दो दिनों की कड़ी सुनवाई को दौरान प्रत्यक्ष और ऑनलाइन गवाहियां शामिल थी। ट्रिब्यूनल ने अपना फैसला दुनिया के सामने पेश किया और अमेरिका, इजराइल, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, हंगरी, नीदरलैंड्स और अन्य को फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ इकोसाइड और जबरन भुखमरी के अपराधों में दोषी ठहराया।

(Photo credit: International League of Peoples’ Struggle – Spain)
बार्सिलोना, 24 नवंबर: दो दिनों तक गवाहों और विशेषज्ञों के बयान सुनने के बाद-जो गाजा में फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ पारिस्थितिक विनाश (इकोसाइड), जनसंहार (जेनोसाइड) और जबरन भुखमरी से जुड़े थे-“राइट टू रेज़िस्ट” अंतरराष्ट्रीय पीपल्स ट्रिब्यूनल ऑन पैलेस्टाइन ने आरोपियों को जनसंहार, इकोसाइड और जबरन भुखमरी के अपराधों में दोषी ठहराया है। यह ट्रिब्यूनल इंटरनेशनल लीग ऑफ पीपल्स’ स्ट्रगल (ILPS), इंटरनेशनल पीपल्स फ्रंट (IPF) और पीपल्स कोएलिशन ऑन फूड सॉवरेनिटी (PCFS) द्वारा संचालित किया गया था, जिसे 240 से ज्यादा संगठनों का समर्थन प्राप्त था। ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि इन अपराधों का मुख्य रूप से जिम्मेदार इजराइल है और अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी इन अपराधों को समर्थन, सहयोग और मदद करने में शामिल हैं।
अगले दिन, ट्रिब्यूनल के आयोजकों और प्रतिभागियों का एक समूह यह फैसला लेकर बार्सिलोना स्थित इजराइली वाणिज्य दूतावास (कांसुलेट) पहुंचा, लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला।
पहले दिन 11 गवाहों ने जनसंहार और पर्यावरण विनाश (इकोसाइड) दोनों से जुड़े सबूतों पर अपनी गवाही दी। इनमें फिलिस्तीन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स के राजी सौरानी, लेबनान के डॉ. ओमर नशाबे, और ग्लोबल सूमूद फ़्लोटिला की मारिया ज़ेन्द्रेरा जैसे लोग शामिल थे। सबूतों में साफ तौर पर बताया गया कि गाजा के पर्यावरण को योजनाबद्ध तरीके से नष्ट किया गया, जिंदगी से जुड़ी हर चीजों को पूरी तरह खत्म कर दिया गया और पूर्ण नाकेबंदी के बाद फिलिस्तीनी लोगों पर रोजमर्रा के जीवन में इसका क्या असर पड़ा—इन सारी बातों को विस्तार से उजागर किया गया।
ट्रिब्यूनल के दूसरे दिन भी लगभग वही मुद्दे उठाए गए और 5 गवाहों ने अपनी गवाही दी। अदालत की कार्यवाही शुरू होते ही अभियोजन पक्ष ने महिलाओं पर पड़े असर को उठाया, जिसकी शुरुआत पहले दिन नादिया बाक़री की लिखित गवाही से हुई। नादिया बाक़री नारीवादी और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं जो गाजा में 30 साल तक वीमेंस अफेयर्स स्टाफ की निदेशक रहीं, लेकिन जनसंहारकारी युद्ध के दौरान उन्हें जबरन मिस्र में विस्थापित होना पड़ा। नेशनल लॉयर्स गिल्ड की सुज़ैन ऐडली, जो ट्रिब्यूनल में बाक़री का प्रतिनिधित्व कर रही थीं, ने कहा: “महिलाओं के स्वास्थ्य केंद्रों और क्लीनिकों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है ताकि फिलिस्तीनी लोग आगे बच्चे पैदा न कर सकें, यह सब जायोनी रणनीति का हिस्सा है।”
इसके बाद न्यायाधीशों ने रज़ी सौरानी और डॉ. ओमर नशाबे से कुछ बातें और स्पष्ट करने के लिए खुद सवाल पूछे ताकि उनकी गवाही के अलग-अलग पहलुओं को बेहतर समझा जा सके।
अभियोजन पक्ष ने रज़ी सौरानी से पूछा कि ट्रम्प की ‘शांति’ योजना पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की हाल की वोटिंग के पीछे हालिया ऐतिहासिक संदर्भ क्या है। सौरानी ने जवाब दिया: “फिलिस्तीनी लोगों के मूल और मौलिक अधिकारों पर एक शब्द भी नहीं है। कब्जे को बाकायदा संस्थागत रूप दे दिया गया है और इसे अमेरिकी सरकारें और ज्यादा समर्थन देती रही हैं-जो सीधे तौर पर इस जनसंहार में शामिल हैं और इज़राइल को खुलकर समर्थन दे रही हैं। 30 साल पहले भी, हम ओस्लो समझौते की कड़ी आलोचना कर रहे थे, क्योंकि उसमें भी न कब्जा खत्म करने की बात थी, न आत्मनिर्णय के अधिकार की-और यह सब जानबूझकर किया गया था।”
