नई दिल्ली। 12-13, जुलाई, 2019 को गांधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में समाजवादी समागम कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर कुर्बान अली द्वारा संपादित पुस्तक- समाजवादी विचार - संकल्प - बदलाव का भी लोकार्पण किया जाएगा। साथ ही पैनलिस्ट भी चर्चा के लिए पहुंचेंगे। सारे कार्यक्रमों के बारे में आयोजक समिति द्वारा एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की है जिसमें समाजवादी पार्टी की संकल्पना और योगदान के बारे में बताया गया है।

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है- भारत में समाजवादी आंदोलन की स्थापना को लगभग 85 वर्ष हो चुके हैं। इन 85 वर्षों में समाजवादी नेताओं के शुरूआती 13 वर्ष तो राष्ट्रीय आंदोलन में कांग्रेस पार्टी में रहते हुए देश को गुलामी से निजात और आजादी दिलाने में गुजरे। खासकर 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान समाजवादी नेताओं की अहम भूमिका थी। जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, युसूफ मेहरअली, अरूणा आसफ अली, अच्युत पटवर्धन और ऊषा मेहता 'अगस्त क्रांति’ आंदोलन के हीरो थे।
जनवरी 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी में शामिल समाजवादी नेताओं ने तय किया कि वे कांग्रेस पार्टी से अलग होकर अपनी सोशलिस्ट पार्टी बनाएंगे और रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। मार्च 1948 में समाजवादियों ने नासिक में अपनी अलग सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर स्वतंत्र भारत में नए सिरे से राजनीति शुरू की अपनी अलग विचारधारा बनाई। पार्टी की नीति और सिद्धांत बनाए और एक जिम्मेदार विपक्षी दल के रूप में राजनीति शुरू की और 1952 में हुए देश के पहले आम चुनाव में शिरकत की।
इस तरह राष्ट्रीय आंदोलन के समय से लेकर आज तक पिछले 85 वर्षों में समाजवादियों का गौरवमयी इतिहास रहा है। समाजवादियों ने समय -समय पर हर तरह का संघर्ष किया है। चाहे कांग्रेसी सरकारों को समाजवाद के रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करना और समता मूलक समाज की स्थापना का मामला हो या पिछडी जातियों को विशेष अवसर दिलाने का सिद्धांत। दाम बांधो, जाति तोड़ो, हिमालय बचाओ, भारत-पाक-बांग्लादेश का महासंघ बनाओ, नर-नारी समानता और हिन्दू-मुसलमानों के बीच आपसी सौहार्द क़ायम करने के लिए समाजवादियों ने बढ़ चढ़कर आंदोलन किये हैं और नागरिक स्वतंत्रता तथा अन्य मानवाधिकारों के लिए सिविल नाफरमानी और सत्याग्रह करते हुए जेल गए हैं।
1974 में लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में लोकतंत्र बचने के लिए जो आंदोलन चलाया गया उसे कौन भूल सकता है, जिसे आज़ादी की दूसरी लड़ाई कहा गया, जिसके कारण आपातकाल लगाया गया और लोकतंत्र का गला घोंटकर तानाशाही क़ायम कर दी गयी। इस आंदोलन के दौरान हज़ारों समाजवादियों को गिरफ्तार किया गया। उन्हें 19 महीनों तक मीसा और डीआईआर जैसे क़ानूनों के तहत जेलों में बंद रखा गया और यातनायें दी गईं, जिसके कारण हशमत लोहिया वारसी और स्नेहलता रेड्डी जैसे कई समाजवादियों की मौत हो गई।
पिछले 85 वर्षों में समाजवादी नेताओं ने हर तरह की कुर्बानी देकर देश को दिशा देने का काम किया है और राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों और उसकी विरासत के आधार पर मिली आज़ादी और राष्ट्रीय आंदोलन की विचारधारा पर बने संविधान को क़ायम रखने की कोशिश की है। उनके समाजवादी सिद्धांतों, नीतियों और विचारों की आज भी प्रासंगिकता है। इसी प्रक्रिया को आगे जारी रखने के उद्देश्य से पिछले वर्ष 17 मई 2018 को दिल्ली में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के 84वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित समाजवादी सम्मेलन में तय किया गया था कि देश भर के समाजवादियों को इकठ्ठा करने के लिए साल भर तक कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे और उसके बाद एक बड़ा समागम आयोजित किया जायेगा।
इसी कड़ी में आगामी 12 - 13 जुलाई 2019 को गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में यह आयोजन किया जा है। जिसमें वर्तमान सरकार आने के बाद देश में उत्पन्न परिस्थितियों में समाजवादियों की क्या भूमिका हो इस पर भी विचार किया जायेगा। इस समाजवादी समागम का उदघाटन वरिष्ठ समाजवादी नेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डा. जी. जी. पारिख करेंगे।
