दो दशक से छात्रसंघ चुनाव का इंतजार, छात्रों के आंदोलन के बाद जामिया प्रशासन ने तय की बहाली की समय-सीमा

Written by sabrang india | Published on: October 31, 2026
विश्वविद्यालय 15 मई, 2027 तक छात्र संघ के संविधान को लागू करने और लिंगदोह समिति के दिशानिर्देशों के तहत चुनाव कराने के लिए सहमत हो गया है।


Image: deccanherald.com

18 दिनों तक लगातार विरोध-प्रदर्शन और अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल के बाद, जामिया मिलिया इस्लामिया (JMI) के छात्रों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन 'जामिया मिलिया इस्लामिया स्टूडेंट्स यूनियन' (JMISU) को बहाल करने के लिए एक तय समय-सीमा वाली प्रक्रिया पर सहमत हो गया है। यह सहमति 29 अक्टूबर को बनी, जब विश्वविद्यालय ने एक औपचारिक आदेश जारी किया। इसमें 15 मई 2027 तक छात्र संघ के संविधान को मंजूरी देने और लागू करने, तथा अगले शैक्षणिक सत्र के शुरू होने के छह सप्ताह के भीतर चुनाव कराने का वादा किया गया है।





यह समझौता विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के लिए चल रहे उस संघर्ष में एक बड़ा कदम है, जो कई वर्षों से जारी था। यहां छात्र संघ मार्च 2006 से ही भंग पड़ा था। प्रशासन ने आंदोलन के सिलसिले में छात्रों के खिलाफ की गई सभी अनुशासनात्मक कार्रवाई को वापस लेने पर भी सहमति जताई है। इसमें 'शो-कॉज' नोटिस, अनुशासनात्मक कार्यवाही, निष्कासन (rustication), निलंबन (suspension) के आदेश और कैंपस में प्रवेश पर लगी रोक शामिल हैं।



विश्वविद्यालय के 29 अक्टूबर के आदेश के अनुसार, संविधान को मंजूरी मिलने के बाद, लिंगदोह समिति की सिफारिशों और दिशानिर्देशों के आधार पर चुनाव की अधिसूचना जारी की जाएगी। उम्मीद है कि चुनाव अगले शैक्षणिक सत्र के शुरू होने के छह सप्ताह के भीतर होंगे, जो लगभग 16 जुलाई 2027 से शुरू होने वाला है।

प्रशासन द्वारा एक निश्चित समय-सीमा तय करने से, प्रदर्शनकारी छात्रों की एक मुख्य आपत्ति दूर हो गई है। इससे पहले, छात्रों ने विश्वविद्यालय के उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जिसमें संविधान को मंजूरी मिलने के बाद चुनाव कराने का वादा तो था, लेकिन मंजूरी प्रक्रिया पूरी करने के लिए कोई ठोस समय-सीमा नहीं दी गई थी। छात्रों का तर्क था कि बिना किसी समय-सीमा के, संघ को बहाल करने का वादा भी बस एक और 'अनिश्चितकालीन आश्वासन' बनकर रह जाता।

यह नया समझौता छात्रों के चार सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच हुई बातचीत के बाद हुआ है। रजिस्ट्रार प्रोफेसर मो. महताब आलम रिज़वी ने ANI को पुष्टि की कि प्रशासन ने छात्रों की तीनों प्रमुख मांगें मान ली हैं।

'डेक्कन हेराल्ड' के अनुसार, प्रशासन ने संविधान का मसौदा तैयार करने और उसे मंजूरी देने की प्रस्तावित प्रक्रिया भी स्पष्ट कर दी है। इस प्रक्रिया में छात्र प्रतिनिधियों के साथ-साथ प्रोफेसर और कानूनी विशेषज्ञ भी शामिल होंगे, जिसमें विभिन्न संकायों (faculties) का प्रतिनिधित्व होगा। संविधान का मसौदा कानूनी जांच से पहले सुझावों के लिए सभी संबंधित पक्षों (stakeholders) के बीच बांटा जाएगा। इसके बाद इसे एकेडमिक काउंसिल और एग्जीक्यूटिव काउंसिल के सामने रखा जाएगा, और फिर अंतिम मंजूरी के लिए विजिटर के नॉमिनी (नामित प्रतिनिधि) के पास भेजा जाएगा। यह प्रक्रिया यह तय करने में बहुत महत्वपूर्ण होगी कि क्या इस बहाली से वास्तव में एक ऐसा छात्र संघ बन पाता है, जो छात्रों का सही प्रतिनिधित्व करे और लोकतांत्रिक तरीके से काम करे।

लिंगदोह समिति की सिफारिशें और चुनाव की राह

जामिया में लंबे समय से निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों के न होने को देखते हुए, लिंगदोह समिति की सिफारिशों के आधार पर चुनाव कराने का विश्वविद्यालय का फैसला काफी अहम है। 12 दिसंबर 2005 को सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के बाद लिंगदोह समिति का गठन किया गया था। इसका मकसद कैंपस चुनावों से जुड़ी चिंताओं की जांच करना था, जिनमें छात्र राजनीति में पैसे और बाहुबल का बढ़ता प्रभाव, राजनीतिक दखलंदाजी और हिंसा जैसे मुद्दे शामिल थे। 'द हिंदू' की रिपोर्ट के अनुसार, समिति को एक ऐसा ढांचा तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी, जिससे छात्र चुनाव स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से हो सकें।

