सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि देश में लगभग हर दूसरे दिन कोई न कोई व्यक्ति सीवर या सेप्टिक टैंक में अपनी जान गंवा रहा है, लेकिन सरकार इस गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है। संगठन के अनुसार, वर्ष 2025 में 121 मौतें दर्ज की गईं, जबकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या केवल 46 बताई गई है।

साभार : द मूकनायक
सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) जंतर-मंतर पर सीवर और सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों के विरोध में धरना-प्रदर्शन कर रहा है। इस कार्यक्रम में 10 राज्यों से आए सफाई कर्मचारी, सीवर हादसों में अपनी जान गंवाने वालों के परिजन और कई सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं। इस दौरान प्रधानमंत्री को संबोधित एक मांग-पत्र भी जारी किया जाएगा, जिसमें देशभर में हो रही इन मौतों को तुरंत रोकने की अपील की गई है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि देश में लगभग हर दूसरे दिन कोई न कोई व्यक्ति सीवर या सेप्टिक टैंक में अपनी जान गंवा रहा है, लेकिन सरकार इस गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है। संगठन के अनुसार, वर्ष 2025 में 121 मौतें दर्ज की गईं, जबकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या केवल 46 बताई गई है।
इसी तरह, 2024 में SKA ने 116 मौतों का रिकॉर्ड दर्ज किया, जबकि सरकार ने केवल 55 मौतें स्वीकार कीं। वहीं 2023 में भी SKA के आंकड़ों के मुताबिक 102 लोगों की मौत हुई, जबकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 65 बताई गई।
संगठन का आरोप है कि सरकार संसद में सीवर और सेप्टिक टैंक से जुड़ी मौतों के मामले में वास्तविकता से कम और भ्रामक आंकड़े पेश कर रही है।
संसद में हाल ही में दी गई जानकारी के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच पांच वर्षों में कुल 315 सफाई कर्मचारियों की मौत सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई। इनमें महाराष्ट्र सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहा, जहां 53 लोगों की जान गई।
इसके बाद हरियाणा में 43, तमिलनाडु में 38, उत्तर प्रदेश में 35, दिल्ली में 26, गुजरात में 25 और राजस्थान में 24 मौतें दर्ज की गईं। इन सात राज्यों में ही कुल मौतों का लगभग 77.5 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया है।
द मूकनायक ने लिखा, “यह वर्ष 2026 अभी शुरू ही हुआ है, और पूरे देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों में पहले ही 41 मौतें हो चुकी हैं, यानी तीन महीनों में 41 जानें चली गई हैं। लेकिन मौतों को रोकने के बजाय सरकार का ध्यान केवल सच को छिपाने पर है। यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। प्रधानमंत्री को इस विफलता को स्वीकार करना चाहिए और राष्ट्र से माफी मांगनी चाहिए।”
सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) के बेजवादा विल्सन ने कहा, “यह बेहद अन्यायपूर्ण है कि ऐसी मौतों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के बजाय सरकार की मुख्य चिंता आधिकारिक आंकड़ों में हेरफेर कर उन्हें कम दिखाने की लगती है। वर्ष 2025 में SKA ने सीवर और सेप्टिक टैंकों में 121 मौतें दर्ज कीं, जबकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या केवल 46 बताई गई है।
इसी तरह, 2024 में SKA के अनुसार 116 लोगों की मौत हुई, लेकिन सरकार ने केवल 55 मौतों की पुष्टि की। वहीं 2023 में SKA के पास 102 मौतों का रिकॉर्ड है, जबकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 65 बताई गई है।
विल्सन का आरोप है कि सरकार संसद में बार-बार वास्तविकता से कम और गलत आंकड़े पेश कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर सरकार इन मौतों की सच्चाई क्यों छिपा रही है?”