उनके अलावा देशभर से कई अन्य वरिष्ठ समाजवादी नेता, चिंतक और कार्यकर्ता भी इस समागम में शामिल हो रहे हैं। इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए एक आयोजन समिति का गठन किया गया है जिनमें प्रो राजकुमार जैन, प्रो आनंद कुमार, कॉमरेड हरभजन सिंह सिद्धू, रमाशंकर सिंह, डॉ सुनीलम, क़ुरबान अली, अरुण श्रीवास्तव, डॉ अनिल ठाकुर,राकेश कुमार,श्रीमती मंजू मोहन, बी आर पाटिल, संजय कनोजिया और गुड्डी शामिल हैं।

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है- भारत में समाजवादी आंदोलन की स्थापना को लगभग 85 वर्ष हो चुके हैं। इन 85 वर्षों में समाजवादी नेताओं के शुरूआती 13 वर्ष तो राष्ट्रीय आंदोलन में कांग्रेस पार्टी में रहते हुए देश को गुलामी से निजात और आजादी दिलाने में गुजरे। खासकर 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान समाजवादी नेताओं की अहम भूमिका थी। जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, युसूफ मेहरअली, अरूणा आसफ अली, अच्युत पटवर्धन और ऊषा मेहता 'अगस्त क्रांति’ आंदोलन के हीरो थे।
जनवरी 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस पार्टी में शामिल समाजवादी नेताओं ने तय किया कि वे कांग्रेस पार्टी से अलग होकर अपनी सोशलिस्ट पार्टी बनाएंगे और रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। मार्च 1948 में समाजवादियों ने नासिक में अपनी अलग सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर स्वतंत्र भारत में नए सिरे से राजनीति शुरू की अपनी अलग विचारधारा बनाई। पार्टी की नीति और सिद्धांत बनाए और एक जिम्मेदार विपक्षी दल के रूप में राजनीति शुरू की और 1952 में हुए देश के पहले आम चुनाव में शिरकत की।
इस तरह राष्ट्रीय आंदोलन के समय से लेकर आज तक पिछले 85 वर्षों में समाजवादियों का गौरवमयी इतिहास रहा है। समाजवादियों ने समय -समय पर हर तरह का संघर्ष किया है। चाहे कांग्रेसी सरकारों को समाजवाद के रास्ते पर चलने के लिए मजबूर करना और समता मूलक समाज की स्थापना का मामला हो या पिछडी जातियों को विशेष अवसर दिलाने का सिद्धांत। दाम बांधो, जाति तोड़ो, हिमालय बचाओ, भारत-पाक-बांग्लादेश का महासंघ बनाओ, नर-नारी समानता और हिन्दू-मुसलमानों के बीच आपसी सौहार्द क़ायम करने के लिए समाजवादियों ने बढ़ चढ़कर आंदोलन किये हैं और नागरिक स्वतंत्रता तथा अन्य मानवाधिकारों के लिए सिविल नाफरमानी और सत्याग्रह करते हुए जेल गए हैं।
1974 में लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में लोकतंत्र बचने के लिए जो आंदोलन चलाया गया उसे कौन भूल सकता है, जिसे आज़ादी की दूसरी लड़ाई कहा गया, जिसके कारण आपातकाल लगाया गया और लोकतंत्र का गला घोंटकर तानाशाही क़ायम कर दी गयी। इस आंदोलन के दौरान हज़ारों समाजवादियों को गिरफ्तार किया गया। उन्हें 19 महीनों तक मीसा और डीआईआर जैसे क़ानूनों के तहत जेलों में बंद रखा गया और यातनायें दी गईं, जिसके कारण हशमत लोहिया वारसी और स्नेहलता रेड्डी जैसे कई समाजवादियों की मौत हो गई।
पिछले 85 वर्षों में समाजवादी नेताओं ने हर तरह की कुर्बानी देकर देश को दिशा देने का काम किया है और राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों और उसकी विरासत के आधार पर मिली आज़ादी और राष्ट्रीय आंदोलन की विचारधारा पर बने संविधान को क़ायम रखने की कोशिश की है। उनके समाजवादी सिद्धांतों, नीतियों और विचारों की आज भी प्रासंगिकता है। इसी प्रक्रिया को आगे जारी रखने के उद्देश्य से पिछले वर्ष 17 मई 2018 को दिल्ली में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के 84वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित समाजवादी सम्मेलन में तय किया गया था कि देश भर के समाजवादियों को इकठ्ठा करने के लिए साल भर तक कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे और उसके बाद एक बड़ा समागम आयोजित किया जायेगा।
इसी कड़ी में आगामी 12 - 13 जुलाई 2019 को गाँधी शांति प्रतिष्ठान, नई दिल्ली में यह आयोजन किया जा है। जिसमें वर्तमान सरकार आने के बाद देश में उत्पन्न परिस्थितियों में समाजवादियों की क्या भूमिका हो इस पर भी विचार किया जायेगा। इस समाजवादी समागम का उदघाटन वरिष्ठ समाजवादी नेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डा. जी. जी. पारिख करेंगे।
उनके अलावा देशभर से कई अन्य वरिष्ठ समाजवादी नेता, चिंतक और कार्यकर्ता भी इस समागम में शामिल हो रहे हैं। इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए एक आयोजन समिति का गठन किया गया है जिनमें प्रो राजकुमार जैन, प्रो आनंद कुमार, कॉमरेड हरभजन सिंह सिद्धू, रमाशंकर सिंह, डॉ सुनीलम, क़ुरबान अली, अरुण श्रीवास्तव, डॉ अनिल ठाकुर,राकेश कुमार,श्रीमती मंजू मोहन, बी आर पाटिल, संजय कनोजिया और गुड्डी शामिल हैं।