पीएम मोदी संसदीय क्षेत्र काशी के घाटों पर लगे 'गैर हिंदुओं का प्रवेश मना है' की चेतावनी वाले पोस्टर

Written by Navnish Kumar | Published on: January 8, 2022
विधानसभा चुनाव से ऐन पहले उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति शुरू हो गई है। वो भी पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से। यहां के गंगा घाटों पर 'गैर हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध' के पोस्टर लगाए गए हैं। हिंदुत्ववादी संगठनों ने गैर हिंदुओं को चेतावनी देते हुए कहा है कि वे गंगा घाट से दूर रहें वरना हम दूर कर देंगे। रिपोर्ट्स के मुताबिक वाराणसी के अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट, रामघाट समेत सभी घाटों पर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल से जुड़े लोगों द्वारा धमकी भरे लहजे में पोस्टर लगाए गए हैं। इनमें लिखा है कि गैर हिंदुओं का प्रवेश प्रतिबंधित। साथ ही ये लिखा है कि यह निवेदन नहीं चेतावनी है। 



पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी (काशी) के गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध वाले ये पोस्टर विश्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल द्वारा लगाए गए हैं। काशी के गंगा घाटों के अलावा और भी मंदिरों में ऐसे पोस्टर लगाने की योजना है। फिलहाल पुलिस इस मामले पर बोलने से बच रही है। हालांकि, पुलिस की ओर से इन पोस्टरों को हटाने का काम किया जा रहा है। उधर, बजरंग दल का कहना है कि इन पोस्टरों के माध्यम से घाट को ‘पिकनिक स्पॉट’ मानने वालों को ‘स्पष्ट’ और सीधा संदेश दिया गया है। संगठन का कहना था कि, “हम उन्हें गंगा के घाटों से दूर रहने की चेतावनी दे रहे हैं, क्योंकि यह पिकनिक स्थल नहीं बल्कि ‘सनातन’ संस्कृति का प्रतीक है।” बजरंग दल काशी महानगर संयोजक निखिल त्रिपाठी 'रुद्र' का कहना है कि अब हिंदू समाज को अपनी ताकत दिखाते हुए धर्म और समाज की रक्षा के लिए स्वयं आगे आना होगा। सारा कुछ सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। 

कहा जिस भी मंदिर या गंगा घाट किनारे कोई विधर्मी घुसता है तो उसे मौके पर पकड़कर पुलिस के हवाले किया जाएगा। इस चेतावनी से वाराणसी के गंगा घाटों पर हिंदू संगठनों के पोस्टर को लेकर विवाद बढ़ता नजर आ रहा है। जी हाँ ख़बरों की मानें तो विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने काशी के घाटों पर पोस्टर लगाकर गैर हिंदुओं को चेतावनी दी है। इन संगठनो ने साफ़-साफ़ इन घाटों पर ऐसे लोगों को आने से मना किया है।

काशी धर्म और अध्यात्म की नगरी है। जिस काशी को गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल के तौर पर पूरी दुनिया में देखा जाता रहा है। जहां के घाटों पर बैठकर भारत रत्न बिस्मिल्ला खान गंगा की लहरों के साथ मिलकर शहनाई बजाते रहे हैं वहां अब मुसलमानों का प्रवेश वर्जित किया जा रहा है। यहां "हमने तो नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर, गंगा तेरे पानी से वजू कर कर के।" सुबह ए बनारस में सूरज की लालिमा के साथ अपनी सांसों को आवाज बनाकर शहनाई के जरिए रंग भरने वाले बिस्मिल्लाह खान को गंगा का किनारा आज भी ढूंढता है। 

आज उसी धर्म, अध्यात्म की नगरी काशी के गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध वाले पोस्टर लगाए गए। धर्म और आस्था का केंद्र कही जाने वाली काशी पीएम मोदी का संसदीय क्षेत्र भी है। खास है कि यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक आते हैं और स्थानीय लोगों से बातचीत करते हुए घाटों पर घंटों अपना समय बिताते हैं और फोटोग्राफी भी करते हैं।

