गलत तरीके से देश से निकाले जाने के दुष्परिणाम

Written by | Published on: July 13, 2026
सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद पश्चिम बंगाल के चार लोगों की वापसी, नागरिकता की पुष्टि किए बिना उन्हें देश से बाहर निकालने के संवैधानिक नतीजों को उजागर करती है।


स्वीटी बीबी अपने बच्चों और दानिश शेख (गहरे नीले रंग की शर्ट और ग्रे रंग की पतलून पहने हुए) के साथ बुधवार को मालदा के महादीपुर लैंड पोर्ट के ज़रिए बांग्लादेश से भारत लौटीं। तस्वीर: सौम्या डे सरकार | द टेलीग्राफ

हाल के वर्षों में नागरिकता से जुड़े सबसे परेशान करने वाले विवादों में से एक विवाद में, बांग्लादेश से चार बंगाली भाषी मुसलमानों की भारत वापसी एक अहम मोड़ मानी जा रही है। कलकत्ता हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के लगातार कानूनी दखल के बाद ही उनकी वापसी हो पाई। इस घटना ने नागरिकता की जांच के तरीकों और राष्ट्रीयता सुनिश्चित किए बिना लोगों को देश से बाहर निकालने के नतीजों को लेकर फिर से चिंताएं बढ़ा दी हैं।

ये चार लोग- दानिश शेख, स्वीटी बीबी और उनके दो बेटे- जून 2025 में देश से निकाले जाने के बाद बांग्लादेश में महीनों तक फंसे रहे और फिर पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में महादीपुर बॉर्डर से भारत लौटे। यह वह समय (मई-जून 2025) था जब केंद्र सरकार के निर्देशों पर अधिकारियों ने बिना कागजात वाले लोगों को देश से बाहर निकालने (पुश-आउट) की बड़े पैमाने पर कोशिशें की थीं। उनकी वापसी सुनाली खातून और उनके छोटे बेटे साबिर के भारत लौटने के महीनों बाद हुई है; सुनाली को देश से निकाले जाते समय वह गर्भवती थीं और उन्हें मानवीय आधार पर लौटने की इजाजत दी गई थी। ये मामले नागरिकता तय करने में प्रशासनिक गलतियों के खतरों और इस संवैधानिक जरूरत को दिखाते हैं कि किसी भी व्यक्ति को उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना उसकी आजादी से वंचित न किया जाए।

खातून को देश से निकाले जाने के बारे में विस्तार से यहां पढ़ा जा सकता है।

'स्क्रॉल' के अनुसार, पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के पाइकर गांव के लोगों ने पुष्टि की कि दानिश शेख, स्वीटी बीबी और उनके दो बेटे राज्य में तब लौटे जब केंद्र सरकार ने उनकी वापसी के अदालती आदेशों का पालन किया। परिवारों का हमेशा से कहना रहा है कि वे बीरभूम के भारतीय नागरिक हैं और पहचान की जांच के दौरान हिरासत में लिए जाने से पहले दिल्ली में रह रहे थे और काम कर रहे थे।

ये लोग उस बड़े पैमाने पर की गई कार्रवाई के तहत देश से निकाले गए थे जो अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू हुई थी। उसके बाद के दिनों में, भारतीय जनता पार्टी (BJP) शासित कई राज्यों की पुलिस ने कथित तौर पर बड़ी संख्या में बंगाली भाषी लोगों- खासकर मुसलमानों- को हिरासत में लिया और उनसे भारतीय नागरिकता के दस्तावेजी सबूत मांगे। कई लोग जो तुरंत अपनी राष्ट्रीयता साबित नहीं कर पाए, उन्हें बांग्लादेश भेज दिया गया। बाद की जांच और अदालती कार्यवाही से पता चला कि कई मामलों में भारतीय नागरिक भी इस कार्रवाई की चपेट में आ गए थे।

