गो-हत्या के आरोप में 70 वर्षीय ज़हीरुद्दीन उर्फ डब्बो ग्यासुद्दीन शेख को गिरफ्तार किया गया था। उनके परिवार से कहा गया है कि वे पहले BNSS के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल करें।

गुजरात हाई कोर्ट ने 70 वर्षीय ज़हीरुद्दीन उर्फ डब्बो ग्यासुद्दीन शेख की कथित हिरासत में हुई मौत के मामले में तुरंत FIR दर्ज करने का आदेश देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने परिवार से कहा है कि वे पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल करें।
ज़हीरुद्दीन को 18 मई को अहमदाबाद पुलिस ने गो-हत्या के एक मामले में गिरफ्तार किया था। उनके बेटे, तोफिक शेख ने आरोप लगाया कि उनके पिता की मौत हिरासत में हुई हिंसा के कारण हुई। उनका कहना है कि हिरासत में उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें कोई अज्ञात पदार्थ खिलाया गया। 70 वर्षीय ज़हीरुद्दीन को 19 मई को सोला सिविल अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन ICU में बेड खाली न होने के कारण उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया और कुछ घंटों बाद उनकी मौत हो गई। परिवार का दावा है कि मेडिकल रिकॉर्ड और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि यह एक संज्ञेय अपराध का मामला है।
क्लेरिअन की रिपोर्ट के अनुसार, तोफिक ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कथित हिरासत में मौत के मामले में FIR दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की थी।
जस्टिस डी.एन. रे ने शुक्रवार को इस याचिका को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि हिरासत में मौत के मामलों में भी परिवार कानूनी प्रक्रिया को नज़रअंदाज करके सीधे अनुच्छेद 226 के तहत कोर्ट में नहीं आ सकते।
जस्टिस रे ने कहा कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला (ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार) यह कहता है कि जब कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है, तो FIR दर्ज करना जरूरी होता है, लेकिन यह फैसला परिवारों को यह अधिकार नहीं देता कि यदि पुलिस कार्रवाई करने में नाकाम रहती है, तो वे सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएं।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हाल के कुछ फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें सुजल विश्वास अट्टावर बनाम महाराष्ट्र सरकार और साकिरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले शामिल हैं। इन फैसलों में कहा गया है कि यदि पुलिस FIR दर्ज करने से मना करती है, तो लोगों को सबसे पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों या किसी मजिस्ट्रेट के पास जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा, "भले ही यह आशंका हो कि पुलिस अपने ही विभाग के खिलाफ FIR दर्ज नहीं करेगी, लेकिन सिर्फ इस वजह से कानूनी उपायों को नजरअंदाज करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।"
गुजरात सरकार ने दलील दी कि अभी तक पुलिस की ओर से किसी भी तरह की लापरवाही या कार्रवाई न करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। परिवार ने 21 मई को हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन पुलिस में औपचारिक शिकायत 22 मई को दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने यह भी बताया कि उसने 20 से 22 मई के बीच एक आंतरिक जांच की थी, जिसमें CCTV फुटेज की समीक्षा करना और अधिकारियों के बयान दर्ज करना शामिल था।
हाई कोर्ट ने परिवार को BNSS के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। इन उपायों में FIR दर्ज कराने या जांच शुरू कराने के लिए मजिस्ट्रेट के पास जाना भी शामिल है।
पुलिस का आरोप है कि ज़हीरुद्दीन गो-हत्या के एक अवैध धंधे का सरगना था। खबरों के मुताबिक, एक छापे के दौरान 520 किलोग्राम संदिग्ध गोमांस और एक जीवित बछड़ा बरामद किया गया। उसके खिलाफ BNS, गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।
ज्ञात हो कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की नई 'प्रिज़न स्टैटिस्टिक्स इंडिया 2024' रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब और हरियाणा में 2024 के दौरान जेलों में कैदियों की अप्राकृतिक मौतों की संख्या देश में दूसरे स्थान पर रही। दोनों राज्यों में 15-15 मौतें दर्ज की गईं। कुल मिलाकर, देशभर में हुई 166 अप्राकृतिक मौतों में से लगभग 18 प्रतिशत मौतें इन दोनों राज्यों में हुईं।
उत्तर प्रदेश में जेलों में अप्राकृतिक मौतों की सबसे अधिक संख्या 26 दर्ज की गई, जिसके बाद पंजाब और हरियाणा का स्थान रहा। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) दिल्ली में ऐसी 12 मौतें हुईं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब की जेलों में हुई 15 अप्राकृतिक मौतों में से 12 आत्महत्याएं थीं, दो साथी कैदियों द्वारा की गई हत्याएं थीं और एक आकस्मिक मौत थी। हरियाणा में सभी 15 अप्राकृतिक मौतें आत्महत्या के कारण हुईं। उत्तर प्रदेश में 16 मौतें आत्महत्या की वजह से हुईं, एक-एक हत्या और दुर्घटना के कारण हुई, जबकि आठ मौतों को "अन्य" कारणों की श्रेणी में रखा गया।
