टीआरपी की नंगई बनाम ‘रेनकोट’ पत्रकारिता: पुण्‍य प्रसून से निकलती एक नज़ीर

Written by अभिषेक श्रीवास्तव | Published on: February 10, 2017
मरा हाथी भी सवा लाख का होता है, फिर पुण्‍य प्रसून वाजपेयी तो अभी साबुत और बदम हैं। रोज़ रात आज तक चैनल पर दस्‍तक देते हैं। ये बात अलग है कि उनकी दस्‍तक अब बरसों में एकाध बार कभी सुनाई दे जाती है, चाहे आप टीवी देखें या न देखें। मैं ईमानदारी और पूरी निष्‍ठा से टीवी नहीं देखता। शायद महीनों में कभी एक बार टीवी खोल लेता हूं जब लगता है कि देख लिया जाए कौन सी शक्‍लें कितनी बदली हैं। बावजूद इसके टीवी पर कुछ अच्‍छा आता है तो अपने आप ही पता चल जाता है।

Punya Prasun

पता चलने में भी फ़र्क होता है। मसलन, पिछली बार अपने आप तब पता चल गया था जब एनडीटीवी ने अपना परदा काला किया था या कुछ माइम कलाकारों को बैठा लिया था। इतनी तरफ से इतनी बार और इतने दिनों तक वह पता चलता रहा कि सिर पर दबाव कायम होने लगा देखने का, लिहाजा मैंने रवीश कुमार के उस शो को आज तक नहीं देखा। अब लगता है ठीक ही किया।

दूसरे किस्‍म का पता चलना पुण्‍य प्रसून वाजपेयी के प्रोग्राम का होता है। चुपके से पता चलता है। लोग उसे फेसबुक पर शेयर नहीं करते। पत्रकारिता में साहस और क्रांतिकारिता का पोस्‍टर ब्‍वाय बनाकर प्रसून को पेश नहीं करते। लोकप्रियता का बाज़ार है। प्रसून लोकप्रिय नहीं हैं, चाहे वे खुद को जितना ही क्‍यों न मान लें। मसलन, आज ट्विटर पर टहलते हुए किसी का ट्वीट दिखा जिसमें उसने एक लाइन में आज तक की एक हेडिंग का जि़क्र किया था। देखकर लगा कि हो न हो, इसे प्रसून ही लिख सकते हैं। और कोई नहीं। खोजखाज कर निकाल लिया। पता चला आज 10तक में प्रसून के शो की यह पंचलाइन थी: हमाम में सब रेनकोट पहने हैं!

टीवी पत्रकारिता में ऐसी लाइन पुण्‍य प्रसून ही लिख सकते हैं। एकाध साल में सत्‍ता उन्‍हें रचनात्‍मक होने के ऐसे मौके दे देती है, जैसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार दिया जब संसद में अपने संबोधन में उन्‍होंने मनमोहन सिंह के बारे में टिप्‍पणी कर डाली कि वे बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाते हैं। ऐसे मौकों पर पुण्‍य भी कहां मानते हैं। एक शब्‍द को पकड़ कर रगड़ देते हैं। आज उन्‍होंने अपने शो में यही किया। कोई गरिमा-वरिमा का सवाल नहीं, जैसा कुछ आहत लोग सोशल मीडिया पर कल से बखान कर रहे हैं। उन्‍होंने एक-एक कर के आज़ादी के बाद से लेकर अब तक केंद्र और राज्‍य में गिनवाया कि कैसे सबने रेनकोट पहना हुआ है। बस सवाल इतना है कि क्‍या प्रधानमंत्री शिवराज सिंह चौहान या रमन सिंह के रेनकोट के बारे में बोलेंगे या नहीं।

नंगा होना अब मुहावरे में पुरानी बात हो चली। अब लखटकिया सूट पहनकर भी नंगा दिखा जा सकता है। कपड़े पारदर्शी हो चले हैं। वैसे ही नंगा होकर नहाना ज़रूरी नहीं है हमाम में। रेनकोट पहनकर नहाइए। सब नहा रहे हैं। सब जानते भी हैं कि रेनकोट के भीतर दूसरे की देह कितनी भीगी है। अपने आदमी पर कोई बोलता नहीं। सबको दूसरे का रेनकोट दिखता है। पुण्‍य प्रसून ने इस शो में सबके रेनकोट दिखाए और गिनवाए हैं।

पत्रकारिता में सत्‍ता की भाषा से खेल करने के दिन लद गए, लेकिन प्रसून इसे गाहे-बगाहे बचा ले जाते हैं। जिन्‍हें प्रसून से कभी उम्‍मीदें हुआ करती थीं, वे आज इस किस्‍म के शो देखकर थोड़ा खुश हो लेते हैं कि चलो, कुछ बचा हुआ है। वैसे, रेनकोट वाली बात पर ठहाका लगाने का नहीं है। प्रसून हिदायत देते हैं कि ठहाका मत लगाइए। इसे समझिए।

पत्रकारिता के छात्रों, भाषा के रसिकों और आम दर्शकों को यह शो देखना चाहिए। समझना चाहिए कि रेनकोट का मुहावरा कैसे हमाम की सामूहिक नंगई को एक्‍सपोज़ करता है। कैसे अपनी ओर से कुछ कहे बगैर भी सब कुछ कहा जा सकता है। प्रैक्टिसिंग पत्रकारों के लिए यह शो काम का नहीं है क्‍योंकि अधिकतर को न तो भाषा की तमीज़ है और न ही मुहावरे की समझ। वे सामने वाले को नंगा दिखाने के चक्‍कर में अपने बाल भी दिखा देते हैं। पुण्‍य प्रसून इस शो से हमें सिखाते हैं कि रेनकोट पहनकर केवल नहाया ही नहीं जा सकता। रेनकोट पहनकर अच्‍छी पत्रकारिता भी की जा सकती है।

वीडियो से पहले पढ़ें रेनकोट अध्‍याय पर पीपी वाजपेयी का यह ट्वीट:


 
नीचे चैन से देखिए कि कैसे व्‍यावसायिकता के दबावों और समय की तंगी में भी कुछ कायदे का किया जा सकता है। पेश है पुण्‍य प्रसून वाजपेयी का बेहतरीन 10तक: ”हमाम में सब रेनकोट पहने हैं”।



Courtesy: Media Vigil
 

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