विस्तृत रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है।

सुनाली खातून और उनके परिवार का मामला ऐसी गलतियों के भयानक नतीजों को बहुत साफ तौर पर दिखाता है। BBC की रिपोर्ट के अनुसार, खातून, उनके पति दानिश शेख और उनके छोटे बेटे को दिल्ली में हिरासत में ले लिया गया क्योंकि अधिकारियों को शक था कि वे बिना कागजात वाले प्रवासी हैं। परिवार का शुरू से यही कहना था कि वे पश्चिम बंगाल के भारतीय नागरिक हैं। खातून के अनुसार, अधिकारियों ने देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया शुरू करने से पहले परिवार के दावों की ठीक से जांच नहीं की और न ही उपलब्ध सबूतों को देखा।

परिवार को सीमा पार बांग्लादेश भेज दिया गया, जहां बांग्लादेशी अधिकारियों ने उन्हें बिना कागजात वाले घुसपैठिये मानकर हिरासत में ले लिया। जिस देश का नागरिक होने का वे दावा करते थे, वहां लौटने के बजाय, वे दूसरे देश में जेल में बंद हो गए; वे अपने रिश्तेदारों से अलग हो गए और भारतीय कानून के तहत मिलने वाली सुरक्षा से भी वंचित हो गए। जो मामला एक प्रशासनिक फैसले के तौर पर शुरू हुआ था, वह जल्द ही एक मानवीय संकट में बदल गया।

इस मामले ने गलती से देश से बाहर भेजने के गंभीर नतीजों को उजागर किया। आम तौर पर होने वाली इमिग्रेशन कार्रवाई के उलट, नागरिकता के बारे में गलत फैसले से परिवार टूट सकते हैं, लोगों की नागरिकता व्यवहार में छिन सकती है, उन्हें दूसरे देश में हिरासत में लिया जा सकता है और वे बिना किसी असरदार कानूनी सुरक्षा के रह सकते हैं। जिन्हें गलत तरीके से देश से बाहर भेजा गया, उनके लिए इसके नतीजे सिर्फ शारीरिक आजादी छिनने तक सीमित नहीं थे- इसका मतलब पहचान, सम्मान और संवैधानिक सुरक्षा से वंचित होना भी था।

इन निर्वासन (देश से बाहर भेजने) की कानूनी वैधता की जल्द ही अदालती जांच हुई। सितंबर 2025 में, कलकत्ता हाई कोर्ट ने 'भोडू शेख बनाम भारत सरकार व अन्य' और इससे जुड़े मामले 'आमिर खान बनाम भारत सरकार व अन्य' पर फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को कड़े शब्दों में निर्देश दिया कि वह देश से बाहर भेजे गए परिवारों को चार हफ्ते के भीतर वापस लाए।

जस्टिस तापब्रत चक्रवर्ती और रीतोब्रतो कुमार मित्रा की डिवीज़न बेंच ने कहा कि अधिकारियों ने "बहुत जल्दबाजी" में काम किया और भारतीय नागरिकता का दावा करने वाले लोगों को देश से बाहर भेजने से पहले जरूरी प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन नहीं किया। कोर्ट ने पाया कि दिल्ली पुलिस और फॉरेनर्स रीजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिस (FRRO) की कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत गंभीर चिंताएं पैदा करती है और इस बात पर जोर दिया कि कार्यकारी कार्रवाई, यहां तक कि अवैध प्रवास से जुड़े मामलों में भी, संवैधानिक सीमाओं के दायरे में होनी चाहिए।

कोर्ट ने केंद्र सरकार को, गृह मंत्रालय और ढाका में भारतीय उच्चायोग के माध्यम से, सुनाली खातून, दानिश शेख और उनके बेटे साबिर, साथ ही स्वीटी बीबी और उनके दो बेटों की वापसी की सुविधा देने का निर्देश दिया। ऐसा करते हुए, इसने फिर से पुष्टि की कि संवैधानिक गारंटी को प्रशासनिक सुविधा के लिए दरकिनार नहीं किया जा सकता है।

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हाई कोर्ट के सामने आए तथ्यों ने एक परेशान करने वाली तस्वीर पेश की। याचिकाओं के अनुसार, सुनाली खातून के परिवार को 24 जून, 2025 को पहचान-सत्यापन अभियान के दौरान दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। अड़तालीस घंटों के भीतर- और उनकी नागरिकता के दावों की किसी भी सार्थक जांच के बिना- उन्हें फॉरेनर्स एक्ट, 1946 के तहत FRRO द्वारा जारी आदेशों के तहत बांग्लादेश भेज दिया गया।

