याचिकाकर्ता ने 2018 के एकतरफा विदेशी न्यायाधिकरण (FT) फैसले को चुनौती देने में देरी के लिए आर्थिक असमर्थता और कानूनी सहायता के अभाव को जिम्मेदार ठहराया; कोर्ट ने कहा, यदि नए सिरे से सुनवाई का मामला बनता है, तो उस पर “तत्काल” विचार किया जाना चाहिए।

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने 11 मई, 2026 को अब्दुल शेख उर्फ अब्दुल गफ्फार द्वारा दायर रिट याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में 2018 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए एकतरफ़ा (ex parte) फैसले को चुनौती दी गई थी और साथ ही देश से बाहर करने के खिलाफ अंतरिम सुरक्षा जारी रखी गई थी। यह मामला जस्टिस संजय कुमार मेधी और जस्टिस प्रांजल दास की डिवीजन बेंच के सामने आया। हालांकि सुनवाई ज्यादातर प्रक्रियागत थी, लेकिन कोर्ट में हुई बातचीत मुख्य रूप से ट्रिब्यूनल के फैसले के एकतरफा होने, कानूनी सहायता की कमी, फैसले को चुनौती देने में हुई देरी के कारणों और याचिकाकर्ता के कथित "पुशबैक" (वापस भेजने) के संबंध में राज्य के रुख जैसे महत्वपूर्ण सवालों पर केंद्रित थी।
'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' इस मामले में कानूनी सहायता पहुंचा रहा है।
कार्यवाही का विवरण
कोर्ट ने जांच की कि ट्रिब्यूनल का फैसला एकतरफा कैसे हो गया: शुरुआत में, फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के अधिकारियों की ओर से पेश वकील ने इस मामले में हलफनामा दायर करने के लिए समय मांगा। तब बेंच ने पूछा कि यह मामला किस मामले को लेकर है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मृण्मय दत्ता ने बताया कि यह रिट याचिका 2018 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए एकतरफा फैसले को चुनौती देती है।
हर हफ्ते, असम में CJP की समर्पित टीम- जिसमें सामुदायिक स्वयंसेवक, डिस्ट्रिक्ट वॉलंटियर मोटिवेटर और वकील शामिल हैं- असम के 24 से अधिक जिलों में नागरिकता संकट से प्रभावित कई लोगों को महत्वपूर्ण अर्ध-कानूनी सहायता, परामर्श और कानूनी मदद देती है। हमारे जमीनी स्तर के प्रयासों के माध्यम से, 12,00,000 लोगों ने सफलतापूर्वक अपने भरे हुए NRC फॉर्म जमा किए (2017-2019)। हम हर महीने जिला स्तर पर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के मामलों की पैरवी करते हैं। इन समन्वित प्रयासों के जरिए, हमने सालाना 20 मामलों में सफलता की एक प्रभावशाली दर हासिल की है, जिसमें लोगों को सफलतापूर्वक भारतीय नागरिकता मिली है। यह जमीनी स्तर का डेटा CJP को हमारी संवैधानिक अदालतों में सोच-समझकर हस्तक्षेप करने में मदद करता है। आपका समर्थन इस महत्वपूर्ण कार्य को आगे बढ़ाता है। सभी के लिए समान अधिकारों के लिए हमारे साथ खड़े हों।
स्पष्टीकरण मांगते हुए, बेंच ने पूछा कि फैसले के "एकतरफा" होने का ठीक-ठीक क्या मतलब है।
वरिष्ठ वकील मृण्मय दत्ता ने बताया कि याचिकाकर्ता शुरू में ट्रिब्यूनल के सामने पेश हुआ था, लेकिन वह कार्यवाही में आगे हिस्सा नहीं ले पाया क्योंकि वह वकील की फीस देने में असमर्थ था। नतीजतन, हालांकि ट्रिब्यूनल के सामने पेशी दर्ज की गई थी, लेकिन मामला आखिरकार एकतरफा (ex-parte) ही आगे बढ़ा।
