जम्मू में एक मेडिकल कॉलेज को इसलिए बंद कर दिया गया क्योंकि मुस्लिम छात्रों को मेरिट के आधार पर MBBS में प्रवेश मिला था। नफरत और बदनामी के ऐसे ही माहौल में, और अब खुले नफरत भरे प्रचार के बीच, मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में एक स्कूल को कथित तौर पर सिर्फ इसलिए गिरा दिया गया क्योंकि उसे एक मुस्लिम ने बनवाया था।

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में एक स्कूल को कथित तौर पर केवल इसलिए बुलडोज़र से गिरा दिया गया क्योंकि उसे एक मुस्लिम ने बनवाया था। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर देशभर में आक्रोश देखने को मिला। इस भयावह “बुलडोज़र कार्रवाई” के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।
अब्दुल नईम, जिन्होंने आदिवासी और दलित बच्चों के लिए एक स्कूल बनाने हेतु लगभग 20 लाख रुपये का कर्ज लिया और परिवार की बचत लगाई, उन्हें प्रशासन के आदेश पर अपने सपने को मलबे में बदलते हुए देखना पड़ा।
भारत कभी बुलडोज़रों पर नहीं बना। यह बहुलवाद, गरिमा और समान नागरिकता के मूल्यों पर टिका है।

इसी बीच, इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि बैतूल जिले में नर्सरी से कक्षा 8 तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए बनाया गया एक निजी स्कूल प्रशासनिक पक्षपात का शिकार हो गया। अफवाहों के आधार पर उसे गलत तरीके से एक “अनधिकृत मदरसा” बताकर बदनाम किया गया, जिसके बाद स्कूल के कुछ हिस्सों को गिरा दिया गया। अधिकारियों ने बुधवार, 14 जनवरी को अख़बार को इसकी जानकारी दी।
स्थानीय निवासी अब्दुल नईम ने कथित तौर पर स्कूल के निर्माण में लगभग 20 लाख रुपये का कर्ज लिया था और परिवार की बचत भी लगाई थी। 13 जनवरी की शाम उन्होंने अपने “शैक्षिक सपने” को मलबे में तब्दील होते देखा, जब JCB और अन्य अर्थमूवर्स ने प्रशासनिक आदेशों के तहत एकतरफा कार्रवाई करते हुए स्कूल की दीवारें और सामने का शेड गिरा दिया। निजी ज़मीन पर बनी इस इमारत के मालिक को न तो कोई पूर्व नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का मौका, जिससे इस कार्रवाई की वैधता और संवैधानिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, नईम पिछले कई वर्षों से ढाबा गांव और आसपास की आदिवासी बस्तियों के बच्चों के लिए नर्सरी से कक्षा 8 तक का स्कूल खोलने का सपना देख रहे थे। इन इलाकों में परिवारों को अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए मीलों दूर भेजना पड़ता है। नईम ने हार नहीं मानी और कमर्शियल भूमि का डायवर्जन कराया, पंचायत से NOC प्राप्त की और 30 दिसंबर को स्कूल शिक्षा विभाग में सभी आवश्यक भूमि दस्तावेजों के साथ औपचारिक आवेदन जमा किया।
नईम ने कहा, “मैंने अपनी निजी ज़मीन पर स्कूल बनाने का फैसला इसलिए किया ताकि मेरा गांव आगे बढ़ सके और बच्चों को पढ़ने का मौका मिले। लेकिन सीनियर अधिकारियों ने दावा किया कि हम यहां गलत काम कर रहे हैं।” उन्होंने बताया कि निर्माण कार्य ठीक से चल रहा था, तभी महज़ तीन दिनों में फैलाई गई झूठी अफवाहों के आधार पर यह कार्रवाई की गई। इन अफवाहों में गलत तरीके से कहा गया कि इलाके में मदरसा बनाया जा रहा है—जबकि मदरसा बनाना भी कोई गैरकानूनी काम नहीं है।
