वाराणसी नगर निगम द्वारा मीट-मछली की दुकानों को शहर से बाहर के करने के विरोध में नागारिक समाज ने आज विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान उन्होंने मीट-मछली दुकानों को बंद करने का निर्णय वापस लेने, रोजी-रोटी पर हमला बंद करने, बनारस के बहुसांस्कृतिक ताने-बाने को बर्बाद करना बंद करने की मांग की।

वाराणसी नगर निगम द्वारा मीट-मछली की दुकानों को शहर से बाहर करने के आदेश के विरोध में आज मंगलवार को नागरिक समाज द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया। इसमें सीजेपी स्टाफ की भी भागीदारी रही। सैकड़ों की संख्या में लोग सिगरा पेट्रोल पंप के पास सुबह 10:00 बजे इकट्ठा हुए वहां से नगर निगम कार्यालय जाकर ज्ञापन दिया। इस प्रदर्शन में बनारस के मछली बेचने वाली महिलाएं मीट और मुर्गा बेचने वाले छोटे व्यवसाय मौजूद थे। इन लोगों ने अपनी बात रखी और यह दबाव बनाया की नगर निगम द्वारा जारी आदेश तुरंत वापस लिया जाए। नागरिक समाज के अलावा अन्य राजनीतिक दल के लोग भी समर्थन में साथ आए।
इस प्रदर्शन में बनारस शहर के अलावा आसपास के गांव से भी लोग शामिल रहे। सराय मोहना, सीर गोवर्धन, चौकाघाट, शिवाला, राजघाट मुकीम गंज, नदेसर, हुकुलगंज, अरदली बाजार, लल्लापुरा, दाल मंडी, रेवड़ी तालाब, पुराना पुल, पड़ाव, सरैया, नक्कीघाट, सोनारपुरा से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
सीजेपी की पूर्वांचल कोऑर्डिनेटर मुनीजा खान ने अपनी बात रखते हुए कहा कि "आज के इस प्रोटेस्ट में ज्यादातर वह लोग हैं जो मांस मछली नहीं खाते। यह दर्शाता है कि बनारस में आज भी हिंदू मुस्लिम एकता कायम है। सरकार चाहे जितना हिंदू मुस्लिम को बांटे और नफरत की राजनीति करे, लेकिन जब रोजी-रोटी का सवाल आता है तो सब एक है।"
उन्होंने यह का कि आज का यह प्रदर्शन हिंदू मुस्लिम एकता की एक जीती जागती मिसाल है। ज्यादातर हिंदू शाकाहारी लोगों ने आज सड़क पर उतरकर नगर निगम को ज्ञापन दिया कि वह मीट, मुर्गा और मछली की दुकानों को नगर निगम क्षेत्र के बाहर बेचने के आदेश को वापस ले।

06 जून 2026 को नगर निगम वाराणसी ने शहर की मीट, मछली और मुर्गे की दुकानों को नगर निगम क्षेत्र से हटाकर 10 से 15 किमी दूर ले जाने का निर्णय लिया। मेयर का तर्क है कि काशी एक सांस्कृतिक और धार्मिक शहर है, इसलिए यहां से इन दुकानों को हटाया जाना चाहिए। प्रस्ताव के अनुसार गणेशपुर, अवलेशपुर, रामनगर और शिवपुर में नए बाज़ार बनाए जाएंगे और शहर के लोगों को मीट, मछली या मुर्गा खरीदने के लिए मुख्य शहर से 10 से 15 किमी दूर जाना होगा।
इन आदेशों के खिलाफ प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने कहा कि "यह फैसला केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि शहर के हजारों छोटे कारोबारियों की आजीविका, नागरिकों की भोजन संबंधी पसंद और बनारस की बहुसांस्कृतिक पहचान पर हमला है। स्वच्छता के नाम पर खुदरा दुकानदारी बंद करके ग़रीबों को उजाड़ने की तैयारी की जा रही है, जबकि बड़े पूंजीपतियों और ऑनलाइन कंपनियों के लिए बाजार के दरवाजे खोले जा रहे हैं।"
उन्होंने कहा कि, "सवाल यह है कि यदि मीट-मछली-मुर्गे की बिक्री से शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान खराब होती है, तो फिर बड़े मॉल, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, होटल और रेस्टोरेंट इस दायरे से बाहर क्यों हैं? शहर में बड़े मॉल, लिशियस, ब्लिंकिट तथा बड़े होटल और रेस्टोरेंट में मांसाहारी भोजन मिलता रहेगा। तब क्या शहर की आस्था और संस्कृति आहत नहीं होगी? यह स्पष्ट रुप से दोहरे मानदंड को दर्शाता है।"
हमारी दुकानों की जगह कॉर्पोरेट लाना चाहते हैं!