डॉ. नशाबे ने अपनी गवाही के दौरान कहा कि यह सिर्फ जनसंहार (genocide) या पर्यावरण विनाश (ecocide) ही नहीं है। उन्होंने कहा, “मैं फिर से कहना चाहूंगा कि इकोसाइड और जेनोसाइड, पूरी आबादी को खत्म कर देने वाली इस नीति का बुनियादी हिस्सा हैं। यह केवल लोगों को मारकर नहीं किया जा सकता, बल्कि उन सभी जिंदगी की बुनियादों को भी नष्ट करना पड़ता है जिनकी मदद से लोग अपना जीवन फिर से खड़ा कर सकें। यह ‘मेटासाइड’ है यानी सब कुछ पूरी तरह बर्बाद कर देना।” आगे उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के अंदर इस ‘शांति’ योजना को लेकर पैदा हुए गहरे मतभेद और इस अंतर-सरकारी संस्था में चल रहे बड़े संकट पर बात की: “जब (इजराइल) अपने गंदे और अमानवीय मकसद को पूरा नहीं कर पाया तो अब वे कौन-सी नई, खतरनाक और हिंसक रणनीतियां अपनाएंगे? हम अंतरराष्ट्रीय कानून के ऐसे संकट से गुजर रहे हैं जो इससे पहले कभी नहीं देखा गया-यह बिल्कुल जॉर्ज ऑरवेल की 1984 जैसी स्थिति है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा भयानक पैमाने पर है जिसकी कल्पना भी नहीं की गई।”
न्यायाधीशों के सवालों के बाद, पांचों गवाहों ने या तो सामने आकर, या ज़ूम के जरिए, या फिर पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो के माध्यम से गवाही दी। उन्होंने सामूहिक सजा देने, पूरे-के-पूरे परिवारों को निशाना बनाने, खाने-पीने की चीजों पर जानबूझकर रोक लगाने, किसानों और मछुआरों पर हवाई हमलों और उपद्रवी सेटलर मॉब द्वारा किए गए हमलों और यहां तक कि फिलिस्तीनी आवाजों को दबाने के लिए अन्य देशों द्वारा ज़ायोनी सरकार के साथ मिलकर की जा रही योजनाबद्ध दमन के सीधे सबूत भी पेश किए।
एक्टिविस्ट और 2023 तक गाजा के मछुआरा समुदाय की हालत पर एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे फिल्ममेकर मुशीर एक फर्रा पहले गवाह के तौर पर सामने आए। उन्होंने बताया कि गाजा पर सामूहिक सजा देना जनसंहार की शुरुआत से ही शुरू हो गया था, यानी 9 अक्टूबर 2023 से ही। उन्होंने कहा, “एक मामले में, एक हमास सदस्य को निशाना बनाने के लिए 67 लोगों को मार दिया गया और 52 घरों को उड़ा दिया गया। यह सामूहिक सजा है जिसकी निंदा तो खुद आरोपियों में से एक [जो बाइडेन] ने भी की है।”

(Photo credit: Carlo Manalansan)
एक फर्रा के बाद, गाज़ा से दो लिखित गवाहियां-पहली एक एक्टिविस्ट की कई गवाहियों का संग्रह और दूसरी एक मजदूर की-अभियोजन पक्ष की ओर से पेश की गईं। इन गवाहियों को जुटाना बेहद मुश्किल था, क्योंकि वास्तविक दुनिया तक पहुंचाने की कोशिश करते हुए 172 पत्रकारों की हत्या कर दी गई थी, जिससे वहां के लोगों में भारी डर फैल गया था। गवाही देने को तैयार एक फिलिस्तीनी किसान ने कहा, “इजराइली टैंक और बुलडोज़र हमारी जमीन में घुसे, सब कुछ फिर से नष्ट करने के लिए। उन्होंने सिंचाई की लाइनें काट दीं, पानी के स्रोत-जैसे कृषि तालाब और कुएं-तबाह कर दिए और भारी मशीनों से पेड़ों के बचे-खुचे हिस्सों को बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में काट डाला।” इसी तरह गाजा के उस मजदूर की गवाही ने इस बर्बादी के पीछे की रणनीति को स्पष्ट किया, “उद्देश्य यह था कि उत्तर गाजा के ज्यादा से ज्यादा आम लोगों और मेडिकल स्टाफ को मारकर या घायल करके उन्हें वहां से भागने पर मजबूर किया जाए।”
इसके बाद, तीन वास्तविक समय (रीयल-टाइम) ज़ूम गवाहियां पेश की गईं, जिनमें फिलिस्तीनी किसान और मछुआरों के वीडियो शामिल थे और इसे एक पत्रकार ने संचालित किया, जिसने खुद अपनी लिखित गवाही भी दी थी। वीडियो गवाहियों में पूरी बर्बादी की रणनीति स्पष्ट हुई-केवल लोगों को बड़े पैमाने पर मारना ही नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी के बुनियादी साधनों को नष्ट करना भी शामिल था। विशेष रूप से गाजा के एकमात्र बंदरगाह की भयानक स्थिति और पूरी तरह तबाही को दिखाया गया, जो इजराइल द्वारा लगाए गए पूर्ण नाकेबंदी के साथ और भी गंभीर हो गई थी। गवाही में बताया गया, “बंदरगाह को युद्ध के तीसरे दिन लगभग 26 रॉकेटों से भारी बमबारी की गई और यह दो हिस्सों में टूट गया। करीब 95% मछली पकड़ने वाली नौकाएं नष्ट हो गईं। जानबूझकर भूखमरी पैदा करने की रणनीति अपनाई जा रही है: कब्जा करने वाले लोग रास्ते बंद कर देते हैं, खाने-पीने की सप्लाई रोक देते हैं और मछुआरों को हमारी जनता को खाना पहुंचाने से रोकते हैं।”