इसके बाद बेंच ने खास तौर पर पूछा कि क्या किसी भी चरण में कानूनी सहायता दी गई थी। जवाब में, सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने भी बताया कि याचिकाकर्ता की आर्थिक स्थिति के बावजूद उसे कोई कानूनी सहायता नहीं दी गई थी। उन्होंने कोर्ट को आगे बताया कि कानूनी सहायता न मिलना ही इस मौजूदा रिट याचिका के मुख्य आधारों में से एक है। उनके अनुसार, कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जा सकती थी, लेकिन अधिकारियों या सिस्टम की ओर से यह सुनिश्चित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया कि याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व हो सके, खासकर तब जब यह साफ हो गया था कि याचिकाकर्ता निजी वकील का खर्च उठाने में असमर्थ है।
इसके बाद कोर्ट ने पूछा कि याचिकाकर्ता ने ट्रिब्यूनल की कार्यवाही में किस चरण तक हिस्सा लिया था। सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने साफ किया कि हालांकि ट्रिब्यूनल के सामने पेशी दर्ज की गई थी, लेकिन आखिरकार कोई लिखित बयान दाखिल नहीं किया गया था।
सुनवाई के दौरान राज्य ने "पुशबैक" का आरोप लगाया: इसके बाद बेंच ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के अधिकारियों की ओर से पेश वकील की ओर रुख किया और पूछा कि क्या राज्य का मामला यह है कि याचिकाकर्ता ने बस लिखित बयान दाखिल करने में लापरवाही की थी।
जवाब में, ट्रिब्यूनल अधिकारियों के वकील ने कोर्ट के सामने कहा कि यह "लापरवाही का मामला नहीं है," और आगे आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता को "बाहर कर दिया गया था" (pushed back) और उसके बाद उसने "फिर से भारत में प्रवेश किया।"
यह बयान याचिकाकर्ता के पक्ष के लिए अप्रत्याशित प्रतीत हुआ। सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने तुरंत जवाब दिया कि यह उनके लिए पूरी तरह से नई जानकारी थी और पहले कभी भी कार्यवाही या याचिकाकर्ता के पास उपलब्ध रिकॉर्ड में सामने नहीं आई थी। बेंच ने उनसे कहा कि वह "इस क्षेत्र के एक अनुभवी व्यक्ति" हैं।
सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने स्पष्ट किया कि किसी भी तरह के 'पुशबैक' (बाहर करने) के बारे में पहले कभी कोई आरोप सामने नहीं आया था और यह पहली बार था जब कोर्ट में ऐसा कोई बयान दिया गया था। उन्होंने दलील दी कि उनके पास मौजूद रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता को वापस भेज दिया गया था और उसके बाद उसने दोबारा भारत में प्रवेश किया था।
इस बातचीत के बाद, ट्रिब्यूनल अधिकारियों के वकील ने राज्य का पक्ष हलफनामे के रूप में रखने के लिए और समय देने का अनुरोध किया।
कोर्ट ने पूछा कि नोटिस पहले क्यों जारी नहीं किया गया था: इसके बाद बेंच ने पूछा कि क्या रिट याचिका में औपचारिक रूप से नोटिस जारी किया गया था। सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने बताया कि नोटिस अभी तक जारी नहीं किया गया था, क्योंकि पिछली सुनवाई के दौरान, राज्य ने हलफनामा दाखिल करके देरी के मुद्दे पर अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा था। हालांकि, इस बीच, कोर्ट द्वारा निर्वासन (deportation) के खिलाफ अंतरिम सुरक्षा पहले ही दी जा चुकी थी।
बेंच ने यह भी पूछा कि क्या याचिकाकर्ता अभी भी हिरासत में है। सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने कोर्ट को बताया कि उनकी जानकारी के अनुसार, याचिकाकर्ता अभी भी हिरासत शिविर (detention camp) में बंद है। जब उनसे पूछा गया कि वह कब से हिरासत में है, तो उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता 25 मई, 2025 से हिरासत में है, और यह हिरासत 2018 के 'विदेशी ट्रिब्यूनल' (Foreigners Tribunal) के फैसले के आधार पर है। उन्होंने कोर्ट को यह भी याद दिलाया कि यह रिट याचिका सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई उस अनुमति के तहत दाखिल की गई थी, जिसके तहत ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती देने की छूट दी गई थी।
