SIR में गड़बड़ियों के सामने आने के बाद UP के CEO का वोटर लिस्ट के ऑडिट का आदेश: क्या जनता की निगरानी के बिना 2027 का चुनाव निष्पक्ष हो सकता है?

Written by sabrang india | Published on: October 28, 2026
पीलीभीत में सामने आई गड़बड़ियों, चुनाव के बहुत कम अंतर से हार-जीत, विपक्ष की शिकायतों और विवादित प्रविष्टियों के बाद, उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और उनमें सुधार करने की पूरी प्रक्रिया की जांच के आदेश दिए गए हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या 2027 के चुनावों से पहले कोई आंतरिक समीक्षा जनता का भरोसा फिर से बहाल कर पाएगी? 'रिपोर्टर्स कलेक्टिव' जैसे खोजी संगठनों और विपक्षी राजनीतिक दलों ने आठ हफ्तों से भी अधिक समय से इन मुद्दों की ओर इशारा किया था, लेकिन चुनाव आयोग ने तब जाकर कार्रवाई की, जब मामला सार्वजनिक रूप से पूरी तरह उजागर हो गया।



उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा ने 10 अप्रैल को 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) समाप्त होने के बाद से कंप्यूटर सहायकों द्वारा किए गए मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और सुधार संबंधी प्रविष्टियों के राज्यव्यापी ऑडिट का आदेश दिया है। पीलीभीत और आजमगढ़ में सामने आई अनियमितताओं के बाद यह निर्णय लिया गया है। इसके तहत, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान किए गए सभी बदलावों की जांच की जाएगी।

ये निर्देश राज्य के 403 विधानसभा क्षेत्रों में फॉर्म 6, 7 और 8 से संबंधित हैं। फॉर्म 6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए है, फॉर्म 7 नाम जोड़ने या हटाने पर आपत्ति दर्ज करने के लिए है, और फॉर्म 8 जानकारी में सुधार या अन्य बदलावों के लिए है।

राज्यव्यापी ऑडिट में क्या जांचा जाएगा?

'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव अधिकारियों को 10 अप्रैल के बाद कंप्यूटर सहायकों द्वारा किए गए नाम जोड़ने, हटाने और सुधारने के कार्यों की बारीकी से जांच करनी होगी। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चुनाव आयोग (ECI) ने इस अवधि के दौरान जोड़े गए या हटाए गए नामों का कोई समेकित विवरण जारी नहीं किया है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस पूरी प्रक्रिया का 'ऑडिट ट्रेल' (यानी किसने कौन सा फॉर्म भरा, किसने उसकी जांच की और क्या निर्णय लिया - फॉर्म 6, 7 और 8 के संदर्भ में) सार्वजनिक किया जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या इसमें शामिल अधिकारियों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जाएगी?

24 अक्टूबर को एक वर्चुअल बैठक में, रिनवा ने मंडलायुक्तों (जो चुनावी सूची के लिए पर्यवेक्षक भी हैं) को इस काम की निगरानी करने का निर्देश दिया। जिला निर्वाचन अधिकारियों को मतदाता सूची तैयार करने वाले कर्मचारियों के काम पर नजर रखने के लिए कहा गया है।

कंप्यूटर सहायकों को अब भौतिक रूप से (कागज पर) प्राप्त आवेदनों को सीधे सिस्टम में दर्ज करने से रोक दिया गया है। अब बूथ स्तर के अधिकारियों (BLO) को 'BLO ऐप' के जरिए इन आवेदनों को डिजिटल रूप में दर्ज करना होगा, जबकि मूल दस्तावेजों को सुरक्षित रखना होगा। चुनावी पंजीकरण अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे लंबित फॉर्म 6, 7 और 8 की रोजाना समीक्षा करें। हालांकि, चुनाव आयोग ने इस बात पर चुप्पी साध रखी है कि क्या कानून के अनुसार इन विवरणों को सार्वजनिक किया जाएगा या नहीं!