नईम ने कहा, “यह ऐसा गांव है जहां सिर्फ तीन मुस्लिम परिवार रहते हैं। यहां मदरसा कैसे चल सकता है? और इमारत अभी पूरी भी नहीं हुई थी—न कोई कक्षा थी, न कोई छात्र।”
घटनाक्रम
रविवार, 11 जनवरी को ग्राम पंचायत ने नईम को बिना अनुमति निर्माण का हवाला देते हुए एक नोटिस जारी किया और स्वयं ढांचा गिराने का आदेश दिया। जब नईम औपचारिक जवाब देने पंचायत कार्यालय पहुंचे, तो उन्होंने बताया कि अधिकारियों ने उनका आवेदन लेने से इनकार कर दिया और बाद में आने को कहा।
दो दिन बाद, 13 जनवरी को, जब नईम और गांव के कुछ लोग कलेक्टर से मिलने और मामले को समझाने के लिए जिला कलेक्ट्रेट गए हुए थे, उसी दौरान प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी। भारी पुलिस बल के साथ एक JCB मशीन ढाबा गांव स्थित निर्माण स्थल पर पहुंची। शाम तक स्कूल भवन का एक हिस्सा और सामने का शेड गिरा दिया गया।
सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट अजीत मरावी ने, एक संवैधानिक पद पर आसीन अधिकारी होने के बावजूद, इस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह ग्राम पंचायत की शिकायत के बाद की गई, जिसमें अतिक्रमण और नियम उल्लंघन का आरोप था। मरावी ने कहा, “जांच में पाया गया कि निर्माण का कुछ हिस्सा अतिक्रमण के अंतर्गत आता है। केवल गैरकानूनी हिस्से को हटाया गया है, पूरी इमारत को नहीं।” उन्होंने यह भी दावा किया कि सभी आवश्यक अनुमतियां नहीं ली गई थीं।
हालांकि, नईम ने इन आरोपों से पूरी तरह इनकार किया। उन्होंने कहा, “मेरे पास पंचायत का NOC था। मैंने स्कूल की मान्यता के लिए आवेदन किया था। अगर कागज़ात में कोई कमी थी, तो मैं सरकार द्वारा लगाया गया कोई भी जुर्माना देने को तैयार था।”
वीडियो यहां देखा जा सकता है।

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में एक स्कूल को कथित तौर पर केवल इसलिए बुलडोज़र से गिरा दिया गया क्योंकि उसे एक मुस्लिम ने बनवाया था। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर देशभर में आक्रोश देखने को मिला। इस भयावह “बुलडोज़र कार्रवाई” के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।
अब्दुल नईम, जिन्होंने आदिवासी और दलित बच्चों के लिए एक स्कूल बनाने हेतु लगभग 20 लाख रुपये का कर्ज लिया और परिवार की बचत लगाई, उन्हें प्रशासन के आदेश पर अपने सपने को मलबे में बदलते हुए देखना पड़ा।
भारत कभी बुलडोज़रों पर नहीं बना। यह बहुलवाद, गरिमा और समान नागरिकता के मूल्यों पर टिका है।

इसी बीच, इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि बैतूल जिले में नर्सरी से कक्षा 8 तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए बनाया गया एक निजी स्कूल प्रशासनिक पक्षपात का शिकार हो गया। अफवाहों के आधार पर उसे गलत तरीके से एक “अनधिकृत मदरसा” बताकर बदनाम किया गया, जिसके बाद स्कूल के कुछ हिस्सों को गिरा दिया गया। अधिकारियों ने बुधवार, 14 जनवरी को अख़बार को इसकी जानकारी दी।