रीयल-टाइम ज़ूम गवाहियों की शुरुआत मोहम्मद एल बाक़री से हुई, जो कृषि ढांचे (agricultural infrastructure) में विशेषज्ञ और अर्बन एग्रीकल्चर फोरम के बोर्ड मेंबर हैं। उन्होंने कहा, “उन्होंने फसलें पूरी तरह नष्ट कर दी हैं, अब कुछ भी नहीं बचा। गाजा के उत्तर और दक्षिण में यह सब जमीन कृषि योग्य है, लेकिन इजराइल ने किसी को भी इस जमीन तक पहुंचने की अनुमति नहीं दी। न कोई आमदनी है, न पानी, क्योंकि पानी प्रदूषित हो गया है-सीवेज का पानी सीधे भूमिगत जल स्रोतों में चला गया है।” बेथलहम यूनिवर्सिटी में पैलेस्टाइन इंस्टीट्यूट फॉर बायोडायवर्सिटी एंड सस्टेनेबिलिटी के संस्थापक और निदेशक, माज़िन बी. क़ुमसियाह ने अपनी गवाही में इस बात को और स्पष्ट किया और बताया कि यह रणनीति केवल गाजा तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिमी तट (West Bank) में इजराइल के कब्जे की रणनीति से भी जुड़ी है, जो 2023 के बाद अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ गई है। उन्होंने कहा, “पश्चिमी तट में वे हुला के वेटलैंड को सूखा रहे हैं, यार्डन नदी का पानी अपने बसावट क्षेत्रों (settlements) की ओर मोड़ रहे हैं और लाखों मूल वृक्षों को उखाड़कर यूरोपीय वृक्षों की एकल-प्रजाति वाली खेती लगा रहे हैं। इससे बचे हुए मूल फिलिस्तीनी ‘संकेंद्रित क्षेत्र’ और शरणार्थी शिविरों में धकेल दिए जाते हैं जो अब पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली दीवारों और सैन्य ढांचों से घिरे हैं।”
इकोसाइड के पर्यावरणीय पहलुओं और जनसंहार के बड़े पैमाने पर हत्या के अलावा अन्य पहलुओं की पूरी तरह जांच के दौरान, डॉ. डायना नज्जल ने जबरन भुखमरी और बढ़ती महंगाई के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विनाशकारी असर, साथ ही सहायता प्राप्त करने वालों को निशाना बनाने के मामलों पर अपनी गवाही दी। डॉ. नज्जल ने कहा, “बाल झड़ने लगते हैं और पतले हो जाते हैं, नाखून टूटने लगते हैं, लोगों की ध्यान क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य बहुत खराब हो जाता है और उनकी पूरी जिंदगी इस बात पर केंद्रित हो जाती है कि अब आगे खाने के लिए खाना कैसे मिलेगा।” उन्होंने आगे कहा,
“अस्पताल हमेशा इस बात के लिए तैयार रहते थे जब गाजा ह्यूमनिटेरियन फंड ‘सहायता’ दे रहा होता था, क्योंकि बच्चों को जानबूझकर मारा जाता था तो यह एक और उदाहरण था कि कैसे मानवीय सहायता का इस्तेमाल जनसंहार करने के लिए किया गया।”
जमीन, हवा और समुद्र के जरिए लगाए गए पूर्ण नाकेबंदी के अलावा इकोसाइड के प्रभाव को दर्शाते हुए, गाजा में कुछ खाने-पीने की चीजों की कीमतें इतनी बढ़ गईं कि वे असहनीय हो गईं। एक किलोग्राम की कीमतें इस तरह थीं:
● टमाटर: उत्तर में 163 यूरो; दक्षिण में 17 यूरो
● मांस: उत्तर में 175 यूरो; दक्षिण में 95 यूरो
● आटा: उत्तर में 1000 यूरो; दक्षिण में 90 यूरो
● चीनी: उत्तर में 46 यूरो; दक्षिण में 40 यूरो
● कॉफ़ी: पूरे गाज़ा में 135 यूरो
गाजा के पर्यावरण की भारी तबाही, जिंदगी के अकल्पनीय नुकसान और जिंदगी पर पड़े असर और अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी कानून के अनगिनत उल्लंघनों के सभी गवाहों और विशेषज्ञों ने यही निष्कर्ष निकाला कि ज़ायोनी सत्ता द्वारा किए गए इस आतंक को खत्म करने का असली रास्ता फिलिस्तीनी लोगों का आत्मनिर्णय के लिए संघर्ष है। गवाहों और विशेषज्ञों के अनुसार:
● मुशीर एक फर्रा: “[सामूहिक सजा में मारे गए लोग] वे लोग थे जिन्हें मैं जानता था और जो प्रतिरोध का हिस्सा भी नहीं थे। मैं उनके प्रतिरोध का समर्थन करता, लेकिन वे बस आम नागरिक थे… हमें मदद सिर्फ परोपकार (charity) के लिए नहीं, बल्कि एकजुटता (solidarity) के लिए करनी चाहिए। यह एक राजनीतिक मामला है-सबसे पहले हमें अपना राजनीतिक समर्थन देना चाहिए और फिर सहानुभूति जतानी चाहिए। वही तेल, खनन और लकड़ी की कंपनियां जो गाजा को नष्ट कर रही हैं, दुनिया के बाकी हिस्सों को भी नष्ट कर रही हैं।”
● डॉ. डायना नज्जल: “हम चाहते हैं कि हमारी जमीन और आत्मनिर्णय का अधिकार हमें मिले और हमें अकेला छोड़ दिया जाए। हम अपनी खुद की सामाजिक व्यवस्था बना सकते हैं, लेकिन हमें ऐसा करने का मौका ही नहीं दिया जा रहा।”