प्रदर्शन में शामिल मछली का कारोबार करने वाली एक अन्य महिला ने कहा कि, "एक तरफ पीढ़ियों से आजीविका चला रहे गरीब खुदरा दुकानदारों को उजाड़ा जा रहा है, तो दूसरी तरफ बड़ी कंपनियों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को बाजार पर कब्जा करने का अवसर दिया जा रहा है। बनारस केवल किसी एक धर्म या समुदाय का शहर नहीं है। यह विश्व के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है, जहां सदियों से विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और समुदायों के लोग साथ रहते आए हैं। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, कबीरपंथी, रैदासी, औघड़ और तांत्रिक परंपराओं के लोग रहते हैं और अपनी-अपनी जीवनशैली एवं खान-पान के साथ इस शहर की साझी संस्कृति को समृद्ध करते हैं।"
उन्होंने आगे कहा कि, "बड़ी संख्या में बंगाली समुदाय निवास करता है, जिनकी धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं में मछली का महत्वपूर्ण स्थान है। मल्लाह समुदाय पीढ़ियों से मछली पकड़ने और बेचने का कार्य करता आया है। मुस्लिम समुदाय में भी मांसाहार सामान्य भोजन और अनेक धार्मिक अवसरों का हिस्सा है।"

उन्होंने कहा कि, 'धार्मिक नगरी है, इसलिए मांस नहीं बिकेगा’, 'सावन है तो मांस नहीं बिकेगा', 'कांवड़ यात्रा आ रही है तो मछली नहीं बिकेगी' जैसे तर्क लोगों की जरुरत और पसंद से मेल नहीं खाते। किसी एक समुदाय की खान-पान की आदतों को पूरे समाज पर थोपना न तो बनारस की परंपरा है और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है। किसी को नॉनवेज खाना पसंद न हो तो वो न खाने के लिए स्वतंत्र है। और जिसे खाना पसंद है उसे खाने की छूट होनी चाहिए, और बेचने की भी।
यह फैसला संविधान की भावना पर भी सवाल खड़ा करता है। बिना किसी व्यापक संवाद के इस प्रकार का निर्णय भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन तथा अपनी पसंद के भोजन के अधिकार को प्रभावित करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की जीवनशैली और रोजगार से जुड़े ऐसे फैसले संवाद और सहमति से होने चाहिए, न कि एकतरफा आदेश के माध्यम से।
"नगर निगम की जिम्मेदारी"
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि नगर निगम की जिम्मेदारी शहर को स्वच्छ रखना, सड़कों को दुरुस्त करना, पार्कों और तालाबों की देखभाल करना है। लेकिन इन जरूरी कामों को छोड़कर मीट मछली दुकानों को नगर निगम अपनी सीमा क्षेत्र से बाहर करने का जो फैसला ले रहा है, उस पर सोचिए जो जमीन नगर निगम की है ही नहीं उस जगह पर किसी को मेयर साहब भेज कैसे सकते हैं? इस फैसले का सीधा असर लाखों फार्मासिस्ट और हजारों छोटे व्यापारियों पर पड़ेगा। एक या दो किलो मीट खरीदने के लिए लोगों को 20 से 30 किलोमीटर चक्कर लगाना पड़ेगा। समय और पैसे दोनों की बर्बादी होगी। दूसरी ओर छोटे दुकानदारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा। एक दुकान से केवल दुकानदार ही नहीं, बल्कि उसके परिवार और उसके साथ काम करने वाले कर्मचारी भी जुड़े होते हैं। यदि ग्राहक दूर नहीं जाएंगे तो उनका व्यापार समाप्त हो जाएगा और हजारों परिवार आर्थिक संकट में पड़ जाएंगे।

छोटे दुकानदारों की ज़ी-रोटी पर हमला!