रिपोर्ट के अनुसार, रिनवा ने कहा, "पीलीभीत जैसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए सभी प्रविष्टियों का सत्यापन किया जाना चाहिए।" उन्होंने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि आगामी 'विशेष सारांश पुनरीक्षण' (Special Summary Revision) के लिए तैयार होने वाली मतदाता सूची में कोई भी नाम दोबारा (डुप्लिकेट) न हो। इन निर्देशों में ERONET लॉगिन क्रेडेंशियल्स को सुरक्षित रखना, पासवर्ड बदलना, और 10 अप्रैल के बाद से शिकायत पोर्टल, सोशल मीडिया व अन्य माध्यमों से प्राप्त शिकायतों का समाधान करना शामिल है। बुलंदशहर, सीतापुर, गाजियाबाद और अलीगढ़ के जिला निर्वाचन अधिकारियों की आलोचना की गई, क्योंकि उन्होंने कथित डुप्लिकेट मतदाताओं के बारे में रिपोर्ट देने में देरी की थी।

इसके अलावा, आयोग ने आगामी ड्राफ्ट रोल (मतदाता सूची का मसौदा) प्रकाशित करने के लिए 12 नवंबर की समय-सीमा तय की है। "बुक अ कॉल विद BLO" सेवा के तहत प्राप्त अनुरोधों को 48 घंटे से अधिक समय तक लंबित नहीं रखा जाना चाहिए, और BLO को खुद को 'अनुपलब्ध' (unavailable) घोषित करने से पहले मतदाताओं से संपर्क करना होगा।

पीलीभीत: 10,470 स्वीकृत बदलावों में अनियमितताएं पाई गईं

फिलहाल सबसे बड़ी चिंता पीलीभीत को लेकर है, जहां अंतिम SIR रोल (मतदाता सूची) के प्रकाशन के बाद मतदाता रिकॉर्ड में किए गए 10,470 स्वीकृत बदलावों में अनियमितताएं पाई गई हैं।

22 अक्टूबर को दो निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (Electoral Registration Officers) और एक कंप्यूटर ऑपरेटर के खिलाफ FIR दर्ज की गई। यह मामला 31 मई से 29 अगस्त के बीच भरे गए 'फॉर्म 8' की 13,779 प्रविष्टियों से जुड़ा है, जिनमें से 10,470 को मंजूरी दी गई और 3,309 को खारिज कर दिया गया। कार्यालय में इनसे जुड़े कोई आवेदन पत्र या सहायक दस्तावेज नहीं मिले।

रिनवा ने 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' को बताया, "यह कोई गलती या लापरवाही नहीं है। यह एक अपराध है। इसे जानबूझकर किया गया है।"

इस FIR में 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' (Representation of the People Act, 1950) की धारा 32 और 'भारतीय न्याय संहिता' की धारा 201 लगाई गई है। रिनवा ने बताया कि ऑपरेटर ने मतदाताओं से आवेदन प्राप्त किए बिना ही उन्हें सिस्टम में दर्ज कर दिया, और अधिकारियों ने उन्हें मंजूरी दे दी। ये अधिकारियों के निष्कर्ष और आरोप हैं जिनके आधार पर कार्रवाई की जा रही है; कानूनी प्रक्रिया के जरिए ही यह तय होगा कि इसके लिए कौन आपराधिक रूप से जिम्मेदार है।

अधिकारियों और आवेदकों के लिए अलग-अलग प्रावधान

रिनवा ने चेतावनी दी है कि अनियमितताओं के लिए निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों, सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों और कंप्यूटर सहायकों के खिलाफ धारा 32 के तहत कार्रवाई की जा सकती है। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, उचित निगरानी न रखने के लिए जिला निर्वाचन अधिकारियों को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

इसके अलावा, CEO कार्यालय ने 17 अक्टूबर को 'फॉर्म 7' के संबंध में एक बयान जारी किया, जिसमें जानबूझकर गलत बयान या घोषणाएं करने के खिलाफ चेतावनी दी गई है। इसमें 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' की धारा 31 का हवाला दिया गया है, जिसके तहत एक साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

इस बयान में अधिकारियों को नियमों के अनुसार आपत्तियों की जांच करने और झूठे या मनगढ़ंत दावों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है। ये दो प्रावधान अलग-अलग तरह के मामलों से जुड़े हैं: आवेदकों द्वारा जानबूझकर गलत घोषणाएं करना और मतदाता सूची से जुड़े आधिकारिक कर्तव्यों का उल्लंघन करना।