स्थानीय निवासी अब्दुल नईम ने कथित तौर पर स्कूल के निर्माण में लगभग 20 लाख रुपये का कर्ज लिया था और परिवार की बचत भी लगाई थी। 13 जनवरी की शाम उन्होंने अपने “शैक्षिक सपने” को मलबे में तब्दील होते देखा, जब JCB और अन्य अर्थमूवर्स ने प्रशासनिक आदेशों के तहत एकतरफा कार्रवाई करते हुए स्कूल की दीवारें और सामने का शेड गिरा दिया। निजी ज़मीन पर बनी इस इमारत के मालिक को न तो कोई पूर्व नोटिस दिया गया और न ही अपना पक्ष रखने का मौका, जिससे इस कार्रवाई की वैधता और संवैधानिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, नईम पिछले कई वर्षों से ढाबा गांव और आसपास की आदिवासी बस्तियों के बच्चों के लिए नर्सरी से कक्षा 8 तक का स्कूल खोलने का सपना देख रहे थे। इन इलाकों में परिवारों को अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए मीलों दूर भेजना पड़ता है। नईम ने हार नहीं मानी और कमर्शियल भूमि का डायवर्जन कराया, पंचायत से NOC प्राप्त की और 30 दिसंबर को स्कूल शिक्षा विभाग में सभी आवश्यक भूमि दस्तावेजों के साथ औपचारिक आवेदन जमा किया।
नईम ने कहा, “मैंने अपनी निजी ज़मीन पर स्कूल बनाने का फैसला इसलिए किया ताकि मेरा गांव आगे बढ़ सके और बच्चों को पढ़ने का मौका मिले। लेकिन सीनियर अधिकारियों ने दावा किया कि हम यहां गलत काम कर रहे हैं।” उन्होंने बताया कि निर्माण कार्य ठीक से चल रहा था, तभी महज़ तीन दिनों में फैलाई गई झूठी अफवाहों के आधार पर यह कार्रवाई की गई। इन अफवाहों में गलत तरीके से कहा गया कि इलाके में मदरसा बनाया जा रहा है—जबकि मदरसा बनाना भी कोई गैरकानूनी काम नहीं है।
नईम ने कहा, “यह ऐसा गांव है जहां सिर्फ तीन मुस्लिम परिवार रहते हैं। यहां मदरसा कैसे चल सकता है? और इमारत अभी पूरी भी नहीं हुई थी—न कोई कक्षा थी, न कोई छात्र।”
घटनाक्रम
रविवार, 11 जनवरी को ग्राम पंचायत ने नईम को बिना अनुमति निर्माण का हवाला देते हुए एक नोटिस जारी किया और स्वयं ढांचा गिराने का आदेश दिया। जब नईम औपचारिक जवाब देने पंचायत कार्यालय पहुंचे, तो उन्होंने बताया कि अधिकारियों ने उनका आवेदन लेने से इनकार कर दिया और बाद में आने को कहा।
दो दिन बाद, 13 जनवरी को, जब नईम और गांव के कुछ लोग कलेक्टर से मिलने और मामले को समझाने के लिए जिला कलेक्ट्रेट गए हुए थे, उसी दौरान प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी। भारी पुलिस बल के साथ एक JCB मशीन ढाबा गांव स्थित निर्माण स्थल पर पहुंची। शाम तक स्कूल भवन का एक हिस्सा और सामने का शेड गिरा दिया गया।
सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट अजीत मरावी ने, एक संवैधानिक पद पर आसीन अधिकारी होने के बावजूद, इस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह ग्राम पंचायत की शिकायत के बाद की गई, जिसमें अतिक्रमण और नियम उल्लंघन का आरोप था। मरावी ने कहा, “जांच में पाया गया कि निर्माण का कुछ हिस्सा अतिक्रमण के अंतर्गत आता है। केवल गैरकानूनी हिस्से को हटाया गया है, पूरी इमारत को नहीं।” उन्होंने यह भी दावा किया कि सभी आवश्यक अनुमतियां नहीं ली गई थीं।
हालांकि, नईम ने इन आरोपों से पूरी तरह इनकार किया। उन्होंने कहा, “मेरे पास पंचायत का NOC था। मैंने स्कूल की मान्यता के लिए आवेदन किया था। अगर कागज़ात में कोई कमी थी, तो मैं सरकार द्वारा लगाया गया कोई भी जुर्माना देने को तैयार था।”
वीडियो यहां देखा जा सकता है।