● माज़िन बी. क़ुमसियाह: “सिर्फ हम ही, यानी फिलिस्तीनी लोग, अपने भ्रष्ट नेताओं और कब्जे के खिलाफ खड़े हो सकते हैं।”
गवाहियों के खत्म होने के बाद, मुख्य अभियोजक जान फेर्मन ने अपना आखिरी बयान दिया:
● “मैं कहना चाहूंगा कि व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो यह केवल जनसंहार या इकोसाइड तक सीमित नहीं है बल्कि यह तो मेटासाइड है यानी सब कुछ नष्ट कर देना। जो हम सुन रहे हैं और देख रहे हैं, उसके लिए यह शब्द बिल्कुल सही है… फिलिस्तीन की मुक्ति फिलिस्तीनी लोगों का ही काम है। बाकी हम सबका काम है एकजुटता दिखाना। नाज़ीवाद को दुनिया के लोगों के प्रतिरोध ने ढहा दिया। अमेरिका की वियतनाम में दखलअंदाज़ी को वियतनामी लोगों के संघर्ष और दुनिया के लोगों की एकजुटता ने खत्म किया। आपार्थेड को दक्षिण अफ्रीका के लोगों के संघर्ष और दुनिया के लोगों की एकजुटता ने समाप्त किया।”

(Photo credit: Carlo Manalansan)
न्यायाधीशों की विचार-विमर्श के आखिर में, उन्होंने अपना फैसला सुनाया: इज़राइल, अमेरिका और अन्य सहयोगी संस्थाओं को जनसंहार, इकोसाइड और जबरन भुखमरी के अपराधों में दोषी ठहराया गया। इजराइल को इन अपराधों का मुख्य दोषी पाया गया जबकि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी को इन अपराधों में सहायता, समर्थन और सहयोग देने में शामिल पाया गया। फैसला सुनाए जाने के बाद हॉल में “फ्री, फ्री पैलेस्टाइन!” के नारों से गूंज उठा। वहां मौजूद लोग इस निर्णय का जश्न मना रहे थे और इसके आधार पर न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सड़कों पर बड़े पैमाने पर अभियान चलाने और फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के संघर्ष में एकजुटता दिखाने का संकल्प ले रहे थे।
आज सुबह, ट्रिब्यूनल के आयोजकों और प्रतिभागियों ने न्यायाधीशों द्वारा तैयार पूरे फैसले की एक प्रति ज़ायोनी कांसुलेट तक पहुंचाई और वहां प्रदर्शन किया। ज़ायोनी कब्जे के प्रतिनिधियों ने ट्रिब्यूनल में शामिल होने से मना कर दिया और बाद में फैसले की प्रति लेने से भी इनकार कर दिया।
दो दिनों तक गवाहियों और सबूतों की सुनवाई के दौरान, अंतरराष्ट्रीय पीपल्स ट्रिब्यूनल का अंतिम दोषसिद्धि फैसला उन्हीं निष्कर्षों के अनुरूप है जिन्हें अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी तय किया है, लेकिन या तो उन्होंने बहुत धीरे कदम उठाए हैं या पूरी तरह अनदेखा किया है। यह फैसला, जो इजराइल और अमेरिका की स्पष्ट नीयत को दिखाने वाले भारी सबूतों पर आधारित है और जिसमें इकोसाइड के पहलुओं को उजागर किया गया है-जो आम तौर पर मुख्यधारा की खबरों में शायद ही लिए जाते हैं- लोगों के हाथ में ताकत देता है कि वे न्याय और जवाबदेही की मांग करें और फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और उनके संघर्ष में एकजुटता दिखाएं।
यह फैसला केवल एक शुरुआत के रूप में ही है। सच्चा न्याय तभी मिलेगा जब लगातार आंदोलन बनाए जाएं, सड़कों पर और हर संभव जगह बड़े पैमाने पर कार्रवाई की जाए, ताकि वकालत (advocacy) के प्रयास न्याय और जवाबदेही में योगदान कर सकें। ट्रिब्यूनल ने यह साबित किया है कि सच्चा न्याय लोगों के हाथ में है और लोग इसे हासिल करने के लिए तब तक लड़ेंगे जब तक इजराइल से सभी आर्थिक, राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक समर्थन खत्म नहीं हो जाता।
भविष्य में ट्रिब्यूनल से जुड़े और भी कई कार्यक्रम और अभियान होंगे, जिन्हें मीडिया कवर कर सकेगी।
पैलेस्टाइन के लिए अंतरराष्ट्रीय पीपल्स ट्रिब्यूनल के बारे में:
पैलेस्टाइन के लिए अंतरराष्ट्रीय पीपल्स ट्रिब्यूनल (IPT) एक नागरिक समाज पहल है, जिसे इंटरनेशनल लीग ऑफ पीपल्स’ स्ट्रगल (ILPS), इंटरनेशनल पीपल्स फ्रंट और पीपल्स कोएलिशन ऑन फूड सॉवरेनिटी ने आयोजित किया है, साथ ही इसमें इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक लॉयर्स (IADL), पलेस्टाइन लैंड स्टडीज़ सेंटर और अन्य समर्थक संगठनों का सहयोग भी शामिल है। इसका उद्देश्य फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ किए गए अपराधों का ऐतिहासिक रिकॉर्ड तैयार करना, अंतरराष्ट्रीय एकजुटता जुटाना और उन सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर नैतिक और राजनीतिक दबाव डालना है जो इन अपराधों में शामिल या सहयोगी हैं।