याचिकाकर्ता का मामला यह था कि परिवार की पश्चिम बंगाल में लंबे समय से जड़ें थीं। उनके पास परिवार के सदस्य, भूमि रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजी सबूत थे जो उन्हें बीरभूम जिले से जोड़ते थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि सुनाली के आधार और परमानेंट अकाउंट नंबर (PAN) रिकॉर्ड में उनकी जन्मतिथि 2000 दिखाई गई थी, जो अधिकारियों के इस दावे का सीधे तौर पर खंडन करती थी कि वह 1998 में अवैध रूप से भारत में आई थीं- एक ऐसा दावा जो आधिकारिक रिकॉर्ड सही होने पर तथ्यात्मक रूप से असंभव था।

याचिकाकर्ताओं ने आगे तर्क दिया कि अधिकारियों ने गृह मंत्रालय के 2 मई, 2025 के दिशानिर्देशों को नजरअंदाज कर दिया था, जिनके तहत देश से बाहर भेजने से पहले व्यक्ति के गृह राज्य से सत्यापन की आवश्यकता थी। उन्होंने तर्क दिया कि सुनवाई का कोई उचित अवसर प्रदान नहीं किया गया था और देश से बाहर भेजने की कार्रवाई ने वैधानिक प्रक्रिया और निष्पक्षता की संवैधानिक गारंटी दोनों का उल्लंघन किया। केंद्र सरकार ने 'फॉरेनर्स एक्ट, 1946' की धारा 9 का हवाला देते हुए अपने कदमों का बचाव किया और तर्क दिया कि भारतीय नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्तियों की है। सरकार का दावा था कि हिरासत में लिए गए लोग अपनी राष्ट्रीयता साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज पेश करने में नाकाम रहे और पूछताछ के दौरान दर्ज बयानों से पता चला कि वे बांग्लादेशी नागरिक थे जो गैर-कानूनी तरीके से भारत में दाखिल हुए थे। हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि ऐसे विवादित दावों की उचित जांच जरूरी थी और तय कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना उन्हें तुरंत देश से बाहर निकालना सही नहीं ठहराया जा सकता था।

सुप्रीम कोर्ट का दखल और सरकार का भरोसा

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कलकत्ता हाई कोर्ट के निर्देशों को चुनौती दी और हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र तथा देश से बाहर निकाले गए लोगों को वापस लाने के आदेश, दोनों पर सवाल उठाए। हालांकि, शीर्ष अदालत में हुई कार्यवाही के दौरान केंद्र सरकार के रुख में एक अहम बदलाव देखने को मिला।

22 मई, 2026 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह देश से बाहर निकाले गए लोगों की भारत वापसी में मदद करेगी और आगे कोई भी कदम उठाने से पहले उनकी नागरिकता के दावों की उचित जांच करेगी। चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच के सामने पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि "मामले के खास तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए," सरकार ने उन लोगों को वापस लाने और कानून के मुताबिक उनकी नागरिकता की स्थिति की जांच करने का फैसला किया है।

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प्रभावित परिवारों की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने अनुरोध किया कि सरकार के इस भरोसे को आधिकारिक तौर पर दर्ज किया जाए। इस बात को मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि देश से बाहर निकाले गए लोगों को भारत वापस लाया जाए और यह स्पष्ट किया कि उनका आगे यहां रहना उनकी नागरिकता के दावों की कानूनी जांच के नतीजे पर निर्भर करेगा। साथ ही, कोर्ट ने सरकार की यह बात भी दर्ज की कि यह भरोसा मामले के खास तथ्यों के आधार पर दिया जा रहा है और इसे भविष्य में देश से बाहर निकालने से जुड़े विवादों के लिए मिसाल (precedent) नहीं माना जाना चाहिए।