विहिप महानगर मंत्री राजन गुप्ता का कहना है कि मंदिर व गंगा घाट सनातन धर्म के लोगों की आस्था और श्रद्धा का स्थान है, यहां अन्य धर्मों के लोगों का क्या काम। विश्व हिंदू परिषद के महानगर अध्यक्ष कन्हैया सिंह ने कहा कि ये धर्म की रक्षा के लिए किया जा रहा है। वाराणसी के गंगा घाटों व कई मंदिरों में इस तरह के बैनर लगाए जाने को लेकर समाजवादी पार्टी की ओर से प्रतिक्रिया आई है। समाजवादी पार्टी ने इसे बीजेपी और विश्व हिंदू परिषद द्वारा धार्मिक ध्रुवीकरण करने की साजिश करार दिया है। 

महामृत्युंजय मंदिर परिवार से जुड़े व समाजवादी पार्टी युवजन सभा के जिलाध्यक्ष किशन दीक्षित का कहना है कि वाराणसी में वैसे भी सभी धर्मों के लोग सभी धर्मों के धार्मिक स्थलों का सम्मान करते हैं। कहा कि सामान्य तौर पर भी न कोई मुसलमान मंदिर में जाता है और न कोई हिंदू मस्जिद में पहुंचता है। फिर इस तरह के बैनर लगाना अनुचित है। सपा नेता का कहना है कि बीजेपी के पास कोई मुद्दा नहीं बचा है। इसलिए अब धार्मिक ध्रुवीकरण कर समाज में माहौल खराब करने का प्रयास किया जा रहा है।

कारवां पत्रिका के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र बनारस आस्थाओं का केंद्र है। दुनिया भर से हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, जैन और बौद्ध पर्यटक यहां हर साल आते हैं। लेकिन जबसे विहिप और बजरंग दल ने घाटों और अन्य स्थानों पर ये पोस्टर लगाने शुरू किए हैं लोगों के मन में कई सवाल और भय ने घर कर लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इससे पहले 25 दिसंबर को बजरंग दल ने चांदमारी स्थित एक गिरजाघर के सामने हनुमान चालीसा का पाठ किया था। मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार इन संगठनों के लोगों ने चर्च आने वालों के साथ दुर्व्यवहार कर उनसे जबरन जय श्रीराम के नारे भी लगवाए। 1 जनवरी को पोस्टर जारी करने से पहले बजरंग दल ने एक विज्ञप्ति जारी कर बनारस से कारोबारियों को “आध्यात्मिक पहचान के साथ खिलवाड़ न करने” की चेतावनी दी थी। 

30 दिसंबर को जारी विज्ञप्ति में लिखा है, “काशी नगरी हिंदुओं की आस्था और सांस्कृतिक परंपरा का केंद्र बिंदु है। दुनिया में इसे भारत की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता है। दुनिया के कोने-कोने से लोग यहां धर्म, ज्ञान, आध्यात्म और मोक्ष की कामना लेकर आते हैं। काशी की महत्वपूर्ण पहचान इस नगर की प्राचीनता और आध्यात्मिकता है। लेकिन कुछ व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, शॉपिंग मॉल, क्लबों द्वारा पाश्चात्य त्योहारों के नाम से धर्मांतरण जैसे घृणित अपराध को बढ़ावा देने व नववर्ष मनाने के नाम पर देर रात तक शराब पार्टी आदि के माध्यम से युवक एवं युवतियों का सामाजिक पतन किया जा रहा है और हमारी धार्मिक आस्थाओं के मानबिंदुओं को भंग करने का कार्य किया जा रहा है एवं हमारी आस्थाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।” इस विज्ञप्ति में आगे धमकी दी गई है कि, “बजरंग दल काशी महानगर उन सभी प्रतिष्ठानों को सख्त चेतावनी देता है कि काशी की धार्मिक आध्यात्मिक पहचान के साथ खिलवाड़ करना बंद करें व पाश्चात्य संस्कृति के नाम पर अश्लीलता का जो नंगा नाच चल रहा है उसे बंद करें, अन्यथा जो दुष्परिणाम होगा उसके जिम्मेदार वे स्वयं होंगे।"

