मणिपुर गैंगरेप पीड़िता की मौत: 2023 की जातीय हिंसा के तीन साल बाद भी नहीं मिला न्याय

Written by sabrang india | Published on: January 20, 2026
मेइतेई–कुकी संघर्ष के दौरान अगवा की गई, बेरहमी से हमला और गैंगरेप का शिकार हुई एक कुकी युवती की सदमे से जुड़ी बीमारी के कारण मौत हो गई। उसके मामले में बिना किसी गिरफ्तारी के लगातार होती देरी ने मणिपुर में यौन हिंसा के मामलों में मुकदमा चलाने में सिस्टम की गंभीर नाकामी को उजागर कर दिया है।


Image: MSN

मणिपुर में जातीय हिंसा के दौरान हुए एक भयावह गैंगरेप से बच निकलने के लगभग तीन साल बाद, एक युवा कुकी-जो महिला की लंबी बीमारी और गहरे मानसिक आघात के चलते मौत हो गई। उसे अपने जीवनकाल में न्याय नहीं मिल सका। उसकी मौत ने मणिपुर संघर्ष के दौरान यौन हिंसा से निपटने के तरीकों पर देशभर में फिर से आक्रोश पैदा कर दिया है और कुकी संगठनों द्वारा जवाबदेही तथा कुकी-जो समुदाय के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था की मांग को और तेज कर दिया है।

मई 2023 में मेइतेई–कुकी जातीय झड़पों के शुरुआती दिनों में युवती का अपहरण कर गैंगरेप किया गया था। 10 जनवरी 2026 को गुवाहाटी में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। उसके परिवार और कुकी संगठनों के अनुसार, उसे लगी गंभीर चोटें और मानसिक आघात कभी ठीक नहीं हो सके, जिससे वह जीवनभर शारीरिक रूप से कमजोर और मानसिक रूप से परेशान रही।

कानून-व्यवस्था के ध्वस्त होने के बीच अपहरण और हमला

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, युवती उस समय 18 वर्ष की थी। 15 मई 2023 को इंफाल में एक एटीएम से पैसे निकालते समय उसका अपहरण कर लिया गया। आरोप है कि काली शर्ट पहने चार हथियारबंद लोग उसे एक सफेद बोलेरो वाहन में ले गए, जिनका संबंध कथित तौर पर हिंसा के दौरान सक्रिय मैतेई उग्रवादी समूह अरामबाई तेंगगोल से था।

अपनी प्राथमिकी (FIR) में पीड़िता ने आरोप लगाया कि उसे मेइरा पाइबी—मैतेई महिलाओं के एक निगरानी समूह—के सदस्यों ने अपहरणकर्ताओं को सौंप दिया था। यह आरोप कुकी संगठनों द्वारा बार-बार उठाया गया है।

पीड़िता को लैंगोल और बिष्णुपुर सहित कई स्थानों पर ले जाया गया, जहां कथित तौर पर तीन लोगों ने उसके साथ बार-बार बलात्कार किया, जबकि चौथा वाहन चला रहा था। जुलाई 2023 में एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में उसने बताया था कि उसकी आंखों पर पट्टी बांध दी गई थी, उसे खाना-पानी नहीं दिया गया, पूरी रात यातनाएं दी गईं और अंत में उसे गंभीर हालत में एक पहाड़ी पर छोड़ दिया गया।

उसने कहा था, “मुझे एक पहाड़ी पर ले जाया गया, जहां मुझे यातनाएं दी गईं और मुझ पर हमला किया गया। वे मेरे साथ जो कुछ भी कर सकते थे, उन्होंने किया।”

अगली सुबह तड़के वह शौच का बहाना बनाकर भागने में सफल रही। घायल और खून से लथपथ हालत में वह पहाड़ी से नीचे उतरी और अंततः एक ऑटो-रिक्शा में सब्जियों के ढेर के नीचे छिपकर सुरक्षित स्थान तक पहुंची। उसका प्रारंभिक इलाज कांगपोकपी में हुआ और बाद में उसे कोहिमा, गुवाहाटी और मणिपुर के विभिन्न अस्पतालों में रेफर किया गया।

FIR में देरी, CBI जांच और अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं

उस समय मणिपुर में कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त थी, जिसके कारण पीड़िता 21 जुलाई 2023 को—हमले के दो महीने से अधिक समय बाद—पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकी। कांगपोकपी पुलिस स्टेशन में ज़ीरो FIR दर्ज की गई, जिसे बाद में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया।

द हिंदू के अनुसार, मामला फिलहाल गुवाहाटी की एक विशेष CBI अदालत में लंबित है। हालांकि, लगभग ढाई साल बीत जाने के बावजूद न तो कोई गिरफ्तारी हुई है, न ही आरोप तय किए गए हैं। पीड़िता के परिवार का कहना है कि उन्हें मणिपुर पुलिस या CBI से कोई ठोस जानकारी या प्रगति नहीं बताई गई।

