पटना हाई कोर्ट ने अवैध गिरफ्तारी पर नाबालिग को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया

Written by sabrang india | Published on: January 14, 2026
कोर्ट ने कहा कि यह जानने के बाद कि बिहार में एक नाबालिग छात्र को गिरफ्तार कर दो महीने से अधिक समय तक जेल में रखा गया, वह “मूक दर्शक” नहीं रह सकता। पुलिस की कार्रवाई को “गैर-कानूनी” घोषित करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार को छात्र को “5 लाख रुपये मुआवजा” देने का निर्देश दिया।



पटना हाई कोर्ट ने बिहार पुलिस द्वारा एक मुस्लिम नाबालिग छात्र की गिरफ्तारी को “गैर-कानूनी” करार देते हुए राज्य सरकार को उसे मुआवजे के रूप में 5 लाख रुपये देने का आदेश दिया है। छात्र को दो महीने से अधिक समय तक जेल में रखा गया था। कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले में “मूक दर्शक” नहीं रह सकता।

मकतूब की रिपोर्ट के अनुसार, लड़के के परिवार ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका दायर की थी, जिसमें याचिकाकर्ता को “अवैध हिरासत” से रिहा करने की मांग की गई थी।

जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस ऋतेश कुमार की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि नाबालिग की हिरासत पूरी तरह अनुचित थी और पुलिस को अपने कृत्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि यह जानने के बाद कि बिहार में एक नाबालिग छात्र को गिरफ्तार कर दो महीने से अधिक समय तक जेल में रखा गया, वह “मूक दर्शक” नहीं रह सकता। पुलिस की कार्रवाई को “गैर-कानूनी” घोषित करते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार को छात्र को “5 लाख रुपये मुआवजा” देने का निर्देश दिया।

23 अक्टूबर, 2025 को लड़के को हिरासत में लिए जाने के बाद उसके परिवार ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी।

पीठ ने कहा कि जांच अधिकारी ने 16 वर्ष से कम उम्र के नाबालिग को बिना किसी ठोस कारण या साक्ष्य के गिरफ्तार किया, जो कानूनन नहीं किया जाना चाहिए था।

पीठ ने टिप्पणी की,
“जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ता, जो 16 वर्ष से कम उम्र का छात्र है, को बिना किसी ठोस सबूत के गिरफ्तार कर लिया। इस मामले में ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था।”

इसलिए कोर्ट ने कहा, “हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यह याचिकाकर्ता की गैर-कानूनी गिरफ्तारी का मामला है और ऐसी स्थिति में यह न्यायालय, एक संवैधानिक अदालत होने के नाते, मूक दर्शक नहीं रह सकता।”

न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करने में विफल रहे कि नाबालिग को अवैध गिरफ्तारी का सामना न करना पड़े।

पटना हाई कोर्ट ने नाबालिग की “गैर-कानूनी गिरफ्तारी और हिरासत” के लिए 5 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया है, जिसका भुगतान राज्य सरकार करेगी, लेकिन यह राशि जिम्मेदार अधिकारियों से वसूल की जाएगी। कोर्ट ने कहा कि नाबालिग को दो महीने से अधिक समय तक “शारीरिक और मानसिक पीड़ा” झेलनी पड़ी और राज्य सरकार को आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से एक महीने के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा, “हम इस राशि का निर्धारण इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कर रहे हैं कि एक नाबालिग छात्र को ढाई महीने तक शारीरिक और मानसिक पीड़ा सहनी पड़ी है। राज्य सरकार आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से एक माह के भीतर यह राशि याचिकाकर्ता को अदा करेगी।”

कोर्ट ने आगे कहा कि जांच पूरी होने के बाद जिम्मेदार अधिकारियों से लागत और मुआवजे की राशि की वसूली की जाएगी। यह वसूली आदेश की जानकारी मिलने या सूचित किए जाने के छह महीने के भीतर पूरी की जानी होगी।

इसके अलावा, कोर्ट ने लड़के के परिवार को “मुकदमेबाजी में हुए खर्च” के लिए अतिरिक्त 15,000 रुपये देने का भी निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि यह खर्च “पुलिस अधिकारी द्वारा शक्ति के दुरुपयोग के कारण परिवार पर थोपा गया था।”

पटना हाई कोर्ट ने बिहार के पुलिस महानिदेशक को भी मामले में प्रशासनिक जांच शुरू करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान सामने आने वाले साक्ष्यों के आधार पर उचित निर्णय लिया जाए और दोषी अधिकारियों से लागत व मुआवजे की राशि वसूल की जाए।

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि छात्र नाबालिग था, फिर भी उसकी स्वतंत्रता का उल्लंघन किया गया, क्योंकि पुलिस ने उसे बिना साक्ष्य के गिरफ्तार किया और मजिस्ट्रेट ने बिना समुचित विचार किए उसे जेल भेज दिया।

यह मामला मधेपुरा जिले के एक गांव में हुए झगड़े से जुड़ा है, जहां एक एफआईआर दर्ज की गई थी। हालांकि, छात्र का नाम चार्जशीट में नहीं था और अधिकारियों ने 23 अक्टूबर को हिरासत में लेने से पहले उसकी उम्र गलत तरीके से 19 वर्ष दर्ज कर दी थी।

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