नोटिस जारी; कोर्ट ने कहा - नई सुनवाई पर विचार किया जा सकता है
दोनों पक्षों को सुनने के बाद, बेंच ने कहा कि अब औपचारिक रूप से नोटिस जारी किया जाना चाहिए, ताकि राज्य को अपना पक्ष हलफनामे के रूप में कोर्ट के सामने रखना पड़े।
इस तरह, कोर्ट ने इस मामले में नोटिस जारी कर दिया और इसे 15 जून, 2026 तक जवाब दाखिल करने योग्य बनाया। बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि निर्वासन के खिलाफ दी गई अंतरिम सुरक्षा जारी रहेगी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि आदेश लिखवाते समय, कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि यदि याचिकाकर्ता 'विदेशी ट्रिब्यूनल' को मामला वापस भेजकर उस पर नई सुनवाई कराने के लिए कोई ठोस आधार प्रस्तुत करने में सफल हो जाता है, तो ऐसे कदम पर तत्काल विचार किया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी याचिकाकर्ता की उस दलील के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसमें उसने कहा था कि ट्रिब्यूनल की कार्यवाही एकतरफा फैसले (ex parte opinion) के रूप में समाप्त हो गई थी, क्योंकि वह कानूनी प्रतिनिधित्व (वकील) का खर्च उठाने में असमर्थ हो गया था और इसके बावजूद उसे कोई कानूनी सहायता भी प्रदान नहीं की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
इस रिट याचिका में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल, चिरांग द्वारा 13 जून, 2018 को दिए गए एकतरफा (ex-parte) फैसले को चुनौती दी गई है। इस फैसले में अब्दुल शेख उर्फ अब्दुल गफ़ार को एक विदेशी नागरिक घोषित किया गया था, जिसने कथित तौर पर 25 मार्च, 1971 के बाद भारत में प्रवेश किया था।
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपने वकील के माध्यम से इस कार्यवाही का विरोध किया था, लेकिन गंभीर आर्थिक तंगी के कारण वह इसे जारी नहीं रख सका। याचिका में कहा गया है कि इसलिए, यह एकतरफा फैसला याचिकाकर्ता द्वारा जानबूझकर कार्यवाही में शामिल न होने का परिणाम नहीं था, बल्कि यह उसकी निजी कानूनी सहायता जारी रखने में असमर्थता के कारण हुआ था।
याचिका में आगे बताया गया है कि याचिकाकर्ता को 2019 में हिरासत में लिया गया था और 2021 में उसे रिहा कर दिया गया। यह रिहाई, घोषित विदेशियों की लंबी हिरासत को नियंत्रित करने वाले तत्कालीन निर्देशों के तहत की गई थी। याचिका में यह भी कहा गया है कि 25 मई, 2025 को उसे फिर से हिरासत में ले लिया गया।
हाई कोर्ट के समक्ष यह वर्तमान मामला तब दायर की गई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में पिछली कार्यवाही का निपटारा करते हुए यह स्पष्ट कर दिया था कि याचिकाकर्ता को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती देने की पूरी स्वतंत्रता होगी।
याचिका में इस वर्तमान चुनौती को दायर करने में हुई देरी के लिए कई कारणों का जिक्र किया गया है: लंबी हिरासत, आर्थिक कठिनाई, कानूनी सहायता का अभाव, हिरासत में रहते हुए सीमित संपर्क सुविधा और हिरासत में रखे गए व्यक्ति के साथ सीधे संवाद किए बिना कानूनी कार्यवाही तैयार करने में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयां।
इस मामले की अगली सुनवाई 15 जून, 2026 को होगी।
