पश्चिम बंगाल के एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि जिन लोगों की अपीलें अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा स्वीकार कर ली जाती हैं, उन्हें मतदान की अनुमति दी जाए। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल अपील लंबित होने के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदान का अधिकार नहीं दिया जाएगा।

फोटो साभार : द हिंदू
पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि जिन लोगों की अपीलें अपीलीय प्राधिकरणों (ट्रिब्यूनल) द्वारा स्वीकार कर ली जाती हैं, उनके लिए पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी की जाए, ताकि वे मतदान कर सकें।
इसके लिए पहले चरण की समयसीमा 21 अप्रैल और दूसरे चरण की 27 अप्रैल तय की गई है। अब तक एसआईआर प्रक्रिया के बाद पश्चिम बंगाल में करीब 27 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए चुनाव आयोग को निर्देश देते हैं कि जिन मामलों में अपीलीय अधिकरण 21 अप्रैल 2026 या 27 अप्रैल 2026 तक अपीलों का निपटारा कर देते हैं, वहां उन आदेशों को लागू करते हुए पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी की जाए और मतदान के अधिकार से जुड़े सभी आवश्यक परिणाम सुनिश्चित किए जाएं।”
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अपील लंबित होने के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदान का अधिकार नहीं दिया जाएगा।
द वायर के अनुसार, अदालत ने कहा कि यदि ऐसा होने दिया गया, तो आपत्ति दर्ज कराने वाले लोग भी उन व्यक्तियों के मतदान अधिकार पर रोक की मांग कर सकते हैं, जिनके नाम संशोधित मतदाता सूची में शामिल हैं, लेकिन जिनके खिलाफ अपील दायर की गई है। इससे वही स्थिति दोबारा उत्पन्न हो सकती है, जो न्यायिक अधिकारियों को सत्यापन की जिम्मेदारी सौंपे जाने से पहले थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमारे विचार में यह स्वीकार्य नहीं है, विशेषकर तब जब पश्चिम बंगाल के न्यायिक अधिकारियों ने झारखंड और ओडिशा के न्यायिक अधिकारियों की सहायता से इस अत्यंत कठिन कार्य को पूरा किया है।”
ज्ञात हो कि नंदीग्राम, पूर्वी मिदनापुर की विधानसभा सीट से मतदाता सूची में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मामला सामने आया है। इस सीट से BJP नेता सुवेंदु अधिकारी विधायक हैं।
द टेलिग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने 23 मार्च को एसआईआर के बाद की पहली सप्लीमेंट्री सूची जारी की। रविवार तक ऐसी दस सूचियां जारी की जा चुकी हैं, जिनमें हटाए गए और मंजूर किए गए—दोनों तरह के मतदाताओं की पहचान की गई है।
नंदीग्राम में सप्लीमेंट्री सूची के तहत मतदाता सूची से कुल 2,826 नाम हटाए गए हैं। इनमें से 2,700 मुसलमान हैं, जो हटाए गए नामों का चौंकाने वाला 95.5% हिस्सा है।
2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान इस निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 26% थी।
28 फरवरी को जारी एसआईआर के बाद की सूची में नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में 10,500 से ज्यादा मामलों को "जांच के अधीन" (under adjudication) के तौर पर चिह्नित किया गया था।
मतदाताओं का एक चौथाई हिस्सा, लेकिन हटाए गए मतदाताओं में 95 प्रतिशत।