केंद्र सरकार ने कोर्ट को बताया कि बांग्लादेश से लोगों को वापस लाने की प्रक्रिया में लगभग आठ से दस दिन लगेंगे। यह कदम सरकार के पहले के रुख से काफी अलग था, जिसमें उसने 'फॉरेनर्स एक्ट' के तहत कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए लोगों को देश से बाहर भेजने (डिपॉर्टेशन) को कानूनी ठहराया था।

असल में, सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में सुनाली खातून के मामले में पहले ही दखल दिया था। उस समय, वह गर्भावस्था के आखिरी चरण में थीं और अपने छोटे बेटे के साथ बांग्लादेश में फंसी हुई थीं। मामले के मानवीय पहलुओं को देखते हुए, कोर्ट ने नागरिकता से जुड़ा विवाद लंबित रहने के बावजूद उन्हें भारत लौटने की इजाजत दे दी थी। उन कार्यवाही के दौरान, बेंच ने कहा कि कुछ स्थितियों में "कानून को इंसानियत के लिए झुकना पड़ता है"- यह टिप्पणी कोर्ट की उस कोशिश को दिखाती है जिसमें वह इमिग्रेशन (प्रवास) को लागू करने और संवैधानिक संवेदना के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थी।

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व्यक्तिगत मामलों से परे संवैधानिक सवाल

इस कानूनी मामले ने ऐसे मुद्दे उठाए हैं जो कुछ परिवारों के भविष्य से कहीं आगे तक जाते हैं। इसके मूल में एक बुनियादी संवैधानिक सवाल है: क्या राज्य किसी ऐसे व्यक्ति को देश से बाहर भेज सकता है जो भारतीय नागरिकता का दावा कर रहा हो, बिना उस दावे की निष्पक्ष, गहन और कानूनी जांच किए?

कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस सवाल का जवाब साफ तौर पर 'नहीं' में दिया। कोर्ट ने कहा कि उसके सामने पेश किए गए दस्तावेज-जिनमें देश से बाहर भेजे गए लोगों के परिवारों के सदस्यों से जुड़े चुनावी रिकॉर्ड भी शामिल थे- प्रथम दृष्टया भारतीय मूल की ओर इशारा करते थे और किसी भी कठोर कार्रवाई से पहले विस्तृत जांच की मांग करते थे। इसके बजाय, अधिकारियों ने बहुत जल्दबाजी में कार्रवाई की- जिसे कोर्ट ने "बहुत ज्यादा जल्दबाजी" (hot haste) कहा- और हिरासत में लेने के कुछ ही दिनों के भीतर लोगों को देश से बाहर भेज दिया, जबकि गृह मंत्रालय की अपनी गाइडलाइंस में बताई गई प्रक्रियात्मक सुरक्षाओं का पालन भी नहीं किया गया।

इस कार्यवाही ने अनुच्छेद 14 और 21 के संवैधानिक महत्व को भी उजागर किया। भले ही राज्य को किसी व्यक्ति के विदेशी नागरिक होने का संदेह हो, फिर भी कार्यकारी कार्रवाई को निष्पक्षता, तर्कसंगतता और उचित प्रक्रिया (due process) की आवश्यकताओं को पूरा करना होगा। नागरिकता से जुड़े विवादों को जल्दबाजी में की गई प्रशासनिक कार्रवाई से हल नहीं किया जा सकता, जिसमें सबूतों को नजरअंदाज किया जाए या लोगों को अपनी पहचान साबित करने का उचित मौका न दिया जाए।

सरकार ने मुख्य रूप से 'फॉरेनर्स एक्ट, 1946' की धारा 9 का सहारा लिया, जिसके तहत नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति पर होती है। हालांकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी तौर पर जिम्मेदारी होने का मतलब यह नहीं है कि प्रक्रियात्मक निष्पक्षता को नजरअंदाज किया जा सकता है। जब किसी व्यक्ति के भारतीय नागरिकता के दावे का समर्थन करने वाले विश्वसनीय सबूत मौजूद हों, तो अधिकारियों को उन्हें देश से बाहर निकालने (डिपोर्टेशन) जैसा कदम उठाने से पहले ठीक से जांच-पड़ताल करनी चाहिए।