चुनाव में जीत-हार का कम अंतर क्यों मायने रखता है

'द वायर' में उमर राशिद द्वारा 25 अक्टूबर को किए गए एक विश्लेषण में इन गड़बड़ियों के चुनावी महत्व को समझाया गया है। पीलीभीत में 10,470 अनियमित प्रविष्टियां (entries) हैं, जो 2022 में वहां बीजेपी की 6,970 वोटों की जीत के अंतर से कहीं अधिक हैं।

राशिद ने पाया कि समाजवादी पार्टी द्वारा चिह्नित 100 निर्वाचन क्षेत्रों में से 43 ऐसी सीटें थीं, जिन्हें पार्टी ने 2022 में बहुत कम अंतर से जीता या गंवाया था। पूरे उत्तर प्रदेश में, 170 सीटों के नतीजे 15,000 या उससे कम वोटों के अंतर से तय हुए थे; इनमें से 124 सीटों पर जीत-हार का अंतर 10,000 से कम था, और 53 सीटों पर 5,000 से भी कम था।



सर्वे के अनुमान मतदाता सूची से जुड़े सवालों का जवाब नहीं दे सकते

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक पोस्ट में NDTV के हवाले से एक विश्लेषण दिया गया है। उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न के आधार पर, यह विश्लेषण समाजवादी पार्टी को 183 विधानसभा क्षेत्रों में, कांग्रेस को 40 में और बीजेपी को 162 क्षेत्रों में आगे दिखाता है। इस पोस्ट में SP और कांग्रेस की कुल सीटों की संख्या 223 बताई गई है, जो विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 202 के आंकड़े से अधिक है। इसे 2027 के चुनावों से पहले इस गठबंधन के लिए एक सकारात्मक संकेत के रूप में पेश किया गया है।

यह कोई नया ओपिनियन सर्वे नहीं है, बल्कि पिछले नतीजों का ही एक विश्लेषण है।

'वोट फॉर डेमोक्रेसी' की सह-संयोजक तीस्ता सीतलवाड़ ने सवाल उठाया है कि क्या उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव - या पिछले कुछ महीनों में हुए खुलासों के बाद होने वाला कोई भी चुनाव - क्या उस त्रुटिपूर्ण SIR सूची के आधार पर कराया जा सकता है? VFD ने तर्क दिया है कि न केवल SIR को खत्म किया जाना चाहिए, बल्कि 2024 की लोकसभा मतदाता सूची को फिर से लागू किया जाना चाहिए, और साथ ही 2024 के बाद पहली बार वोट देने वालों का नामांकन भी किया जाना चाहिए।



कांग्रेस और SP ने व्यापक जांच की मांग की

कांग्रेस ने 21 अक्टूबर को पीलीभीत का मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि 13,150 मतदाताओं के नाम बदल दिए गए, जबकि उनके EPIC और सीरियल नंबर वही रहे। इस आरोप को बाद में सामने आई उस आधिकारिक जानकारी से अलग देखा जाना चाहिए, जिसमें 'फॉर्म 8' की 10,470 प्रविष्टियों (entries) को अनियमित तरीके से मंजूर किए जाने की बात कही गई थी। कांग्रेस नेताओं ने SIR प्रक्रिया की जांच की मांग की और चेतावनी दी कि पहचान में गड़बड़ी के कारण, वोट देने के योग्य लोग भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।

समाजवादी पार्टी (SP) ने भी डुप्लिकेट पंजीकरण और मतदाताओं की पहचान में गड़बड़ी को लेकर शिकायतें दर्ज कराई हैं। पार्टी की शिकायतों के बाद, आजमगढ़ में एक आधिकारिक जांच में पता चला कि मतदाता सूची में 'विकास यादव' नाम 13 जगहों पर दर्ज था। चुनाव अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई। 'द वायर' की रिपोर्ट की तरह, इसे इस सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जाना चाहिए कि एक ही व्यक्ति ने 13 बार वोट डाला।