कलकत्ता स्थित एक रिसर्च संस्था 'सबर इंस्टीट्यूट' के साबिर अहमद ने कहा, “मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने की चौंकाने वाली दर एसआईआर प्रक्रिया और उसके असर को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा करती है।” यह संस्था चुनाव वाले बंगाल में मतदाता सूची के चल रहे संशोधन में धर्म और लिंग से जुड़े पैटर्न का अध्ययन कर रही है।
उन्होंने कहा, “यह विश्लेषण बताता है कि एसआईआर प्रक्रिया एक राजनीतिक एजेंडे के तहत चलाई गई थी—जिसका मकसद एक खास पार्टी को चुनावी फायदा पहुंचाने के लिए मुस्लिम नामों को सूची से हटाना था। जिन मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं, उनके इस बार वोट डाल पाने की संभावना कम है, क्योंकि अपील की प्रक्रिया में समय लगेगा।”
एसआईआर की यह कवायद 27 अक्टूबर, 2025 को शुरू हुई थी, जब चुनाव आयोग (EC) ने बंगाल समेत नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष संशोधन की घोषणा की थी।
बंगाल में 16 दिसंबर को जारी ड्राफ्ट सूची में 58 लाख से ज्यादा ऐसे पंजीकृत मतदाताओं के नाम शामिल नहीं थे, जिन्हें मृत, डुप्लीकेट, कहीं और चले गए या अनुपस्थित (ASDD) के तौर पर चिह्नित किया गया था।
ASDD सूची में शामिल लोगों में से लगभग 33% मुसलमान थे, जो मतदाताओं में उनकी कुल हिस्सेदारी के लगभग बराबर है।
जब 28 फरवरी को एसआईआर के बाद की शुरुआती सूची जारी हुई, तो करीब 60 लाख और नाम जांच के दायरे में रखे गए।
जिन नामों को "जांच के दायरे में" (under adjudication) रखा गया है, उनमें मुसलमानों का हिस्सा कितना है, यह जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है। शोधकर्ताओं ने बताया कि तकनीकी दिक्कतों की वजह से विश्लेषण का काम धीमा हो गया है। रिसर्च टीम के सदस्य आशिम चक्रवर्ती ने कहा, “जांच के दायरे में आने वाले हर नाम पर 'जांच के दायरे में' होने का वॉटरमार्क लगा होता है। हम एक मशीन लर्निंग टूल का इस्तेमाल कर रहे हैं; अगर वह किसी नाम को ठीक से पढ़ नहीं पाता, तो उसका आगे विश्लेषण नहीं किया जा सकता।”
2021 के विधानसभा चुनावों में नंदीग्राम सबसे हाई-प्रोफाइल मुकाबला था, जो ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच हुआ था। BJP नेता ने अपने चुनाव प्रचार में ज्यादातर धार्मिक ध्रुवीकरण का सहारा लिया था। शुभेंदु अधिकारी ने 2,000 से भी कम वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। ममता बनर्जी ने चुनाव नतीजों में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट में एक कानूनी चुनौती अभी भी लंबित है।
2021 में नंदीग्राम में 68,000 से ज्यादा मुस्लिम मतदाता थे, जो कुल मतदाताओं का करीब 26% हिस्सा थे। उस समय कुल मतदाताओं की संख्या करीब 2.57 लाख थी, जो दिसंबर में ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होने के बाद बढ़कर 2,68,378 हो गई।
नंदीग्राम के रहने वाले 39 वर्षीय ज़फ़र हुसैन उन लोगों में से हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। शनिवार को BLO ने उन्हें बताया कि उनका नाम मतदाता सूची से काट दिया गया है। हुसैन ने अपने वोट देने के अधिकार को बहाल करने की मांग करते हुए ऑनलाइन अपील दायर की है।
खेती-बाड़ी का काम करने वाले मजदूर हुसैन ने कहा, “कोई नहीं कह सकता कि मेरे मामले पर फैसला समय पर हो पाएगा या नहीं, ताकि मैं वोट डाल सकूं। मेरे आस-पड़ोस में भी कई लोग ऐसी ही मुश्किल का सामना कर रहे हैं।”
सबर इंस्टीट्यूट के एक पिछले अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि कलकत्ता की चार विधानसभा सीटों—बालीगंज, भवानीपुर, कोलकाता पोर्ट और मेटियाब्रुज—में "तार्किक विसंगति" (logical discrepancy) वाली सूचियों में मुस्लिम नामों की संख्या उनकी कुल आबादी में हिस्सेदारी के मुकाबले कहीं ज्यादा थी।
