भोपाल। सरदार सरोवर के हजारों विस्थापितों के पुनर्वास की मांग के साथ मेधा पाटकर गत नौ दिन से अनिश्चितकालीन अनशन पर हैं। इस दौरान उनकी तबियत भी रविवार से खराब चल रही है लेकिन वे अपनी मांगों के साथ खड़ी हैं। ऐसे में नर्मदा बचाओ आंदोलनकारियों ने मध्य प्रदेश के सीएम कमलनाथ को पत्र लिखकर मांग की है कि विस्थापितों का पुनर्वास करने के साथ ही उन्हें उचित मुआवजा भी दिया जाए।

नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर के हजारों विस्थापित परिवार गांव-गांव में डूब का सामना कर रहे है। इस डूब का सामना करने के दौरान अब तक निमाड़ और आदिवासी क्षेत्र के 3 गरीब किसानों की मृत्यु हो चुकी है। ऐसे में सरकार से मांग है कि जलस्तर 122 मीटर तक किया जाए।
सीएम को लिखे पत्र में कहा गया है कि जलाशय में 139 मी0 तक पानी भरने का विरोध आपकी सरकार द्वारा भी किया गया है फिर भी गुजरात और केंद्र शासन से ही जुड़े नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण ने कभी न विस्थापितों के पुनर्वास की, न ही पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की परवाह की है न ही सत्य रिपोर्ट या शपथ पत्र पेश किये हैं।
हजारों परिवारों का सम्पूर्ण पुनर्वास भी मध्य प्रदेश में अधूरा है, पुनर्वास स्थलों पर कानूनन सुविधाएँ नही है। ऐसे में विस्थापित अपने मूल गाँव में खेती, आजीविका डूबते देख संघर्ष कर रहे है। ऐसे में आज की मध्य प्रदेश सरकार लोगो का साथ नही छोड़ सकती। ऐसा हमारा विश्वास है।
मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव द्वारा नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण NCA को भेजे गये 27 मई के पत्र अनुसार 76 गांवों में 6000 परिवार डूब क्षेत्र में निवासरत हैं। 8500 अर्जियां तथा 2952 खेती या 60 लाख की पात्रता के लिए अर्जियाँ लंबित हैं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन के अनुसार 6000 परिवार और 76 गाँव ही नहीं, काफी अधिक मात्रा में (करीब 32000 परिवार) निवासरत हैं। गांवों में विकल्प में अधिकार न पाये दुकान, छोटे उद्योग, कारीगरी, केवट, कुम्हार तो डूब लाकर क्या इन गांवों की हत्या करने दे सकते हैं?
इन मुद्दों पर कार्य बहुत धीमी गति से आगे बढ़ा है। आज तुरंत सही प्रक्रिया अपनाना जरुरी है क्योंकि पिछले 15 सालों में काफी गड़बड़ी, धांधली, झूठे रिपोर्ट और भ्रष्टाचार चला है। आज भी दुर्देव से भ्रष्टाचारियों को रोका नहीं गया है। पूर्व शासन से सर्वोच्च या उच्च अदालत में प्रस्तुत याचिकाएँ वापस करने के आश्वासनों की पूर्ति आज तक नहीं हुई।
इसीलिए किसी भी हालत में सरदार सरोवर में 122 मी. के उपर पानी नहीं रहे, यह मध्य प्रदेश सरकार को देखना होगा। जिसके लिये आपके साथ नर्मदा बचाओं आंदोलन का तथा हमारा भी सहयोग रहेगा।
आंदोलनकारियों की तरफ से कहा गया है कि आपने तथा आपकी पार्टी ने न केवल अपने चुनाव घोषणा पत्र द्वारा किन्तु प्रत्यक्ष विस्थापितों के साथ खड़े होकर भी समर्थन दिया है। मध्य प्रदेश में 1996 में व 1978 के निमाड़ बचाओ आंदोलन में, सर्वदलीय सहमति भी इस मुद्दे पर हो चुकी है। 34 साल के अहिंसक संघर्ष की सीमा पर जाकर नर्मदा घाटी में मेधा पाटकर व प्रभावित गांव की 24 महिलाओं का अनिश्चितकालीन उपवास चालू किया है।