ट्रिब्यूनल की पूरी रिकॉर्डिंग देखें https://drive.proton.me/urls/0CHZSRPA5W#obBBwaZ7zLkK
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(Photo credit: International League of Peoples’ Struggle – Spain)
बार्सिलोना, 24 नवंबर: दो दिनों तक गवाहों और विशेषज्ञों के बयान सुनने के बाद-जो गाजा में फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ पारिस्थितिक विनाश (इकोसाइड), जनसंहार (जेनोसाइड) और जबरन भुखमरी से जुड़े थे-“राइट टू रेज़िस्ट” अंतरराष्ट्रीय पीपल्स ट्रिब्यूनल ऑन पैलेस्टाइन ने आरोपियों को जनसंहार, इकोसाइड और जबरन भुखमरी के अपराधों में दोषी ठहराया है। यह ट्रिब्यूनल इंटरनेशनल लीग ऑफ पीपल्स’ स्ट्रगल (ILPS), इंटरनेशनल पीपल्स फ्रंट (IPF) और पीपल्स कोएलिशन ऑन फूड सॉवरेनिटी (PCFS) द्वारा संचालित किया गया था, जिसे 240 से ज्यादा संगठनों का समर्थन प्राप्त था। ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा कि इन अपराधों का मुख्य रूप से जिम्मेदार इजराइल है और अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी इन अपराधों को समर्थन, सहयोग और मदद करने में शामिल हैं।
अगले दिन, ट्रिब्यूनल के आयोजकों और प्रतिभागियों का एक समूह यह फैसला लेकर बार्सिलोना स्थित इजराइली वाणिज्य दूतावास (कांसुलेट) पहुंचा, लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला।
पहले दिन 11 गवाहों ने जनसंहार और पर्यावरण विनाश (इकोसाइड) दोनों से जुड़े सबूतों पर अपनी गवाही दी। इनमें फिलिस्तीन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स के राजी सौरानी, लेबनान के डॉ. ओमर नशाबे, और ग्लोबल सूमूद फ़्लोटिला की मारिया ज़ेन्द्रेरा जैसे लोग शामिल थे। सबूतों में साफ तौर पर बताया गया कि गाजा के पर्यावरण को योजनाबद्ध तरीके से नष्ट किया गया, जिंदगी से जुड़ी हर चीजों को पूरी तरह खत्म कर दिया गया और पूर्ण नाकेबंदी के बाद फिलिस्तीनी लोगों पर रोजमर्रा के जीवन में इसका क्या असर पड़ा—इन सारी बातों को विस्तार से उजागर किया गया।
ट्रिब्यूनल के दूसरे दिन भी लगभग वही मुद्दे उठाए गए और 5 गवाहों ने अपनी गवाही दी। अदालत की कार्यवाही शुरू होते ही अभियोजन पक्ष ने महिलाओं पर पड़े असर को उठाया, जिसकी शुरुआत पहले दिन नादिया बाक़री की लिखित गवाही से हुई। नादिया बाक़री नारीवादी और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं जो गाजा में 30 साल तक वीमेंस अफेयर्स स्टाफ की निदेशक रहीं, लेकिन जनसंहारकारी युद्ध के दौरान उन्हें जबरन मिस्र में विस्थापित होना पड़ा। नेशनल लॉयर्स गिल्ड की सुज़ैन ऐडली, जो ट्रिब्यूनल में बाक़री का प्रतिनिधित्व कर रही थीं, ने कहा: “महिलाओं के स्वास्थ्य केंद्रों और क्लीनिकों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है ताकि फिलिस्तीनी लोग आगे बच्चे पैदा न कर सकें, यह सब जायोनी रणनीति का हिस्सा है।”
इसके बाद न्यायाधीशों ने रज़ी सौरानी और डॉ. ओमर नशाबे से कुछ बातें और स्पष्ट करने के लिए खुद सवाल पूछे ताकि उनकी गवाही के अलग-अलग पहलुओं को बेहतर समझा जा सके।
अभियोजन पक्ष ने रज़ी सौरानी से पूछा कि ट्रम्प की ‘शांति’ योजना पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की हाल की वोटिंग के पीछे हालिया ऐतिहासिक संदर्भ क्या है। सौरानी ने जवाब दिया: “फिलिस्तीनी लोगों के मूल और मौलिक अधिकारों पर एक शब्द भी नहीं है। कब्जे को बाकायदा संस्थागत रूप दे दिया गया है और इसे अमेरिकी सरकारें और ज्यादा समर्थन देती रही हैं-जो सीधे तौर पर इस जनसंहार में शामिल हैं और इज़राइल को खुलकर समर्थन दे रही हैं। 30 साल पहले भी, हम ओस्लो समझौते की कड़ी आलोचना कर रहे थे, क्योंकि उसमें भी न कब्जा खत्म करने की बात थी, न आत्मनिर्णय के अधिकार की-और यह सब जानबूझकर किया गया था।”
