जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस अभय मंत्री की पीठ ने टिप्पणी की कि यदि राज्य सरकार आर्थिक तंगी से जूझ रही है, तो उसे ‘लाड़की बहिन योजना’ को बंद करने और पेंशन भुगतान को प्राथमिकता देने पर विचार करना चाहिए।

फोटो साभार : मिड-डे
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को पेंशन न देने के मुद्दे पर महाराष्ट्र सरकार की कड़ी आलोचना की है।
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस अभय मंत्री की पीठ ने कहा कि यदि राज्य सरकार आर्थिक तंगी से जूझ रही है, तो उसे ‘लाड़की बहिन योजना’ को बंद करने और पेंशन भुगतान को प्राथमिकता देने पर विचार करना चाहिए।
गौरतलब है कि यह योजना, जिसे 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों से पहले पूर्व मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने शुरू किया था, पात्र महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये प्रदान करती है। बताया जाता है कि इस योजना पर राज्य सरकार हर साल लगभग 40,000 करोड़ रुपये खर्च करती है।
यह मामला अदालत में बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के शिक्षा विभाग की एक कर्मचारी द्वारा दायर याचिका के माध्यम से सामने आया, जिसमें उसने सातवें वेतन आयोग के अनुसार अपने प्रॉविडेंट फंड (पीएफ) और पेंशन के भुगतान की मांग की थी। बीएमसी ने धन की कमी का हवाला देते हुए कहा कि यह देरी राज्य सरकार से पर्याप्त फंड न मिलने के कारण हुई है।
अदालत ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई कि उसने समय पर निगम को धन उपलब्ध नहीं कराया, जिससे कर्मचारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अदालत ने जोर देकर कहा कि सरकार को पेंशन, ग्रेच्युटी और भविष्य निधि का भुगतान समय पर सुनिश्चित करना चाहिए।
द वायर के अनुसार, अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब सरकार वित्तीय संकट से जूझ रही है, तो ‘लाड़की बहिन योजना’ पर भारी खर्च क्यों जारी रखा जा रहा है। अदालत ने सुझाव दिया कि कर्मचारियों के बकाया भुगतान को सुनिश्चित करने के लिए इस योजना को अस्थायी रूप से रोका जाए।
कड़ी टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि यदि राज्य वास्तव में आर्थिक तंगी से गुजर रहा है, तो याचिकाकर्ता के बकाया भुगतान के लिए कार्यालय की संपत्तियां—जैसे टेबल, एयर कंडीशनर, कुर्सियां और अन्य फर्नीचर—तक बेचने पर विचार किया जाना चाहिए। यहां तक कि आवश्यकता पड़ने पर बीएमसी आयुक्त की आधिकारिक गाड़ी बेचने का भी सुझाव दिया गया, ताकि महिला को उसका अधिकार मिल सके।
अदालत ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई तक एक हलफनामा दायर करें, जिसमें बकाया भुगतान करने का आश्वासन दिया जाए।
अखबार के अनुसार, इस बीच राज्य सरकार ने ‘लाड़की बहिन योजना’ के तहत पात्रता मानदंडों को सख्त करना शुरू कर दिया है, जिसके चलते लाभार्थियों की संख्या में कमी आई है। 2023 में योजना शुरू होने पर लाभार्थियों की संख्या 2.43 लाख थी, जो अब घटकर 1.72 लाख रह गई है, जिससे कई लोग इसके लाभ से वंचित हो गए हैं।
हालांकि, हाल के वर्षों में इस योजना के तहत कई अनियमितताएं सामने आई हैं, जिनमें अपात्र लोगों के नाम शामिल होना और यहां तक कि कुछ पुरुषों द्वारा महिलाओं के नाम पर लाभ उठाने के मामले भी शामिल हैं।
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को पेंशन न देने के मुद्दे पर महाराष्ट्र सरकार की कड़ी आलोचना की है।
न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस अभय मंत्री की पीठ ने कहा कि यदि राज्य सरकार आर्थिक तंगी से जूझ रही है, तो उसे ‘लाड़की बहिन योजना’ को बंद करने और पेंशन भुगतान को प्राथमिकता देने पर विचार करना चाहिए।
गौरतलब है कि यह योजना, जिसे 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों से पहले पूर्व मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने शुरू किया था, पात्र महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये प्रदान करती है। बताया जाता है कि इस योजना पर राज्य सरकार हर साल लगभग 40,000 करोड़ रुपये खर्च करती है।
यह मामला अदालत में बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के शिक्षा विभाग की एक कर्मचारी द्वारा दायर याचिका के माध्यम से सामने आया, जिसमें उसने सातवें वेतन आयोग के अनुसार अपने प्रॉविडेंट फंड (पीएफ) और पेंशन के भुगतान की मांग की थी। बीएमसी ने धन की कमी का हवाला देते हुए कहा कि यह देरी राज्य सरकार से पर्याप्त फंड न मिलने के कारण हुई है।
अदालत ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई कि उसने समय पर निगम को धन उपलब्ध नहीं कराया, जिससे कर्मचारियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अदालत ने जोर देकर कहा कि सरकार को पेंशन, ग्रेच्युटी और भविष्य निधि का भुगतान समय पर सुनिश्चित करना चाहिए।
द वायर के अनुसार, अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब सरकार वित्तीय संकट से जूझ रही है, तो ‘लाड़की बहिन योजना’ पर भारी खर्च क्यों जारी रखा जा रहा है। अदालत ने सुझाव दिया कि कर्मचारियों के बकाया भुगतान को सुनिश्चित करने के लिए इस योजना को अस्थायी रूप से रोका जाए।
कड़ी टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा कि यदि राज्य वास्तव में आर्थिक तंगी से गुजर रहा है, तो याचिकाकर्ता के बकाया भुगतान के लिए कार्यालय की संपत्तियां—जैसे टेबल, एयर कंडीशनर, कुर्सियां और अन्य फर्नीचर—तक बेचने पर विचार किया जाना चाहिए। यहां तक कि आवश्यकता पड़ने पर बीएमसी आयुक्त की आधिकारिक गाड़ी बेचने का भी सुझाव दिया गया, ताकि महिला को उसका अधिकार मिल सके।
अदालत ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई तक एक हलफनामा दायर करें, जिसमें बकाया भुगतान करने का आश्वासन दिया जाए।
अखबार के अनुसार, इस बीच राज्य सरकार ने ‘लाड़की बहिन योजना’ के तहत पात्रता मानदंडों को सख्त करना शुरू कर दिया है, जिसके चलते लाभार्थियों की संख्या में कमी आई है। 2023 में योजना शुरू होने पर लाभार्थियों की संख्या 2.43 लाख थी, जो अब घटकर 1.72 लाख रह गई है, जिससे कई लोग इसके लाभ से वंचित हो गए हैं।
हालांकि, हाल के वर्षों में इस योजना के तहत कई अनियमितताएं सामने आई हैं, जिनमें अपात्र लोगों के नाम शामिल होना और यहां तक कि कुछ पुरुषों द्वारा महिलाओं के नाम पर लाभ उठाने के मामले भी शामिल हैं।
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