दलित समुदाय पर केंद्रित अध्ययन से ऑनलाइन भेदभाव और संरचनात्मक असमानताओं का खुलासा

साभार : विकिपीडिया
यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ, स्कूल ऑफ मैनेजमेंट की एक नई रिसर्च से पता चलता है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म—जिन्हें अक्सर सभी को अपनी बात कहने का अवसर देने के लिए सराहा जाता है—दरअसल असमानता को और बढ़ा सकते हैं तथा वंचित समुदायों को अलग-थलग कर सकते हैं।
यह अध्ययन भारत के दलित समुदाय पर केंद्रित था, जिन्हें पहले “अछूत” कहा जाता था और जिन्हें अब कानूनी रूप से अनुसूचित जाति (Scheduled Castes) के रूप में जाना जाता है। दलित, जो भारत की 1.47 अरब की आबादी में लगभग 20 करोड़ से अधिक हैं, पारंपरिक हिंदू जाति व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समूह हैं। उन्हें लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक भेदभाव तथा उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। ऐतिहासिक रूप से उन्हें ऐसे कार्यों तक सीमित रखा जाता था जिन्हें तथाकथित रूप से “अशुद्ध” माना जाता था, जैसे पशु वध और चमड़ा उद्योग से जुड़े काम।
डॉ. प्रदीप अत्री ने कहा, “तरक्की बहुत धीमी है और दलितों के खिलाफ भेदभाव व हिंसा अब भी व्यापक है। हालांकि, समुदाय के अधिक लोग अब सार्वजनिक सेवाओं, बैंकिंग, रेलवे और कभी-कभी निजी उद्योगों में भी काम कर रहे हैं, और एक दलित मध्यवर्ग उभर रहा है। उम्मीद थी कि सोशल मीडिया इस प्रगति को तेज करेगा—लेकिन कई मामलों में इसने समस्याओं को और बढ़ा दिया है।”
अध्ययन, जिसका शीर्षक है—“You Belong to Gutter, Not Facebook or Twitter: Recovering Dalit Histories from the Shadows of Social Media”—यह दर्शाता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म किस प्रकार पहले से भेदभाव का सामना कर रहे समूहों के इतिहास और अनुभवों को आकार देते हैं, सीमित करते हैं और कभी-कभी उन्हें हाशिए पर धकेल देते हैं। अध्ययन में ऑनलाइन बहिष्कार के तीन प्रमुख तरीकों की पहचान की गई:

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यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ, स्कूल ऑफ मैनेजमेंट की एक नई रिसर्च से पता चलता है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म—जिन्हें अक्सर सभी को अपनी बात कहने का अवसर देने के लिए सराहा जाता है—दरअसल असमानता को और बढ़ा सकते हैं तथा वंचित समुदायों को अलग-थलग कर सकते हैं।
यह अध्ययन भारत के दलित समुदाय पर केंद्रित था, जिन्हें पहले “अछूत” कहा जाता था और जिन्हें अब कानूनी रूप से अनुसूचित जाति (Scheduled Castes) के रूप में जाना जाता है। दलित, जो भारत की 1.47 अरब की आबादी में लगभग 20 करोड़ से अधिक हैं, पारंपरिक हिंदू जाति व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समूह हैं। उन्हें लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक भेदभाव तथा उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। ऐतिहासिक रूप से उन्हें ऐसे कार्यों तक सीमित रखा जाता था जिन्हें तथाकथित रूप से “अशुद्ध” माना जाता था, जैसे पशु वध और चमड़ा उद्योग से जुड़े काम।
डॉ. प्रदीप अत्री ने कहा, “तरक्की बहुत धीमी है और दलितों के खिलाफ भेदभाव व हिंसा अब भी व्यापक है। हालांकि, समुदाय के अधिक लोग अब सार्वजनिक सेवाओं, बैंकिंग, रेलवे और कभी-कभी निजी उद्योगों में भी काम कर रहे हैं, और एक दलित मध्यवर्ग उभर रहा है। उम्मीद थी कि सोशल मीडिया इस प्रगति को तेज करेगा—लेकिन कई मामलों में इसने समस्याओं को और बढ़ा दिया है।”