MLC चुनाव में शिकायतों के बाद आगरा में फिर से मतदान

23 अक्टूबर को हुए विधान परिषद (MLC) चुनावों के दौरान भी कुछ चिंताएं सामने आईं। SP के प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल ने अमरोहा, आगरा, फतेहपुर, प्रतापगढ़, गोरखपुर और अन्य जिलों में कथित तौर पर बूथ कैप्चरिंग और अनियमितताओं को लेकर कार्रवाई की मांग की।



पार्टी ने मतदान केंद्रों के वीडियो की जांच करने, दोबारा मतदान कराने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की। पार्टी का आरोप है कि सत्ताधारी दल के प्रतिनिधियों ने मतदान को प्रभावित किया और पहले की गई शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ये अभी भी पार्टी के आरोप ही हैं।

इसके बाद, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने आगरा डिवीजन शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के तीन मतदान केंद्रों-20, 21 और 26-पर हुए मतदान को रद्द कर दिया। इन केंद्रों पर 26 अक्टूबर को सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे के बीच फिर से मतदान कराने का फैसला लिया गया। ये मतदान केंद्र खेरागढ़, सैंया और फतेहाबाद में थे। SP उम्मीदवार आकाश अग्रवाल ने आरोप लगाया था कि मतदान के दौरान उनके समर्थकों को परेशान किया गया और कई अनियमितताएं हुईं।

'शुक्र है कि राम ने किसी अल्पसंख्यक को नहीं मारा': यूपी के CEO का सांप्रदायिक बयान

16 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के आधिकारिक X (ट्विटर) हैंडल से वोटर स्लिप में हुई गलतियों पर एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी की गई, जिससे राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। इस घटना ने राज्य के शीर्ष चुनाव अधिकारी की निष्पक्षता और उनके आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल के इस्तेमाल के तरीके पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब चुनावी रिकॉर्ड में एक वोटर का नाम "रामहित यादव" गलत तरीके से "राम ने यादव को मारा" के रूप में दर्ज हो गया।

CEO ने इस गलती को स्वीकार किया और हाल ही में हुए विधान परिषद चुनावों की वोटर लिस्ट में मौजूद एक और गलत एंट्री, "राम ने शर्मा को मारा", का भी जिक्र किया। हालांकि, उनकी यह टिप्पणी कि "शुक्र है कि राम ने किसी अल्पसंख्यक को नहीं मारा",



AAP ने CEO के आचरण और चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठाए

CEO की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए, संजय सिंह ने उनकी भाषा को बेहद सांप्रदायिक बताया। उन्होंने सवाल किया कि क्या ऐसे अधिकारी के रहते उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जा सकते हैं, जो इस तरह के बयान दे रहा हो। सिंह ने घोषणा की कि AAP दोपहर 3 बजे पार्टी कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके CEO को जवाब देगी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मतदाता सूची में गलतियों को लेकर चुनाव आयोग का रवैया गंभीर चिंताएं पैदा करता है। उन्होंने कहा कि पार्टी मतदाता सूची में हेरफेर करने की उन कोशिशों को बर्दाश्त नहीं करेगी, जिनका मकसद BJP को फायदा पहुंचाना हो सकता है। ये आरोप सिंह द्वारा लगाए गए हैं; मतदाता सूची में गलत प्रविष्टियों का विवाद अपने आप में यह साबित नहीं करता कि किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने के लिए मतदाता सूची में हेरफेर की गई थी।



हालांकि, पूरे राज्य में ऑडिट करना एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन यह सुधार स्पष्ट रूप से मजबूरी में किया गया है। उत्तर प्रदेश राज्य चुनाव आयोग को केवल आंतरिक जांच तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। मतदाता रिकॉर्ड में गड़बड़ियों की खबरों और विपक्षी दलों की शिकायतों को देखते हुए, चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर नए नाम को जोड़ने, हटाने या सुधारने की प्रक्रिया का ठीक से सत्यापन हो और इसके नतीजे सार्वजनिक किए जाएं।

मतदाता सूचियां भी SIR (विशेष पुनरीक्षण) से पहले वाली स्थिति के अनुरूप होनी चाहिए। 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता का भरोसा एक ऐसी पारदर्शी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा, जो हर पात्र मतदाता के वोट देने के अधिकार की रक्षा करे।

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