लंबे समय तक चला आघात और बिगड़ती सेहत

परिवार ने न्यूज़लॉन्ड्री और अन्य मीडिया संस्थानों को बताया कि पीड़िता न तो शारीरिक चोटों से उबर पाई और न ही मानसिक सदमे से। उसे सांस लेने में दिक्कत, गर्भाशय से जुड़ी समस्याएं, अवसाद और लगातार स्वास्थ्य जटिलताओं का सामना करना पड़ा।

उसकी मां ने कहा, “घटना से पहले मेरी बेटी हमेशा मुस्कुराती रहती थी। उसके बाद उसकी मुस्कान चली गई। वह ज़्यादातर घर पर रहती थी, कम बोलती थी, कभी बाइबिल पढ़ती थी तो कभी चुपचाप टीवी देखती रहती थी।”

इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम (ITLF) ने बताया कि उसे गर्भाशय और आंतरिक अंगों में गंभीर चोटें आई थीं और उसे तीन राज्यों में बार-बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। हालांकि परिवार को कुछ मुआवजा मिला, लेकिन उसकी राशि और स्रोत को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

मौत के बाद आक्रोश और नई मांगें

उसकी मौत के बाद मणिपुर और दिल्ली में कुकी संगठनों ने कैंडल मार्च निकाले और न्याय की मांग करते हुए तीखे बयान जारी किए। ITLF ने उसकी मौत को “कुकी-जो लोगों को बेरहमी से निशाना बनाए जाने का एक और दर्दनाक प्रमाण” बताया और दोहराया कि समुदाय के पास अब “हमारी सुरक्षा, गरिमा और अस्तित्व के लिए अलग प्रशासन की मांग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।” यह रिपोर्ट पीटीआई ने प्रकाशित की।

कुकी स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (KSO), दिल्ली-NCR ने मांग की कि उसकी मौत को आधिकारिक तौर पर 2023 की हिंसा का प्रत्यक्ष परिणाम माना जाए।  KSO ने कहा, “इस मौत को इससे अलग मानना न्याय से इनकार और जवाबदेही से बचने के समान होगा।”

कुकी-जो विमेंस फोरम, दिल्ली-NCR ने पीड़िता की साहसिक जिजीविषा को याद करते हुए कहा, “लगभग तीन वर्षों तक उसने ऐसा दर्द सहा, जिसे किसी भी इंसान को कभी नहीं सहना चाहिए।”

‘एक राष्ट्रीय शर्म’: वृंदा करात

पीटीआई के अनुसार, वरिष्ठ CPI(M) नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद वृंदा करात ने पीड़िता की मौत को “राष्ट्रीय शर्म” करार दिया और कहा कि अपराध के लगभग दो साल बाद भी राज्य और न्याय व्यवस्था पूरी तरह विफल रही।

करात ने कहा, “उसे दो बार शिकार बनाया गया—पहली बार उस राजनीति ने, जिसने नफरत और हिंसा को बढ़ावा दिया, और दूसरी बार उस व्यवस्था ने, जो समय पर कार्रवाई करने में नाकाम रही।”

उन्होंने RSS-BJP द्वारा बनाए गए राजनीतिक माहौल को दोषी ठहराया, जिसने हिंसा के दौरान सशस्त्र समूहों को बिना रोक-टोक काम करने दिया। उन्होंने कहा,
“न्याय के बिना उसकी मौत हमारे प्रशासनिक और न्यायिक संस्थानों पर एक गंभीर आरोप है।”

जवाबदेही का गहराता संकट

पीड़िता की मौत ने एक बार फिर मणिपुर संघर्ष के दौरान यौन हिंसा के दर्जनों अनसुलझे मामलों की ओर ध्यान खींचा है। मई 2023 में शुरू हुआ यह संघर्ष भूमि अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और घाटी में रहने वाले मैतेई समुदाय तथा पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाली कुकी-जो जनजातियों के बीच जातीय तनाव से जुड़ा है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अब तक 260 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। फरवरी 2025 से मणिपुर राष्ट्रपति शासन के अधीन है, इसके बावजूद पीड़ित परिवार लगातार निष्क्रियता, चुप्पी और न्याय से वंचित किए जाने की शिकायत कर रहे हैं।

वृंदा करात ने कहा, “वह केवल मणिपुर की बेटी नहीं थी, बल्कि भारत की बेटी थी।”

बिना गिरफ्तारी, बिना जवाबदेही और बिना न्याय के उसकी मौत अब संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में यौन हिंसा के प्रति राज्य की प्रतिक्रिया पर एक कठोर अभियोग है—और यह याद दिलाती है कि लंबे समय तक की गई निष्क्रियता की मानवीय कीमत कितनी भयावह हो सकती है।

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