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फोटो साभार : द हिंदू
पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि जिन लोगों की अपीलें अपीलीय प्राधिकरणों (ट्रिब्यूनल) द्वारा स्वीकार कर ली जाती हैं, उनके लिए पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी की जाए, ताकि वे मतदान कर सकें।
इसके लिए पहले चरण की समयसीमा 21 अप्रैल और दूसरे चरण की 27 अप्रैल तय की गई है। अब तक एसआईआर प्रक्रिया के बाद पश्चिम बंगाल में करीब 27 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए चुनाव आयोग को निर्देश देते हैं कि जिन मामलों में अपीलीय अधिकरण 21 अप्रैल 2026 या 27 अप्रैल 2026 तक अपीलों का निपटारा कर देते हैं, वहां उन आदेशों को लागू करते हुए पूरक संशोधित मतदाता सूची जारी की जाए और मतदान के अधिकार से जुड़े सभी आवश्यक परिणाम सुनिश्चित किए जाएं।”
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अपील लंबित होने के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदान का अधिकार नहीं दिया जाएगा।
द वायर के अनुसार, अदालत ने कहा कि यदि ऐसा होने दिया गया, तो आपत्ति दर्ज कराने वाले लोग भी उन व्यक्तियों के मतदान अधिकार पर रोक की मांग कर सकते हैं, जिनके नाम संशोधित मतदाता सूची में शामिल हैं, लेकिन जिनके खिलाफ अपील दायर की गई है। इससे वही स्थिति दोबारा उत्पन्न हो सकती है, जो न्यायिक अधिकारियों को सत्यापन की जिम्मेदारी सौंपे जाने से पहले थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमारे विचार में यह स्वीकार्य नहीं है, विशेषकर तब जब पश्चिम बंगाल के न्यायिक अधिकारियों ने झारखंड और ओडिशा के न्यायिक अधिकारियों की सहायता से इस अत्यंत कठिन कार्य को पूरा किया है।”
ज्ञात हो कि नंदीग्राम, पूर्वी मिदनापुर की विधानसभा सीट से मतदाता सूची में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए जाने का मामला सामने आया है। इस सीट से BJP नेता सुवेंदु अधिकारी विधायक हैं।
द टेलिग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने 23 मार्च को एसआईआर के बाद की पहली सप्लीमेंट्री सूची जारी की। रविवार तक ऐसी दस सूचियां जारी की जा चुकी हैं, जिनमें हटाए गए और मंजूर किए गए—दोनों तरह के मतदाताओं की पहचान की गई है।
नंदीग्राम में सप्लीमेंट्री सूची के तहत मतदाता सूची से कुल 2,826 नाम हटाए गए हैं। इनमें से 2,700 मुसलमान हैं, जो हटाए गए नामों का चौंकाने वाला 95.5% हिस्सा है।
2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान इस निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 26% थी।
28 फरवरी को जारी एसआईआर के बाद की सूची में नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र में 10,500 से ज्यादा मामलों को "जांच के अधीन" (under adjudication) के तौर पर चिह्नित किया गया था।
मतदाताओं का एक चौथाई हिस्सा, लेकिन हटाए गए मतदाताओं में 95 प्रतिशत।
कलकत्ता स्थित एक रिसर्च संस्था 'सबर इंस्टीट्यूट' के साबिर अहमद ने कहा, “मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने की चौंकाने वाली दर एसआईआर प्रक्रिया और उसके असर को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा करती है।” यह संस्था चुनाव वाले बंगाल में मतदाता सूची के चल रहे संशोधन में धर्म और लिंग से जुड़े पैटर्न का अध्ययन कर रही है।
