विपक्ष का आरोप है कि अल्पसंख्यक समुदाय के पात्र मतदाताओं के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराने के लिए फॉर्म-7 का दुरुपयोग किया जा रहा है। वहीं, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा का कहना है कि नोटिस केवल ‘मिया’, यानी बांग्लादेश मूल के मुस्लिम प्रवासियों को भेजे जा रहे हैं, न कि किसी आदिवासी, हिंदू या असमिया मुस्लिम समुदाय को।

फोटो साभार : द हिंदू
असम में विपक्षी दलों का आरोप है कि आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (एसआर) के दौरान फॉर्म-7 का दुरुपयोग कर वास्तविक नागरिकों को परेशान किया जा रहा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जाता है। इसके जरिए कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के नाम को मतदाता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज करा सकता है। इस प्रक्रिया के तहत मृत्यु या निवास स्थान में बदलाव की स्थिति में नाम हटाने का अनुरोध किया जा सकता है।
एक संयुक्त बयान में वामपंथी दलों—मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक और एसयूसीआई (सी)—ने कहा कि फॉर्म-7 का इस्तेमाल अल्पसंख्यक मतदाताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।
अख़बार के मुताबिक, कांग्रेस ने बोको–छायगांव में कथित तौर पर अवैध रूप से नाम काटे और जोड़े जाने के मामले में स्थानीय भाजपा नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है।
इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने शुक्रवार, 23 जनवरी को चुनाव आयोग से अपील की कि फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग के चलते चल रहे पुनरीक्षण के दौरान किसी भी योग्य मतदाता का नाम मतदाता सूची से न हटाया जाए।
इन दलों ने आपत्तियों और दावों के निपटारे की 2 फरवरी की समय-सीमा बढ़ाने की भी मांग की।
‘फॉर्म-7 भरने से नाम अपने आप नहीं हटेंगे’
फॉर्म-7 को लेकर उठे सवालों के बीच राज्य निर्वाचन विभाग ने एक सार्वजनिक एडवाइजरी जारी कर स्थिति स्पष्ट की है। विभाग के अनुसार, फॉर्म-7 जमा होने मात्र से किसी भी मतदाता का नाम स्वतः नहीं हटाया जाता। प्रत्येक आपत्ति पर कानूनी प्रक्रिया के तहत फील्ड सत्यापन किया जाता है, संबंधित मतदाता को नोटिस देकर सुनवाई का अवसर दिया जाता है और उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाता है।
एडवाइजरी में मतदाताओं से प्रपत्र 6, 7 और 8 के तहत आवेदन करते समय सही जानकारी देने की अपील की गई है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि झूठी घोषणाएं करना या जानबूझकर गलत प्रविष्टियां दर्ज कराना कानून के तहत दंडनीय अपराध है, जिनमें लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 भी शामिल है।
रिपोर्ट में विभाग के हवाले से कहा गया है कि संशोधन प्रक्रिया का उद्देश्य एक स्वच्छ, सटीक और समावेशी मतदाता सूची सुनिश्चित करना है और इससे किसी भी मतदाता को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
एडवाइजरी में यह भी कहा गया है कि प्रविष्टियों के शामिल होने, हटाए जाने या सुधार से असंतुष्ट कोई भी व्यक्ति मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत वैधानिक उपायों का सहारा ले सकता है।
आयोग के अनुसार, सभी आपत्तियों के आवेदनों का निपटारा 2 फरवरी तक कर दिया जाएगा और अंतिम मतदाता सूची 10 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी।
विपक्ष हमलावर
कई नेताओं ने आलोचना की है कि इस प्रक्रिया के लिए समय अपर्याप्त है। इस संबंध में तृणमूल कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि असम में मतदाता सूचियों का विशेष पुनरीक्षण “न केवल जल्दबाजी में किया गया, बल्कि बेहद अव्यवस्थित” भी था।
देव ने अपने पत्र में फॉर्म-7 का मुद्दा उठाते हुए कहा कि वैध व्यक्तियों के नाम हटाने के लिए इसके तहत “बड़ी संख्या में आपत्तियां” दर्ज की गई हैं।
पत्र में कहा गया है कि “नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 के जरिए बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज की गई हैं और अधिकांश मामलों में शिकायतकर्ता, जिनका नाम फॉर्म में दर्ज है, या तो अनुपस्थित हैं या उन्होंने इन फॉर्मों को दाखिल करने से इनकार कर दिया है।”