वर्ष 2026 की शुरुआत को अभी तीन महीने ही हुए हैं, लेकिन देशभर में सीवर और सेप्टिक टैंकों में काम के दौरान अब तक 41 लोगों की मौत हो चुकी है—यानी महज तीन महीनों में 41 जानें चली गई हैं।
संगठन का कहना है कि इन मौतों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के बजाय सरकार का ध्यान केवल सच्चाई को छिपाने पर है। इसे राष्ट्रीय शर्म का विषय बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को इस विफलता को स्वीकार करना चाहिए और देश से माफी मांगनी चाहिए।
साथ ही, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर में सूखे शौचालयों की सफाई के लिए अवैध और अमानवीय मैला ढोने की प्रथा अब भी जारी है। कानूनी प्रतिबंध होने के बावजूद दलित समुदायों, खासकर महिलाओं को, आज भी इस अपमानजनक और असुरक्षित काम के लिए मजबूर किया जा रहा है।
संगठन का कहना है कि सरकार के मंत्री संसद में बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि देश में मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है, जबकि हकीकत इससे अलग है। यह केवल गलत जानकारी देना ही नहीं, बल्कि जमीनी सच्चाई से आंखें मूंदने और न्याय सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी से बचने जैसा है।
संगठन ने प्रधानमंत्री से इस स्थिति की जिम्मेदारी स्वीकार करने और देश से माफी मांगने की मांग की है। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर में सूखे शौचालयों की सफाई के लिए अब भी अवैध और अमानवीय मैनुअल स्कैवेंजिंग जारी है।
कानूनी प्रतिबंध होने के बावजूद दलित समुदायों, खासकर महिलाओं को, इस अपमानजनक काम के लिए मजबूर किया जा रहा है। वहीं सरकार के मंत्री संसद में बार-बार यह दावा करते हैं कि मैनुअल स्कैवेंजिंग पूरी तरह समाप्त हो चुकी है, लेकिन सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) का कहना है कि यह दावा जमीनी हकीकत से इनकार करने जैसा है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन पिछले लगभग 40 वर्षों से इस मुद्दे पर लगातार संघर्ष कर रहा है। आज सुबह 11 बजे जंतर-मंतर पर आयोजित कार्यक्रम में #StopKillingUs के नारे के साथ सीवर और सेप्टिक टैंकों में हो रही मौतों को तुरंत रोकने और मैनुअल स्कैवेंजिंग की प्रथा को पूरी तरह समाप्त करने की मांग जोरदार तरीके से उठाई जाएगी।
बता दें कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बीते सप्ताह एक दर्दनाक हादसा सामने आया। पचपेड़ी नाका स्थित रामकृष्ण अस्पताल के पीछे बने सीवरेज टैंक की सफाई के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से तीन सफाईकर्मियों की दम घुटने से मौत हो गई, जबकि एक अन्य कर्मचारी की हालत गंभीर बताई गई।
यह घटना टिकरापारा थाना क्षेत्र की थी। जानकारी के अनुसार, टैंक के अंदर मौजूद जहरीली गैस के संपर्क में आते ही सभी मजदूर बेहोश हो गए। उन्हें तुरंत बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन तब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी थी।
मृतकों की पहचान अनमोल मांझी (25), गोविंद सेंद्रे (35) और सत्यम कुमार (22) के रूप में हुई है। अन्य मजदूर का इलाज जारी है। बताया जा रहा है कि सभी मजदूर एक कॉन्ट्रैक्ट एजेंसी के माध्यम से काम कर रहे थे।
इस दर्दनाक हादसे के बीच केंद्र सरकार ने लोकसभा में सपा सांसद इकरा चौधरी के सवाल के जवाब में सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले द्वारा मंगलवार को पेश किए गए आंकड़ों में बताया कि 2017 से अब तक देशभर में सीवर और सेप्टिक टैंक की दुर्घटनाओं में कम से कम 622 सफाईकर्मियों की मौत हुई है।
देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई इन मौतों के मामलों में 539 परिवारों को पूरा मुआवजा मिला है, जबकि 25 परिवारों को आंशिक मुआवजा दिया गया है। वहीं 52 परिवार ऐसे हैं जिन्हें अब तक किसी प्रकार का मुआवजा नहीं मिला है। इसके अलावा, छह मामलों को बिना किसी ठोस समाधान के ही बंद कर दिया गया।
आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक 86 मौतें उत्तर प्रदेश में दर्ज की गईं। इसके बाद महाराष्ट्र में 82, तमिलनाडु में 77, हरियाणा में 76, गुजरात में 73 और दिल्ली में 62 लोगों की मौत हुई।
उत्तर प्रदेश में 13 परिवार ऐसे हैं जिन्हें अब तक कोई सहायता नहीं मिली है, जबकि दो परिवारों को आंशिक मुआवजा दिया गया है। वहीं दिल्ली में नौ परिवार ऐसे हैं जिन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिल पाया है।
सरकार ने ‘प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऐज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट, 2013’ के तहत वर्ष 2023 में कराए गए सर्वे का हवाला देते हुए कहा है कि देश के किसी भी जिले में मैनुअल स्कैवेंजर्स की मौजूदगी नहीं पाई गई। इसके बावजूद, सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के दौरान मौतों का सिलसिला लगातार जारी है। रायपुर में हुआ यह हालिया हादसा इस गंभीर समस्या की ओर एक बार फिर ध्यान दिलाता है।
केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने संसद में इस तरह के सवालों के जवाब में कई बार स्पष्ट किया है कि मैनुअल स्कैवेंजिंग—यानी अस्वच्छ शौचालयों से मानव मल उठाने की प्रक्रिया—के कारण किसी की मौत दर्ज नहीं हुई है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान सुरक्षा उपकरणों की कमी और लापरवाही के कारण होने वाली मौतों को लेकर सरकार गंभीर है।
सरकार ने वर्ष 2023-24 में ‘नेशनल एक्शन फॉर मैकेनाइज्ड सैनिटेशन इकोसिस्टम’ (NAMASTE) योजना की शुरुआत की। इसका उद्देश्य सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, ताकि हाथ से मैला ढोने की प्रथा को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
इस कार्यक्रम के तहत सीवर और सेप्टिक टैंक में काम करने वाले कर्मचारियों (SSWs) के पुनर्वास और कौशल विकास पर भी जोर दिया गया है। साथ ही उन्हें प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और आवश्यक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है, ताकि उनका काम सुरक्षित और सम्मानजनक बन सके।
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साभार : द मूकनायक
सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) जंतर-मंतर पर सीवर और सेप्टिक टैंकों में होने वाली मौतों के विरोध में धरना-प्रदर्शन कर रहा है। इस कार्यक्रम में 10 राज्यों से आए सफाई कर्मचारी, सीवर हादसों में अपनी जान गंवाने वालों के परिजन और कई सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हो रहे हैं। इस दौरान प्रधानमंत्री को संबोधित एक मांग-पत्र भी जारी किया जाएगा, जिसमें देशभर में हो रही इन मौतों को तुरंत रोकने की अपील की गई है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि देश में लगभग हर दूसरे दिन कोई न कोई व्यक्ति सीवर या सेप्टिक टैंक में अपनी जान गंवा रहा है, लेकिन सरकार इस गंभीर मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए है। संगठन के अनुसार, वर्ष 2025 में 121 मौतें दर्ज की गईं, जबकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या केवल 46 बताई गई है।
इसी तरह, 2024 में SKA ने 116 मौतों का रिकॉर्ड दर्ज किया, जबकि सरकार ने केवल 55 मौतें स्वीकार कीं। वहीं 2023 में भी SKA के आंकड़ों के मुताबिक 102 लोगों की मौत हुई, जबकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 65 बताई गई।
संगठन का आरोप है कि सरकार संसद में सीवर और सेप्टिक टैंक से जुड़ी मौतों के मामले में वास्तविकता से कम और भ्रामक आंकड़े पेश कर रही है।
संसद में हाल ही में दी गई जानकारी के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच पांच वर्षों में कुल 315 सफाई कर्मचारियों की मौत सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान हुई। इनमें महाराष्ट्र सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहा, जहां 53 लोगों की जान गई।
