कर्नाटक हाई कोर्ट ने नागरिकता के विवादित दावे को लेकर FRRO के डिपोर्टेशन आदेश पर रोक लगाई

Written by sabrang india | Published on: July 14, 2026
बिना दस्तावेज वाले बांग्लादेशी नागरिक होने के आरोपी अब्दुल रहीम का कहना है कि वह जन्म से भारतीय नागरिक हैं और यह पूरी कार्रवाई गलत पहचान के कारण की जा रही है।



कर्नाटक हाई कोर्ट ने बेंगलुरु के फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (FRRO) के उस डिपोर्टेशन आदेश (देश से बाहर भेजने के आदेश) पर रोक लगा दी है, जो एक ऐसे व्यक्ति के खिलाफ जारी किया गया था जिसे बांग्लादेशी नागरिक होने के संदेह में हिरासत में लिया गया था। उस व्यक्ति का दावा है कि वह जन्म से भारतीय नागरिक है और गलत पहचान का शिकार हुआ है।

द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जस्टिस सूरज गोविंदराज ने FRRO को निर्देश दिया कि वह अब्दुल रहीम की पहचान की पुष्टि करे और यह पता लगाए कि क्या वह वही व्यक्ति है जिसे उत्तर प्रदेश की एक सत्र अदालत ने बांग्लादेश से अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने के मामले में दोषी ठहराया था। उस दोषसिद्धि (कनविक्शन) के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील अभी लंबित है।

एक अंतरिम आदेश में (जिसकी प्रति अभी उपलब्ध नहीं है), कोर्ट ने अधिकारियों को अगली सुनवाई, 14 जुलाई, तक रहीम को डिपोर्ट करने से रोक दिया। कोर्ट ने FRRO को यह भी निर्देश दिया कि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित कार्यवाही की जानकारी प्राप्त करे और यह तय करे कि क्या वह कार्यवाही उसी व्यक्ति से संबंधित है, जिसके खिलाफ मौजूदा डिपोर्टेशन आदेश जारी किया गया है।

वेरिफिकेशन ड्राइव के दौरान हिरासत में लिया गया

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, रहीम ने अपनी याचिका में कहा कि उनका जन्म 14 अप्रैल 1979 को नई सीमापुरी, दिल्ली में हुआ था और वे जीवन भर भारत में ही रहे और काम करते रहे हैं। उन्हें 5 मार्च 2026 को पैराप्पना अग्रहारा पुलिस ने संदिग्ध बिना दस्तावेज वाले बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान के अभियान के दौरान हिरासत में लिया था और बाद में FRRO को सौंप दिया गया।

उसी दिन FRRO ने फॉरेनर्स एक्ट, 2025 की धारा 7(2)(f) और इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स ऑर्डर के पैरा 8 के तहत एक आदेश जारी किया। इस आदेश में उनकी आवाजाही पर रोक लगाई गई और उन्हें कोथानुर, बेंगलुरु स्थित यूटाइल फाउंडेशन डिटेंशन सेंटर में रहने का निर्देश दिया गया। FRRO के आदेश में उनकी पहचान "मो. रहीम होवलादार, पिता मो. मोतालेब होवलादार" के रूप में दर्ज की गई और उन्हें विदेशी नागरिक मान लिया गया।

कोर्ट में नागरिकता से जुड़े दस्तावेज पेश किए गए

रहीम की ओर से पेश अधिवक्ता क्लिफ्टन डी. रोजारियो ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल जन्म से भारतीय नागरिक हैं। उन्होंने जन्म प्रमाण-पत्र, पासपोर्ट, मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और परिवार के सदस्यों से संबंधित दस्तावेज सहित कई सरकारी रिकॉर्ड अदालत के समक्ष पेश किए।

याचिका में कहा गया कि हिरासत का आदेश बिना कोई नोटिस दिए, बिना सुनवाई का अवसर प्रदान किए और बिना उनकी नागरिकता की स्थिति की समुचित जांच किए जारी किया गया। इसमें संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 22 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया तथा कहा गया कि हिरासत में लिए जाने से रहीम की आजीविका प्रभावित हुई और उनकी पत्नी तथा छोटे बच्चे को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

उत्तर प्रदेश में दोषसिद्धि से संबंध

इस मामले में एक और पेचीदगी यह है कि रहीम को वर्ष 2012 में गाजियाबाद के एक अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 14A(b) के तहत दोषी ठहराया था। उन पर बिना वैध दस्तावेजों के भारत में प्रवेश करने और रहने का आरोप था। उस मामले में उनकी पहचान "अब्दुल रहीम, पिता शाह जमाल, निवासी बागेरहाट, बांग्लादेश" के रूप में दर्ज की गई थी।

याचिका के अनुसार, जैसा कि द इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया, उन्हें दोषी ठहराने का आधार मुख्य रूप से विदेशी अधिनियम के तहत आरोपी पर नागरिकता साबित करने की कानूनी जिम्मेदारी तथा प्रस्तुत दस्तावेजों को पर्याप्त न माना जाना था। रहीम ने वर्ष 2012 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए उन्हें जमानत दे दी थी। यह अपील अभी भी लंबित है।

रोजारियो ने तर्क दिया कि मौजूदा हिरासत और डिपोर्टेशन की कार्यवाही 'दोहरे दंड' (Double Jeopardy) के समान है, जो संविधान के अनुच्छेद 20 के तहत निषिद्ध है। यह अनुच्छेद किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार मुकदमा चलाने और दंडित किए जाने से संरक्षण देता है।

बेंगलुरु में व्यवसाय और पारिवारिक जीवन

रहीम ने कोर्ट को बताया कि वह वर्ष 2014 में दिल्ली से बेंगलुरु आए थे और सरकार के साथ पंजीकृत प्रोपराइटरशिप के माध्यम से वेस्ट मैनेजमेंट और स्क्रैप ट्रेडिंग का व्यवसाय शुरू किया था। उनके पास कर्नाटक गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट, 2017 के तहत जारी GST पंजीकरण प्रमाण-पत्र भी है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने दलील दी कि उन्होंने बेंगलुरु में अपना परिवार और आर्थिक जीवन स्थापित किया है, लेकिन उन्हें बिना कोई पूर्व नोटिस दिए ही देश से बाहर भेजने की कार्रवाई शुरू कर दी गई।

देश से बाहर भेजने से पहले पहचान की पुष्टि करने का निर्देश

यह देखते हुए कि याचिका में ऐसे प्रश्न उठाए गए हैं जिनकी तथ्यात्मक पुष्टि आवश्यक है, कर्नाटक हाई कोर्ट ने FRRO को निर्देश दिया कि वह कोई भी कठोर कार्रवाई करने से पहले रहीम की पहचान की पुष्टि करे। अदालत द्वारा दिया गया अंतरिम संरक्षण 14 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई तक प्रभावी रहेगा।

स्क्रॉल की रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में FRRO के आदेश को रद्द करने और रहीम को हिरासत से रिहा करने की मांग की गई है। फिलहाल अदालत का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि क्या हिरासत में लिया गया व्यक्ति वास्तव में वही है जो उत्तर प्रदेश में लंबित मामले में शामिल है और क्या डिपोर्टेशन का आदेश सही व्यक्ति के खिलाफ जारी किया गया है।

Related

गलत तरीके से देश से निकाले जाने के दुष्परिणाम

सरकार का विरोध अपराध नहीं, असहमति दबाने का हथियार नहीं बन सकता 'एक्सटर्नमेंट': बॉम्बे हाईकोर्ट

बाकी ख़बरें