इन मामलों ने 'नॉन-रिफ्यूलमेंट' (non-refoulement यानी किसी व्यक्ति को ऐसे देश में जबरन वापस न भेजने का अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत, जहाँ उसकी जान, स्वतंत्रता या सुरक्षा को गंभीर खतरा हो।) के सिद्धांत पर भी चर्चा को फिर से शुरू कर दिया है- यह अंतरराष्ट्रीय कानून का एक नियम है जो लोगों को जबरन ऐसे इलाकों में वापस भेजने से रोकता है जहां उन्हें उत्पीड़न, मनमाने ढंग से हिरासत में लिए जाने या अन्य गंभीर नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि भारत 1951 के शरणार्थी सम्मेलन (Refugee Convention) का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, फिर भी भारतीय अदालतों ने बार-बार इस सिद्धांत के तत्वों को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी में शामिल माना है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि लोगों की राष्ट्रीयता का ठीक से पता लगाए बिना उन्हें देश से बाहर निकालना इन संवैधानिक सुरक्षा उपायों का उल्लंघन है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अक्टूबर 2025 में, बांग्लादेश की एक अदालत ने फैसला सुनाया था कि इन छह लोगों को दिल्ली से "अवैध बांग्लादेशी" बताकर जबरन निर्वासित किया गया था, जबकि वे असल में भारतीय नागरिक हैं; अदालत ने उनके आधार कार्ड और घर के पते का हवाला दिया था। इसके बावजूद, केंद्र सरकार ने कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

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प्रशासनिक गलती की कीमत की याद दिलाता एक मामला

यह कानूनी लड़ाई एक अहम मोड़ पर तब पहुंची जब दानिश शेख, स्वीटी बीबी और उनके दो बेटे आखिरकार मालदा जिले के महादीपुर बॉर्डर क्रॉसिंग से पश्चिम बंगाल लौट आए। उनकी वापसी महीनों की कानूनी लड़ाई और न्यायिक जांच के बाद हुई, जिसने आखिरकार केंद्र सरकार को अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया।

इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी वकालत सिर्फ कोर्ट तक ही सीमित नहीं थी। मौजूदा कानूनी मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले ही, तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने बंगाली बोलने वाले प्रवासी मजदूरों के साथ हो रहे व्यवहार और उन्हें गलत तरीके से हिरासत में लेने और देश से बाहर निकालने (डिपोर्टेशन) के आरोपों पर बार-बार चिंता जताई थी। मई 2025 में, राज्यसभा सांसद समीरुल इस्लाम ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर बीजेपी शासित राज्यों में बंगाली बोलने वाले मजदूरों के उत्पीड़न, हिरासत और हिंसा की खबरों पर तुरंत दखल देने की मांग की। उसी समय, बहरामपुर के सांसद यूसुफ पठान ने भी इस बात पर चिंता जताई कि उनके संसदीय क्षेत्र के प्रवासी मजदूरों को ओडिशा में जान-बूझकर निशाना बनाया जा रहा है और उनकी सुरक्षा व बचाव के लिए कदम उठाने की मांग की।

जल्द ही यह मुद्दा एक बड़े संवैधानिक सवाल के तौर पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अगस्त 2025 में, कोर्ट ने केंद्र सरकार और नौ राज्यों से जवाब मांगा। यह जवाब 'पश्चिम बंगाल प्रवासी कल्याण बोर्ड' की एक याचिका पर मांगा गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पश्चिम बंगाल के प्रवासी मजदूरों को अवैध बांग्लादेशी प्रवासी होने के बिना-पुष्टि वाले आरोपों पर हिरासत में लिया जा रहा था। 'द हिंदू' की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने अवैध घुसपैठ को लेकर राज्य की जायज चिंता को तो माना, लेकिन यह भी कहा कि "असली मजदूरों" की पहचान करने और उनकी सुरक्षा के लिए एक तरीका होना चाहिए। याचिका में गृह मंत्रालय के 2 मई, 2025 के सर्कुलर को लागू करने को चुनौती दी गई थी। इसमें तर्क दिया गया था कि राज्यों के बीच सत्यापन अभियान के कारण असली भारतीय नागरिकों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया जा रहा था।

