खनन और जलविद्युत परियोजनाओं के नाम पर 9,000 बीघा से अधिक आदिवासी ज़मीन कॉरपोरेट कंपनियों को सौंपे जाने का आरोप; छठी अनुसूची के तहत संरक्षण के लिए राज्यपाल से गुहार।

असम के दिमा हसाओ ज़िले में आदिवासी ज़मीन को कॉरपोरेट हितों के लिए हस्तांतरित किए जाने का मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। ज़िले के राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने राज्य सरकार और ‘नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनॉमस काउंसिल’ (NCHAC) पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि संवैधानिक संरक्षणों की अनदेखी करते हुए आदिवासी भूमि को सुनियोजित ढंग से निजी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है, जिससे बड़े पैमाने पर आदिवासी आबादी के विस्थापन का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार (31 जनवरी) को उमरांगसो में एक विशाल विरोध रैली आयोजित की गई, जिसमें हजारों की संख्या में स्थानीय लोगों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मौजूदा भूमि आवंटन उनके पारंपरिक भूमि अधिकारों और संविधान के तहत आदिवासी क्षेत्रों को मिली स्वायत्तता को कमजोर कर रहे हैं।
विरोध के बाद कांग्रेस नेता बापोजित लंगथासा के नेतृत्व में मूल निवासियों के प्रतिनिधियों ने असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य को एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में उनसे आग्रह किया गया कि वे खनन, सीमेंट निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं के नाम पर हो रहे “अवैध भूमि हस्तांतरण” को रोकने के लिए छठी अनुसूची के तहत प्राप्त अपनी विशेष संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करें।
राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं। आरोप है कि पिछले दो वर्षों में उमरांगसो क्षेत्र में चूना पत्थर (लाइमस्टोन) खनन के लिए 9,000 बीघा से अधिक आदिवासी भूमि आवंटित की जा चुकी है। इस भूमि हस्तांतरण का सीधा असर कम से कम सात गांवों पर पड़ा है।
ज्ञापन के अनुसार, यह ज़मीन अंबुजा सीमेंट्स (जो अब अडानी समूह का हिस्सा है), डालमिया भारत, स्टार सीमेंट और जेके लक्ष्मी सीमेंट जैसी प्रमुख कंपनियों को दी गई है।
प्रदर्शनकारी समूहों का दावा है कि इनमें से कई भूमि आवंटन ‘क्रुंगमिंग रिज़र्व फ़ॉरेस्ट’ और एक मान्यता प्राप्त ‘प्रमुख जैव विविधता क्षेत्र’ (Key Biodiversity Area) के भीतर आते हैं। यह क्षेत्र लुप्तप्राय ‘व्हाइट-रंप्ड वल्चर’ (white-rumped vulture) का प्राकृतिक आवास है और प्रवासी ‘अमूर फाल्कन’ पक्षियों का एक महत्वपूर्ण बसेरा भी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, इस इलाके में कई हाथी गलियारे (elephant corridors) मौजूद हैं, जिन पर प्रस्तावित परियोजनाओं के कारण गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
स्थानीय नेताओं का आरोप है कि खनन और औद्योगिक गतिविधियों के चलते कई आदिवासी परिवार पहले ही बेघर हो चुके हैं। इससे भी अधिक गंभीर आरोप यह है कि विस्थापितों के लिए निर्धारित मुआवजा फर्जी लाभार्थियों को बांट दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, काउंसिल के आधिकारिक रिकॉर्ड और कर रसीदों (tax receipts) के बावजूद कम से कम 77 वास्तविक आदिवासी परिवारों को मुआवजा सूची से बाहर कर दिया गया है।
विस्थापन का भय
विरोध केवल खनन परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। ‘असम पावर जनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड’ (APGCL) और ‘अडानी ग्रीन’ की साझेदारी में प्रस्तावित 1,250 मेगावाट की ‘पम्प्ड-स्टोरेज जलविद्युत परियोजना’ को लेकर भी गंभीर चिंताएं सामने आई हैं।
आशंका है कि यह परियोजना पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली झूम खेती (jhum land) के बड़े हिस्से को जलमग्न कर सकती है। इसके परिणामस्वरूप भूस्खलन और भूकंप के प्रति संवेदनशील क्षेत्र में स्थित तीन गांव—मोती लम्पू, मोती होजई और रियाम बाथरी—के विस्थापन का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
भूमि अधिग्रहण कानूनों का उल्लंघन
ज्ञापन में कहा गया है कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े कानूनों का उल्लंघन करते हुए, बिना किसी सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment), जनसुनवाई या ग्राम अधिकारियों की पूर्व सहमति के ज़मीन आवंटित की गई। आरोप है कि छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों में—जहां भूमि का स्वामित्व औपचारिक शीर्षकों (formal titles) के बजाय पारंपरिक प्रणालियों के तहत होता है—अधिकारी कानूनी संरक्षणों को दरकिनार करने के लिए बसी-बसाई आदिवासी भूमि को “खाली” (vacant) घोषित कर रहे हैं।
अस्तित्व का संघर्ष
आदिवासी नेताओं ने चेतावनी दी है कि भारत–बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट (Indo-Burma Biodiversity Hotspot) के भीतर स्थित दिमा हसाओ में प्रस्तावित इन परियोजनाओं से गंभीर पर्यावरणीय क्षति होगी। उनके अनुसार, इससे वनों की कटाई तेज़ होगी, प्रदूषण बढ़ेगा, वन्यजीव गलियारों में बाधा पड़ेगी और पवित्र व सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थलों के नष्ट होने का खतरा है।