देश पहले से ही बेरोजगारी और महंगाई की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। ऐसे समय में छोटे व्यापारियों को उजाड़ने वाले फैसले सामाजिक और आर्थिक संकट को और गहरा करेंगे। यह सवाल उठना स्वभाव है कि यह निर्णय क्यों लिया जा रहा है?
मॉल, बड़ी कंपनियों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को फायदा पहुंचाना चाहते हैं!
वास्तव में स्वच्छता और संस्कृति के नाम पर लिया गया है, या धर्म की आड़ लेकर इसके पीछे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और बड़े व्यापारियों को लाभ पहुंचाने की राजनीति काम कर रही है? नगर निगम से हमारी मांग है की ये मनाना निर्णय वापस लें। मांस-मछली विक्रेताओं को स्ट्रीट वेंडर एक्ट 2014 से संरक्षण देते हुए उनका सर्वे करें, उन्हें सर्टिफिकेट दें और वेडिंग जोन में पक्के दुकान बनाएं दें। साफ-सफाई, स्वच्छ भंडारण, रंगीन या काले शीशे, फ्लाई कैचर, पानी की व्यवस्था तथा नियोजन और रखरखाव के विज्ञानसम्मत निर्देश बनावें और सख्ती से पालन करें।

इस प्रदर्शन में धनंजय त्रिपाठी, संजीव सिंह, नंदलाल, एडवोकेट अब्दुल्ला, अंकित वर्मा, मीरा देवी, राघवेंद्र चौबे, शमा बानो, वीके सिंह, अनूप श्रमिक, राम जनम, अब्दुल्ला खान, फादर आनंद, कृपा वर्मा, मनीष शर्मा, इनदू पांडे, निधि, समाजवादी पार्टी के वाराणसी के जिलाध्यक्ष सुजीत यादव (लक्कड़ पहलवान), कांग्रेस महानगर अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे समेत अन्य नेता व सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।
वहीं प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आप, सीपीआईएमएल, ऐपवा, आइसा सक्रिय रूप से शामिल रहीं।
मुख्य मांगें:-
1. नगर निगम द्वारा मांस-मछली की दुकानों को शहर से बाहर विस्थापन करने के एकतरफा निर्णय को तत्काल वापस लिया जाए।
2. विस्थापन के बजाय शहर के भीतर पहले से संचालित मांस-मछली मण्डियों और दुकानों को नियमित (रेगुलराइज) किया जाए।
3. मांस-मछली विक्रेताओं का सर्वे कर उन्हें विधिक मान्यता और आवश्यक प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाएं तथा उनके लिए पक्की दुकानों की व्यवस्था की जाए।
4. दुकानों में स्वच्छता और स्वास्थ्य के वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप बिजली, पानी, पर्याप्त कचरा प्रबंधन तथा शीत भंडारण (कोल्ड स्टोरेज) की व्यवस्था विकसित की जाए।
5. दुकानों में ग्रीन नेट, शीशे, फ्लाई कैचर तथा स्वच्छ भंडारण और बिछाने की अनिवार्य व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
6. मांस-मछली विक्रेताओं को स्ट्रीट वेंडर्स (जीविका संरक्षण एवं पथ विक्रय पर्यवेक्षण) अधिनियम, 2014 के तहत संरक्षण प्रदान किया जाए।
7. नगर निगम शहर के भीतर पहले से संचालित मण्डियों के विकास में निवेश करे और वहां कार्यरत विक्रेताओं को पक्की दुकानें का कामकाज करे।
8. नागरिकों के अपनी पसंद के भोजन, आजीविका और व्यापार के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए तथा किसी एक वर्ग की विकासशील के आधार पर प्रतिबंधात्मक निर्णय न के लिए जाएं।