डॉ. नशाबे ने अपनी गवाही के दौरान कहा कि यह सिर्फ जनसंहार (genocide) या पर्यावरण विनाश (ecocide) ही नहीं है। उन्होंने कहा, “मैं फिर से कहना चाहूंगा कि इकोसाइड और जेनोसाइड, पूरी आबादी को खत्म कर देने वाली इस नीति का बुनियादी हिस्सा हैं। यह केवल लोगों को मारकर नहीं किया जा सकता, बल्कि उन सभी जिंदगी की बुनियादों को भी नष्ट करना पड़ता है जिनकी मदद से लोग अपना जीवन फिर से खड़ा कर सकें। यह ‘मेटासाइड’ है यानी सब कुछ पूरी तरह बर्बाद कर देना।” आगे उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के अंदर इस ‘शांति’ योजना को लेकर पैदा हुए गहरे मतभेद और इस अंतर-सरकारी संस्था में चल रहे बड़े संकट पर बात की: “जब (इजराइल) अपने गंदे और अमानवीय मकसद को पूरा नहीं कर पाया तो अब वे कौन-सी नई, खतरनाक और हिंसक रणनीतियां अपनाएंगे? हम अंतरराष्ट्रीय कानून के ऐसे संकट से गुजर रहे हैं जो इससे पहले कभी नहीं देखा गया-यह बिल्कुल जॉर्ज ऑरवेल की 1984 जैसी स्थिति है, लेकिन उससे भी कहीं ज्यादा भयानक पैमाने पर है जिसकी कल्पना भी नहीं की गई।”
न्यायाधीशों के सवालों के बाद, पांचों गवाहों ने या तो सामने आकर, या ज़ूम के जरिए, या फिर पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो के माध्यम से गवाही दी। उन्होंने सामूहिक सजा देने, पूरे-के-पूरे परिवारों को निशाना बनाने, खाने-पीने की चीजों पर जानबूझकर रोक लगाने, किसानों और मछुआरों पर हवाई हमलों और उपद्रवी सेटलर मॉब द्वारा किए गए हमलों और यहां तक कि फिलिस्तीनी आवाजों को दबाने के लिए अन्य देशों द्वारा ज़ायोनी सरकार के साथ मिलकर की जा रही योजनाबद्ध दमन के सीधे सबूत भी पेश किए।
एक्टिविस्ट और 2023 तक गाजा के मछुआरा समुदाय की हालत पर एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे फिल्ममेकर मुशीर एक फर्रा पहले गवाह के तौर पर सामने आए। उन्होंने बताया कि गाजा पर सामूहिक सजा देना जनसंहार की शुरुआत से ही शुरू हो गया था, यानी 9 अक्टूबर 2023 से ही। उन्होंने कहा, “एक मामले में, एक हमास सदस्य को निशाना बनाने के लिए 67 लोगों को मार दिया गया और 52 घरों को उड़ा दिया गया। यह सामूहिक सजा है जिसकी निंदा तो खुद आरोपियों में से एक [जो बाइडेन] ने भी की है।”

(Photo credit: Carlo Manalansan)
एक फर्रा के बाद, गाज़ा से दो लिखित गवाहियां-पहली एक एक्टिविस्ट की कई गवाहियों का संग्रह और दूसरी एक मजदूर की-अभियोजन पक्ष की ओर से पेश की गईं। इन गवाहियों को जुटाना बेहद मुश्किल था, क्योंकि वास्तविक दुनिया तक पहुंचाने की कोशिश करते हुए 172 पत्रकारों की हत्या कर दी गई थी, जिससे वहां के लोगों में भारी डर फैल गया था। गवाही देने को तैयार एक फिलिस्तीनी किसान ने कहा, “इजराइली टैंक और बुलडोज़र हमारी जमीन में घुसे, सब कुछ फिर से नष्ट करने के लिए। उन्होंने सिंचाई की लाइनें काट दीं, पानी के स्रोत-जैसे कृषि तालाब और कुएं-तबाह कर दिए और भारी मशीनों से पेड़ों के बचे-खुचे हिस्सों को बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में काट डाला।” इसी तरह गाजा के उस मजदूर की गवाही ने इस बर्बादी के पीछे की रणनीति को स्पष्ट किया, “उद्देश्य यह था कि उत्तर गाजा के ज्यादा से ज्यादा आम लोगों और मेडिकल स्टाफ को मारकर या घायल करके उन्हें वहां से भागने पर मजबूर किया जाए।”
इसके बाद, तीन वास्तविक समय (रीयल-टाइम) ज़ूम गवाहियां पेश की गईं, जिनमें फिलिस्तीनी किसान और मछुआरों के वीडियो शामिल थे और इसे एक पत्रकार ने संचालित किया, जिसने खुद अपनी लिखित गवाही भी दी थी। वीडियो गवाहियों में पूरी बर्बादी की रणनीति स्पष्ट हुई-केवल लोगों को बड़े पैमाने पर मारना ही नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी के बुनियादी साधनों को नष्ट करना भी शामिल था। विशेष रूप से गाजा के एकमात्र बंदरगाह की भयानक स्थिति और पूरी तरह तबाही को दिखाया गया, जो इजराइल द्वारा लगाए गए पूर्ण नाकेबंदी के साथ और भी गंभीर हो गई थी। गवाही में बताया गया, “बंदरगाह को युद्ध के तीसरे दिन लगभग 26 रॉकेटों से भारी बमबारी की गई और यह दो हिस्सों में टूट गया। करीब 95% मछली पकड़ने वाली नौकाएं नष्ट हो गईं। जानबूझकर भूखमरी पैदा करने की रणनीति अपनाई जा रही है: कब्जा करने वाले लोग रास्ते बंद कर देते हैं, खाने-पीने की सप्लाई रोक देते हैं और मछुआरों को हमारी जनता को खाना पहुंचाने से रोकते हैं।”