उत्तर प्रदेश के बाद जेलों में सबसे अधिक प्राकृतिक मौतें पंजाब में हुईं। उत्तर प्रदेश में 304 कैदियों की प्राकृतिक मौतें हुईं, जबकि पंजाब में 213 और महाराष्ट्र में 136 मौतें दर्ज की गईं। पूरे देश में 2024 के दौरान जेलों में 1,737 प्राकृतिक मौतें हुईं।
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ज़हीरुद्दीन को 18 मई को अहमदाबाद पुलिस ने गो-हत्या के एक मामले में गिरफ्तार किया था। उनके बेटे, तोफिक शेख ने आरोप लगाया कि उनके पिता की मौत हिरासत में हुई हिंसा के कारण हुई। उनका कहना है कि हिरासत में उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें कोई अज्ञात पदार्थ खिलाया गया। 70 वर्षीय ज़हीरुद्दीन को 19 मई को सोला सिविल अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन ICU में बेड खाली न होने के कारण उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया और कुछ घंटों बाद उनकी मौत हो गई। परिवार का दावा है कि मेडिकल रिकॉर्ड और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चलता है कि यह एक संज्ञेय अपराध का मामला है।
क्लेरिअन की रिपोर्ट के अनुसार, तोफिक ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कथित हिरासत में मौत के मामले में FIR दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की थी।
जस्टिस डी.एन. रे ने शुक्रवार को इस याचिका को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि हिरासत में मौत के मामलों में भी परिवार कानूनी प्रक्रिया को नज़रअंदाज करके सीधे अनुच्छेद 226 के तहत कोर्ट में नहीं आ सकते।
जस्टिस रे ने कहा कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला (ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार) यह कहता है कि जब कोई संज्ञेय अपराध सामने आता है, तो FIR दर्ज करना जरूरी होता है, लेकिन यह फैसला परिवारों को यह अधिकार नहीं देता कि यदि पुलिस कार्रवाई करने में नाकाम रहती है, तो वे सीधे अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएं।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हाल के कुछ फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें सुजल विश्वास अट्टावर बनाम महाराष्ट्र सरकार और साकिरी वासु बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले शामिल हैं। इन फैसलों में कहा गया है कि यदि पुलिस FIR दर्ज करने से मना करती है, तो लोगों को सबसे पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों या किसी मजिस्ट्रेट के पास जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा, "भले ही यह आशंका हो कि पुलिस अपने ही विभाग के खिलाफ FIR दर्ज नहीं करेगी, लेकिन सिर्फ इस वजह से कानूनी उपायों को नजरअंदाज करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।"
गुजरात सरकार ने दलील दी कि अभी तक पुलिस की ओर से किसी भी तरह की लापरवाही या कार्रवाई न करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता। परिवार ने 21 मई को हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी, लेकिन पुलिस में औपचारिक शिकायत 22 मई को दर्ज कराई गई थी। पुलिस ने यह भी बताया कि उसने 20 से 22 मई के बीच एक आंतरिक जांच की थी, जिसमें CCTV फुटेज की समीक्षा करना और अधिकारियों के बयान दर्ज करना शामिल था।
हाई कोर्ट ने परिवार को BNSS के तहत उपलब्ध कानूनी उपायों का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है। इन उपायों में FIR दर्ज कराने या जांच शुरू कराने के लिए मजिस्ट्रेट के पास जाना भी शामिल है।
पुलिस का आरोप है कि ज़हीरुद्दीन गो-हत्या के एक अवैध धंधे का सरगना था। खबरों के मुताबिक, एक छापे के दौरान 520 किलोग्राम संदिग्ध गोमांस और एक जीवित बछड़ा बरामद किया गया। उसके खिलाफ BNS, गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।
ज्ञात हो कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की नई 'प्रिज़न स्टैटिस्टिक्स इंडिया 2024' रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब और हरियाणा में 2024 के दौरान जेलों में कैदियों की अप्राकृतिक मौतों की संख्या देश में दूसरे स्थान पर रही। दोनों राज्यों में 15-15 मौतें दर्ज की गईं। कुल मिलाकर, देशभर में हुई 166 अप्राकृतिक मौतों में से लगभग 18 प्रतिशत मौतें इन दोनों राज्यों में हुईं।
उत्तर प्रदेश में जेलों में अप्राकृतिक मौतों की सबसे अधिक संख्या 26 दर्ज की गई, जिसके बाद पंजाब और हरियाणा का स्थान रहा। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) दिल्ली में ऐसी 12 मौतें हुईं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब की जेलों में हुई 15 अप्राकृतिक मौतों में से 12 आत्महत्याएं थीं, दो साथी कैदियों द्वारा की गई हत्याएं थीं और एक आकस्मिक मौत थी। हरियाणा में सभी 15 अप्राकृतिक मौतें आत्महत्या के कारण हुईं। उत्तर प्रदेश में 16 मौतें आत्महत्या की वजह से हुईं, एक-एक हत्या और दुर्घटना के कारण हुई, जबकि आठ मौतों को "अन्य" कारणों की श्रेणी में रखा गया।
उत्तर प्रदेश के बाद जेलों में सबसे अधिक प्राकृतिक मौतें पंजाब में हुईं। उत्तर प्रदेश में 304 कैदियों की प्राकृतिक मौतें हुईं, जबकि पंजाब में 213 और महाराष्ट्र में 136 मौतें दर्ज की गईं। पूरे देश में 2024 के दौरान जेलों में 1,737 प्राकृतिक मौतें हुईं।
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