ज्ञापन के अंत में कहा गया है कि ऑटोनॉमस काउंसिल, राज्य एजेंसियों और पर्यावरण नियामक संस्थाओं की विफलताओं को देखते हुए राज्यपाल को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। नेताओं ने चेतावनी दी है कि अदालती प्रक्रियाओं में वर्षों लग सकते हैं, लेकिन तब तक ज़मीन पर होने वाले नुकसान की भरपाई असंभव हो जाएगी।
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द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार (31 जनवरी) को उमरांगसो में एक विशाल विरोध रैली आयोजित की गई, जिसमें हजारों की संख्या में स्थानीय लोगों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि मौजूदा भूमि आवंटन उनके पारंपरिक भूमि अधिकारों और संविधान के तहत आदिवासी क्षेत्रों को मिली स्वायत्तता को कमजोर कर रहे हैं।
विरोध के बाद कांग्रेस नेता बापोजित लंगथासा के नेतृत्व में मूल निवासियों के प्रतिनिधियों ने असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य को एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में उनसे आग्रह किया गया कि वे खनन, सीमेंट निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं के नाम पर हो रहे “अवैध भूमि हस्तांतरण” को रोकने के लिए छठी अनुसूची के तहत प्राप्त अपनी विशेष संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करें।
राज्यपाल को सौंपे गए ज्ञापन में चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं। आरोप है कि पिछले दो वर्षों में उमरांगसो क्षेत्र में चूना पत्थर (लाइमस्टोन) खनन के लिए 9,000 बीघा से अधिक आदिवासी भूमि आवंटित की जा चुकी है। इस भूमि हस्तांतरण का सीधा असर कम से कम सात गांवों पर पड़ा है।
ज्ञापन के अनुसार, यह ज़मीन अंबुजा सीमेंट्स (जो अब अडानी समूह का हिस्सा है), डालमिया भारत, स्टार सीमेंट और जेके लक्ष्मी सीमेंट जैसी प्रमुख कंपनियों को दी गई है।
प्रदर्शनकारी समूहों का दावा है कि इनमें से कई भूमि आवंटन ‘क्रुंगमिंग रिज़र्व फ़ॉरेस्ट’ और एक मान्यता प्राप्त ‘प्रमुख जैव विविधता क्षेत्र’ (Key Biodiversity Area) के भीतर आते हैं। यह क्षेत्र लुप्तप्राय ‘व्हाइट-रंप्ड वल्चर’ (white-rumped vulture) का प्राकृतिक आवास है और प्रवासी ‘अमूर फाल्कन’ पक्षियों का एक महत्वपूर्ण बसेरा भी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, इस इलाके में कई हाथी गलियारे (elephant corridors) मौजूद हैं, जिन पर प्रस्तावित परियोजनाओं के कारण गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
स्थानीय नेताओं का आरोप है कि खनन और औद्योगिक गतिविधियों के चलते कई आदिवासी परिवार पहले ही बेघर हो चुके हैं। इससे भी अधिक गंभीर आरोप यह है कि विस्थापितों के लिए निर्धारित मुआवजा फर्जी लाभार्थियों को बांट दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, काउंसिल के आधिकारिक रिकॉर्ड और कर रसीदों (tax receipts) के बावजूद कम से कम 77 वास्तविक आदिवासी परिवारों को मुआवजा सूची से बाहर कर दिया गया है।
विस्थापन का भय
विरोध केवल खनन परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। ‘असम पावर जनरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड’ (APGCL) और ‘अडानी ग्रीन’ की साझेदारी में प्रस्तावित 1,250 मेगावाट की ‘पम्प्ड-स्टोरेज जलविद्युत परियोजना’ को लेकर भी गंभीर चिंताएं सामने आई हैं।
आशंका है कि यह परियोजना पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली झूम खेती (jhum land) के बड़े हिस्से को जलमग्न कर सकती है। इसके परिणामस्वरूप भूस्खलन और भूकंप के प्रति संवेदनशील क्षेत्र में स्थित तीन गांव—मोती लम्पू, मोती होजई और रियाम बाथरी—के विस्थापन का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
भूमि अधिग्रहण कानूनों का उल्लंघन
ज्ञापन में कहा गया है कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े कानूनों का उल्लंघन करते हुए, बिना किसी सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment), जनसुनवाई या ग्राम अधिकारियों की पूर्व सहमति के ज़मीन आवंटित की गई। आरोप है कि छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों में—जहां भूमि का स्वामित्व औपचारिक शीर्षकों (formal titles) के बजाय पारंपरिक प्रणालियों के तहत होता है—अधिकारी कानूनी संरक्षणों को दरकिनार करने के लिए बसी-बसाई आदिवासी भूमि को “खाली” (vacant) घोषित कर रहे हैं।
अस्तित्व का संघर्ष
आदिवासी नेताओं ने चेतावनी दी है कि भारत–बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट (Indo-Burma Biodiversity Hotspot) के भीतर स्थित दिमा हसाओ में प्रस्तावित इन परियोजनाओं से गंभीर पर्यावरणीय क्षति होगी। उनके अनुसार, इससे वनों की कटाई तेज़ होगी, प्रदूषण बढ़ेगा, वन्यजीव गलियारों में बाधा पड़ेगी और पवित्र व सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थलों के नष्ट होने का खतरा है।
ज्ञापन के अंत में कहा गया है कि ऑटोनॉमस काउंसिल, राज्य एजेंसियों और पर्यावरण नियामक संस्थाओं की विफलताओं को देखते हुए राज्यपाल को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। नेताओं ने चेतावनी दी है कि अदालती प्रक्रियाओं में वर्षों लग सकते हैं, लेकिन तब तक ज़मीन पर होने वाले नुकसान की भरपाई असंभव हो जाएगी।
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