उन्होंने आगे लिखा कि “हर व्यक्ति को नोटिस देना और 11 दिनों के भीतर सुनवाई करना व्यावहारिक रूप से असंभव है, जिससे वास्तविक मतदाताओं को प्रभावी सुनवाई से वंचित होना पड़ेगा और उनके मतदान के लोकतांत्रिक अधिकार का हनन होगा। इससे वास्तविक मतदाताओं में दहशत, व्याकुलता और आक्रोश का माहौल पैदा हो गया है।”
देव की मांगों में यह भी शामिल है कि चुनाव आयोग सुनवाई और निपटारे की समय-सीमा कम से कम सात दिन और बढ़ाए, ताकि लोगों को अपने मतदान अधिकार की रक्षा करने का पर्याप्त अवसर मिल सके।
द हिंदू के अनुसार, इससे पहले भी असम के विपक्षी नेता देबब्रता सैकिया ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित राज्य की मतदाता सूची में “गंभीर अनियमितताओं” का आरोप लगाया था।
मुख्यमंत्री ने विवादित आरोपों को नकारा
वहीं, विशेष पुनरीक्षण को लेकर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने किसी भी तरह की चिंताओं से इनकार करते हुए कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है।
सीएम शर्मा ने कहा, “नोटिस केवल ‘मिया’, यानी बांग्लादेश मूल के मुस्लिम प्रवासियों को भेजे जा रहे हैं, न कि किसी भी आदिवासी, हिंदू या असमिया मुस्लिम समुदाय को।”
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “क्या किसी हिंदू परिवार को नोटिस मिला? क्या किसी असमिया मुस्लिम परिवार को नोटिस मिला? नोटिस केवल मिया लोगों को ही दिए जा रहे हैं।” उन्होंने स्पष्ट कहा, “हां, मैं उन्हें परेशान कर रहा हूं, इसमें छिपाने जैसा कुछ नहीं है।”
सीएम हिमंता ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई अवैध प्रवासियों पर दबाव बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।
उन्होंने कहा, “उन्हें समझना होगा कि असम के लोग किसी न किसी स्तर पर उनका विरोध कर रहे हैं, नहीं तो उन्हें बिना किसी विरोध के जीत मिल जाएगी। इसलिए किसी को एसआईआर के तहत नोटिस मिलेगा, किसी को अतिक्रमण के मामले में और किसी को बॉर्डर पुलिस की ओर से।”
शर्मा के अनुसार, सरकार असम की “जाति” और पहचान से समझौता नहीं करेगी।
उन्होंने आगे कहा, “हम कुछ विरोध प्रदर्शन करेंगे, लेकिन कानून के दायरे में रहकर… हम गरीबों और दलितों के साथ हैं, लेकिन उनके साथ नहीं जो हमारी जाति को नष्ट करना चाहते हैं।”
Related

फोटो साभार : द हिंदू
असम में विपक्षी दलों का आरोप है कि आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (एसआर) के दौरान फॉर्म-7 का दुरुपयोग कर वास्तविक नागरिकों को परेशान किया जा रहा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जाता है। इसके जरिए कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति के नाम को मतदाता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज करा सकता है। इस प्रक्रिया के तहत मृत्यु या निवास स्थान में बदलाव की स्थिति में नाम हटाने का अनुरोध किया जा सकता है।
एक संयुक्त बयान में वामपंथी दलों—मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक और एसयूसीआई (सी)—ने कहा कि फॉर्म-7 का इस्तेमाल अल्पसंख्यक मतदाताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।
अख़बार के मुताबिक, कांग्रेस ने बोको–छायगांव में कथित तौर पर अवैध रूप से नाम काटे और जोड़े जाने के मामले में स्थानीय भाजपा नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है।
इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने शुक्रवार, 23 जनवरी को चुनाव आयोग से अपील की कि फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग के चलते चल रहे पुनरीक्षण के दौरान किसी भी योग्य मतदाता का नाम मतदाता सूची से न हटाया जाए।
इन दलों ने आपत्तियों और दावों के निपटारे की 2 फरवरी की समय-सीमा बढ़ाने की भी मांग की।
‘फॉर्म-7 भरने से नाम अपने आप नहीं हटेंगे’
फॉर्म-7 को लेकर उठे सवालों के बीच राज्य निर्वाचन विभाग ने एक सार्वजनिक एडवाइजरी जारी कर स्थिति स्पष्ट की है। विभाग के अनुसार, फॉर्म-7 जमा होने मात्र से किसी भी मतदाता का नाम स्वतः नहीं हटाया जाता। प्रत्येक आपत्ति पर कानूनी प्रक्रिया के तहत फील्ड सत्यापन किया जाता है, संबंधित मतदाता को नोटिस देकर सुनवाई का अवसर दिया जाता है और उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाता है।
