क्या सरकार उत्तरखंड के बाजगियो को राज्य आन्दोलनकारी होने का आधिकारिक दर्जा देगी ?

Written by विद्या भूषण रावत | Published on: November 9, 2018

आज उत्तराखंड का १८ वा स्थापना दिवस है. राज्य गठन के इतने वर्षो के बाद भी बदलाव के बावजूद बहुत से सवालों पे उत्तराखंड की तमाम सरकारों का रुख शर्मनाक रहा है.



उत्तराखंड प्रकति की गोद में बसा राज्य है और यहाँ विकास के नाम पर जो कमाई ठेकेदारों और नेताओं के गठबंधन ने की है वो आपराधिक है. विकास के नाम पर जंगलो का कटान, गंगा और यमुना की निर्मल धारा को नियंत्रित करना और पहाड़ो में रोड और रेलवे के नाम पर लगातार यहाँ के पर्यावरण के साथ लगातार खिलवाड़ का  सवाल बहुत महत्वपूर्ण है. गंगा को बचाने की प्रोफेसर जी  डी अग्रवाल को अंतिम समय तक जनता का सहयोग नहीं मिला क्योंकि सभी को विकास नामकी बिमारी ने मदहोश किया हुआ है. किसी की ये समझ नहीं आ रहा के यदि पहाड़ और उसकी गंगा जैसी पवित्र घाटिया ही नहीं रहेंगे तो वहा कौन आएगा और रहने के मायने क्या है. जो लोग अपनी संस्कृति और मिटटी के प्रति सचेत नहीं रहते उनकी जिंदगी भर कोई पहचान नहीं हो सकती.


उत्तराखंड की विविध सरकारों ने दलितों के प्रश्न को हमेशा हासिये पे रखा है. दरसल उत्तराखंड के प्रमुख आन्दोलनों के केंद्र बिंदु से भी दलित प्रश्न गायब रहा है. इस प्रश्न को ऐसे गायब कर दिया जाता है जैसे दलित प्रश्न यहाँ है ही नहीं और ये सारी बीमारिया तो देश के दुसरे हिस्सों में है.. हमारे यहाँ तो सभी भाई बहिन है. उत्तराखंड के दलित परिद्रश्य को समझने के लिए यहाँ की विविध भौगोलिक परिस्थितयो को समझना होगा. उत्तराखंड के पहाड़ो के हालत अलग है, तो मैदानी इलाको या तराई के क्षेत्र के सामाजिक समीकरण बिलकुल भिन्न और जौनसार का क्षेत्र बिलकुल अलग.

उत्तराखंड के पहाड़ो में जनसँख्या का दवाब बिलकुल कम है और स्थितिया कठिन है. सामाजिक जीवन में जाति की महत्ता है लेकिन खेती की भूमि कम होने के कारण अधिकांश लोग सरकारी नौकरियों पर निर्भर है, इसलिए शारीरिक हिंसा कम दिखाई देती है लेकिन समाज जाति विहीन है, ये कहना बेहद झूठ होगा.

लेकिन उत्तराखंड में जाति का सबसे भयावह स्वरूप जौनसार क्षेत्र में दिखाई देता है. एक बड़ी साजिश के तहत पूरे क्षेत्र को 'आदिवासी' घोषित करवाकर जौनसार की ताकतवर जातियों ने आदिवासियों के नाम पर सारे नौकरियों में कब्ज़ा कर लिया और क्षेत्र में जातीय प्रभुत्व को कायम रखा फलस्वरूप दलित कभी भी तरक्की नहीं कर पाए. जौनसार का क्षेत्र उत्तराखंड में अकेला ऐसा है जहा दलितों को अभी भी मंदिरों में प्रवेश पर लोगो पर हिंसा होती है. पूरे क्षेत्र को कुछ राजनैतिक परिवारों ने अपनी सल्तनत के तौर पर तैयार कर लिया. उत्तराखंड की दोनों मुख्य दलों ने इस प्रकार की राजनीती को जगह दी.