पिछली कार्यवाहियों का विवरण यहां पढ़ा जा सकता है।
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गुवाहाटी हाई कोर्ट ने 11 मई, 2026 को अब्दुल शेख उर्फ अब्दुल गफ्फार द्वारा दायर रिट याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में 2018 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए एकतरफ़ा (ex parte) फैसले को चुनौती दी गई थी और साथ ही देश से बाहर करने के खिलाफ अंतरिम सुरक्षा जारी रखी गई थी। यह मामला जस्टिस संजय कुमार मेधी और जस्टिस प्रांजल दास की डिवीजन बेंच के सामने आया। हालांकि सुनवाई ज्यादातर प्रक्रियागत थी, लेकिन कोर्ट में हुई बातचीत मुख्य रूप से ट्रिब्यूनल के फैसले के एकतरफा होने, कानूनी सहायता की कमी, फैसले को चुनौती देने में हुई देरी के कारणों और याचिकाकर्ता के कथित "पुशबैक" (वापस भेजने) के संबंध में राज्य के रुख जैसे महत्वपूर्ण सवालों पर केंद्रित थी।
'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' इस मामले में कानूनी सहायता पहुंचा रहा है।
कार्यवाही का विवरण
कोर्ट ने जांच की कि ट्रिब्यूनल का फैसला एकतरफा कैसे हो गया: शुरुआत में, फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के अधिकारियों की ओर से पेश वकील ने इस मामले में हलफनामा दायर करने के लिए समय मांगा। तब बेंच ने पूछा कि यह मामला किस मामले को लेकर है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मृण्मय दत्ता ने बताया कि यह रिट याचिका 2018 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए एकतरफा फैसले को चुनौती देती है।
हर हफ्ते, असम में CJP की समर्पित टीम- जिसमें सामुदायिक स्वयंसेवक, डिस्ट्रिक्ट वॉलंटियर मोटिवेटर और वकील शामिल हैं- असम के 24 से अधिक जिलों में नागरिकता संकट से प्रभावित कई लोगों को महत्वपूर्ण अर्ध-कानूनी सहायता, परामर्श और कानूनी मदद देती है। हमारे जमीनी स्तर के प्रयासों के माध्यम से, 12,00,000 लोगों ने सफलतापूर्वक अपने भरे हुए NRC फॉर्म जमा किए (2017-2019)। हम हर महीने जिला स्तर पर फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के मामलों की पैरवी करते हैं। इन समन्वित प्रयासों के जरिए, हमने सालाना 20 मामलों में सफलता की एक प्रभावशाली दर हासिल की है, जिसमें लोगों को सफलतापूर्वक भारतीय नागरिकता मिली है। यह जमीनी स्तर का डेटा CJP को हमारी संवैधानिक अदालतों में सोच-समझकर हस्तक्षेप करने में मदद करता है। आपका समर्थन इस महत्वपूर्ण कार्य को आगे बढ़ाता है। सभी के लिए समान अधिकारों के लिए हमारे साथ खड़े हों।
स्पष्टीकरण मांगते हुए, बेंच ने पूछा कि फैसले के "एकतरफा" होने का ठीक-ठीक क्या मतलब है।
वरिष्ठ वकील मृण्मय दत्ता ने बताया कि याचिकाकर्ता शुरू में ट्रिब्यूनल के सामने पेश हुआ था, लेकिन वह कार्यवाही में आगे हिस्सा नहीं ले पाया क्योंकि वह वकील की फीस देने में असमर्थ था। नतीजतन, हालांकि ट्रिब्यूनल के सामने पेशी दर्ज की गई थी, लेकिन मामला आखिरकार एकतरफा (ex-parte) ही आगे बढ़ा।
इसके बाद बेंच ने खास तौर पर पूछा कि क्या किसी भी चरण में कानूनी सहायता दी गई थी। जवाब में, सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने भी बताया कि याचिकाकर्ता की आर्थिक स्थिति के बावजूद उसे कोई कानूनी सहायता नहीं दी गई थी। उन्होंने कोर्ट को आगे बताया कि कानूनी सहायता न मिलना ही इस मौजूदा रिट याचिका के मुख्य आधारों में से एक है। उनके अनुसार, कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जा सकती थी, लेकिन अधिकारियों या सिस्टम की ओर से यह सुनिश्चित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया कि याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व हो सके, खासकर तब जब यह साफ हो गया था कि याचिकाकर्ता निजी वकील का खर्च उठाने में असमर्थ है।