एडवाइजरी में मतदाताओं से प्रपत्र 6, 7 और 8 के तहत आवेदन करते समय सही जानकारी देने की अपील की गई है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि झूठी घोषणाएं करना या जानबूझकर गलत प्रविष्टियां दर्ज कराना कानून के तहत दंडनीय अपराध है, जिनमें लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 भी शामिल है।
रिपोर्ट में विभाग के हवाले से कहा गया है कि संशोधन प्रक्रिया का उद्देश्य एक स्वच्छ, सटीक और समावेशी मतदाता सूची सुनिश्चित करना है और इससे किसी भी मतदाता को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
एडवाइजरी में यह भी कहा गया है कि प्रविष्टियों के शामिल होने, हटाए जाने या सुधार से असंतुष्ट कोई भी व्यक्ति मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत वैधानिक उपायों का सहारा ले सकता है।
आयोग के अनुसार, सभी आपत्तियों के आवेदनों का निपटारा 2 फरवरी तक कर दिया जाएगा और अंतिम मतदाता सूची 10 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी।
विपक्ष हमलावर
कई नेताओं ने आलोचना की है कि इस प्रक्रिया के लिए समय अपर्याप्त है। इस संबंध में तृणमूल कांग्रेस की सांसद सुष्मिता देव ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि असम में मतदाता सूचियों का विशेष पुनरीक्षण “न केवल जल्दबाजी में किया गया, बल्कि बेहद अव्यवस्थित” भी था।
देव ने अपने पत्र में फॉर्म-7 का मुद्दा उठाते हुए कहा कि वैध व्यक्तियों के नाम हटाने के लिए इसके तहत “बड़ी संख्या में आपत्तियां” दर्ज की गई हैं।
पत्र में कहा गया है कि “नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 के जरिए बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज की गई हैं और अधिकांश मामलों में शिकायतकर्ता, जिनका नाम फॉर्म में दर्ज है, या तो अनुपस्थित हैं या उन्होंने इन फॉर्मों को दाखिल करने से इनकार कर दिया है।”
उन्होंने आगे लिखा कि “हर व्यक्ति को नोटिस देना और 11 दिनों के भीतर सुनवाई करना व्यावहारिक रूप से असंभव है, जिससे वास्तविक मतदाताओं को प्रभावी सुनवाई से वंचित होना पड़ेगा और उनके मतदान के लोकतांत्रिक अधिकार का हनन होगा। इससे वास्तविक मतदाताओं में दहशत, व्याकुलता और आक्रोश का माहौल पैदा हो गया है।”
देव की मांगों में यह भी शामिल है कि चुनाव आयोग सुनवाई और निपटारे की समय-सीमा कम से कम सात दिन और बढ़ाए, ताकि लोगों को अपने मतदान अधिकार की रक्षा करने का पर्याप्त अवसर मिल सके।
द हिंदू के अनुसार, इससे पहले भी असम के विपक्षी नेता देबब्रता सैकिया ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित राज्य की मतदाता सूची में “गंभीर अनियमितताओं” का आरोप लगाया था।
मुख्यमंत्री ने विवादित आरोपों को नकारा
वहीं, विशेष पुनरीक्षण को लेकर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने किसी भी तरह की चिंताओं से इनकार करते हुए कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है।
सीएम शर्मा ने कहा, “नोटिस केवल ‘मिया’, यानी बांग्लादेश मूल के मुस्लिम प्रवासियों को भेजे जा रहे हैं, न कि किसी भी आदिवासी, हिंदू या असमिया मुस्लिम समुदाय को।”
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “क्या किसी हिंदू परिवार को नोटिस मिला? क्या किसी असमिया मुस्लिम परिवार को नोटिस मिला? नोटिस केवल मिया लोगों को ही दिए जा रहे हैं।” उन्होंने स्पष्ट कहा, “हां, मैं उन्हें परेशान कर रहा हूं, इसमें छिपाने जैसा कुछ नहीं है।”
सीएम हिमंता ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई अवैध प्रवासियों पर दबाव बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है।
उन्होंने कहा, “उन्हें समझना होगा कि असम के लोग किसी न किसी स्तर पर उनका विरोध कर रहे हैं, नहीं तो उन्हें बिना किसी विरोध के जीत मिल जाएगी। इसलिए किसी को एसआईआर के तहत नोटिस मिलेगा, किसी को अतिक्रमण के मामले में और किसी को बॉर्डर पुलिस की ओर से।”
शर्मा के अनुसार, सरकार असम की “जाति” और पहचान से समझौता नहीं करेगी।
उन्होंने आगे कहा, “हम कुछ विरोध प्रदर्शन करेंगे, लेकिन कानून के दायरे में रहकर… हम गरीबों और दलितों के साथ हैं, लेकिन उनके साथ नहीं जो हमारी जाति को नष्ट करना चाहते हैं।”
Related
2024 संभल हिंसा मामले में पुलिस के खिलाफ FIR का आदेश देने वाले CJM का इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रांसफर कर दिया, क्या यह नया ट्रेंड है?
पुरोला से नैनीताल तक: APCR की रिपोर्ट में उत्तराखंड में सांप्रदायिक हिंसा के पैटर्न को उजागर किया गया