सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में एक ही दिन दो अलग-अलग घटनाओं में तीन लोगों की मौत के बाद इस साल 188 दिनों में देश भर में सीवर और सेप्टिक टैंकों में मरने वालों की संख्या 101 हो गई है। केवल दिल्ली-एनसीआर में ही 12 लोगों की मौत हुई है।

Representation Image | The Hindu
नई दिल्ली, जुलाई 2026: 'सफाई कर्मचारी आंदोलन' (SKA) के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में एक ही दिन दो अलग-अलग घटनाओं में तीन लोगों की मौत के बाद इस साल 188 दिनों में देश भर में सीवर और सेप्टिक टैंकों में मरने वालों की संख्या 101 हो गई है। केवल दिल्ली-एनसीआर (NCR) में ही 12 लोगों की मौत हुई है। इस साल ऐसी मौतों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है, जबकि वर्ष 2025 में पूरे साल के दौरान 121 मौतें दर्ज की गई थीं। SKA हाथ से मैला ढोने की प्रथा (मैनुअल स्कैवेंजिंग) को समाप्त करने के लिए काम करने वाला एक आंदोलन है।
देश में हर 45 घंटे में सीवर से जुड़ी एक मौत होने के बावजूद सरकारें आपराधिक चुप्पी साधे हुए हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार के लिए दलितों की जान की कोई अहमियत नहीं है और इन मौतों को एक सामान्य घटना की तरह लिया जा रहा है। इस समस्या की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष देश के 16 राज्यों से सीवर और सेप्टिक टैंकों में मौत की खबरें सामने आई हैं। पिछले दशक में ऐसी मौतों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि हुई है। जहां वर्ष 2016 में केवल 39 मौतें दर्ज की गई थीं, वहीं 2017 में यह संख्या लगभग 350 प्रतिशत बढ़कर 137 तक पहुंच गई।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों और उसके बाद 'हाथ से मैला ढोने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013' लागू होने के बाद उम्मीद थी कि सरकारें इस दिशा में सक्रिय कदम उठाएंगी। हालांकि, SKA के अनुसार, इस कानून के लागू होने के बाद से अब तक 1,726 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें से 1,203 मौतें केवल सात राज्यों में हुई हैं—तमिलनाडु (332), गुजरात (216), दिल्ली-एनसीआर (157), महाराष्ट्र (155), उत्तर प्रदेश (148), हरियाणा (104) और बिहार (91)। इतनी बड़ी संख्या के बावजूद इन राज्यों में से किसी ने भी इन मौतों को रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं।
जुलाई 2023 में केंद्र सरकार ने NAMASTE (National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem) योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत शौचालयों और स्वच्छता व्यवस्था के मशीनीकरण के लिए 349.73 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। इससे पहले, स्वच्छ भारत मिशन के तहत सरकार 12 करोड़ शौचालयों के निर्माण पर लगभग 19,000 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी थी। इसके बावजूद न तो सफाई व्यवस्था का पर्याप्त मशीनीकरण हो पाया और न ही सूखे शौचालयों को पूरी तरह समाप्त किया जा सका।
विडंबना यह है कि इतने वर्षों तक केंद्र सरकार के मंत्रियों ने संसद में इन कड़वे तथ्यों से इनकार किया। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने यह तक कहा कि देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग के कारण किसी की मौत नहीं हुई है। इससे साफ जाहिर होता है कि सरकार इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेती है। यह भी स्पष्ट होता है कि आज भी अछूत समझे जाने वाले सफाई कर्मचारियों के जीवन को कितनी कम अहमियत दी जाती है।
SKA ने मांग की है कि प्रधानमंत्री तत्काल हस्तक्षेप करें और सीवर तथा सेप्टिक टैंकों के भीतर होने वाली मौतों को पूरी तरह रोकने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने की घोषणा करें। यह प्रेस विज्ञप्ति SKA के राष्ट्रीय संयोजक बेज़वाड़ा विल्सन द्वारा जारी की गई है।
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नई दिल्ली, जुलाई 2026: 'सफाई कर्मचारी आंदोलन' (SKA) के आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में एक ही दिन दो अलग-अलग घटनाओं में तीन लोगों की मौत के बाद इस साल 188 दिनों में देश भर में सीवर और सेप्टिक टैंकों में मरने वालों की संख्या 101 हो गई है। केवल दिल्ली-एनसीआर (NCR) में ही 12 लोगों की मौत हुई है। इस साल ऐसी मौतों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है, जबकि वर्ष 2025 में पूरे साल के दौरान 121 मौतें दर्ज की गई थीं। SKA हाथ से मैला ढोने की प्रथा (मैनुअल स्कैवेंजिंग) को समाप्त करने के लिए काम करने वाला एक आंदोलन है।
देश में हर 45 घंटे में सीवर से जुड़ी एक मौत होने के बावजूद सरकारें आपराधिक चुप्पी साधे हुए हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार के लिए दलितों की जान की कोई अहमियत नहीं है और इन मौतों को एक सामान्य घटना की तरह लिया जा रहा है। इस समस्या की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस वर्ष देश के 16 राज्यों से सीवर और सेप्टिक टैंकों में मौत की खबरें सामने आई हैं। पिछले दशक में ऐसी मौतों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि हुई है। जहां वर्ष 2016 में केवल 39 मौतें दर्ज की गई थीं, वहीं 2017 में यह संख्या लगभग 350 प्रतिशत बढ़कर 137 तक पहुंच गई।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों और उसके बाद 'हाथ से मैला ढोने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013' लागू होने के बाद उम्मीद थी कि सरकारें इस दिशा में सक्रिय कदम उठाएंगी। हालांकि, SKA के अनुसार, इस कानून के लागू होने के बाद से अब तक 1,726 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें से 1,203 मौतें केवल सात राज्यों में हुई हैं—तमिलनाडु (332), गुजरात (216), दिल्ली-एनसीआर (157), महाराष्ट्र (155), उत्तर प्रदेश (148), हरियाणा (104) और बिहार (91)। इतनी बड़ी संख्या के बावजूद इन राज्यों में से किसी ने भी इन मौतों को रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं।
जुलाई 2023 में केंद्र सरकार ने NAMASTE (National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem) योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत शौचालयों और स्वच्छता व्यवस्था के मशीनीकरण के लिए 349.73 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। इससे पहले, स्वच्छ भारत मिशन के तहत सरकार 12 करोड़ शौचालयों के निर्माण पर लगभग 19,000 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी थी। इसके बावजूद न तो सफाई व्यवस्था का पर्याप्त मशीनीकरण हो पाया और न ही सूखे शौचालयों को पूरी तरह समाप्त किया जा सका।
विडंबना यह है कि इतने वर्षों तक केंद्र सरकार के मंत्रियों ने संसद में इन कड़वे तथ्यों से इनकार किया। हैरानी की बात यह है कि उन्होंने यह तक कहा कि देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग के कारण किसी की मौत नहीं हुई है। इससे साफ जाहिर होता है कि सरकार इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेती है। यह भी स्पष्ट होता है कि आज भी अछूत समझे जाने वाले सफाई कर्मचारियों के जीवन को कितनी कम अहमियत दी जाती है।
SKA ने मांग की है कि प्रधानमंत्री तत्काल हस्तक्षेप करें और सीवर तथा सेप्टिक टैंकों के भीतर होने वाली मौतों को पूरी तरह रोकने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाने की घोषणा करें। यह प्रेस विज्ञप्ति SKA के राष्ट्रीय संयोजक बेज़वाड़ा विल्सन द्वारा जारी की गई है।
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