कारवां पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, काशी के घाटों पर लोक विद्या सत्संग करने वाले हरिश्चंद्र बिंद के अनुसार इन पोस्टरों को लगाने का मतलब है कि बजरंग दल और विहिप हिंसा की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि हालांकि बनारस के लोगों ने सोशल मीडिया पर इन पोस्टरों का विरोध किया है पर अब तक कोई भी प्रशासनिक कार्रवाई नहीं हुई है। फिलहाल पुलिस ने ये पोस्टर हटा दिए हैं लेकिन बिंद का कहना है कि उन्हें नहीं लगता कि इससे पोस्टर लगाने वालों को कोई फर्क पड़ेगा। उन्होंने बताया कि उन्हें नहीं लगता कि नागरिकों के विरोध से काम चलेगा। 

बिंद कहते हैं, “ये लोग पिछले दिनों से ही कई कार्यक्रम चला रहे हैं और उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भी है। ये शायद उसके लिए मुद्दा तलाश रहे हैं।”
7 जनवरी को साझा संस्कृति के लोगों ने बनारस के आयुक्त को ज्ञापन सौंप कर पोस्टर लगाए जाने का विरोध किया। इस संगठन के सदस्य अजय पटेल ने बताया कि पोस्टर लगने की खबर सुन कर वह हैरान रह गए थे। उन्होंने आयुक्त से कहा है कि हमारे बहुत सारे दोस्त दूसरे धर्मों के हैं और अक्सर हमारे साथ गंगा घाट और अस्सी पर चाय पीते हैं। यह गंगा-जमुनी तहजीब का शहर है। पटेल के अनुसार, कमिश्नर ने मंच के सदस्यों को आश्वासन दिया है कि वह किसी को भी कानून अपने हाथों में लेने नहीं देंगे। बुनकर और सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद अहमद अंसारी ने बताया कि पोस्टर लगने की बात जब से मुसलमानों को पता चली है तभी से लोग वहां जाने से कतराने लगे हैं। 

उन्होंने बताया कि घाटों में सभी धर्म के लोग जाते हैं लेकिन “पोस्टर लगने के बाद लगता है कि वे लोग किसी के भी साथ अभद्रता कर सकते हैं और अच्छा होगा कि वहां न जाएं।” कहा कि बाबरी मस्जिद को गिराए जाने के बाद के माहौल में भी यहां के मुसलमान घाटों पर जाने से डरने लगे थे लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया वैसे-वैसे असर भी कम होता चला गया। बिंद की तरह उनका भी कहना था कि उत्तर प्रदेश के आगामी चुनाव के लिए सांप्रदायिक उन्माद फैलाया जा रहा है। बहरहाल, बनारस के दशाश्वमेध थाना के थाना प्रभारी आशीष मिश्रा से जब मैंने पुलिस कार्रवाई के बारे में पूछा तो उनका कहना था कि पोस्टर सभी घाटों पर लगे हैं और घाट अलग-अलग थानों में आते हैं। उन्होंने कहा कि अभी इनकी जांच हो रही है और उसके बाद कोई कार्रवाई होगी। ऐसे में अब सबकी नजर कार्रवाई पर टिकी है।

दूसरी लहर के पहले 2021 में फरवरी और बाद में अक्टूबर-नवंबर संक्रमण के लिहाज से काफी सुरक्षित थे। 2022 में यह मौका मार्च से जून के बीच आ सकता है। रंजन के मुताबिक, पीक आने के कुछ समय बाद गतिविधियां शुरू कर देनी चाहिए, क्योंकि 4-5 महीने बाद वायरस के दोबारा हमले की आशंका होती है। लोगों को नंबर देखकर घबराने से बचना होगा। वायरस कुदरती रूप से पैदा हुआ है तो अब घातक नहीं होगा। आप 100 साल पहले आए स्पेनिश फ्लू के आंकड़े देख कह सकते हैं कि स्पेनिश फ्लू की सौवीं लहर आई है, लेकिन ऐसा नहीं होता।

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