जौनसार के मसले को समझना इसलिए जरुरी है क्योंकि वाकई में इस क्षेत्र में दलित आदिवासी जातियों की संख्या अधिक थी लेकिन यहाँ पर तथाकथित ब्राह्मण, राजपूत भी बहुत थे. उत्तर प्रदेश राज्य में आदिवासियों और दलितों  के लिए जब आरक्षण का प्रश्न आया तो सूचि में आने वाले समुदायों को लिस्ट से हटाकर जौनसार के मामले में 'जौनसारी' जाति को रखा दिया गया जो संविधान के साथ किया गया फ्रॉड है. जौनसारी कोई जाति नहीं होती, यह एक क्षेत्र है जिसमे विविध जातिया रहती है इसलिए पूरे जौनसार को जौनसारी जाति का क्षेत्र कह कर यहाँ की दबंग जातियों ने न केवल राजनीती पर कब्ज़ा किया अपितु दलित और आदिवासियों के लिए बने आरक्षण को भी लूट लिया. यदि पूरा क्षेत्र जौनसारी है तो इस क्षेत्र में दलितों पे हिंसा क्यों होती है. इस क्षेत्र में सर्वाधिक बंधुआ मजदूर हुआ करते थे, वो क्यों था. उत्तर प्रदेश में गोविन्द बल्लभ पन्त के मुख्यमंत्री रहते ये कारनामे हुए है. जौनसार में कोल्टा जाति और बाजगी जातियों की हालात बहुत ख़राब है. वे छुआछूत का शिकार भी है लेकिन अभी तक उनहे न तो आरक्षण का कभी लाभ मिला ना ही उनके पास थोडा भी कृषि भूमि नहीं है. सरकार और नीति निर्माताओं को समझना चाहिए के कोई भी भूभाग जरुर भगौलिक तौर पर समान हो सकता है लेकिन उसमे रहने वाले लोगो के सामाजिक और आर्थिक हालत एक से होंगे ये बहुत बड़ा झूठ है लेकिन उत्तराखंड के ताकतवर लोगो ने बहुत से इलाको में ऐसा कमाल कर संविधान के सामाजिक न्याय के सिद्धांतो की धज्जिया उखाड़ दी है और संविधान के साथ ऐसी धोखाधड़ी का पर्दाफाश होना चाहिए. चमोली, उत्तरकाशी और जौनसार से आरक्षण की व्यवस्था क्षेत्रीय आधार पर हटाकर जातीय आधार पर होनी चाहिए.

उत्तराखंड में सरकारी आंकड़े ही कहते है के दलितों के पास भूमि १३.४६% है और आदिवासियों के लिए ये आंकड़ा ३.२२%. २८% दलित परिवार अभी भी बी पी एल की श्रेणी में आते है वही आदिवासियों के लिए ये संख्या ९.३४% है. जहाँ तक सत्ता में भागीदारी का प्रश्न है उत्तराखंड में श्रेणी क में अनुसूचित जाति के अधिकारियों का प्रतिशत ११.६४% जबकि अनुसूचित जनजाति का २.९८%.  श्रेणी ख में अनुसूचित जाति के लोगो की संख्या १२.१८% और जनजाति के २.१७% है. श्रेणी ग में १३.९१%% दलित और  १.६६% आदिवासी है. वैसे सीलिंग भूमि के जिस संघर्ष को लड़ते मुझे बीस वर्ष से ऊपर हुए उसने मुझे उत्तराखंड में व्याप्त जातीय पूर्वाग्रहों को बेहद अच्छे से महसूस कराया विशेषकर राज्य के राजनैतिक नेतृत्व में तो दलित आदिवासी प्रश्न गौण है या वो है ही नहीं. अधिकारियों में तो होड़ है के जमीन ढूंढ ढूंढ कर निकाली जाए और कैसे वो बड़े बड़े होटलों और रेजोर्ट्स के लिए आवंटित कर दी जाए. विकास की ऐसी 'भूख' के उत्तराखंड के आबो हवा और सांस्कृतिक विरासत खत्म हो जाए इसकी कोई चिंता नहीं. उत्तराखंड सरकार ने आधिकारिक तौर पर एक शपथपात्र में कहा राज्य गठन के बाद से अभी तक उसने किसी भी आदिवासी को भूमि आवंटन नहीं किया. उसी कोर्ट में जब जस्टिस के एम् जोसफ ने प्रश्न किया के ये कैसे संभव है तो सरकारी वकील ने कहा के प्रदेश में कोई भी आदिवासी भूमिहीन नहीं है. 