इसकी मुख्य सिफारिशों में से एक यह थी कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में आमतौर पर निर्वाचित छात्र प्रतिनिधि होने चाहिए। केवल ऐसी विशेष परिस्थितियों में ही नामांकन (नॉमिनेशन) की अनुमति दी जानी चाहिए, जहां चुनाव कराना संभव न हो। जिन संस्थानों में नामांकन के जरिए प्रतिनिधि चुने जाते थे, उनसे उम्मीद की गई थी कि वे पांच साल के भीतर चुनाव आधारित व्यवस्था लागू कर लें। समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि छात्र चुनाव हर साल होने चाहिए, और बेहतर होगा कि ये शैक्षणिक सत्र शुरू होने के छह से आठ सप्ताह के भीतर करा लिए जाएं। नामांकन, प्रचार और परिणाम घोषित करने सहित पूरी चुनाव प्रक्रिया 10 दिनों के भीतर पूरी हो जानी चाहिए।

इन सिफारिशों में संस्थान के आकार और ढांचे के आधार पर प्रत्यक्ष (डायरेक्ट), अप्रत्यक्ष (इनडायरेक्ट) और मिश्रित (हाइब्रिड) चुनाव प्रणालियों की अनुमति दी गई है। छोटे और सिंगल-कैंपस वाले विश्वविद्यालयों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव को बेहतर माना गया, जबकि कई कैंपस वाले बड़े विश्वविद्यालयों के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव का सुझाव दिया गया।

जामिया के लिए, इन सिफारिशों को मानने का वादा एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे एक ऐसी संस्थागत व्यवस्था फिर से बहाल हो सकेगी, जिसके जरिए छात्र विश्वविद्यालय के कामकाज में हिस्सा ले सकेंगे और प्रशासन को जवाबदेह ठहरा सकेंगे।

छात्र प्रतिनिधित्व के बिना लगभग दो दशक

मार्च 2006 में JMISU (जामिया मिलिया इस्लामिया छात्र संघ) को भंग कर दिया गया था। ऐसा हिंसा की बार-बार होने वाली घटनाओं, छात्र समूहों के बीच झड़पों, शिक्षकों पर हमलों और शैक्षणिक गतिविधियों में बाधाओं के कारण किया गया था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह चिंता भी जताई थी कि छात्र प्रतिनिधि कथित तौर पर प्रशासनिक मामलों में दखल दे रहे थे।

हालांकि, छात्र संघ के भंग होने से कई पीढ़ियों के छात्र बिना किसी निर्वाचित प्रतिनिधि निकाय के रह गए। छात्रों के सामूहिक प्रतिनिधित्व के लिए किसी संस्थागत मंच का न होना ही मौजूदा आंदोलन का मुख्य कारण बना। छात्र केवल चुनाव कराने का आश्वासन ही नहीं चाहते थे, बल्कि वे परिसर में लोकतांत्रिक भागीदारी को बहाल करने के लिए एक पक्का वादा चाहते थे।

हालिया विरोध प्रदर्शन 12 अक्टूबर को शुरू हुआ और धीरे-धीरे एक अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल में बदल गया। विश्वविद्यालय ने घोषणा की थी कि संविधान को मंजूरी मिलने के 15 दिनों के भीतर चुनाव कराए जाएंगे, लेकिन छात्रों ने अपना आंदोलन जारी रखा। उनका कहना था कि प्रशासन ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि संविधान को कब मंजूरी दी जाएगी।

यह गतिरोध ऐसे समय में हुआ जब परिसर में पाबंदियां बढ़ाई जा रही थीं। सुरक्षा चिंताओं और विरोध प्रदर्शनों के कारण शैक्षणिक गतिविधियों में आ रही बाधाओं का हवाला देते हुए, विश्वविद्यालय ने पढ़ाई को ऑनलाइन मोड में स्थानांतरित कर दिया। कक्षाओं को ऑनलाइन करने के फैसले के बाद, आगे की घोषणाओं में इस ऑनलाइन व्यवस्था को और बढ़ा दिया गया और परीक्षाओं को भी ऑफलाइन (आमने-सामने) मोड से हटा दिया गया।

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कांग्रेस ने छात्रों की जीत की सराहना की

कांग्रेस के महासचिव (संगठन) के. सी. वेणुगोपाल ने इस परिणाम को 'छात्र शक्ति' की जीत बताया। 'एक्स' (ट्विटर) पर एक पोस्ट में उन्होंने लिखा, "जामिया मिलिया इस्लामिया केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र जीत गए हैं!" वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि भाजपा के नियंत्रण वाले प्रशासन ने विरोध कर रहे छात्रों को बांटने और उन्हें बदनाम करने की कोशिश की थी। उन्होंने दावा किया कि आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण NSUI नेताओं को तिहाड़ जेल भेज दिया गया था। उन्होंने लिखा, "अंततः, फासीवादी ताकतों को छात्र शक्ति के सामने झुकना पड़ा। लोकतंत्र के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा, लेकिन आखिरकार जीत हुई!" उन्होंने छात्रों के अहिंसक संघर्ष को सलाम किया।



यह समझौता जामिया के 106वें स्थापना दिवस के अवसर पर हुआ, जिससे विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक भागीदारी की बहाली से जुड़ी इस घटना का महत्व और बढ़ गया है। हालांकि छात्रों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया है, लेकिन यह समझौता एक लंबी प्रक्रिया की केवल शुरुआत है।

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