वाराणसी नगर निगम द्वारा मीट-मछली की दुकानों को शहर से बाहर करने के आदेश के विरोध में आज मंगलवार को नागरिक समाज द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया। इसमें सीजेपी स्टाफ की भी भागीदारी रही। सैकड़ों की संख्या में लोग सिगरा पेट्रोल पंप के पास सुबह 10:00 बजे इकट्ठा हुए वहां से नगर निगम कार्यालय जाकर ज्ञापन दिया। इस प्रदर्शन में बनारस के मछली बेचने वाली महिलाएं मीट और मुर्गा बेचने वाले छोटे व्यवसाय मौजूद थे। इन लोगों ने अपनी बात रखी और यह दबाव बनाया की नगर निगम द्वारा जारी आदेश तुरंत वापस लिया जाए। नागरिक समाज के अलावा अन्य राजनीतिक दल के लोग भी समर्थन में साथ आए।
इस प्रदर्शन में बनारस शहर के अलावा आसपास के गांव से भी लोग शामिल रहे। सराय मोहना, सीर गोवर्धन, चौकाघाट, शिवाला, राजघाट मुकीम गंज, नदेसर, हुकुलगंज, अरदली बाजार, लल्लापुरा, दाल मंडी, रेवड़ी तालाब, पुराना पुल, पड़ाव, सरैया, नक्कीघाट, सोनारपुरा से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
सीजेपी की पूर्वांचल कोऑर्डिनेटर मुनीजा खान ने अपनी बात रखते हुए कहा कि "आज के इस प्रोटेस्ट में ज्यादातर वह लोग हैं जो मांस मछली नहीं खाते। यह दर्शाता है कि बनारस में आज भी हिंदू मुस्लिम एकता कायम है। सरकार चाहे जितना हिंदू मुस्लिम को बांटे और नफरत की राजनीति करे, लेकिन जब रोजी-रोटी का सवाल आता है तो सब एक है।"
उन्होंने यह का कि आज का यह प्रदर्शन हिंदू मुस्लिम एकता की एक जीती जागती मिसाल है। ज्यादातर हिंदू शाकाहारी लोगों ने आज सड़क पर उतरकर नगर निगम को ज्ञापन दिया कि वह मीट, मुर्गा और मछली की दुकानों को नगर निगम क्षेत्र के बाहर बेचने के आदेश को वापस ले।

06 जून 2026 को नगर निगम वाराणसी ने शहर की मीट, मछली और मुर्गे की दुकानों को नगर निगम क्षेत्र से हटाकर 10 से 15 किमी दूर ले जाने का निर्णय लिया। मेयर का तर्क है कि काशी एक सांस्कृतिक और धार्मिक शहर है, इसलिए यहां से इन दुकानों को हटाया जाना चाहिए। प्रस्ताव के अनुसार गणेशपुर, अवलेशपुर, रामनगर और शिवपुर में नए बाज़ार बनाए जाएंगे और शहर के लोगों को मीट, मछली या मुर्गा खरीदने के लिए मुख्य शहर से 10 से 15 किमी दूर जाना होगा।
इन आदेशों के खिलाफ प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने कहा कि "यह फैसला केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि शहर के हजारों छोटे कारोबारियों की आजीविका, नागरिकों की भोजन संबंधी पसंद और बनारस की बहुसांस्कृतिक पहचान पर हमला है। स्वच्छता के नाम पर खुदरा दुकानदारी बंद करके ग़रीबों को उजाड़ने की तैयारी की जा रही है, जबकि बड़े पूंजीपतियों और ऑनलाइन कंपनियों के लिए बाजार के दरवाजे खोले जा रहे हैं।"
उन्होंने कहा कि, "सवाल यह है कि यदि मीट-मछली-मुर्गे की बिक्री से शहर की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान खराब होती है, तो फिर बड़े मॉल, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, होटल और रेस्टोरेंट इस दायरे से बाहर क्यों हैं? शहर में बड़े मॉल, लिशियस, ब्लिंकिट तथा बड़े होटल और रेस्टोरेंट में मांसाहारी भोजन मिलता रहेगा। तब क्या शहर की आस्था और संस्कृति आहत नहीं होगी? यह स्पष्ट रुप से दोहरे मानदंड को दर्शाता है।"
हमारी दुकानों की जगह कॉर्पोरेट लाना चाहते हैं!