इसके बाद हरियाणा में 43, तमिलनाडु में 38, उत्तर प्रदेश में 35, दिल्ली में 26, गुजरात में 25 और राजस्थान में 24 मौतें दर्ज की गईं। इन सात राज्यों में ही कुल मौतों का लगभग 77.5 प्रतिशत हिस्सा दर्ज किया गया है।
द मूकनायक ने लिखा, “यह वर्ष 2026 अभी शुरू ही हुआ है, और पूरे देश में सीवर और सेप्टिक टैंकों में पहले ही 41 मौतें हो चुकी हैं, यानी तीन महीनों में 41 जानें चली गई हैं। लेकिन मौतों को रोकने के बजाय सरकार का ध्यान केवल सच को छिपाने पर है। यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। प्रधानमंत्री को इस विफलता को स्वीकार करना चाहिए और राष्ट्र से माफी मांगनी चाहिए।”
सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) के बेजवादा विल्सन ने कहा, “यह बेहद अन्यायपूर्ण है कि ऐसी मौतों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के बजाय सरकार की मुख्य चिंता आधिकारिक आंकड़ों में हेरफेर कर उन्हें कम दिखाने की लगती है। वर्ष 2025 में SKA ने सीवर और सेप्टिक टैंकों में 121 मौतें दर्ज कीं, जबकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या केवल 46 बताई गई है।
इसी तरह, 2024 में SKA के अनुसार 116 लोगों की मौत हुई, लेकिन सरकार ने केवल 55 मौतों की पुष्टि की। वहीं 2023 में SKA के पास 102 मौतों का रिकॉर्ड है, जबकि सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 65 बताई गई है।
विल्सन का आरोप है कि सरकार संसद में बार-बार वास्तविकता से कम और गलत आंकड़े पेश कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर सरकार इन मौतों की सच्चाई क्यों छिपा रही है?”
वर्ष 2026 की शुरुआत को अभी तीन महीने ही हुए हैं, लेकिन देशभर में सीवर और सेप्टिक टैंकों में काम के दौरान अब तक 41 लोगों की मौत हो चुकी है—यानी महज तीन महीनों में 41 जानें चली गई हैं।
संगठन का कहना है कि इन मौतों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने के बजाय सरकार का ध्यान केवल सच्चाई को छिपाने पर है। इसे राष्ट्रीय शर्म का विषय बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को इस विफलता को स्वीकार करना चाहिए और देश से माफी मांगनी चाहिए।
साथ ही, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर में सूखे शौचालयों की सफाई के लिए अवैध और अमानवीय मैला ढोने की प्रथा अब भी जारी है। कानूनी प्रतिबंध होने के बावजूद दलित समुदायों, खासकर महिलाओं को, आज भी इस अपमानजनक और असुरक्षित काम के लिए मजबूर किया जा रहा है।
संगठन का कहना है कि सरकार के मंत्री संसद में बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि देश में मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह समाप्त हो चुकी है, जबकि हकीकत इससे अलग है। यह केवल गलत जानकारी देना ही नहीं, बल्कि जमीनी सच्चाई से आंखें मूंदने और न्याय सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी से बचने जैसा है।
संगठन ने प्रधानमंत्री से इस स्थिति की जिम्मेदारी स्वीकार करने और देश से माफी मांगने की मांग की है। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर में सूखे शौचालयों की सफाई के लिए अब भी अवैध और अमानवीय मैनुअल स्कैवेंजिंग जारी है।
कानूनी प्रतिबंध होने के बावजूद दलित समुदायों, खासकर महिलाओं को, इस अपमानजनक काम के लिए मजबूर किया जा रहा है। वहीं सरकार के मंत्री संसद में बार-बार यह दावा करते हैं कि मैनुअल स्कैवेंजिंग पूरी तरह समाप्त हो चुकी है, लेकिन सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) का कहना है कि यह दावा जमीनी हकीकत से इनकार करने जैसा है।
सफाई कर्मचारी आंदोलन पिछले लगभग 40 वर्षों से इस मुद्दे पर लगातार संघर्ष कर रहा है। आज सुबह 11 बजे जंतर-मंतर पर आयोजित कार्यक्रम में #StopKillingUs के नारे के साथ सीवर और सेप्टिक टैंकों में हो रही मौतों को तुरंत रोकने और मैनुअल स्कैवेंजिंग की प्रथा को पूरी तरह समाप्त करने की मांग जोरदार तरीके से उठाई जाएगी।