सीलिंग की भूमि दलितों में न जा सके इसके लिए उत्तराखंड के अधिकारियों, नेताओं और पंजाब से आये जाट सिखों के बड़े रसूखदार लोगो की सांठ गाँठ से तराई क्षेत्र में सीलिंग कानूनों की धज्जिया उड़ाई जा रही है. येही लोग थे जो उत्तराखंड राज्य गठन में शहीद उधम सिंह नगर को अलग रखना चाहते थे ताकि रुद्रपुर, किच्छा, खटीमा से लेकर पीलीभीत तक उनका साम्राज्य बदस्तूर बिना किसी रोक टोक के चलता रहे. नेताओं को चंदा चाहिए इसलिए उन्होंने दलित प्रश्नों को तो बिलकुल हासिये पे फेंक दिया. हाई कोर्ट में उत्तराखंड सरकार ने कहा के सीलिंग की जमीन को वो जैसा चाहे इस्तेमाल कर सकती है जबकि हमारा कहना था के उसे सीलिंग कानून की सेक्शन २७ और ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम की १९८ के तहत प्रथिमकता की सूचि के आधार पर बांटा जाना चाहिए. सरकार ने धारा २५ का इस्तेमाल कर जमीन का उपयोग 'जनहित' में कर दिया. इस जनहित में सिडकुल को जमीन दी गयी हालाँकि कार्य अभी कुछ नहीं दिखाई देता है. एक बहुत बड़ी संख्या में जमीन पंजाब से आये उन सिखों को दी गयी जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने २००४  के अपने निर्णय में अवैध एन्क्रोचर बोला था. इस जमीन को लेकर लोकायुक्त ने भी उसे सुप्रीम कोर्ट के आदेशो की अवहेलना बताया था और सरकार ने पूरे मुक़दमे झूठ का सहारा लेकर उस जमीन को किसी भी प्रकार से दलित आदिवासियों को वितरित होने से रोका. आज भी तराई क्षेत्र में बस रहे थारू और बोक्सा जनजातियों की भूमि मुख्यतः पंजाब से आये बड़े धनाढ्य लोगो के कब्जे में चली गयी है और इस सभी में प्रशासन और राजनैतिक नेत्रत्व की बड़ी भूमिका है. सरकार यदि चाहे तो चकबंदी की प्रक्रिया शुरू कर सकती है लेकिन तराई के बाहर से आयातित नव-सामंत ऐसा नहीं होने देंगे और प्रक्रिया को शुरू होने से पहले ही फ़ैल करा देंगे.

उत्तराखंड गठन के करीब एक डेढ़ हफ्ते पहले शहीद उधम सिंह नगर के भूमिहीन दलितों में कुछ उत्साही राजनैतिक कार्यकर्ताओं ने सेंध लगा दी. जब उत्तर प्रदेश सरकार में शामिल विधायक और मंत्री वहा से इस्तीफ़ा देने के बाद काशीपुर पहुंचे. सभी दलितों को बताया गया था के भाजपा के ये लोग दलितों के लिए कुछ घोषणा करने वाले है लेकिन हुआ क्या.  सभी ने वादा किया के उधम सिंह नगर को और औद्योकीकरण होगा और दलितों को अपनी जुमले बाजी में लुभाया, जिस जमीन की लड़ाई के लिए हम लड़ रहे थे उसके बारे में एक शब्द ही इन नेताओं की जुबान पर नहीं था. शाम तक आन्दोलन के नेता बेहद खफा और नाराज़ थे हालाँकि मैंने उन्हें पहले ही समझा दिया था के आप ने नेताओं से हट उम्मीद न करे . उत्तराखंड राज्य में आज भी दलित आदिवासियों के स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान पूरा खर्च नहीं होता. वैसे दुसरे राज्यों में भी स्थितिया ख़राब है लेकिन आंध्र और कर्नाटक से सीखना होगा जहा क़ानून के तहत दलित आदिवासियों के लिए प्रावधान बजट को खर्च करना ही होगा नहीं तो अधिकारियों के मुकद्दमें दर्ज होंगे.