प्रदर्शन में शामिल मछली का कारोबार करने वाली एक अन्य महिला ने कहा कि, "एक तरफ पीढ़ियों से आजीविका चला रहे गरीब खुदरा दुकानदारों को उजाड़ा जा रहा है, तो दूसरी तरफ बड़ी कंपनियों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को बाजार पर कब्जा करने का अवसर दिया जा रहा है। बनारस केवल किसी एक धर्म या समुदाय का शहर नहीं है। यह विश्व के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है, जहां सदियों से विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और समुदायों के लोग साथ रहते आए हैं। यहां हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, कबीरपंथी, रैदासी, औघड़ और तांत्रिक परंपराओं के लोग रहते हैं और अपनी-अपनी जीवनशैली एवं खान-पान के साथ इस शहर की साझी संस्कृति को समृद्ध करते हैं।"
उन्होंने आगे कहा कि, "बड़ी संख्या में बंगाली समुदाय निवास करता है, जिनकी धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं में मछली का महत्वपूर्ण स्थान है। मल्लाह समुदाय पीढ़ियों से मछली पकड़ने और बेचने का कार्य करता आया है। मुस्लिम समुदाय में भी मांसाहार सामान्य भोजन और अनेक धार्मिक अवसरों का हिस्सा है।"

उन्होंने कहा कि, 'धार्मिक नगरी है, इसलिए मांस नहीं बिकेगा’, 'सावन है तो मांस नहीं बिकेगा', 'कांवड़ यात्रा आ रही है तो मछली नहीं बिकेगी' जैसे तर्क लोगों की जरुरत और पसंद से मेल नहीं खाते। किसी एक समुदाय की खान-पान की आदतों को पूरे समाज पर थोपना न तो बनारस की परंपरा है और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है। किसी को नॉनवेज खाना पसंद न हो तो वो न खाने के लिए स्वतंत्र है। और जिसे खाना पसंद है उसे खाने की छूट होनी चाहिए, और बेचने की भी।
यह फैसला संविधान की भावना पर भी सवाल खड़ा करता है। बिना किसी व्यापक संवाद के इस प्रकार का निर्णय भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यापार की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन तथा अपनी पसंद के भोजन के अधिकार को प्रभावित करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की जीवनशैली और रोजगार से जुड़े ऐसे फैसले संवाद और सहमति से होने चाहिए, न कि एकतरफा आदेश के माध्यम से।
"नगर निगम की जिम्मेदारी"
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि नगर निगम की जिम्मेदारी शहर को स्वच्छ रखना, सड़कों को दुरुस्त करना, पार्कों और तालाबों की देखभाल करना है। लेकिन इन जरूरी कामों को छोड़कर मीट मछली दुकानों को नगर निगम अपनी सीमा क्षेत्र से बाहर करने का जो फैसला ले रहा है, उस पर सोचिए जो जमीन नगर निगम की है ही नहीं उस जगह पर किसी को मेयर साहब भेज कैसे सकते हैं? इस फैसले का सीधा असर लाखों फार्मासिस्ट और हजारों छोटे व्यापारियों पर पड़ेगा। एक या दो किलो मीट खरीदने के लिए लोगों को 20 से 30 किलोमीटर चक्कर लगाना पड़ेगा। समय और पैसे दोनों की बर्बादी होगी। दूसरी ओर छोटे दुकानदारों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा। एक दुकान से केवल दुकानदार ही नहीं, बल्कि उसके परिवार और उसके साथ काम करने वाले कर्मचारी भी जुड़े होते हैं। यदि ग्राहक दूर नहीं जाएंगे तो उनका व्यापार समाप्त हो जाएगा और हजारों परिवार आर्थिक संकट में पड़ जाएंगे।

छोटे दुकानदारों की ज़ी-रोटी पर हमला!