बता दें कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बीते सप्ताह एक दर्दनाक हादसा सामने आया। पचपेड़ी नाका स्थित रामकृष्ण अस्पताल के पीछे बने सीवरेज टैंक की सफाई के दौरान जहरीली गैस की चपेट में आने से तीन सफाईकर्मियों की दम घुटने से मौत हो गई, जबकि एक अन्य कर्मचारी की हालत गंभीर बताई गई।
यह घटना टिकरापारा थाना क्षेत्र की थी। जानकारी के अनुसार, टैंक के अंदर मौजूद जहरीली गैस के संपर्क में आते ही सभी मजदूर बेहोश हो गए। उन्हें तुरंत बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन तब तक तीन लोगों की मौत हो चुकी थी।
मृतकों की पहचान अनमोल मांझी (25), गोविंद सेंद्रे (35) और सत्यम कुमार (22) के रूप में हुई है। अन्य मजदूर का इलाज जारी है। बताया जा रहा है कि सभी मजदूर एक कॉन्ट्रैक्ट एजेंसी के माध्यम से काम कर रहे थे।
इस दर्दनाक हादसे के बीच केंद्र सरकार ने लोकसभा में सपा सांसद इकरा चौधरी के सवाल के जवाब में सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले द्वारा मंगलवार को पेश किए गए आंकड़ों में बताया कि 2017 से अब तक देशभर में सीवर और सेप्टिक टैंक की दुर्घटनाओं में कम से कम 622 सफाईकर्मियों की मौत हुई है।
देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई इन मौतों के मामलों में 539 परिवारों को पूरा मुआवजा मिला है, जबकि 25 परिवारों को आंशिक मुआवजा दिया गया है। वहीं 52 परिवार ऐसे हैं जिन्हें अब तक किसी प्रकार का मुआवजा नहीं मिला है। इसके अलावा, छह मामलों को बिना किसी ठोस समाधान के ही बंद कर दिया गया।
आंकड़ों के अनुसार, सबसे अधिक 86 मौतें उत्तर प्रदेश में दर्ज की गईं। इसके बाद महाराष्ट्र में 82, तमिलनाडु में 77, हरियाणा में 76, गुजरात में 73 और दिल्ली में 62 लोगों की मौत हुई।
उत्तर प्रदेश में 13 परिवार ऐसे हैं जिन्हें अब तक कोई सहायता नहीं मिली है, जबकि दो परिवारों को आंशिक मुआवजा दिया गया है। वहीं दिल्ली में नौ परिवार ऐसे हैं जिन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिल पाया है।
सरकार ने ‘प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट ऐज मैनुअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट, 2013’ के तहत वर्ष 2023 में कराए गए सर्वे का हवाला देते हुए कहा है कि देश के किसी भी जिले में मैनुअल स्कैवेंजर्स की मौजूदगी नहीं पाई गई। इसके बावजूद, सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के दौरान मौतों का सिलसिला लगातार जारी है। रायपुर में हुआ यह हालिया हादसा इस गंभीर समस्या की ओर एक बार फिर ध्यान दिलाता है।
केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने संसद में इस तरह के सवालों के जवाब में कई बार स्पष्ट किया है कि मैनुअल स्कैवेंजिंग—यानी अस्वच्छ शौचालयों से मानव मल उठाने की प्रक्रिया—के कारण किसी की मौत दर्ज नहीं हुई है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान सुरक्षा उपकरणों की कमी और लापरवाही के कारण होने वाली मौतों को लेकर सरकार गंभीर है।
सरकार ने वर्ष 2023-24 में ‘नेशनल एक्शन फॉर मैकेनाइज्ड सैनिटेशन इकोसिस्टम’ (NAMASTE) योजना की शुरुआत की। इसका उद्देश्य सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई में मशीनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, ताकि हाथ से मैला ढोने की प्रथा को पूरी तरह खत्म किया जा सके।
इस कार्यक्रम के तहत सीवर और सेप्टिक टैंक में काम करने वाले कर्मचारियों (SSWs) के पुनर्वास और कौशल विकास पर भी जोर दिया गया है। साथ ही उन्हें प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और आवश्यक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है, ताकि उनका काम सुरक्षित और सम्मानजनक बन सके।
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