इसके बाद कोर्ट ने पूछा कि याचिकाकर्ता ने ट्रिब्यूनल की कार्यवाही में किस चरण तक हिस्सा लिया था। सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने साफ किया कि हालांकि ट्रिब्यूनल के सामने पेशी दर्ज की गई थी, लेकिन आखिरकार कोई लिखित बयान दाखिल नहीं किया गया था।
सुनवाई के दौरान राज्य ने "पुशबैक" का आरोप लगाया: इसके बाद बेंच ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के अधिकारियों की ओर से पेश वकील की ओर रुख किया और पूछा कि क्या राज्य का मामला यह है कि याचिकाकर्ता ने बस लिखित बयान दाखिल करने में लापरवाही की थी।
जवाब में, ट्रिब्यूनल अधिकारियों के वकील ने कोर्ट के सामने कहा कि यह "लापरवाही का मामला नहीं है," और आगे आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता को "बाहर कर दिया गया था" (pushed back) और उसके बाद उसने "फिर से भारत में प्रवेश किया।"
यह बयान याचिकाकर्ता के पक्ष के लिए अप्रत्याशित प्रतीत हुआ। सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने तुरंत जवाब दिया कि यह उनके लिए पूरी तरह से नई जानकारी थी और पहले कभी भी कार्यवाही या याचिकाकर्ता के पास उपलब्ध रिकॉर्ड में सामने नहीं आई थी। बेंच ने उनसे कहा कि वह "इस क्षेत्र के एक अनुभवी व्यक्ति" हैं।
सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने स्पष्ट किया कि किसी भी तरह के 'पुशबैक' (बाहर करने) के बारे में पहले कभी कोई आरोप सामने नहीं आया था और यह पहली बार था जब कोर्ट में ऐसा कोई बयान दिया गया था। उन्होंने दलील दी कि उनके पास मौजूद रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता को वापस भेज दिया गया था और उसके बाद उसने दोबारा भारत में प्रवेश किया था।
इस बातचीत के बाद, ट्रिब्यूनल अधिकारियों के वकील ने राज्य का पक्ष हलफनामे के रूप में रखने के लिए और समय देने का अनुरोध किया।
कोर्ट ने पूछा कि नोटिस पहले क्यों जारी नहीं किया गया था: इसके बाद बेंच ने पूछा कि क्या रिट याचिका में औपचारिक रूप से नोटिस जारी किया गया था। सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने बताया कि नोटिस अभी तक जारी नहीं किया गया था, क्योंकि पिछली सुनवाई के दौरान, राज्य ने हलफनामा दाखिल करके देरी के मुद्दे पर अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा था। हालांकि, इस बीच, कोर्ट द्वारा निर्वासन (deportation) के खिलाफ अंतरिम सुरक्षा पहले ही दी जा चुकी थी।
बेंच ने यह भी पूछा कि क्या याचिकाकर्ता अभी भी हिरासत में है। सीनियर एडवोकेट मृण्मय दत्ता ने कोर्ट को बताया कि उनकी जानकारी के अनुसार, याचिकाकर्ता अभी भी हिरासत शिविर (detention camp) में बंद है। जब उनसे पूछा गया कि वह कब से हिरासत में है, तो उन्होंने बताया कि याचिकाकर्ता 25 मई, 2025 से हिरासत में है, और यह हिरासत 2018 के 'विदेशी ट्रिब्यूनल' (Foreigners Tribunal) के फैसले के आधार पर है। उन्होंने कोर्ट को यह भी याद दिलाया कि यह रिट याचिका सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई उस अनुमति के तहत दाखिल की गई थी, जिसके तहत ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती देने की छूट दी गई थी।
नोटिस जारी; कोर्ट ने कहा - नई सुनवाई पर विचार किया जा सकता है