देश पहले से ही बेरोजगारी और महंगाई की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। ऐसे समय में छोटे व्यापारियों को उजाड़ने वाले फैसले सामाजिक और आर्थिक संकट को और गहरा करेंगे। यह सवाल उठना स्वभाव है कि यह निर्णय क्यों लिया जा रहा है?
मॉल, बड़ी कंपनियों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को फायदा पहुंचाना चाहते हैं!
वास्तव में स्वच्छता और संस्कृति के नाम पर लिया गया है, या धर्म की आड़ लेकर इसके पीछे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और बड़े व्यापारियों को लाभ पहुंचाने की राजनीति काम कर रही है? नगर निगम से हमारी मांग है की ये मनाना निर्णय वापस लें। मांस-मछली विक्रेताओं को स्ट्रीट वेंडर एक्ट 2014 से संरक्षण देते हुए उनका सर्वे करें, उन्हें सर्टिफिकेट दें और वेडिंग जोन में पक्के दुकान बनाएं दें। साफ-सफाई, स्वच्छ भंडारण, रंगीन या काले शीशे, फ्लाई कैचर, पानी की व्यवस्था तथा नियोजन और रखरखाव के विज्ञानसम्मत निर्देश बनावें और सख्ती से पालन करें।

इस प्रदर्शन में धनंजय त्रिपाठी, संजीव सिंह, नंदलाल, एडवोकेट अब्दुल्ला, अंकित वर्मा, मीरा देवी, राघवेंद्र चौबे, शमा बानो, वीके सिंह, अनूप श्रमिक, राम जनम, अब्दुल्ला खान, फादर आनंद, कृपा वर्मा, मनीष शर्मा, इनदू पांडे, निधि, समाजवादी पार्टी के वाराणसी के जिलाध्यक्ष सुजीत यादव (लक्कड़ पहलवान), कांग्रेस महानगर अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे समेत अन्य नेता व सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए।
वहीं प्रमुख राजनीतिक पार्टियों में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आप, सीपीआईएमएल, ऐपवा, आइसा सक्रिय रूप से शामिल रहीं।
मुख्य मांगें:-
1. नगर निगम द्वारा मांस-मछली की दुकानों को शहर से बाहर विस्थापन करने के एकतरफा निर्णय को तत्काल वापस लिया जाए।
2. विस्थापन के बजाय शहर के भीतर पहले से संचालित मांस-मछली मण्डियों और दुकानों को नियमित (रेगुलराइज) किया जाए।
3. मांस-मछली विक्रेताओं का सर्वे कर उन्हें विधिक मान्यता और आवश्यक प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाएं तथा उनके लिए पक्की दुकानों की व्यवस्था की जाए।
4. दुकानों में स्वच्छता और स्वास्थ्य के वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप बिजली, पानी, पर्याप्त कचरा प्रबंधन तथा शीत भंडारण (कोल्ड स्टोरेज) की व्यवस्था विकसित की जाए।
5. दुकानों में ग्रीन नेट, शीशे, फ्लाई कैचर तथा स्वच्छ भंडारण और बिछाने की अनिवार्य व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
6. मांस-मछली विक्रेताओं को स्ट्रीट वेंडर्स (जीविका संरक्षण एवं पथ विक्रय पर्यवेक्षण) अधिनियम, 2014 के तहत संरक्षण प्रदान किया जाए।
7. नगर निगम शहर के भीतर पहले से संचालित मण्डियों के विकास में निवेश करे और वहां कार्यरत विक्रेताओं को पक्की दुकानें का कामकाज करे।
8. नागरिकों के अपनी पसंद के भोजन, आजीविका और व्यापार के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए तथा किसी एक वर्ग की विकासशील के आधार पर प्रतिबंधात्मक निर्णय न के लिए जाएं।