अध्ययन, जिसका शीर्षक है—“You Belong to Gutter, Not Facebook or Twitter: Recovering Dalit Histories from the Shadows of Social Media”—यह दर्शाता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म किस प्रकार पहले से भेदभाव का सामना कर रहे समूहों के इतिहास और अनुभवों को आकार देते हैं, सीमित करते हैं और कभी-कभी उन्हें हाशिए पर धकेल देते हैं। अध्ययन में ऑनलाइन बहिष्कार के तीन प्रमुख तरीकों की पहचान की गई:
- अनदेखा किया जाना – दलित इतिहास और सामग्री को प्लेटफॉर्म एल्गोरिद्म और पक्षपाती क्यूरेशन के कारण अक्सर कम दृश्यता मिलती है।
- अनसुना किया जाना – प्लेटफॉर्म की नीतियां और रिपोर्टिंग सिस्टम उत्पीड़न से पर्याप्त सुरक्षा प्रदान नहीं करते या शिकायतों के प्रभावी समाधान की अनुमति नहीं देते।
- अनकहा किया जाना – लगातार ट्रोलिंग, दुर्व्यवहार और भेदभाव के कारण कई दलित उपयोगकर्ता चुप रहने या मंच छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।
डॉ. अत्री ने कहा, “एल्गोरिद्मिक पक्षपात जैसे तकनीकी मुद्दों के साथ-साथ, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे मॉडरेटर की तत्काल आवश्यकता है जो दलित समुदाय की सामाजिक वास्तविकताओं को समझते हों और सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने वाले ट्रोल्स से प्रभावी ढंग से निपट सकें। मुख्यधारा मीडिया और डिजिटल स्पेस पर प्रभावशाली जातियों का वर्चस्व भी इसमें भूमिका निभाता है। इसके लिए सख्त नीतियों और जागरूकता की आवश्यकता है।”
शोधकर्ताओं ने पाया कि केवल सोशल मीडिया पर दृश्यता (visibility) ही सशक्तिकरण (empowerment) की गारंटी नहीं देती। कई मामलों में, ऑनलाइन उपस्थिति बढ़ने से दलित उपयोगकर्ताओं को अधिक उत्पीड़न और उनके योगदान को बदनाम या मिटाने के प्रयासों का सामना करना पड़ता है। कई लोगों को यह भी महसूस होता है कि उनके इतिहास और कथाओं को कैसे प्रस्तुत किया जाए, इस पर उनका पर्याप्त नियंत्रण नहीं है।
डॉ. अत्री ने कहा, “आर्थिक असमानता भी एक बड़ी बाधा है। कई दलितों के पास लैपटॉप या स्मार्टफोन खरीदने के लिए संसाधन नहीं हैं, जिससे उनकी डिजिटल भागीदारी सीमित हो जाती है।”
हालांकि, इन चुनौतियों के बीच प्रतिरोध भी उभर रहा है। कई दलित उपयोगकर्ता वैकल्पिक आर्काइव बना रहे हैं, सहायक ऑनलाइन समुदायों का निर्माण कर रहे हैं और #DalitLivesMatter जैसे हैशटैग के माध्यम से डिजिटल सक्रियता का उपयोग कर रहे हैं, ताकि वे अपने इतिहास और अनुभवों को पुनः स्थापित और संरक्षित कर सकें।
डॉ. अत्री ने चेतावनी दी, “यदि मुख्यधारा प्लेटफॉर्म इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते, तो बहिष्कार और गहरा हो सकता है। आवश्यक है कि सोशल मीडिया कंपनियां और नीति-निर्माता ऑनलाइन जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए कड़े उपाय करें। इसमें प्रभावी मॉडरेशन, स्पष्ट नीतियां और ऐसी तकनीक शामिल होनी चाहिए जो हानिकारक सामग्री की पहचान कर उसे सीमित करे, बिना प्रभावित समुदायों की आवाज दबाए।”
उन्होंने निष्कर्ष में कहा, “असमानता कम करने के लिए केवल भागीदारी बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि सभी समुदाय बिना भय के बोल सकें, सुने जाएं और अपनी डिजिटल पहचान तथा इतिहास को सुरक्षित रूप से निर्मित कर सकें।”
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