पुस्तक समीक्षा: बेस्ट ऑफ़ करवाचौथ

Written by विद्या भूषण रावत | Published on: January 15, 2018
रजनी तिलक का नवीन कहानी संग्रह ' बेस्ट ऑफ़ करवाचौथ' उनके व्यक्तिगत जीवन के संघर्षो के अलावा सामाजिक आन्दोलन में उनके द्वारा नजदीकी से देखी गयी घटनाओं का विश्लेषित विवरण है. ये दर्शाता के है अम्बेडकरवादी कहानिया अब केवल व्यक्तिगत संघर्षो का दस्तावेज ही नहीं रहेगा अपितु वहा से आगे बढ़ चुकी है और अब उनलोगों के जीवन संघर्ष भी इसमें शामिल हैं जो शायद स्वयं को अभिव्यक्त न कर पायें.


उनकी कहानिया हमें जीवन के यथार्थ से परिचय करवाती है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह के ये कहानिया बेबाक है जिनका एक ही उद्देश्य है के कैसे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता हमारे जीवन में कार्य करती है और शायद उसके संवाहक मात्र सवर्ण या ब्राह्मण ही नहीं अपितु बड़े बड़े विचारो के दावा करने वाले भी होते है. रजनी की कहानियो ने हमारे समाज के बड़े बड़े चिंतको के दोहरे मापदंडो का भी पर्दाफास किया है. वैसे समाज में काम करने वाले अधिकांश लोग इन बातो को जानते भी है लेकिन लिखते या बोलते वक़्त इन बातो को या तो चालाकी से छुपा देते है या घर का मामला कहकर हल्का करने की कोशिश करते है. ये सारी कहानिया करवाचौथ पर नहीं है लेकिन उसके सहारे लेखिका ने परम्परावादी समाज में महिलाओं के उत्पीडन की दस्तानो को संजोया है जो हमारे जीवन से बहुत नजदीकी से जुडी हुई है.

इस कहानी संग्रह की एक कहानी 'अस्मितावादी' आदिवासी हितों पर कार्य करने वाली एक बड़े नाम की सवर्ण साहित्यकार का परिचय करवाती है जो बिलकुल वैसे ही है जैसे बड़े बड़े घरों की किट्टी पार्टी महिलाओं के सामाजिक कार्य जहाँ पे वे बाल मजदूरी या महिला हिंसा पर चर्चा कर रहे होते हैं लेकिन सभी के घर पर न्यूनतम वेतन से कम पर चौबीस घंटे काम करने वाली महिलाए काम कर रही होती है. वैसे, जिन लेखिका को इंगित करती रजनी जी ने अस्मिता कहानी लिखी वो वाकई में हकीकत बयां करती है. बहुत से लोग अपने विशाशाधिकारों के कारण चाहे उनके जातीय या आर्थिक ताकत के बल पर कार्य करते हैं और उनकी पूरी कोशिश 'हितैषी' दिखने की तो होती है लेकिन वे अपने विशेषाधिकार छोड़ने को तैयार नहीं होते. कहानी असल में हमारी वैचारिक बेईमानी को दर्शाती है के हम जाति ख़त्म करने या आदिवासी हितो की तो बात करेंगे लेकिन वो केवल भाषणों या मंचो पर. अपने व्यक्तिगत जीवन में हम उससे दूर नहीं होते क्योंकि उससे हमें सामाजिक और आर्थिक ताकत मिलती है. जो लोग उससे दूर होते है वे समाज में अलग थलग पड जाते है. अकेलेपन के भय में भी लोग अपने समाज से नहीं हटते. इसलिए आन्दोलन, लेखन आदि बहुतो के लिए विचार कम और प्रसिद्धि पाने और समय बिताने के तरीके भी होते है क्योंकि उनके पास समय होता है, पैसे होते है और ताकत होती है. दूसरी और, ऐसे भी लोग होते है जो इन सबके लिए संघर्ष कर रहे होते है. विशेसाधिकार प्राप्त लोगो को चाहिए के वे नए लेखको और विचारको को आगे बढाए न के उनके साथ कोई कम्पटीशन करें.

बेस्ट ऑफ़ करवा चौथ नामकी कहानी रजनी जी का आत्मकथात्मक कृति है. बाकि सभी कहानिया उनके सामाजिक कार्यो से जुड़े संस्मरण है लेकिन बेस्ट ऑफ़ कर्वाचोव्थ नमक कहानी व्यक्तिगत है. अक्सर ये सवाल खड़े होते है के अम्बेडकरवादी साथी वामपंथ के साथ क्यों नहीं आना चाहते. इस बारे में तो हमारे बहुत बाते है जो इस समीक्षा के बाहर की बात होगी लेकिन एक बात साफ़ है के वैचारिक ब्राह्मणवाद भी बहुत खतरनाक होता है. बहुत से लोग मार्क्सवाद और अन्य वादों के नाम पर दूसरो का जो अपमान करते है वो बेहद निंदनीय है. रजनी ने वो सब झेला जब घर पर स्वयं को कम्युनिस्ट कहने वाला आंबेडकर का मजाक उड़ाता और दुनिया की सारी समस्याओ का समाधान मार्क्सवाद में ढूंढता लेकिन आश्चर्यजनक बात यह के घर पर वह चाहता है के उसकी बीवी उसके लिए करवा चौथ का व्रत रखे और जब वह नहीं रखती तो उसे अम्बेडकरी कह मजाक उडाता है. भारत के घर घर के क्रांतिकारियों की ऐसी ही दास्तान है और ये केवल मार्क्सवाद का दावा करने वालो के साथ है ऐसा मैं नहीं मानता. पित्रसत्ता की ईगो में तो बड़े बड़े अम्बेडकरवादी भी धंसे पड़े है लेकिन जैसा के मैंने कहा उस सच को बाहर लाने की ताकत सभी में नहीं होती. रजनी जी ने वो सच उगला है और इसकी सराहना की जानी चाहिए क्योंकि अगर हम अपने समाज के नैतिक मूल्यों का पुनरवलोकन नहीं करेंगे तो कही नहीं पहुंचेंगे. आखिर जब हम चर्चा करते है के भारत में मार्क्सवाद या आंबेडकरवाद क्यों नहीं सफल हो रहा तो बहुत हद तक ये बात सही है के सभी विचारधाराओ के पुरुषो पर असल में पुरुषवादी विचारधारा हावी हो जाति है. सबसे आश्चर्यजनक बात यह के एक क्रन्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी की क्रन्तिकारी महिला भी रजनी को कहती है के उन्हें करवाचौथ का व्रत रखना चाहिए. ये मुझे ज्यादा अफसोसनाक लगा क्योंकि मान लिया के पुरुषो का तो अहम् है लेकिन क्रन्तिकारी कहने वाली महिलाओं को क्यों करवाचौथ प्यारा लगे ये बात समझ से बाहर है.

