ज़िला सरकारी वकील ने कहा कि विशेष अत्याचार न्यायालय ने आरोपियों को IPC और SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत दोषी पाया।

गिर सोमनाथ जिले के वेरावल में एक विशेष अदालत ने सोमवार को 2016 के ऊना में दलित पुरुषों की पिटाई के मामले में पांच लोगों को दोषी ठहराया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर फैलने के बाद पूरे गुजरात में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे। अदालत ने सजा पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ज़िला सरकारी वकील केतनसिंह डी. वला ने बताया कि विशेष अत्याचार अदालत ने सुनवाई के दौरान मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों की जांच के बाद आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत दोषी पाया।
यह घटना 11 जुलाई 2016 को ऊना के पास समधियाला गांव में हुई थी, जब एक दलित परिवार के सदस्य एक मृत गाय की खाल उतार रहे थे। पुरुषों के एक समूह ने, जिन्होंने खुद को ‘गौ रक्षक’ बताया था, कथित तौर पर उन्हें रोका, उन पर गौ-हत्या का आरोप लगाया और हमला किया। पीड़ितों में से चार को एक वाहन से बांध दिया गया और इलाके में घुमाते हुए सार्वजनिक रूप से लाठियों से पीटा गया। इस हमले का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं, जिनमें हत्या के प्रयास का आरोप भी शामिल था, तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया।
जांच बाद में गांधीनगर स्थित अपराध जांच विभाग (CID) को सौंप दी गई, जिसने 41 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दायर किया। मामले से जुड़े एक पुलिस अधिकारी की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो जाने के बाद 40 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चला।
डी. वला के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने सुनवाई के दौरान लगभग 240 गवाहों के बयान दर्ज किए। साक्ष्यों का आकलन करने के बाद अदालत ने रमेश भगवान जाधव, राकेश रसिक जोशी, नागजी दया वानिया, प्रमोदगिरी रमेशगिरी गोस्वामी और बलवंतगिरी गोस्वामी को दोषी ठहराया।
वला ने बताया कि अदालत ने उन्हें IPC की धारा 323, 324, 342 और 504 के तहत तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(d), 3(1)(e), 3(1)(r), 3(1)(s) और 3(1)(u) के तहत दोषी पाया।
इस अत्याचार मामले की सुनवाई 2018 से वेरावल की विशेष अत्याचार अदालत में चल रही थी।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, वला ने कहा कि इन पांचों को खतरनाक हथियारों से जान-बूझकर चोट पहुंचाने, अवैध रूप से बंधक बनाने, शांति भंग करने के इरादे से अपमान करने और अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों का अपमान करने जैसे आरोपों में दोषी ठहराया गया है।
इस मामले में कुल 41 लोगों पर आपराधिक मुकदमा चल रहा था, जिनमें ऊना पुलिस स्टेशन के चार पुलिसकर्मी भी शामिल थे। इनमें तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर निर्मलसिंह झाला, तत्कालीन पुलिस सब-इंस्पेक्टर नरेंद्रदेव पांडे, तत्कालीन असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर कंचन परमार और तत्कालीन हेड कांस्टेबल कांजीभाई चुडासमा शामिल थे। मुकदमे के दौरान झाला की मृत्यु हो जाने के कारण उनके खिलाफ मामला समाप्त कर दिया गया। बाकी तीन पुलिस अधिकारियों पर मुकदमा चला और सत्र न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया। इन पुलिसकर्मियों पर आरोपियों को उकसाने, कर्तव्य में लापरवाही, गलत दस्तावेज तैयार करने और सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर जैसे आरोप थे।
आरोपियों पर हत्या का प्रयास, आपराधिक साजिश, गंभीर चोट पहुंचाने का प्रयास, डकैती, अपहरण, महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग, अवैध हिरासत, घातक हथियारों के साथ दंगा, गैर-कानूनी जमावड़ा, जान-बूझकर चोट पहुंचाना, शांति भंग करने के इरादे से अपमान, खतरनाक हथियारों से चोट पहुंचाना, आपराधिक धमकी देना और आपत्तिजनक संदेश प्रसारित करना जैसे आरोप लगाए गए थे। ये आरोप IPC के साथ-साथ SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत दर्ज किए गए थे।
बचाव पक्ष के वकील वी.सी. मावधिया ने कहा, “इस तथाकथित घटना में कई लोग शामिल थे, लेकिन अभियोजन पक्ष यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि किसने क्या किया। इसलिए अदालत ने 35 आरोपियों के खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं पाया।”
दोषी ठहराए गए पांच लोगों में से तीन का प्रतिनिधित्व मावधिया कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन आरोपों में अधिकतम सजा पांच साल तक हो सकती है और सभी दोषी पहले ही पांच साल से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं। उन्होंने कहा, “मेरे मुवक्किल यह तय करेंगे कि वे इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देंगे या नहीं।”
