किसान आंदोलन : 6 माह पूरे होने पर संयुक्त मोर्चा ने चेताया- धैर्य की परीक्षा न ले मोदी सरकार

Written by Navnish Kumar | Published on: May 21, 2021
नई दिल्ली। किसान आंदोलन के 6 माह सफलता पूर्वक पूरे होने से किसान संगठन नई ऊर्जा और आत्मविश्वास से लबरेज हैं। इस दौरान किसानों ने सरकारी दमन के साथ-साथ प्रकृति (आंधी बारिश) की क्रूरता का भी बड़ी बहदुरी से सामना किया है लेकिन हौसले में कमी नहीं आई। 6 माह पूरे होने पर देश भर में काला दिवस मनाने के आह्वान के साथ संयुक्त मोर्चा ने केंद्र सरकार से फिर से बातचीत शुरु करने को कहा है। किसान आंदोलन के नेताओं ने कहा कि सरकार हमारे धैर्य की परीक्षा न ले, बातचीत की शुरुआत करे और हमारी मांगों को मान ले। दूसरी ओर आंदोलन को खापों के साथ अब कर्मचारी संगठनों का भी साथ मिल गया है। काला दिवस कार्यक्रम में खापों के साथ सामाजिक व कर्मचारी संगठन भी एकजुट होकर सरकार के खिलाफ रोष जताएंगे। 



मोर्चा नेताओं ने कहा कि 'किसान आंदोलन में 470 से ज्यादा किसानों की मौत हो चुकी है। कई आंदोलनकारियों को अपनी नौकरियां, पढ़ाई और दूसरे काम छोड़ने पड़े और सरकार अपने नागरिकों, 'अन्नदाताओं’ के प्रति कितना अमानवीय लापरवाह रुख दिखा रही है व बेफिक्र है। कहा सरकार किसानों की हितैषी होने का बहाना करती है। जब यह किसी राज्य में फसल के उत्पादन या निर्यात में बढ़ोतरी का पूरा श्रेय लेती है तो इसे हर नागरिक की क्षति और दूसरे नुकसानों की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए जो दिल्ली की सीमाओं पर हो रही है। ऐसे में सरकार अगर अपने किसानों की चिंता करती है और उनका कल्याण चाहती है तो उसे किसानों से बातचीत शुरू करनी चाहिए और उनकी मांगें माननी चाहिएं।

संयुक्त मोर्चे ने कहा "इतने लंबे समय से लड़ रहे संघर्ष में किसानों ने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगों को रखा है। सरकार ने किसानों को बदनाम करने की तमाम कोशिशें की परंतु असफल रही। आज महामारी की विराट आपदा और गोदी मीडिया के पूर्वाग्रह के चलते किसान आंदोलन मेनस्ट्रीम मीडिया से भले गायब हो, लेकिन दिल्ली के बॉर्डरों पर वह पहले जैसी ही दृढ़ता, जुझारूपन और स्पष्ट विज़न के साथ जारी है। इसका सबूत 16 मई को हिसार के हासी में दिन भर चला शह-मात का नाटकीय घटनाक्रम भी है। हिसार में मुख्यमंत्री खट्टर एक अस्पताल के उद्घाटन कार्यक्रम में गये थे। भाजपा-जजपा नेताओं, मंत्रियों के ख़िलाफ़ विरोध और सामाजिक बहिष्कार के अपने पूर्व घोषित फैसले के तहत किसानों ने वहां पुलिस बैरिकेड तोड़ते हुए जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया। लाठीचार्ज हुआ, अनेक बुजुर्ग किसान व महिलाएं घायल हुए लेकिन पीछे नहीं हटे। नतीजा खट्टर को ही अपना कार्यक्रम आनन-फानन में समेटकर वहां से भागना पड़ा।

अब आंदोलन के 6 माह पूरे होने पर 26 मई को किसान काला दिवस मनाएंगे। काला दिवस कार्यक्रम में खापों के साथ सामाजिक व कर्मचारी संगठन भी शामिल होकर सरकार के खिलाफ रोष जताएंगे। काला दिवस पर खाप के प्रत्येक गांव में कमेटियों का गठन करते हुए ड्यूटियां लगाई गई हैं। प्रत्येक गांव से महिलाओं की भी भागीदारी सुनिश्चित की गई है। 

भाकियू नेता राकेश टिकैत ने फिर से दोहराया है कि, किसान आंदोलन खत्म नहीं होने वाला। टिकैत ने कहा कि किसान यहां से तभी हटेगा, जब उसकी मांगें मानी जाएंगी। ये सरकार जब तक एमएसपी पर कानून नहीं बनाती और किसानों के सभी मसलों पर बातचीत नहीं करती...प्रदर्शनकारी यूं ही डटे रहेंगे। 6 माह पूरे होने पर आंदोलन को और प्रभावी व धारदार बनाने को रणनीति का ऐलान किया जाएगा। यही नहीं, हरियाणा के रेवाड़ी में प्रदर्शनकारियों से भेंट के दौरान टिकैत ने जोर देकर कहा कि, किसानों पर लाठीचार्ज या आंसू गैस दागकर सरकार उन्हें पीछे नहीं हटा सकती। वह डटे रहेंगे। कोरोना संक्रमण फैलने के सवाल पर टिकैत ने कहा कि, हमारी वजह से महामारी नहीं फैल रही। ये समझो कि कोरोना का रास्ता अस्पताल जाता है और किसान का रास्ता पार्लियामेंट जाता है। दोनों के रास्ते अलग हैं।

उधर, अब कर्मचारी संगठनों ने भी मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया है। 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच ने किसान आंदोलन के 6 माह पूरे होने पर बृहस्पतिवार 26 मई को ‘भारतीय लोकतंत्र के लिए काला दिवस’ के तौर पर मनाने का आह्वान किया है। श्रमिक संघों का यह मंच इस दिन अपनी मांगों के समर्थन में काली पट्टी पहनेगा और काले झंडे फहरायेगा। कर्मचारी संगठनों के संयुक्त बयान के मुताबिक, उनकी मांगों में सभी के लिए मुफ्त टीकाकरण, गरीबों को मुफ्त राशन और 7,500 रुपये प्रति माह दिये जाने, तीन नये कृषि कानूनों को रद्द करने, फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और गत वर्ष संसद द्वारा पारित श्रम संहिताओं को वापस लेने जैसी मांगे शामिल हैं। 

संयुक्त मंच की 10 केंद्रीय यूनियनों में इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक), ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक), हिंद मजदूर सभा (एचएमएस), सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (सीटू), ऑल इंडिया यूनाइटेड ट्रेड यूनियन सेंटर (एआईयूटीयूसी), ट्रेड यूनियन को-ऑर्डिनेशन सेंटर (टीयूसीसी), सेल्फ-एम्प्लॉयड वूमेन्स एसोसिएशन (एसईडब्ल्यूए), ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ़ ट्रेड यूनियन्स (एक्टू), लेबर प्रोग्रेसिव फ़ेडरेशन (एलपीएफ) और यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (यूटीयूसी) जैसी मुख्य ट्रेड यूनियन शामिल हैं।

श्रमिक संगठनों ने सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी विभागों के निजीकरण/निगमीकरण की नीति पर भी रोक लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा शासित राज्यों द्वारा तीन साल की अवधि के लिए 38 श्रम कानूनों के मनमाने निलंबन को वापस लिया जाना चाहिये। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा शासित राज्य खुले तौर पर कई अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन कर रहे हैं।

बाकी ख़बरें