उन्होंने कहा, “यह विश्लेषण बताता है कि एसआईआर प्रक्रिया एक राजनीतिक एजेंडे के तहत चलाई गई थी—जिसका मकसद एक खास पार्टी को चुनावी फायदा पहुंचाने के लिए मुस्लिम नामों को सूची से हटाना था। जिन मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं, उनके इस बार वोट डाल पाने की संभावना कम है, क्योंकि अपील की प्रक्रिया में समय लगेगा।”
एसआईआर की यह कवायद 27 अक्टूबर, 2025 को शुरू हुई थी, जब चुनाव आयोग (EC) ने बंगाल समेत नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष संशोधन की घोषणा की थी।
बंगाल में 16 दिसंबर को जारी ड्राफ्ट सूची में 58 लाख से ज्यादा ऐसे पंजीकृत मतदाताओं के नाम शामिल नहीं थे, जिन्हें मृत, डुप्लीकेट, कहीं और चले गए या अनुपस्थित (ASDD) के तौर पर चिह्नित किया गया था।
ASDD सूची में शामिल लोगों में से लगभग 33% मुसलमान थे, जो मतदाताओं में उनकी कुल हिस्सेदारी के लगभग बराबर है।
जब 28 फरवरी को एसआईआर के बाद की शुरुआती सूची जारी हुई, तो करीब 60 लाख और नाम जांच के दायरे में रखे गए।
जिन नामों को "जांच के दायरे में" (under adjudication) रखा गया है, उनमें मुसलमानों का हिस्सा कितना है, यह जानकारी अभी उपलब्ध नहीं है। शोधकर्ताओं ने बताया कि तकनीकी दिक्कतों की वजह से विश्लेषण का काम धीमा हो गया है। रिसर्च टीम के सदस्य आशिम चक्रवर्ती ने कहा, “जांच के दायरे में आने वाले हर नाम पर 'जांच के दायरे में' होने का वॉटरमार्क लगा होता है। हम एक मशीन लर्निंग टूल का इस्तेमाल कर रहे हैं; अगर वह किसी नाम को ठीक से पढ़ नहीं पाता, तो उसका आगे विश्लेषण नहीं किया जा सकता।”
2021 के विधानसभा चुनावों में नंदीग्राम सबसे हाई-प्रोफाइल मुकाबला था, जो ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी के बीच हुआ था। BJP नेता ने अपने चुनाव प्रचार में ज्यादातर धार्मिक ध्रुवीकरण का सहारा लिया था। शुभेंदु अधिकारी ने 2,000 से भी कम वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। ममता बनर्जी ने चुनाव नतीजों में गड़बड़ी का आरोप लगाया था। इस मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट में एक कानूनी चुनौती अभी भी लंबित है।
2021 में नंदीग्राम में 68,000 से ज्यादा मुस्लिम मतदाता थे, जो कुल मतदाताओं का करीब 26% हिस्सा थे। उस समय कुल मतदाताओं की संख्या करीब 2.57 लाख थी, जो दिसंबर में ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी होने के बाद बढ़कर 2,68,378 हो गई।
नंदीग्राम के रहने वाले 39 वर्षीय ज़फ़र हुसैन उन लोगों में से हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। शनिवार को BLO ने उन्हें बताया कि उनका नाम मतदाता सूची से काट दिया गया है। हुसैन ने अपने वोट देने के अधिकार को बहाल करने की मांग करते हुए ऑनलाइन अपील दायर की है।
खेती-बाड़ी का काम करने वाले मजदूर हुसैन ने कहा, “कोई नहीं कह सकता कि मेरे मामले पर फैसला समय पर हो पाएगा या नहीं, ताकि मैं वोट डाल सकूं। मेरे आस-पड़ोस में भी कई लोग ऐसी ही मुश्किल का सामना कर रहे हैं।”
सबर इंस्टीट्यूट के एक पिछले अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि कलकत्ता की चार विधानसभा सीटों—बालीगंज, भवानीपुर, कोलकाता पोर्ट और मेटियाब्रुज—में "तार्किक विसंगति" (logical discrepancy) वाली सूचियों में मुस्लिम नामों की संख्या उनकी कुल आबादी में हिस्सेदारी के मुकाबले कहीं ज्यादा थी।
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