दोनों पक्षों को सुनने के बाद, बेंच ने कहा कि अब औपचारिक रूप से नोटिस जारी किया जाना चाहिए, ताकि राज्य को अपना पक्ष हलफनामे के रूप में कोर्ट के सामने रखना पड़े।
इस तरह, कोर्ट ने इस मामले में नोटिस जारी कर दिया और इसे 15 जून, 2026 तक जवाब दाखिल करने योग्य बनाया। बेंच ने यह भी निर्देश दिया कि निर्वासन के खिलाफ दी गई अंतरिम सुरक्षा जारी रहेगी।
महत्वपूर्ण बात यह है कि आदेश लिखवाते समय, कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि यदि याचिकाकर्ता 'विदेशी ट्रिब्यूनल' को मामला वापस भेजकर उस पर नई सुनवाई कराने के लिए कोई ठोस आधार प्रस्तुत करने में सफल हो जाता है, तो ऐसे कदम पर तत्काल विचार किया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी याचिकाकर्ता की उस दलील के संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसमें उसने कहा था कि ट्रिब्यूनल की कार्यवाही एकतरफा फैसले (ex parte opinion) के रूप में समाप्त हो गई थी, क्योंकि वह कानूनी प्रतिनिधित्व (वकील) का खर्च उठाने में असमर्थ हो गया था और इसके बावजूद उसे कोई कानूनी सहायता भी प्रदान नहीं की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
इस रिट याचिका में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल, चिरांग द्वारा 13 जून, 2018 को दिए गए एकतरफा (ex-parte) फैसले को चुनौती दी गई है। इस फैसले में अब्दुल शेख उर्फ अब्दुल गफ़ार को एक विदेशी नागरिक घोषित किया गया था, जिसने कथित तौर पर 25 मार्च, 1971 के बाद भारत में प्रवेश किया था।
याचिका के अनुसार, याचिकाकर्ता ने शुरू में अपने वकील के माध्यम से इस कार्यवाही का विरोध किया था, लेकिन गंभीर आर्थिक तंगी के कारण वह इसे जारी नहीं रख सका। याचिका में कहा गया है कि इसलिए, यह एकतरफा फैसला याचिकाकर्ता द्वारा जानबूझकर कार्यवाही में शामिल न होने का परिणाम नहीं था, बल्कि यह उसकी निजी कानूनी सहायता जारी रखने में असमर्थता के कारण हुआ था।
याचिका में आगे बताया गया है कि याचिकाकर्ता को 2019 में हिरासत में लिया गया था और 2021 में उसे रिहा कर दिया गया। यह रिहाई, घोषित विदेशियों की लंबी हिरासत को नियंत्रित करने वाले तत्कालीन निर्देशों के तहत की गई थी। याचिका में यह भी कहा गया है कि 25 मई, 2025 को उसे फिर से हिरासत में ले लिया गया।
हाई कोर्ट के समक्ष यह वर्तमान मामला तब दायर की गई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2025 में पिछली कार्यवाही का निपटारा करते हुए यह स्पष्ट कर दिया था कि याचिकाकर्ता को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती देने की पूरी स्वतंत्रता होगी।
याचिका में इस वर्तमान चुनौती को दायर करने में हुई देरी के लिए कई कारणों का जिक्र किया गया है: लंबी हिरासत, आर्थिक कठिनाई, कानूनी सहायता का अभाव, हिरासत में रहते हुए सीमित संपर्क सुविधा और हिरासत में रखे गए व्यक्ति के साथ सीधे संवाद किए बिना कानूनी कार्यवाही तैयार करने में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयां।
इस मामले की अगली सुनवाई 15 जून, 2026 को होगी।
पिछली कार्यवाहियों का विवरण यहां पढ़ा जा सकता है।
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CJP scores big win! Citizenship restored to Mazirun Bewa, a widowed daily wage worker from Assam
Victory in Dhubri FT: Jarina Bibi declared Indian after years of ordeal
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