संभल: कोर्ट के आदेश के बावजूद यूपी पुलिस ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने से इनकार किया

Written by sabrang india | Published on: January 15, 2026
9 जनवरी को जज सुधीर ने कहा कि मामले के तथ्य प्रथम दृष्टया एक संज्ञेय अपराध की ओर इशारा करते हैं और FIR दर्ज करने का आदेश दिया। इसके बावजूद, संभल पुलिस ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर कहा कि वह अदालत के आदेश के खिलाफ अपील करेगी।


साभार : पीटीआई

संभल की एक अदालत ने नवंबर 2024 में शहर में हुई हिंसा के दौरान पुलिसकर्मियों द्वारा एक युवक को गोली मारे जाने के आरोपों के संबंध में FIR दर्ज करने का आदेश दिया था। हालांकि, आदेश के कुछ दिनों बाद पुलिस ने कहा है कि वह FIR दर्ज नहीं करेगी और अदालत के आदेश को चुनौती देगी।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) विभांशु सुधीर ने यामीन नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई की थी। यामीन ने आरोप लगाया कि हिंसा के दौरान स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने उसके बेटे आलम को पीठ में दो बार और हाथ में एक बार गोली मारी। यामीन के अनुसार, उस समय आलम अपना खाने का स्टॉल लगाने गया था। याचिका में जिन अधिकारियों के नाम शामिल हैं, उनमें तत्कालीन सर्कल ऑफिसर अनुज चौधरी, स्टेशन हाउस ऑफिसर अनुज कुमार तोमर और 15–20 अज्ञात अन्य पुलिसकर्मी शामिल हैं।

9 जनवरी को जज सुधीर ने कहा कि मामले के तथ्य प्रथम दृष्टया एक संज्ञेय अपराध की ओर इशारा करते हैं और FIR दर्ज करने का आदेश दिया। इसके बावजूद, संभल पुलिस ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर कहा कि वह अदालत के आदेश के खिलाफ अपील करेगी।

संभल के पुलिस अधीक्षक कृष्ण कुमार ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि जज सुधीर का आदेश “अवैध” है और पुलिस FIR दर्ज नहीं करेगी। उन्होंने कहा, “हिंसा की न्यायिक जांच पहले ही इस निष्कर्ष पर पहुंच चुकी है कि पुलिस की कार्रवाई उचित थी। हम इस आदेश के खिलाफ उचित मंच पर अपील करेंगे।”

गौरतलब है कि कुछ हिंदू संगठनों ने यह दावा किया था कि संभल की शाही जामा मस्जिद एक हिंदू मंदिर के ऊपर बनाई गई है। इसी को लेकर 24 नवंबर, 2024 को मस्जिद के सर्वे के विरोध में हुए प्रदर्शन हिंसक झड़पों में बदल गए थे, जिनमें कम से कम चार मुस्लिम लोगों की मौत हो गई थी। स्थानीय अदालत के निर्देश पर सर्वे का एक पिछला चरण कुछ दिन पहले ही पूरा हुआ था।

उस समय प्रदर्शनकारियों पर पुलिस द्वारा गोली चलाने के आरोप लगे थे, जिन्हें पुलिस ने खारिज कर दिया था।

उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंसा की परिस्थितियों की जांच के लिए तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया था, जिसने अगस्त में अपनी रिपोर्ट सौंपी। हालांकि, रिपोर्ट की सामग्री को आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किया गया।

द वायर हिंदी के अनुसार, यामीन ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि जब उन्होंने संभल के डॉक्टरों और अस्पतालों में आलम का इलाज कराने की कोशिश की, तो इलाज से इनकार कर दिया गया। यामीन ने बताया कि पुलिस के डर से उन्होंने आलम को तीन दिनों तक घर पर ही रखा। उन्होंने यह भी कहा कि मुरादाबाद और अलीगढ़ के अस्पतालों ने भी आलम को भर्ती करने से मना कर दिया और कथित तौर पर कहा गया कि पुलिस ने मेडिकल स्टाफ को संभल हिंसा में घायल लोगों को भर्ती न करने के निर्देश दिए हैं। बाद में यामीन ने अपना पता छिपाकर मेरठ के एक अस्पताल में आलम को भर्ती कराया।

सुनवाई के दौरान जज सुधीर ने पुलिस रिपोर्ट, मेडिकल रिकॉर्ड और फॉरेंसिक रिपोर्ट की समीक्षा की। पुलिस ने अदालत को बताया कि आलम के शरीर से मिली गोली .32 कैलिबर की थी, जिसे पुलिस अपने हथियारों में इस्तेमाल नहीं करती।

हालांकि, जज सुधीर ने कहा कि मेडिकल रिकॉर्ड में आलम की चोट को “गोली लगने का घाव” बताया गया है, जो “दंगे के दौरान पुलिस फायरिंग से संबंधित” है। अदालत के अनुसार, यह तथ्य मामले को संदिग्ध बनाता है।

द वायर हिंदी से बातचीत में आलम के रिश्तेदार शाहनवाज ने कहा कि पुलिस ने आलम को झड़पों में आरोपी तभी बनाया, जब यामीन ने पिछले साल फरवरी में याचिका दायर की थी।

याचिका में जिन पुलिस अधिकारियों पर प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आरोप लगाया गया है, उनमें तत्कालीन सर्कल ऑफिसर अनुज चौधरी भी शामिल हैं, जिन्होंने पिछले साल यह बयान दिया था कि यदि मुसलमान होली के दौरान उन पर रंग लगाए जाने को स्वीकार नहीं कर सकते, तो उन्हें घर के अंदर रहना चाहिए।

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