उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया गया, उन्होंने जेल में समय बिताया और उन्हें विश्वविद्यालय से निष्कासित भी किया गया। इन तमाम परिस्थितियों के बीच तैयार की गई उनकी पीएचडी थीसिस जुलाई 2018 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज़ में जमा की गई थी। तब से यह शोध विद्वानों और इतिहासकारों के बीच व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में बेहद कठिन परिस्थितियों में पूरी की गई उमर खालिद की डॉक्टरेट शोध पहली बार पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई है। 'फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज़: आदिवासी हिस्ट्रीज़ एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर' (Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power) शीर्षक से प्रकाशित यह पुस्तक अब जगरनॉट बुक्स (Juggernaut Books) से उपलब्ध है और इसका औपचारिक विमोचन 27 जून को किया जाएगा।
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, यह पुस्तक खालिद की उस पीएचडी थीसिस पर आधारित है, जिसे उन्होंने जुलाई 2018 में JNU के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज़ में प्रस्तुत किया था। इसमें वर्तमान झारखंड (पूर्व के विस्तृत छोटानागपुर पठार क्षेत्र) के सिंहभूम इलाके में रहने वाले आदिवासी समुदायों के इतिहास का गहन अध्ययन किया गया है।
अभिलेखीय (आर्काइव) स्रोतों के आधार पर यह पुस्तक ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान आदिवासी समाजों की जटिलताओं की पड़ताल करती है और आदिवासी प्रतिरोध की एकरूप तथा सरलीकृत व्याख्याओं को चुनौती देती है। पुस्तक दिखाती है कि इन समुदायों के भीतर भी विभाजन मौजूद थे—कुछ लोगों ने औपनिवेशिक सत्ता का विरोध किया, कुछ ने उससे सहयोग किया, जबकि कई समूहों ने सत्ता और संसाधनों को लेकर औपनिवेशिक अधिकारियों तथा पड़ोसी समुदायों के साथ समझौते और मोलभाव किए।
पुस्तक की प्रस्तावना प्रख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखी है। उन्होंने इसे "मजबूत तर्कों वाली" और "बेहद रोचक" कृति बताया है। सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में गुहा ने लिखा, "उमर खालिद की शानदार पीएचडी थीसिस अब पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई है। यह छोटानागपुर के आदिवासियों के इतिहास पर आधारित एक गहन शोध है और पढ़ने में अत्यंत दिलचस्प है। उम्मीद है कि उनकी लंबी और कठोर कैद जल्द समाप्त होगी और डॉ. खालिद ऐतिहासिक शोध के क्षेत्र में आगे भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे।"
पुस्तक का आफ्टरवर्ड समाजशास्त्री नंदिनी सुंदर ने लिखा है। इसके प्रकाशन के अवसर पर 20 से 27 जून तक इसका किंडल संस्करण Amazon India पर निःशुल्क उपलब्ध कराया गया है। पुस्तक का मुद्रित संस्करण लगभग 400 पृष्ठों का है।
JNU के पूर्व छात्र, एक्टिविस्ट और इतिहासकार उमर खालिद ने अनेक कानूनी और संस्थागत चुनौतियों के बीच अपनी थीसिस पूरी की थी। इन चुनौतियों में उन पर लगाए गए देशद्रोह के आरोप और विश्वविद्यालय से निष्कासन भी शामिल थे। सितंबर 2020 से वे UAPA तथा अन्य धाराओं के तहत 2020 दिल्ली हिंसा से जुड़े कथित साजिश मामले में न्यायिक हिरासत में हैं। इस मामले का मुकदमा अभी भी जारी है।
'फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज़' केवल सबाल्टर्न (वंचित समुदायों) और पर्यावरणीय इतिहास के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अकादमिक योगदान नहीं है, बल्कि यह सत्ता-केंद्रित इतिहास लेखन की आलोचनात्मक समीक्षा भी प्रस्तुत करती है। पहचान, इतिहास और स्मृति को लेकर चल रही समकालीन बहसों के संदर्भ में भी यह पुस्तक विशेष महत्व रखती है।
पाठक Amazon पर पुस्तक का नाम खोजकर निर्धारित प्रचार अवधि के दौरान इसका किंडल संस्करण निःशुल्क प्राप्त कर सकते हैं।
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द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, यह पुस्तक खालिद की उस पीएचडी थीसिस पर आधारित है, जिसे उन्होंने जुलाई 2018 में JNU के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज़ में प्रस्तुत किया था। इसमें वर्तमान झारखंड (पूर्व के विस्तृत छोटानागपुर पठार क्षेत्र) के सिंहभूम इलाके में रहने वाले आदिवासी समुदायों के इतिहास का गहन अध्ययन किया गया है।
अभिलेखीय (आर्काइव) स्रोतों के आधार पर यह पुस्तक ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान आदिवासी समाजों की जटिलताओं की पड़ताल करती है और आदिवासी प्रतिरोध की एकरूप तथा सरलीकृत व्याख्याओं को चुनौती देती है। पुस्तक दिखाती है कि इन समुदायों के भीतर भी विभाजन मौजूद थे—कुछ लोगों ने औपनिवेशिक सत्ता का विरोध किया, कुछ ने उससे सहयोग किया, जबकि कई समूहों ने सत्ता और संसाधनों को लेकर औपनिवेशिक अधिकारियों तथा पड़ोसी समुदायों के साथ समझौते और मोलभाव किए।
पुस्तक की प्रस्तावना प्रख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने लिखी है। उन्होंने इसे "मजबूत तर्कों वाली" और "बेहद रोचक" कृति बताया है। सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में गुहा ने लिखा, "उमर खालिद की शानदार पीएचडी थीसिस अब पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई है। यह छोटानागपुर के आदिवासियों के इतिहास पर आधारित एक गहन शोध है और पढ़ने में अत्यंत दिलचस्प है। उम्मीद है कि उनकी लंबी और कठोर कैद जल्द समाप्त होगी और डॉ. खालिद ऐतिहासिक शोध के क्षेत्र में आगे भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे।"
पुस्तक का आफ्टरवर्ड समाजशास्त्री नंदिनी सुंदर ने लिखा है। इसके प्रकाशन के अवसर पर 20 से 27 जून तक इसका किंडल संस्करण Amazon India पर निःशुल्क उपलब्ध कराया गया है। पुस्तक का मुद्रित संस्करण लगभग 400 पृष्ठों का है।
JNU के पूर्व छात्र, एक्टिविस्ट और इतिहासकार उमर खालिद ने अनेक कानूनी और संस्थागत चुनौतियों के बीच अपनी थीसिस पूरी की थी। इन चुनौतियों में उन पर लगाए गए देशद्रोह के आरोप और विश्वविद्यालय से निष्कासन भी शामिल थे। सितंबर 2020 से वे UAPA तथा अन्य धाराओं के तहत 2020 दिल्ली हिंसा से जुड़े कथित साजिश मामले में न्यायिक हिरासत में हैं। इस मामले का मुकदमा अभी भी जारी है।
'फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज़' केवल सबाल्टर्न (वंचित समुदायों) और पर्यावरणीय इतिहास के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण अकादमिक योगदान नहीं है, बल्कि यह सत्ता-केंद्रित इतिहास लेखन की आलोचनात्मक समीक्षा भी प्रस्तुत करती है। पहचान, इतिहास और स्मृति को लेकर चल रही समकालीन बहसों के संदर्भ में भी यह पुस्तक विशेष महत्व रखती है।
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