी गई, जिसमें दावा किया गया कि लव जिहाद प्रचार हिंदू समाज के लिए एक वास्तविक खतरा है। समाज ने ग्रामीण महाराष्ट्र में रैलियों का आयोजन किया जो भाजपा शासित राज्य में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत का निर्माण कर सकता है। लव जिहाद के मामलों का कोई प्रयोगसिद्ध आधार नहीं है। 11 नवंबर 2020 को एक आरटीआई जांच से पता चला कि राष्ट्रीय महिला आयोग के पास इस मुद्दे से संबंधित कोई डेटा नहीं है। राष्ट्रीय महिला आयोग ने कहा, "राष्ट्रीय महिला आयोग के पास 'लव जिहाद' से संबंधित शिकायतों की श्रेणी के तहत कोई विशिष्ट डेटा नहीं है।"

केरल में सत्तारूढ़ सीपीएम सरकार और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग फिल्म की स्क्रीनिंग के खिलाफ हैं क्योंकि यह केवल मुस्लिम विरोधी प्रचार को बढ़ाने और राज्य में विभाजनकारी राजनीति बनाने का काम करेगा। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा है कि धार्मिक आधार पर समाज को विभाजित करने के लिए कलात्मक स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए। फिल्म के बारे में अब तक जो कुछ भी पता चला है, उससे समान रूप से परेशान कांग्रेस नेता शशि थरूर ने ट्वीट किया है कि जो यह साबित करेगा कि 32,000 लड़कियां इस पौराणिक लव जिहाद की शिकार हुई हैं, उसे एक करोड़ रुपये पुरस्कार के रूप में मिलेंगे, साथ ही उन्होने यह भी कहा कि झूठ पर आधारित फिल्म की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।  

यह फिल्म ठीक ऐसे वक़्त में आई है जब सुप्रीम कोर्ट ने अभद्र भाषा के खिलाफ कार्रवाई की और अधिकारियों से कहा कि वे इस तरह के कृत्यों के खिलाफ खुद कार्रवाई करें। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को देश और केरल में प्रसारित होने वाली फिल की फिटनेस की समीक्षा करनी चाहिए। और, न केवल केरल बल्कि पूरे देश के सामाजिक ताने-बाने के लिए जोखिम को देखते हुए, सर्वोच्च न्यायालय को कला के नाम पर नफरत का प्रचार करने वाली फिल्मों पर रोक लगाने की जरूरत है।

(लेखक एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और आईआईटी बॉम्बे में पढ़ाते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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