इन कहानियो में बहुत से बेहद मार्मिक भी है लेकिन वे लेखिका के मज़बूत पक्ष को सामने रखती है के समाज के हित में कोई बात न छुपाओ. उनकी अपनी भाभी हमेशा करवाचौथ रखती थी लेकिन भरी जवानी में बड़े भाई की मौत हो गयी . रजनी कहती है के अगर करवाचौथ का व्रत रखकर पति की उम्र लम्बी होती तो किसी भी पति को मरना नहीं चाहिए और भारत में सभी पतियों की उम्र लम्बी होनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है. जिस बात के लिए उन्हें अपने पति और आस पास की महिलाओं के ताने सुनने पड़े, उसी बात का पालन करके भी उनकी भाभी उनके भैय्या की उम्र लम्बी नहीं कर सकी. अगर भाभी के व्रत में ताकत होती तो भैया कम उम्र में नहीं जाते. मतलब ये के समय आ गया है के ऐसी सड़ी गली परम्पराओं को छोड़ देना चाहिए जो केवल और केवल महिलाओं के प्रति नकारात्मकता पर आधारित है और समाज में किसी भी बुराई के लिए महिलाओं को ही जिम्मेवार ठहराती है.

वीमेन सेल की कहानी दर्शाती है कैसे सरकारी स्तर पर महिलाओं के खिलाफ अत्याचार मिटाने के लिए किये जा रहे इन प्रयासों में कोई मौलिकता नहीं है और सभी मात्र दिखावा है. ये हकीकत है के सरकार के अधिकांश विभाग या मंत्रालय संवेदनहीन है और वहा बजाय सहानुभूति के आपको 'पति' को परमेश्वर मानने के ही प्रवचन मिलेंगे.

ये सभी कहानिया बेहद संवेदनशील है लेकिन सभी में जीने के सन्देश भी है. ये बताता है के जब तक साहित्यकार का समाज से वास्ता नहीं होगा तो वो कुछ नहीं कर सकता. इन छोटे छोटे कथानको में समाज में व्याप्त कुरीतिया है और सबसे बड़ी बात ये के उनका मुकाबला हम इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि हम स्वयं ही पित्र-सत्ता के विशेषाधिकारो का लाभ ले रहे है. इन कहानियो के पत्र हमारे जीवन का हिस्सा है लेकिन हम इन्हें कभी नायक नहीं बनाते. इन महिलाओं ने अपने जीवट संघर्ष से जीवन को जिया है और रजनी ने उन्हें आवाज देकर समाज के लिए बहुत अच्छे सन्देश रखे है. अभिकरण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में १९ प्रेरणास्प्रद कहानिया है जो हमें झकझोरती है और सोचने को विवश करती है. ये यह भी साबित करती है के अभी समाज में काम करने के बहुत जरुरत है. बड़े बड़े सिद्धांतो और विचारो की दुनिया में हम सभी खोये रहते है लेकिन अधिकांश विचारक समाज से कट चुके है लिहाजा समाज जड हो चूका है हालाँकि महिलाए प्रतिरोध भी कर रही है लेकिन परम्परावादी शक्तिया भी बहुत तेजी से बढ़ रही है. जरुरत है अम्बेडकरवाद की आजाद हवा हमारे घरो के अन्दर बहे लेकिन वो तभी होगा जब हम बाबा साहेब के सामाजिक और सांस्कृतिक के मूल्यों को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाए जिसके मूल में स्त्रीमुक्ति है क्योंकि इसके बिना देश में कभी परिवर्तन नहीं आ पायेगा और उसके लिए ये भी आवश्यक है के रजनी तिलक जैसे लोग समाज की कुरीतियों पर न केवल लगातार प्रहार करे अपितु बाबा साहेब द्वारा बताये गए विकल्पों के बारे में लोगो को जागृत करें.

पुस्तक का नाम : बेस्ट ऑफ़ करवाचौथ

लेखिका : रजनी तिलक

प्रकाशक :  अधिकरण प्रकाशन, दिल्ली

मूल्य : रुपैया 265 ( हार्ड कवर )

पेज : 107

समीक्षा लेखक :

विद्या भूषण रावत

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