नर्मदा ट्रिब्यूनल और सर्वोच्च अदालत के फैसलों के तहत डूब के पहले सम्पूर्ण पुनर्वास हो, यह सुनिश्चित करना, आपका हक़ भी है और कानूनी ज़िम्मेदारी भी". अतः आपकी सरकार से हमारी अपेक्षा है कि तुरंत संवेदनशील युद्ध स्तरीय, न्यायपूर्ण निर्णय और कार्यवाही करें।

नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर के हजारों विस्थापित परिवार गांव-गांव में डूब का सामना कर रहे है। इस डूब का सामना करने के दौरान अब तक निमाड़ और आदिवासी क्षेत्र के 3 गरीब किसानों की मृत्यु हो चुकी है। ऐसे में सरकार से मांग है कि जलस्तर 122 मीटर तक किया जाए।
सीएम को लिखे पत्र में कहा गया है कि जलाशय में 139 मी0 तक पानी भरने का विरोध आपकी सरकार द्वारा भी किया गया है फिर भी गुजरात और केंद्र शासन से ही जुड़े नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण ने कभी न विस्थापितों के पुनर्वास की, न ही पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की परवाह की है न ही सत्य रिपोर्ट या शपथ पत्र पेश किये हैं।
हजारों परिवारों का सम्पूर्ण पुनर्वास भी मध्य प्रदेश में अधूरा है, पुनर्वास स्थलों पर कानूनन सुविधाएँ नही है। ऐसे में विस्थापित अपने मूल गाँव में खेती, आजीविका डूबते देख संघर्ष कर रहे है। ऐसे में आज की मध्य प्रदेश सरकार लोगो का साथ नही छोड़ सकती। ऐसा हमारा विश्वास है।
मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव द्वारा नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण NCA को भेजे गये 27 मई के पत्र अनुसार 76 गांवों में 6000 परिवार डूब क्षेत्र में निवासरत हैं। 8500 अर्जियां तथा 2952 खेती या 60 लाख की पात्रता के लिए अर्जियाँ लंबित हैं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन के अनुसार 6000 परिवार और 76 गाँव ही नहीं, काफी अधिक मात्रा में (करीब 32000 परिवार) निवासरत हैं। गांवों में विकल्प में अधिकार न पाये दुकान, छोटे उद्योग, कारीगरी, केवट, कुम्हार तो डूब लाकर क्या इन गांवों की हत्या करने दे सकते हैं?
इन मुद्दों पर कार्य बहुत धीमी गति से आगे बढ़ा है। आज तुरंत सही प्रक्रिया अपनाना जरुरी है क्योंकि पिछले 15 सालों में काफी गड़बड़ी, धांधली, झूठे रिपोर्ट और भ्रष्टाचार चला है। आज भी दुर्देव से भ्रष्टाचारियों को रोका नहीं गया है। पूर्व शासन से सर्वोच्च या उच्च अदालत में प्रस्तुत याचिकाएँ वापस करने के आश्वासनों की पूर्ति आज तक नहीं हुई।
इसीलिए किसी भी हालत में सरदार सरोवर में 122 मी. के उपर पानी नहीं रहे, यह मध्य प्रदेश सरकार को देखना होगा। जिसके लिये आपके साथ नर्मदा बचाओं आंदोलन का तथा हमारा भी सहयोग रहेगा।
आंदोलनकारियों की तरफ से कहा गया है कि आपने तथा आपकी पार्टी ने न केवल अपने चुनाव घोषणा पत्र द्वारा किन्तु प्रत्यक्ष विस्थापितों के साथ खड़े होकर भी समर्थन दिया है। मध्य प्रदेश में 1996 में व 1978 के निमाड़ बचाओ आंदोलन में, सर्वदलीय सहमति भी इस मुद्दे पर हो चुकी है। 34 साल के अहिंसक संघर्ष की सीमा पर जाकर नर्मदा घाटी में मेधा पाटकर व प्रभावित गांव की 24 महिलाओं का अनिश्चितकालीन उपवास चालू किया है।
नर्मदा ट्रिब्यूनल और सर्वोच्च अदालत के फैसलों के तहत डूब के पहले सम्पूर्ण पुनर्वास हो, यह सुनिश्चित करना, आपका हक़ भी है और कानूनी ज़िम्मेदारी भी". अतः आपकी सरकार से हमारी अपेक्षा है कि तुरंत संवेदनशील युद्ध स्तरीय, न्यायपूर्ण निर्णय और कार्यवाही करें।