रीयल-टाइम ज़ूम गवाहियों की शुरुआत मोहम्मद एल बाक़री से हुई, जो कृषि ढांचे (agricultural infrastructure) में विशेषज्ञ और अर्बन एग्रीकल्चर फोरम के बोर्ड मेंबर हैं। उन्होंने कहा, “उन्होंने फसलें पूरी तरह नष्ट कर दी हैं, अब कुछ भी नहीं बचा। गाजा के उत्तर और दक्षिण में यह सब जमीन कृषि योग्य है, लेकिन इजराइल ने किसी को भी इस जमीन तक पहुंचने की अनुमति नहीं दी। न कोई आमदनी है, न पानी, क्योंकि पानी प्रदूषित हो गया है-सीवेज का पानी सीधे भूमिगत जल स्रोतों में चला गया है।” बेथलहम यूनिवर्सिटी में पैलेस्टाइन इंस्टीट्यूट फॉर बायोडायवर्सिटी एंड सस्टेनेबिलिटी के संस्थापक और निदेशक, माज़िन बी. क़ुमसियाह ने अपनी गवाही में इस बात को और स्पष्ट किया और बताया कि यह रणनीति केवल गाजा तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिमी तट (West Bank) में इजराइल के कब्जे की रणनीति से भी जुड़ी है, जो 2023 के बाद अभूतपूर्व स्तर तक बढ़ गई है। उन्होंने कहा, “पश्चिमी तट में वे हुला के वेटलैंड को सूखा रहे हैं, यार्डन नदी का पानी अपने बसावट क्षेत्रों (settlements) की ओर मोड़ रहे हैं और लाखों मूल वृक्षों को उखाड़कर यूरोपीय वृक्षों की एकल-प्रजाति वाली खेती लगा रहे हैं। इससे बचे हुए मूल फिलिस्तीनी ‘संकेंद्रित क्षेत्र’ और शरणार्थी शिविरों में धकेल दिए जाते हैं जो अब पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली दीवारों और सैन्य ढांचों से घिरे हैं।”
इकोसाइड के पर्यावरणीय पहलुओं और जनसंहार के बड़े पैमाने पर हत्या के अलावा अन्य पहलुओं की पूरी तरह जांच के दौरान, डॉ. डायना नज्जल ने जबरन भुखमरी और बढ़ती महंगाई के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विनाशकारी असर, साथ ही सहायता प्राप्त करने वालों को निशाना बनाने के मामलों पर अपनी गवाही दी। डॉ. नज्जल ने कहा, “बाल झड़ने लगते हैं और पतले हो जाते हैं, नाखून टूटने लगते हैं, लोगों की ध्यान क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य बहुत खराब हो जाता है और उनकी पूरी जिंदगी इस बात पर केंद्रित हो जाती है कि अब आगे खाने के लिए खाना कैसे मिलेगा।” उन्होंने आगे कहा,
“अस्पताल हमेशा इस बात के लिए तैयार रहते थे जब गाजा ह्यूमनिटेरियन फंड ‘सहायता’ दे रहा होता था, क्योंकि बच्चों को जानबूझकर मारा जाता था तो यह एक और उदाहरण था कि कैसे मानवीय सहायता का इस्तेमाल जनसंहार करने के लिए किया गया।”
जमीन, हवा और समुद्र के जरिए लगाए गए पूर्ण नाकेबंदी के अलावा इकोसाइड के प्रभाव को दर्शाते हुए, गाजा में कुछ खाने-पीने की चीजों की कीमतें इतनी बढ़ गईं कि वे असहनीय हो गईं। एक किलोग्राम की कीमतें इस तरह थीं:
● टमाटर: उत्तर में 163 यूरो; दक्षिण में 17 यूरो
● मांस: उत्तर में 175 यूरो; दक्षिण में 95 यूरो
● आटा: उत्तर में 1000 यूरो; दक्षिण में 90 यूरो
● चीनी: उत्तर में 46 यूरो; दक्षिण में 40 यूरो
● कॉफ़ी: पूरे गाज़ा में 135 यूरो
गाजा के पर्यावरण की भारी तबाही, जिंदगी के अकल्पनीय नुकसान और जिंदगी पर पड़े असर और अंतरराष्ट्रीय मानवतावादी कानून के अनगिनत उल्लंघनों के सभी गवाहों और विशेषज्ञों ने यही निष्कर्ष निकाला कि ज़ायोनी सत्ता द्वारा किए गए इस आतंक को खत्म करने का असली रास्ता फिलिस्तीनी लोगों का आत्मनिर्णय के लिए संघर्ष है। गवाहों और विशेषज्ञों के अनुसार:
● मुशीर एक फर्रा: “[सामूहिक सजा में मारे गए लोग] वे लोग थे जिन्हें मैं जानता था और जो प्रतिरोध का हिस्सा भी नहीं थे। मैं उनके प्रतिरोध का समर्थन करता, लेकिन वे बस आम नागरिक थे… हमें मदद सिर्फ परोपकार (charity) के लिए नहीं, बल्कि एकजुटता (solidarity) के लिए करनी चाहिए। यह एक राजनीतिक मामला है-सबसे पहले हमें अपना राजनीतिक समर्थन देना चाहिए और फिर सहानुभूति जतानी चाहिए। वही तेल, खनन और लकड़ी की कंपनियां जो गाजा को नष्ट कर रही हैं, दुनिया के बाकी हिस्सों को भी नष्ट कर रही हैं।”
● डॉ. डायना नज्जल: “हम चाहते हैं कि हमारी जमीन और आत्मनिर्णय का अधिकार हमें मिले और हमें अकेला छोड़ दिया जाए। हम अपनी खुद की सामाजिक व्यवस्था बना सकते हैं, लेकिन हमें ऐसा करने का मौका ही नहीं दिया जा रहा।”
● माज़िन बी. क़ुमसियाह: “सिर्फ हम ही, यानी फिलिस्तीनी लोग, अपने भ्रष्ट नेताओं और कब्जे के खिलाफ खड़े हो सकते हैं।”
गवाहियों के खत्म होने के बाद, मुख्य अभियोजक जान फेर्मन ने अपना आखिरी बयान दिया:
● “मैं कहना चाहूंगा कि व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो यह केवल जनसंहार या इकोसाइड तक सीमित नहीं है बल्कि यह तो मेटासाइड है यानी सब कुछ नष्ट कर देना। जो हम सुन रहे हैं और देख रहे हैं, उसके लिए यह शब्द बिल्कुल सही है… फिलिस्तीन की मुक्ति फिलिस्तीनी लोगों का ही काम है। बाकी हम सबका काम है एकजुटता दिखाना। नाज़ीवाद को दुनिया के लोगों के प्रतिरोध ने ढहा दिया। अमेरिका की वियतनाम में दखलअंदाज़ी को वियतनामी लोगों के संघर्ष और दुनिया के लोगों की एकजुटता ने खत्म किया। आपार्थेड को दक्षिण अफ्रीका के लोगों के संघर्ष और दुनिया के लोगों की एकजुटता ने समाप्त किया।”

(Photo credit: Carlo Manalansan)
न्यायाधीशों की विचार-विमर्श के आखिर में, उन्होंने अपना फैसला सुनाया: इज़राइल, अमेरिका और अन्य सहयोगी संस्थाओं को जनसंहार, इकोसाइड और जबरन भुखमरी के अपराधों में दोषी ठहराया गया। इजराइल को इन अपराधों का मुख्य दोषी पाया गया जबकि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी को इन अपराधों में सहायता, समर्थन और सहयोग देने में शामिल पाया गया। फैसला सुनाए जाने के बाद हॉल में “फ्री, फ्री पैलेस्टाइन!” के नारों से गूंज उठा। वहां मौजूद लोग इस निर्णय का जश्न मना रहे थे और इसके आधार पर न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सड़कों पर बड़े पैमाने पर अभियान चलाने और फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के संघर्ष में एकजुटता दिखाने का संकल्प ले रहे थे।
आज सुबह, ट्रिब्यूनल के आयोजकों और प्रतिभागियों ने न्यायाधीशों द्वारा तैयार पूरे फैसले की एक प्रति ज़ायोनी कांसुलेट तक पहुंचाई और वहां प्रदर्शन किया। ज़ायोनी कब्जे के प्रतिनिधियों ने ट्रिब्यूनल में शामिल होने से मना कर दिया और बाद में फैसले की प्रति लेने से भी इनकार कर दिया।
दो दिनों तक गवाहियों और सबूतों की सुनवाई के दौरान, अंतरराष्ट्रीय पीपल्स ट्रिब्यूनल का अंतिम दोषसिद्धि फैसला उन्हीं निष्कर्षों के अनुरूप है जिन्हें अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी तय किया है, लेकिन या तो उन्होंने बहुत धीरे कदम उठाए हैं या पूरी तरह अनदेखा किया है। यह फैसला, जो इजराइल और अमेरिका की स्पष्ट नीयत को दिखाने वाले भारी सबूतों पर आधारित है और जिसमें इकोसाइड के पहलुओं को उजागर किया गया है-जो आम तौर पर मुख्यधारा की खबरों में शायद ही लिए जाते हैं- लोगों के हाथ में ताकत देता है कि वे न्याय और जवाबदेही की मांग करें और फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार और उनके संघर्ष में एकजुटता दिखाएं।
यह फैसला केवल एक शुरुआत के रूप में ही है। सच्चा न्याय तभी मिलेगा जब लगातार आंदोलन बनाए जाएं, सड़कों पर और हर संभव जगह बड़े पैमाने पर कार्रवाई की जाए, ताकि वकालत (advocacy) के प्रयास न्याय और जवाबदेही में योगदान कर सकें। ट्रिब्यूनल ने यह साबित किया है कि सच्चा न्याय लोगों के हाथ में है और लोग इसे हासिल करने के लिए तब तक लड़ेंगे जब तक इजराइल से सभी आर्थिक, राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक समर्थन खत्म नहीं हो जाता।
भविष्य में ट्रिब्यूनल से जुड़े और भी कई कार्यक्रम और अभियान होंगे, जिन्हें मीडिया कवर कर सकेगी।
पैलेस्टाइन के लिए अंतरराष्ट्रीय पीपल्स ट्रिब्यूनल के बारे में:
पैलेस्टाइन के लिए अंतरराष्ट्रीय पीपल्स ट्रिब्यूनल (IPT) एक नागरिक समाज पहल है, जिसे इंटरनेशनल लीग ऑफ पीपल्स’ स्ट्रगल (ILPS), इंटरनेशनल पीपल्स फ्रंट और पीपल्स कोएलिशन ऑन फूड सॉवरेनिटी ने आयोजित किया है, साथ ही इसमें इंटरनेशनल एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक लॉयर्स (IADL), पलेस्टाइन लैंड स्टडीज़ सेंटर और अन्य समर्थक संगठनों का सहयोग भी शामिल है। इसका उद्देश्य फिलिस्तीनी लोगों के खिलाफ किए गए अपराधों का ऐतिहासिक रिकॉर्ड तैयार करना, अंतरराष्ट्रीय एकजुटता जुटाना और उन सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर नैतिक और राजनीतिक दबाव डालना है जो इन अपराधों में शामिल या सहयोगी हैं।
ट्रिब्यूनल की पूरी रिकॉर्डिंग देखें https://drive.proton.me/urls/0CHZSRPA5W#obBBwaZ7zLkK
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