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हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, ज़िला सरकारी वकील केतनसिंह डी. वला ने बताया कि विशेष अत्याचार अदालत ने सुनवाई के दौरान मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों की जांच के बाद आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत दोषी पाया।
यह घटना 11 जुलाई 2016 को ऊना के पास समधियाला गांव में हुई थी, जब एक दलित परिवार के सदस्य एक मृत गाय की खाल उतार रहे थे। पुरुषों के एक समूह ने, जिन्होंने खुद को ‘गौ रक्षक’ बताया था, कथित तौर पर उन्हें रोका, उन पर गौ-हत्या का आरोप लगाया और हमला किया। पीड़ितों में से चार को एक वाहन से बांध दिया गया और इलाके में घुमाते हुए सार्वजनिक रूप से लाठियों से पीटा गया। इस हमले का वीडियो बाद में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं, जिनमें हत्या के प्रयास का आरोप भी शामिल था, तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया।
जांच बाद में गांधीनगर स्थित अपराध जांच विभाग (CID) को सौंप दी गई, जिसने 41 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दायर किया। मामले से जुड़े एक पुलिस अधिकारी की सुनवाई के दौरान मृत्यु हो जाने के बाद 40 आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चला।
डी. वला के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने सुनवाई के दौरान लगभग 240 गवाहों के बयान दर्ज किए। साक्ष्यों का आकलन करने के बाद अदालत ने रमेश भगवान जाधव, राकेश रसिक जोशी, नागजी दया वानिया, प्रमोदगिरी रमेशगिरी गोस्वामी और बलवंतगिरी गोस्वामी को दोषी ठहराया।
वला ने बताया कि अदालत ने उन्हें IPC की धारा 323, 324, 342 और 504 के तहत तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(d), 3(1)(e), 3(1)(r), 3(1)(s) और 3(1)(u) के तहत दोषी पाया।
इस अत्याचार मामले की सुनवाई 2018 से वेरावल की विशेष अत्याचार अदालत में चल रही थी।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, वला ने कहा कि इन पांचों को खतरनाक हथियारों से जान-बूझकर चोट पहुंचाने, अवैध रूप से बंधक बनाने, शांति भंग करने के इरादे से अपमान करने और अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों का अपमान करने जैसे आरोपों में दोषी ठहराया गया है।
इस मामले में कुल 41 लोगों पर आपराधिक मुकदमा चल रहा था, जिनमें ऊना पुलिस स्टेशन के चार पुलिसकर्मी भी शामिल थे। इनमें तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर निर्मलसिंह झाला, तत्कालीन पुलिस सब-इंस्पेक्टर नरेंद्रदेव पांडे, तत्कालीन असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर कंचन परमार और तत्कालीन हेड कांस्टेबल कांजीभाई चुडासमा शामिल थे। मुकदमे के दौरान झाला की मृत्यु हो जाने के कारण उनके खिलाफ मामला समाप्त कर दिया गया। बाकी तीन पुलिस अधिकारियों पर मुकदमा चला और सत्र न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया। इन पुलिसकर्मियों पर आरोपियों को उकसाने, कर्तव्य में लापरवाही, गलत दस्तावेज तैयार करने और सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर जैसे आरोप थे।
आरोपियों पर हत्या का प्रयास, आपराधिक साजिश, गंभीर चोट पहुंचाने का प्रयास, डकैती, अपहरण, महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग, अवैध हिरासत, घातक हथियारों के साथ दंगा, गैर-कानूनी जमावड़ा, जान-बूझकर चोट पहुंचाना, शांति भंग करने के इरादे से अपमान, खतरनाक हथियारों से चोट पहुंचाना, आपराधिक धमकी देना और आपत्तिजनक संदेश प्रसारित करना जैसे आरोप लगाए गए थे। ये आरोप IPC के साथ-साथ SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत दर्ज किए गए थे।
बचाव पक्ष के वकील वी.सी. मावधिया ने कहा, “इस तथाकथित घटना में कई लोग शामिल थे, लेकिन अभियोजन पक्ष यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि किसने क्या किया। इसलिए अदालत ने 35 आरोपियों के खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं पाया।”
दोषी ठहराए गए पांच लोगों में से तीन का प्रतिनिधित्व मावधिया कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन आरोपों में अधिकतम सजा पांच साल तक हो सकती है और सभी दोषी पहले ही पांच साल से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं। उन्होंने कहा, “मेरे मुवक्किल यह तय करेंगे कि वे इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देंगे या नहीं।”
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