बीरभूम के परिवारों को देश से बाहर निकाले जाने के बाद भी पार्टी सक्रिय रूप से इस मामले में शामिल रही। सितंबर 2025 में, TMC राज्यसभा सांसद समीरुल इस्लाम ने बीरभूम के मुराराई में सुनाली खातून और स्वीटी बीबी के परिवारों से मुलाकात की। इन दोनों महिलाओं और उनके बच्चों को भारतीय नागरिक होने का दावा करने के बावजूद कथित तौर पर बांग्लादेश भेज दिया गया था। सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में, इस्लाम ने उन्हें "असली भारतीय नागरिक" बताया, जिनके परिवार पीढ़ियों से बीरभूम में रह रहे थे। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी इस मामले को कलकत्ता हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों जगह उठा रही है। उन्होंने परिवारों को भरोसा दिलाया कि हर संभव कानूनी और संस्थागत मदद दी जाएगी, जिसमें महिलाओं के भारत लौटने पर राज्य सरकार की 'श्रमश्री' कल्याण योजना में उनका नाम शामिल करना भी शामिल है। स्क्रॉल से बात करते हुए, तृणमूल कांग्रेस के सांसद समीरुल इस्लाम ने कहा कि "सिर्फ न्यायपालिका के दखल की वजह से" सरकार ने आखिरकार उन लोगों को वापस बुलाया, जिन्हें उन्होंने "गरीब भारतीय नागरिक" बताया। उन्होंने माना कि असली विदेशी नागरिकों को कानूनी तौर पर वापस भेजा जा सकता है, लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि भारतीय नागरिकों को उनकी नागरिकता की ठीक से जांच किए बिना परेशान क्यों किया जाए, हिरासत में क्यों लिया जाए और देश से बाहर क्यों निकाला जाए।

प्रभावित परिवारों के लिए, भारत वापसी से उन्हें सिर्फ थोड़ी राहत मिली है। उनकी नागरिकता के दावों पर अभी कोई ठोस फैसला नहीं हुआ है और कानूनी लड़ाई जारी है। फिर भी, उनकी वापसी इस बात को मानती है कि नागरिकता के कानूनी फैसले से पहले सरकार कोई ऐसा कदम नहीं उठा सकती जिसे बदला न जा सके।

इस घटना का देश भर में नागरिकता की जांच की प्रक्रियाओं पर भी बड़ा असर पड़ता है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद से, सबरांगइंडिया और सिटिज़न फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) की कई रिपोर्टों में बंगाली बोलने वाले मुसलमानों को बिना ठीक से जांच किए हिरासत में लेने, उनसे पूछताछ करने और कुछ मामलों में उन्हें देश से बाहर निकालने के आरोपों का जिक्र किया गया है। यह कानूनी मामला ऐसी हरकतों के गंभीर संवैधानिक नतीजों को दिखाता है और मनमाने सरकारी कदमों के खिलाफ न्यायपालिका की सुरक्षा करने वाली भूमिका को मजबूत करता है।

विस्तृत रिपोर्ट यहां, यहां, यहां और यहां पढ़ी जा सकती हैं।

CJP जबरन और गैर-कानूनी तरीके से देश से बाहर निकाले जाने के मामलों में कानूनी मदद भी दे रहा है। विवरण यहां पढ़ा जा सकता है।

आखिरकार, यह मामला सिर्फ इमिग्रेशन लागू करने या नागरिकता के कागजात का नहीं है। यह राज्य की उस संवैधानिक जिम्मेदारी के बारे में है जिसके तहत उसे अपनी शक्तियों का इस्तेमाल निष्पक्ष, सावधानी से और उचित प्रक्रिया के अनुसार करना चाहिए। गलती से किसी को देश से बाहर निकालना कोई मामूली प्रशासनिक गलती नहीं है- इससे परिवार अलग हो सकते हैं, लोग किसी दूसरे देश में जेल जा सकते हैं और असल में अपनी नागरिकता खो सकते हैं। लगातार न्यायिक दखल से इन परिवारों की वापसी यह याद दिलाती है कि संवैधानिक गारंटी का सबसे ज्यादा महत्व तब होता है जब राज्य अपनी सबसे सख्त शक्तियों का इस्तेमाल करता है।

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