जेएनयू की कुलपति शांतिश्री के दलित समुदाय पर दिए बयान को लेकर बहुजन समाज में भारी नाराजगी

Written by sabrang india | Published on: February 21, 2026
द संडे गार्डियन के पॉडकास्ट में पत्रकार जोयिता बसु को दिए साक्षात्कार में कुलपति ने यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशंस को “पूरी तरह अनावश्यक” और “तर्कहीन” करार दिया।



जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित के एक पॉडकास्ट में दिए गए विवादित बयान देशभर में चर्चा का विषय बन गए हैं। खासकर बहुजन, दलित, आदिवासी और ओबीसी समुदायों में इन टिप्पणियों को लेकर गहरा असंतोष व्यक्त किया जा रहा है।

द संडे गार्डियन के पॉडकास्ट में पत्रकार जोयिता बसु को दिए साक्षात्कार में कुलपति ने यूजीसी के नए इक्विटी रेगुलेशंस को “पूरी तरह अनावश्यक” और “तर्कहीन” बताया।

उन्होंने अपने बयान में “परमानेंट विक्टिमहुड” को “एक तरह की ड्रग” करार देते हुए कहा कि इससे प्रगति संभव नहीं है। उनके शब्दों में, “हमेशा विक्टिम बने रहते हैं। और आप हमेशा विक्टिम बनकर या विक्टिम कार्ड खेलकर तरक्की नहीं कर सकते। यह ब्लैक्स के लिए किया गया था… यही चीजें यहां दलितों के लिए लाई गईं।”

उन्होंने आगे कहा कि जन्म के आधार पर किसी एक पक्ष के अधिकारों से इनकार नहीं किया जा सकता और इसे “सजा” के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आलोचकों का मानना है कि इस तरह की टिप्पणियां ऐतिहासिक विशेषाधिकारों और सामाजिक असमानताओं की अनदेखी करती हैं।

यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जहां कई लोगों ने इसे दलितों और अश्वेत समुदायों के लंबे संघर्ष को “विक्टिम कार्ड” या “ड्रग” कहकर खारिज करने की कोशिश के रूप में देखा और इसकी कड़ी आलोचना की।

द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, बहुजन समुदाय ने इसे संस्थागत जातिवाद और सवर्ण विशेषाधिकार की रक्षा करने वाला हमला बताया है। सोशल मीडिया पर #RemoveSantishreePandit, #DalitLivesMatter, #JNUAgainstCasteism जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। एक प्रमुख पोस्ट में एक अंबेडकराइट एक्टिविस्ट ने लिखा, “दलितों को ‘victim card’ खेलने वाला कहना कितना घिनौना है! क्या जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाना विक्टिमहुड है? … आप ब्राह्मण जाति से हैं, RSS सदस्य हैं, दलितों के दर्द को क्या जानती हैं? हम हर दिन अपमान, भेदभाव और हिंसा झेलते हैं…”

एक यूजर ने लिखा, “जेएनयू वीसी ने यूजीसी नियमों का विरोध किया… दलित समुदाय को ‘victimhood के नशे में डूबा हुआ’ कहने के बाद कुलपति संतिश्री पंडित ने यूजीसी नियमों का भी विरोध किया… क्या कल्पना कर सकते हैं कि कैंपस में एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के साथ कैसा व्यवहार होता होगा?”

एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की, “दलित और ब्लैक्स स्थायी victimhood के नशे में हैं! मैडम, असली नशा तो आपका विशेषाधिकार है!” जबकि @Nher_who ने पोस्ट किया, “अगर हक मांगना ड्रग के बराबर है, तो सदियों का विशेषाधिकार कैंसर होना चाहिए।” सीपीआई(एम) के महासचिव @MABABYCPIM ने कहा, “दलितों की स्थिति को ‘permanent victimhood’ कहकर मजाक उड़ाना व्यवस्थागत उत्पीड़न को सफेद करने की कोशिश है… उन्हें तत्काल इस्तीफा देना चाहिए।”

छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सदियों के जातिगत उत्पीड़न, भूमि से बेदखली, शिक्षा से वंचित किए जाने और हिंसा झेलने वाले दलित-बहुजन समाज के अधिकारों के लिए आवाज उठाना किसी प्रकार का “विक्टिमहुड” नहीं है। उनके अनुसार, यह संघर्ष डॉ. बी.आर. आंबेडकर और पेरियार ई.वी. रामासामी द्वारा प्रतिपादित संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की लड़ाई का विस्तार है।

कई छात्र संगठनों का कहना है कि आज बड़ी संख्या में एससी, एसटी और ओबीसी युवा शिक्षित, जागरूक और मुखर हैं। उनके अनुसार, वे केवल वोट बैंक बनकर नहीं रहना चाहते, बल्कि संस्थानों में रोस्टर में कथित हेरफेर, साक्षात्कार में पक्षपात और नियुक्तियों में भेदभाव जैसी संरचनात्मक बाधाओं के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।

वरिष्ठ आईआरएस अधिकारी नेत्रपाल ने भी कुलपति के बयान की आलोचना करते हुए लिखा, “SC/ST/OBC के अधिकारों के लिए बोलना विक्टिमहुड नहीं है। यह हमारी ताकत है।” उन्होंने कहा कि आज लाखों एससी, एसटी और ओबीसी के मन आज़ाद हैं। वे बिना डरे बोलते हैं। वे शिक्षित हैं। वे उन राजनीतिक और सामाजिक जालों को पहचानते हैं जो उन्हें केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि रोस्टर, इंटरव्यू और एम्पैनलमेंट जैसी संरचनात्मक बाधाएं खड़ी की गई हैं ताकि वंचित समुदायों को शीर्ष पदों तक पहुंचने से रोका जा सके।

उन्होंने लिखा, “हम विक्टिमहुड की बात नहीं करते। यह हमारे अधिकार हैं, और कोई वीसी या कोई बड़ी ताकत हमें हमारे अधिकारों के लिए बोलने से नहीं रोक सकती। हमें हमारी मातृभूमि में हमारी सही जगह दीजिए — यह एक सीधी मांग है। इससे कम कुछ नहीं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। हम कभी भी मुट्ठी भर समुदायों को दौलत, शिक्षा और सत्ता के पदों पर एकाधिकार करने की अनुमति नहीं देंगे। हमारा संविधान, जिसे डॉ. आंबेडकर और पेरियार जैसे महान नेताओं ने गढ़ा है, हमें समान अवसर देता है। अपने अधिकार के लिए बोलना विक्टिमहुड नहीं, हमारी ताकत है… मैडम वीसी अपने शब्द वापस लें।”

कुलपति के बयान को मनुवादी सोच और सवर्ण पूर्वाग्रह से प्रेरित बताया जा रहा है। जेएनयू में पहले से छात्र संघ के साथ विवाद जारी है, और यूजीसी नियमों को लेकर कानूनी चुनौतियां भी लंबित हैं, जिनका उद्देश्य कैंपस में जातिवाद को रोकना बताया जाता है। बहुजन समाज की मांग स्पष्ट है — कुलपति अपने शब्द वापस लें, सार्वजनिक माफी मांगें, यूजीसी नियम लागू किए जाएं और ऐसी सोच रखने वाली कुलपति को पद से हटाया जाए।

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