उत्तराखंड राज्य का आन्दोलन जब अपने चरम पे था तो वह मंडल कमीशन के विरुद्ध था. धीरे धीरे उसने जातीय रूप धारण कर लिया. उत्तराखंड पहला राज्य है जहा राज्य आन्दोलन में भाग लेने बाले लोगो के लिए 'पेंशन' का प्रावधान है और उन्हें अन्य सुविधाओं की भी बात है. वैसे महत्वपूर्ण ये है हम कोई आन्दोलन सरकार से अपने लिए सुविधाओं के लिए नहीं लेते अपितु अपने समाज और क्षेत्र को बेहतर बनाने के लिए करते है लेकिन हाँ बहुत लोग उस दौर में अपने काम कान को छोड़कर काम किये इसलिए सरकार अगर कुछ करती है तो कोई हर्जा नहीं है. लेकिन उस दौर में मैंने उत्तराखंड के आंदोलनात्मक स्वरूप को ब्राह्मणवादी कहां था क्योंकि इसमें दलित पिछडो आदिवासियों की भूमिका नगण्य थी या ये कहिये के वे हासिये पे थे. मंडल विरोधी आन्दोलन में दलितों, पिछडो या आदिवासियों के बारे में बात करने पर आप पीछे धकेल दिए जाते.

आज जब उत्तराखंड के आंदोलनकारियो को सरकार ने आधिकारिक दर्जा दिया है तो मैं एक प्रश्न उठाना चाहता हूँ जिस विषय को उत्तराखंड से सबसे ईमानदार अधिकारियों में एक श्री चन्द्र सिंह, सेवानिवृत आई ए एस ने उठाया था. जब भी उत्तराखंड आन्दोलनकारी जुलुस निकालते उस पर सबसे आगे ढोल डमाग बजाकर चलने वाले लोग बाजगी या दास जातियों के होते थे. उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से बाजगी, दास, औजी, जैसी जातीय संगीत और मनोरजन करती थी. ये सभी लोग सारे आन्दोलन में पुर्णतः शामिल थे और इन्होने आन्दोलनकारियों के हौसलाफजाई के लिए ढोल बजाये. सभी बिना संकोच और बिना पैसे के ये काम किये. कई बार तो अपने घरो के बुरे हालातो के बावजूद भी वे इस कार्य में लगे रहे. श्री चन्द्र सिंह कहते है के उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान कोई गाँव और क़स्बा ऐसा नहीं था जहा बाजगी,औजी, दासो ने ढोल न बजाया हो लेकिन जब उत्तराखंड राज्य बन गया तो उत्तराखंड की परम्परा के ले जा रहे इन लोगो को सरकार और आंदोलनकारियो ने पुर्णतः भुला दिया. आखिर राज्य आन्दोलनकारी का दर्जा उन सभी को दिया गया है जिन्होंने आन्दोलन में भाग लिया. फिर बाजगियो और अन्य दलित जातियों को ये दर्जा क्यों नहीं. क्या ढोल डमाऊ नगाड़े बजाने वाले लोग राज्य आन्दोलनकारी नहीं हो सकते. ये जातिया पुर्णतः भूमिहीन है और दलितों में हासिये पे पी. दलित आन्दोलन भी इन लोगो तक नहीं पहुंचा है. इन जातियों के कोई लोग भी सरकारी नौकरियों पे दूर दूर तक नहीं है. जौनसार, टिहरी, उत्तरकाशी आदि जिलो में तो बाजियों के हालत गुलामी वाले है. किसी भी विवाह में वे ढोल बजाने से जाने से इनकार नहीं कर सकते. कई लोग परंपरा के नाम पर उन्हें बुलाते है लेकिन उनके सम्मानजनक जीवन के लिए उत्तराखंड की सरकारों ने आज तक कुछ नहीं किया है.

अगर उत्तराखंड अपने १८ वे स्थापना दिवस पर उत्तराखंड के दलित आदिवासियों के विकास और राज्य निर्माण में उनकी भूमिका को स्वीकार करते हुए उनका सम्मान करता है और उनको उनकी संख्या आधार हर स्टार पर प्रतिनिधत्व देता है  तो इस राज्य को सही दृष्ठि में एक समाजवादी राज्य कहने में मुझे कोई संकोच नहीं होगा. उत्तराखंड की प्राकर्तिक सौन्दर्य के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी सौन्दर्यपूर्ण हो जाएगा और ये देश के सभी राज्यों के लिए एक आदर्श बन सकता है.


 

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